मंगलवार, 18 सितंबर 2012

जानेमन तुम कमाल करती हो!

मेरी प्रिय जानेमन,

कई दिनों से सोच रही थी तुमसे दिल की सारी उथल-पुथल साझा करूं, ज़िन्दगी के उन मुख़्तसर मसलों पर तुम्हारी राय पूछूं जो यूं तो बेतुकी और बेमानी होते हैं, लेकिन अक्सर उन मसलों की संजीदगी दो देशों में छिड़ी कूटनीतिक जंग से कम नहीं होती।

अब लोगों को भले ही ये लगता हो कि हमारी-तुम्हारी रोज़मर्रा की इस एकदम बेमज़ा और नीरस ज़िन्दगी में है ही क्या जिसमें किसी की दिलचस्पी हो, जिसके बारे में लिखा जाए, जिसके बारे में बात किया जाए... इससे बड़े भी तो कितने मसले हैं दुनिया में? लोग एक-दूसरे को मारते-काटते क्यों हैं... मौनमोहन सिंह के बाद कौन... एक मज़बूत विपक्ष का ना होना लोकतंत्र के लिए कितना बड़ा ख़तरा है... अरब देशों में आई क्रांति का हासिल क्या, वगैरह वगैरह।

ज़रूरी हैं ये सारे मसले। एक से बढ़कर एक ज्वलंत मुद्दे। एक से बड़ी एक चिंताएं। लेकिन ये सब तभी ना कि जब तक सांसें हैं, जान है, सेहत है, दिमाग़ है? बाकी, सुकून से परे अपने लिए दुनिया भर की हज़ार दुश्चिंताएं जुटा लेना और उन्हें मंथन के लिए दिमाग के सागर में डाल देने का काम तो हम हर रोज़ बख़ूबी करते हैं। जो काम करना आता नहीं वो लम्हा-लम्हा खिसकती, रेंगती ज़िन्दगी के छोटे-छोटे, नीरस, बेमज़ा, मन्डेन लम्हों में से कुछ उदात्त, कुछ सबलाईम निकालने का हुनर है।

जानेमन, ये हुनर तुम्हें आता होगा, ऐसा मैं सोचा करती थी। मुझे लगता था कि सोच और कल्पना के धागों में हक़ीकत को पिरोकर उनका संतुलन बनाकर चलनेवाले लोगों में से रही होगी तुम। मुझे लगता था कि तुम अपनी और अपने आस-पास बसी छोटी-छोटी नेमतों की कद्र करना जानती होगी। लेकिन मैं परेशान हूं क्योंकि तुम्हें हैरान-परेशान देखती हूं आजकल।

दिल की ये जो उथल-पुथल है ना, वो इसलिए है कि तुम्हें कटघरे में खड़ा करके तुमसे जिरह करना, जवाबतलब करना मुझे ज़रा भी रुचिकर नहीं लगता। टू इच हिज़ ऑर हर ओन। सबकी अपनी-अपनी ज़िन्दगियां होती हैं, जीने के तरीके होते हैं, और इन तरीकों में एक ही बात स्थायी होती है - बदलाव। हम हर रोज़ बदल रहे होते हैं, हर रोज़ एक नए तरीके से जीने की ख़्वाहिश कर रहे होते हैं। हर रोज़ हमारे लिए सही और ग़लत के मायने बदलते रहते हैं। इसलिए किसी से सवाल पूछने या उसे सही-गलत ठहराने का हक़ हमें किसी ने दिया नहीं। हम ना न्यायपालिका हैं ना कार्यपालिका। हम तो वो नगरपालिका हैं जिसपर अपनी ही भ्रष्ट व्यवस्था से जूझते हुए भी अपने ही टूटे-फूटे शहर को बचाए रखने का दारोमदार होता है।

तो फिर तुम्हें ख़त क्यों लिख रही हूं? सुबह-सुबह ऐसी भाषणबाज़ी से हासिल क्या करना चाहती हूं?

जानेमन, ये ख़त तुम्हें तुम्हारे बारे में ही कई चीज़ें याद दिलाने की प्रक्रिया का एक हिस्सा है। ये ख़त तमाम बदलावों के बीच उस शाश्वत सत्य को रेखांकित करने का एक ज़रिया है, जो हम अक्सर भूल जाया करते हैं। एक शाश्वत सत्य ये है कि इस पूरे विशालकाय ब्रह्मांड के उलझे-पेचीदा सांचे में हमें किसी एक रूप में कहीं घुसाया गया है, कहीं फिट किया गया है तो उसका कोई उद्देश्य ज़रूर होगा। लेकिन उस एक या अनेक उद्देश्यों को हम पूरा कर सकें, उसके लिए हमारा शारीरिक और मानसिक तौर पर दुरुस्त होना लाज़िमी है।

जानेमन, तुम एक स्त्री हो, बीवी हो, मां हो, और जाने किन-किन रूपों में उन उद्द्श्यों को पूरा करने की जुगत में लगी रहती हो। तुम्हारा घर साफ-सुथरा हो, तुम्हारे बच्चे हंसते-खेलते रहें, तुम्हारा सुहाग अमर-अडिग रहे, तुम्हारे काम पर कोई उंगली ना उठाए, तुम्हारा घर भी बचा रहे और तुम्हारी महत्वाकांक्षाएं भी, और सड़क पर चलते हुए तुम्हारा आत्मसम्मान बचा रहे - इन कोशिशों में तुमने देखा कि क्या हश्र करती हो अपना?

टेक ईट ईज़ी, जानेमन। लंबी गहरी सांसें लो और जो आस-पास त्याज्य है उसे छोड़ना सीखो। जाने दो, उन कड़वी बातों को, उन तकलीफ़देह सच्चाईयों को जो तुम्हारी रातों की नींद ख़राब करने चले आते हैं। दो-चार दिन के लिए अपना झंडा नीचे कर दो, और कहो कि इस संघर्षरत ज़ेहन को आराम दो। अपने साथ इतनी ज़्यादतियां क्यों करती हो? कह कर तो देखो, तुम्हारे लिए मदद के कई दरवाज़े खुलेंगे। सबकुछ इतना भी दुरूह नहीं।  इसमें कोई दो राय नहीं कि तुम्हारे अथक होने, साहसी होने और तुम्हारी हार ना मानने की प्रवृत्ति ही इस धरती की धुरी है। सबकुछ तुम्हारे इर्द-गिर्द ही चलता है। लेकिन धरती भी ऐसे घूमती है कि कहीं दिन का उजाला हो, कहीं रात का अंधेरा। और धरती भी सौर ऊर्जा से चलती है, किसी और की ताक़त से।

जानेमन, देखा है आस-पास कभी, कि कुछ भी स्टैंड-अलोन नहीं होता। प्रकृति धूप और बारिश पर निर्भर है, नदियां बर्फीली चोटियों और समंदर पर। पेड़ धरती से फूटते हैं, फल पेड़ों की डालियों पर आते हैं। चींटियां तक केंचुओं के मृत शरीर पर आश्रित हैं। शेर को हिरण चाहिए, हिरण को घास, और घास को फिर से शेर के अवशेष। ऐकला चॉलो रे की डाक लगाने वाला भी अपने पीछे एक कारवां जुटने की उम्मीद करता है।

तो फिर तुम्हें क्यों लगता है कि अपने कंधे पर दुनियाभर का बोझ लिए तुम जी जाओगी? तुम्हें क्यों लगता है कि पूरे घर-संसार का दारोमदार एक तुम्हारे खुद को माथे है? तुम्हें क्यों लगता है कि एक तुम स्थिर हो, बाकी सब आनी-जानी है?

जीवन का दूसरा और बेहद कड़वा सत्य ये भी है कि अपनी जिस दुनिया में ख़ुद को तुम इन्डिसपेन्सेबल, अपरित्याज्य माने रहती हो उस दुनिया का काम तुम्हारे बग़ैर बड़े मज़े में (और कई बार तो ज़्यादा बेहतर तरीके से) चलता है। इसलिए जानेमन, अपनी इत्ती-सी दुनिया से बाहर निकलो और देखो कि जीने-सुनने-समझने-भोगने-देने-समेटने के लिए कितना कुछ बाकी है अभी।

जियो मेरी जान, ख़ुद के लिए भी कभी-कभी, कि बाकी तो दूसरों के लिए जीना तो तुम्हारी ख़ूबसूरत फ़ितरत है।

अनु सिंह, सब समझती हो फिर भी कितनी नासमझ हो!! जानेमन, तुम वाकई कमाल करती हो!!!

ढेर सारे प्यार के साथ,

तुम्हारे भीतर की रूह,
जो बहुत सोचती है और उससे ज़्यादा बोलती है!





गुरुवार, 30 अगस्त 2012

ख़्यालों, ख्वाबों, ख़्वाहिशों के ख़त

एक मम्मा थी। कभी बहुत बोलती थी, कभी ख़ामोश रहती थी। मम्मा का पूरा दिन अपने मन के आंगन से ख़ामख़्याली के पंछियों को उड़ाने में जाता था। मम्मा अच्छी चिड़ीमार नहीं थी, इसलिए ख़्यालों के पंछियों को फुर्र-फुर्र करके उड़ा दिया करती थी, उन्हें शब्दों के पिंजरों में बंद करने का हुनर उसे कभी आया ही नहीं।

ख़्यालों को उड़ाते-उड़ाते जब उलझ जाया करती तो ख़्वाब बुनने लगती - उस हसीन दुनिया के ख़्वाब जहां अमन-चैन हो, जहां बताशों के बदले प्रसाद में मीठी बोलियां बांटी जाती हों, जहां दुख-तकलीफ़ों के बीच हौसले के पुल बनाने को प्रोत्साहन मिलता हो।

फिर कुछ ऊंटपटांग-सी ख़्वाहिशें भी थीं मम्मा की। फर्श पर छितरा गए दूध से सफ़ेद लकीरों वाले रेखाचित्र बनाने की ख़्वाहिश, खुरदुरी और सख़्त हथेलियों की कटी-पीटी लकीरों को बच्चों के इरेज़र से मिटा देने की ख़्वाहिश, अपनी सोच की धार को उनके शार्पनर से और नुकीला कर देने की ख़्वाहिश, पार्क में अकेले बैठे सफेद मूंछोंवाले राजगढ़िया अंकल को खीर खिलाने की ख़्वाहिश, आस-पास तैरती बेनामी कहानियों को डिब्बों में बंद कर देने की ख़्वाहिश...

इन ख़्यालों, ख़्वाबों और ख़्वाहिशों के ख़त मम्मा चलते-फिरते, सोते-जगते, रुकते-थमते, हंसते-बोलते जाने किसको-किसको लिखा करती थी। वक़्त कम पड़ता गया, वो ख़त पूरा नहीं हुआ और एक जो क़ासिद हुआ करता था, वो भी थककर चला गया।  इस डाकखाने में नहीं, सारे ज़माने में नहीं... मम्मा गुनगुनाती रही और फिर भी अपने दिमाग में लिखती रही एक के बाद एक चिट्ठियां...

1.

लाल बत्ती के हरियाते ही
गाड़ियों के बीच से
निकल जाएगी
उस मम्मा की गाड़ी

बगल की सीट पर
ख़ामोश बैठे रहेंगे
सुबह पांच बजे
उठकर तैयार किए गए
टपरवेयर के डिब्बे
और पीछे की सीट पर
दो बच्चे

एक को डेकेयर छोड़ने के बाद
दूसरे को 'स्कूल फॉर स्पेशल चिल्ड्रेन'
पर छोड़ आएगी वो
और फ़ीस के लिए
ज़लालत को निगलकर
दिनभर करेगी जद्दोज़ेहद

शाम तो फिर भी होगी,
है ना मम्मा?

2.

खीर में पीसकर डालो इलायची
तो खुशबू
बढ़ा देती है स्वाद
मां की रेसिपी डायरी में
क्यों नहीं मिलता
ज़िन्दगी का अचार डाल सकनेवाला
कोई नुस्ख़ा।

3.

सुरमई रात
बरसती रही
बहाती रही काजल
हम उम्मीद की आंखें मूंदे
तकिए में सिर घुसाए
काटते रहे रात।

4.

चलो छोड़ो
करो ना वक़्त ज़ाया
नहीं पढ़ता इन दिनों कोई चिट्ठियां
हमारे लेटर बॉक्स में भी सिर्फ
टेलीफोन और बिजली के बिल मिलते हैं

फिर भी मैं कैसे फाड़ दूं
तुम्हारे पते वाला लिफ़ाफ़ा?


सोमवार, 20 अगस्त 2012

शून्य के सन्नाटे में

गर्मी की छुट्टियों की एक शाम ननिहाल की आंगन में गोटियां खेलने बैठे थे हम। चबूतरों और खंभों वाले आंगन के एक कोने में एक, फिर दो, फिर तीन, फिर चार गोटियों को एक साथ सफाई से समेटते हुए उलझते-झगड़ते खेल जारी था। पीछे विविध भारती बज रहा था। हमारे खेल की मसरूफियत मौसी ने तोड़ी थी, जो नंगे पांव बदहवास रसोई से दौडती हुए रेडियो के पास आई थी। आटे सने हाथ से मौसी ने रेडियो के बगल में रखी अपनी डायरी निकाली थी और वहीं पालथी मारकर बैठ गई और कुछ तेज़ी से लिखने लगी। 'क्या हुआ मौसी' का जवाब होठों पर रखी हुए एक उंगली से दिया था उन्होंने और बदस्तूर लिखती रही थी। गाना ख़त्म हुआ, मौसी के चेहरे पर मुस्कुराहट उतर आई और हंसते हुए कहा, "कितने दिन से इस गाने के बोल लिखना चाह रहे थे। आज पूरा कर ही लिए।" फाउंटेन पेन को धोने और आटे को दुबारा गूंधने के दोहरे काम से बढ़कर थी गाने के बोल लिख लेने की वो खुशी। वैसे मुझे याद नहीं कि गाना कौन-सा था, किसी और के लिखे हुए गीत के बोल अपनी डायरी में उतारते हुए मौसी के चेहरे की चमक याद है बस।

ट्विटर पर छिड़े एक गीत की चर्चा ने आज मेरी वो हालत की तो वो दुपहर याद आई। बोल किसी के होते हैं, उन्हें सुरों में पिरोतो कोई और है, धुन कोई और बजाता है, गाता कोई और है और दिल में किसी के और उतर जाया करते हैं वो गीत दफ्फ़तन।

एक फ़ाकामस्त फ़कीर को इससे बेहतर श्रद्धांजलि और क्या होगी कि अपनी-अपनी ठुड्डियों पर हाथ धरे मैं और मेरे छह साल के जुडवां बच्चे लगातार सुबह से यही एक कॉम्पोज़िशन सुने जा रहे हैं। आज मैंने भी मौसी की तरह गिरते-पड़ते गीत के बोल लिख ही लिए। मेरे पास पॉज और प्ले का ऑप्शन था वैसे।

तो स्वानंद किरकिरे के बोल, मेरे बच्चों के लिए मम्मा की डायरी में सहेजने लगी हूं। कहीं बोल की गलती हो तो माफ़ी की हक़दार समझ लिया जाए। गीत है पिंजरा, जिसे कोक स्टूडियो के दूसरे सीज़ने के लिए स्वानंद किरकिरे, शांतनु मोइत्रा और बॉनी चक्रवर्ती ने मिलकर तैयार किया।

सबपर तेरी साहेबी
तुझपर साहेब नाय
निराकार निरगुन तू ही
और सकल भरमाय

ओए आमार कांखेर कॉलोशी
गैछे जॉले ते बाशी - 2

मांझी रे तोर नोकर ढेवला हिया रे - 2

पांच तत्व का बना पिंजरा
पिंजरे में मैना
पांच लुटेरे घात लगाए
घबराए मैना - 2

बजा ले अनहद शून्य के सन्नाटे में
धड़कन की तिरताल
सिमर ले साहिब जी का नाम
कि दुनिया माया का जंजाल

कोरस

साहिब मेरा एक रखवाला रे
साहिब मेरा दीन दयाला रे
साहिब मेरा तन पे दुशाला रे
साहिब मेरा तन में उजाला रे

साहिब तेरे घट भीतर ही
धूनी रमाए बैठा साधु
साहिब तेरा अंतरमन ना रूप रंग
निरगुनिया साधु

ओ मांझी रे ओ मांझी
मांझी रे तोर नोकर ढेवला हिया रे

साहिब नहीं तात-पांत
ना बंधु सखा सखी सैयां साधु
साहिब नहीं जात-पांत
ना धर्म काज निरगुनिया साधु

कोरस

साहिब मेरा निर्मल जल जैसा
साहिब मेरा बहते पवन जैसा
साहिब मेरा नील गगन जैसा
साहिब मेरा भोला मन जैसा


साहिब मेरा एक रखवाला रे
साहिब मेरा दीन दयाला रे
साहिब मेरा तन पे दुशाला रे
साहिब मेरा तन में उजाला रे





उनका होना ना होना क्या

एक उमसभरी गर्म दोपहर में शूट पर निकलना दुनिया के सबसे वाहियात कामों में से एक हो सकता है, ख़ासतौर पर तब, जब आपका काम एक बड़ी-सी गाड़ी का ख़ूबसूरती कैमरे में बंद करना हो। राहत इतनी-सी है कि इस बड़ी-सी गाड़ी को हाईवे पर चला पाने का सुख सारी तकलीफ़ों को नज़रअंदाज़ कर देने के लिए बहुत है।   लेज़र पार्क के बाहर गाड़ी लगाकर हम शूट शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं कि एक लड़का खिड़की के शीशे पर आकर लटक जाता है। चाहे देश के किसी भी शहर में जाएं, ट्रैफिक सिग्नलों पर ऐसे दीन-हीन चेहरे दिख ही जाएंगे। नब्बे सेकेंड के इंतज़ार में दस-बारह सेकेंड गाड़ियों की भीड़ में अपने लिए जगह बनाने में गुज़रते जाते है, बाकी इस जद्दोज़ेहद में कि हर लाल बत्ती पर किस-किसको कितना बांटा जाए। किसी-किसी दिन इन्हें इग्नोर करने में सहूलियत नज़र आती है, किसी दिन अपने मन की भड़ास इन्हें झिड़ककर उतार दी जाती है। बगल में कोई बैठा हो तो कुछ वक्त ट्रैफिक सिग्नल बेगिंग माफ़िया के टोटल टर्नओवर के अंकगणित को समझने में भी निकल जाता है।

यहां इसकी गुंजाईश नहीं थी। नज़रअंदाज़ करके देख लिया। आपस में बातचीत करके भी देखा। आंखें तरेरकर देखने का नतीजा भी सिफ़र ही रहा। अबकी तो जाकर वो एक लड़की को भी ले आया था। दोनों की शक्लें ऐसी मिलती थीं कि उनके भाई-बहन होने पर यकीन ना करने की कोई वजह थी नहीं। या काली-कलूटी शक्लें एक-सी ही लगती हैं शायद। मेरे अंदर के पूर्वाग्रहग्रसित गेहुंए दंभ ने गेहुंअन सांप की तरह सिर उठाया तो उसे लंबे शीतस्वापन के लिए भेजने में ख़ासी मेहनत करनी पड़ी।

दस मिनट बाद भाई-बहन हमें वहीं पाकर फिर लौटे तो इस बार मुझे अपनी एयरकंडिशन्ड गाड़ी का शीशा नीचे करना ही पड़ा।

"क्या है?"

"तीन रुपया दे दीजिए। सात रुपया हो गया है। तीन और मिलेगा तो रोटी खा लेंगे," बहन ने कहा।

"अच्छा! पूरा हिसाब करके आई हो। तीन रुपया न दें तो?"

"और कहीं जाकर मांगना पड़ेगा। यहां तो कोई है भी नहीं आस-पास।"

"तो मांगना क्यों पड़ेगा," मैंने पूछ तो लिया, लेकिन अपने ही सवाल पर शर्म आ गई।

"यही करते हैं। भीख मांगते हैं।"

"किधर? इधर ही?"

"इधर भी। पीछे उधर की तरफ बत्ती पर भी।"

"और मां-बाप?"

मैंने दोनों से पूछा। दोनों का जवाब एक साथ आया, लेकिन अलग-अलग। "मां मर गई। बाप उधर रहता है।" और "बाप मर गया। मां मजदूरी करती है।"

"अब तय कर लो कि कहना क्या है। झूठ तो पकड़ा गया तुम्हारा। क्यों जी, मां-बाप में से कौन मरा है?"

दोनों ने एक-दूसरे को देखा और मेरा सवाल नज़रअंदाज़ कर दिया।

"तीन रुपया दे दो ना। हम चले जाएंगे।"

"चले तो तुम जाओगे ही। अपने साथ घर थोड़े ना ले जाऊंगी तुमको?"

"सच्ची में खाना खाने के लिए पैसे मांग रहे हो?"

"हां, ये देखो, सात रुपए हैं। तीन रुपए चाहिए," बड़ी बहन ने मेरे सामने हथेली खोल दी। इसकी हाथों में तो मेरे जैसी लकीरें थीं - कटी-फटी, गड्डमड्ड और किस्मत कितनी अलग!

"कहां मिलेगी रोटी यहां?"

"उधर पीछे..."

"उस दुकान में मिलेगी?" मैंने दूर एक ठेले की ओर इशारा किया।

"चाय मिलती है वहां..."

"आओ देखते हैं, लेकिन सच-सच बताना पड़ेगा कि मां-बाप कहां हैं?"

"मां दूसरे के साथ भाग गई। बाप दारू पीकर पड़ा रहता है। दादी सुबह भीख मांगने भेज देती है। अपने भी उधर इफको के पास भीख मांगती है। सड़क पर रहते हैं, उधर ही, दादी के साथ।"

"और कब से हो इधर गुड़गांव में?"

"एक महीना हुआ। राजस्थान से आए। चितौड़ से।"

"मीराबाई के देश से?"

दोनों मेरी शक्ल देखते रहे, और मैं उनकी। फिर ठेलेवाले से पूछा कि क्या मिलेगा खाने को। रोटी और दाल फ्राई के साथ दो चाय का ऑर्डर कर मैं वापस उनके पास आ गई।

"चलो अब मैं फोटो खीचूंगी तुम्हारी। खाना खिलाने की फ़ीस। दांत दिखाओ कि मंजन किया या नहीं सुबह-सुबह।"

दोनों झेंप गए, लेकिन दांत निपोड़ ही दिया।

"ये बाल तो बड़े अच्छे हैं तुम्हारे," मैंने लड़की की चोटी की ओर इशारा किया। बिना तेल के रूखे उलझे बालों में नकली बालों की चोटी अलग से नज़र आ रही थी।

"उधर एक आंटी ने लाकर दिया। कपड़े भी लाकर दिए। लेकिन घुटने तक के कपड़े पहनने पर दादी गुस्सा करेगी।"

"अच्छा चलो नाम तो बता दो अपना-अपना। मेरा नाम अनु है वैसे।"

"मैं मौरी। ये मेरी भाई सुलीन। बाप का नाम खेमराज। हम चितौड़ से तो हैं लेकिन मीराबाई को नहीं जानते।"

"मैं भी नहीं जानती। यूं ही पूछ लिया था।"

उनका खाना आ गया था और हमारे लंच का भी वक्त हो चला था। ऐसे कितने बच्चे हर रोज़ शहर में आते होंगे, कितने भीख मांगते होंगे, कितनों का शोषण होता होगा, उनका क्या हश्र होता होगा, बड़े होकर क्या करते होंगे, शिक्षा का अधिकार इनके लिए क्या मायने रखता है, इनकी ज़िन्दगी का होना-ना होना क्या... इतने सारे बेतुके सवालों का जवाब ढूंढने का ना वक्त है ना कोई हासिल है उसका। मौरी और सुलीन तो फिर भी भीख ही मांगेंगे। मौरी और सुलीन अपना काम करेंगे, मैं अपना।

सुलीन ने मंजन नहीं किया था शायद!

बुधवार, 15 अगस्त 2012

दुआ दीजिए कि दुआओं में दम हो


पारूल नाम है उसका। वैसे प्यार से सब सीपू बुलाते हैं उसके। शहद-सी बोली, उतनी ही मीठी शक्ल और उतने ही ख़ूबसूरत दिल की नेमत किसी एक को मिलती है तो कैसे मिलती है, ये सीपू को पहली बार देखा था तो समझा था। उससे मेरा ख़ून का रिश्ता नहीं। यूं भी अक्सर ख़ून पानी हो जाता है और जो बचा रहता है, दिल का रिश्ता होता है। उसके भाई से मेरा एक धागे का रिश्ता है, पिछले कई सालों से। इतने ही सालों से कि याद भी नहीं आता कि उसने क्यों मुझे 'दीदी' कहना शुरू कर दिया था जबकि उम्र के इतने से फ़ासले पर हम एक-दूसरे को नाम से ही बुलाया करते है।

ख़ैर, उसी एक धागे और इसी एक धड़कते दिल का रिश्ता रहा कि हम महीनों ना मिलते, लेकिन फिर भी एक-दूसरे की ख़बर ले रहे होते। उन्हीं ख़बरों में एक-दूसरों के परिवारों की, दोस्त-यारों की ख़बर शामिल होती। उन्हीं ख़बरों में ब्रेक-अप्स, हैंगअप्स, करियर ब्रेक्स, बदलते हुए पते, बदलती हुई पहचान और बदलती हुई ज़िन्दगियों की निशानियां भी बंटती रहीं। उन्हीं ख़बरों में सीपू की शादी होने की ख़बर भी थी, जिसका जश्न मैंने फेसबुक पर उसकी सगाई और फिर शादी की तस्वीर देखकर मनाया। उन्हीं ख़बरों में सीपू के गोद में एक नए मेहमान के आने की ख़बर भी शामिल थी। और उन्हीं ख़बरों में सीपू की डिलीवरी से कुछ ही हफ्ते पहले उसके ब्रेस्ट कैंसर की ख़बर भी शामिल थी। बीबीएम, फेसबुक और फोन पर उन्हीं ख़बरों में सीपू की जीवटता और कैंसर से जूझने के किस्से भी शामिल होते रहे हैं।

कल एक और ख़बर मिली। छह महीने के आरव की मां सीपू की हड्डियों में भी कैंसर फैलने लगा है। ना ना। कोई मातमपुर्सी के लिए नहीं बैठे हम। हम बात सीपू की कर रहे हैं, जिसके अदम्य साहस और जीजिविषा की बात करते हुए मुझे अपनी शब्दावली के अतिसंकुचित होने का अहसास होता है। दस दिनों के रेडिएशन और हॉर्मोनल इंजेक्शन के बाद सीपू ठीक हो जाएगी। लेकिन उसकी हिम्मत मुझे हैरान करती है। लिखने तो बैठी हूं और सोचा तो है कि सीपू की तकलीफ़ और तकलीफ़ पर हर बार मिलती उसकी जीत के बारे में बताऊं आपको, लेकिन शब्द कम पड़ रहे हैं।

ज़िन्दगी वाकई सबसे बड़ी और कठोर अध्यापिका होती है। जिन पाठों को हम सीखना नहीं चाहते, जिस सच को स्वीकार नहीं करना चाहते, उसे सामने ला पटकने के कई हुनर मालूम हैं उसे। कहां तो हम छोटी-छोटी परेशानियों का हज़ार रोना रोते हैं  और कहां संघर्ष ऐसा होता है कि हर पल भारी पड़े। अब अपनी तन्हाई का रोना रोना चाहती हूं तो सीपू याद आती है। मन को तो फिर भी बहला लें, लेकिन उसके शरीर का दर्द लाख चाहकर भी कौन कहां बांट पाता होगा? हमें अपने-अपने हिस्से का दुख ख़ुद झेलना होता है और उस दुख को झेलकर जो निकलता है, वही सच्चा सुपरस्टार होता है।

सीपू, कैंसर से एक लड़ाई तुम लड़ रही है और तुम्हारे साथ-साथ सीख हम रहे हैं। ज़िन्दगी के इम्तिहान में सीढ़ी-दर-सीढ़ी ऊपर तुम चढ़ रही हो, हिम्मत हमें मिल रही है। तुमसे सीखा है कि तकलीफ़ों को हंसकर झेल जाने पर कविता-कहानियां लिखना बहुत आसान है, उन्हें महीनों लम्हा-लम्हा जीए जाना बहुत मुश्किल। तुमसे सीखा है कि जैसे दर्द की कोई सीमा नहीं होता, वैसे ही सब्र और हिम्मत का कोई पैमाना नहीं होता। तुमसे सीखा है कि हज़ार शिकायतों हों तब भी ज़िन्दगी अनमोल है और जीने के काबिल बनाया जा सकने वाला हर पल बेशकीमती। सीपू, तुमसे सीखा है कि जब तकलीफ, मुसीबत और परेशानियां हर ओर से घेरती हैं तभी हमारी सही औकात सामने आती है। तुमने तो ऐसी मिसाल कायम की है कि हम अपने बच्चों को बताएंगे - सीखना है तो सीपू मौसी से सीखो।

तुम्हारे लिए इस पब्लिक फोरम पर लिख रही हूं पंद्रह अगस्त की सुबह-सुबह, इस दुआ के साथ कि तुम्हारी तकलीफ़ों और दर्द से तुम्हें जितनी जल्दी हो सके, आज़ादी मिले। दुआ है कि मेरी एक दुआ में कई दुआएं शामिल हों और सबमें इतना असर तो हो कि तुम्हारी तकलीफ़ कम हो सके। दुआ ये भी है कि तुम्हारी हिम्मत का एक क़तरा ही सही, हमें भी मिल सके।

लव यू, सीपू। 


रविवार, 29 जुलाई 2012

मेट्रोनामचा 1: मैं सुन्दर हूं!

मेट्रो इज़ रियली द बेस्ट थिंग दैट हैपेन्ड टू डेल्ही, मैंने ये घिसा-पिटा सा जुमला मन ही मन दोहराया, और खुद को रात भर की कश्मकश के बाद मानसिक रूप से तैयार किया कि दिल्ली में टिकना है तो हर रोज़ काम पर जाने के लिए मेट्रो की आदत डाल लेनी चाहिए। नोएडा से गुड़गांव तक का सफ़र मेरे लिए एक हसीन लॉन्ग-ड्राईवनुमा होता रहा है अबतक। सफ़र कुछ इस तरह से प्लान किया कि रास्ते में किसी मनपसंद आरजे का साथ हो। साथ में वो सीडीज़ निकालीं जो मैं इत्मीनान से सुनना चाहती हूं। लेकिन आप ये काम महीने में दो-चार बार कर सकते हैं, हर रोज़ नहीं। पेट्रोल की बर्बादी और समय का विनाश क्रिमिनल है। 

इसलिए मेट्रो से ही जाना तय किया। यूं भी साढ़े सात बजे निकलना है, ऑफ़ ट्रैफ़िक आवर्स में, तो बैठने की जगह तो कहीं गई नहीं। भीड़ भी हो तो लेडी़ज़ कंपार्टमेंट में खड़े होकर झेली जा सकती है भीड़। यूं भी जिसने जवानी के दिनों में डीटीसी बसों की धक्का-मुक्की और बदतमीज़ियां झेल ली, उसके लिए मेट्रो का लेडीज़ डब्बा लक्ज़री है।

साढ़े सात का टार्गेट अनरियल था। बच्चों की बस ने दस मिनट की देरी करके अपशकुन की शुरुआत कर डाली। सात चालीस। मेट्रो स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते कुल सात मिनट और। सेक्योरिटी चेक इन, एक्सलेटर और वेटिंग, कुल चार मिनट और। यानी मेट्रो में घुसते-घुसते तकरीबन आठ बज ही गए - पीक ट्रैफिक आवर!   

जहां मैं चढ़ी वो तीसरा स्टेशन है। जगह नहीं बैठने की, लेकिन आराम से खड़े होकर कोई किताब पढ़ी जा सकती है। मेरे बगल में खड़ी लड़की के हाथ में जो किताब है वो जानी-पहचानी लग रही है। "लाइफ़: एन एनिग्मा, ए प्रेशस ज्वेल" जिसके लेखक हैं जापान के दाइसाकू इकेदा - धर्मगुरु, आध्यात्मिक नेता, विश्व शांति के प्रचारक। मुझे कॉलेज जाने वाली लड़की के हाथ में ये किताब देखकर सुखद आश्चर्य हुआ है। मैं उससे बात करना चाहती हूं, लेकिन वो कुछ इस तरह ध्यानमग्न है कि उसे टोकना साधना में विघ्न डालने जैसा कुछ होगा।

बाकी डिब्बे में रंगों का कॉलोज बिखरा पड़ा है जैसे। कोई लड़की गीले बालों को उंगलियों से सुलझा रही है, कोई आंटी वैभवलक्ष्मी कथापाठ कर रही हैं। जाने कितनों के कानों में ईयरप्लग्स हैं। दो लड़कियां एक-दूसरे से धक्कामुक्की करते हुए भी मोबाइल पर एन्ग्रीबर्ड्स खेले जा रही हैं। मोबाइल, तेरी महिमा अपरंपार है। नैस्कॉम यूं ही नहीं कहता कि अगले एक साल में मोबाइल बिज़नेस 36,000 करोड़ से भी बड़ा हो जाएगा। 

मुसीबत तो दरअसल राजीव चौक स्टेशन पर भयावह भीड़ के रूप में दिखाई पड़ती है। एक-दूसरे को धकियाते-मुकियाते प्लैटफॉर्म पर जगह तो बना लिया है लड़कियों, अब हम ट्रेन में कैसे घुसेंगे? हमें किसी तरह की मेहनत नहीं करनी पड़ती। भीड़ अपने-आप धकेलती हुई मेट्रो में चढ़ा भी देती है, आपके लिए खड़े होने की जगह भी बना देती है। वर्क फ्रॉम होम कितनी बड़ी लक्ज़री है, ये एक घंटे में ही समझ में आ गया है। अगले चालीस मिनट फास्ट-फॉरवर्ड मोड में चलते तो क्या शानदार मॉन्टाज बनता। उतरती भीड़। चढ़ती भीड़। हिलती भीड़। ब्रेक लगने पर एक-दूसरे पर गिरती भीड़। पैर कुचलकर आती भीड़। सॉरी बोलकर जाती भीड़।

लेकिन कमाल है कि मैं वन-पीस गुड़गांव के आखिरी स्टेशन पर उतर गई हूं। ना जी, पिछले दो घंटे में कहीं बैठने की जगह नहीं मिली। सब एफर्टलेस है। स्टेशन से बाहर निकल आना भी, ऑटो स्टैंड तक जाना भी और खुद से मेट्रो पर ऐसी भीड़ में कभी ना चढ़ने के वायदे करना भी। मैं मीटिंग में महज़ पैंसठ मिनट की देरी से पहुंची हूं। आई टुक अ मेट्रो - ये एक कथन मेरे सारे गुनाहों की माफ़ी है। च्च-च्च। आर यू ऑलराइट? डु यू वॉन्ट सम टी-कॉफ़ी? अच्छा, इतना बड़ा किला फ़तह किया है मैंने?

घड़ी देखकर ऐसे समय पर निकली हूं कि जब भीड़ ना हो सड़कों पर। घुटनों भर पानी हो तो भी कोई बात नहीं। सावन से बरस जाने के लिए अर्ज़ी तो हमीं ने डाली थी ना। मुसीबत बोलकर नहीं आती, बरसती हुई आती है।
रुका जा सकता है, बारिश के थमने तक। लेकिन फिर पीक आवर में चलने का ख़तरा कौन मोल ले? रंग-बिरंगी छतरियों के बीच जगह बनाते हुए डिब्बे में बैठने की जगह भी मिल गई है। लेकिन इस वक्त मुझे भीड़ की सख़्त ज़रूरत है। गीले होने के बाद डिब्बे के एसी में ऐसी ज़बर्दस्त कंपकपी हो रही है कि सीधे बैठना मुश्किल। डिब्बे में बिल्कुल भीड़ नहीं। कोई कमबख्त मेरे बगल में बैठने भी नहीं आता। एक यात्री पर दो सीटें! इसी को कहते होंगे मर्फीज़ लॉ।

एक महिला अपने दो बच्चों के साथ चढ़ी है दो बैग लेकर। बच्चों की पोशाक देखते ही लग जाता है कि एनआरआई हैं। मेरे बगल में आकर बड़ी भारी अमेरिकन लहज़े में अंग्रेज़ी बोलते हुए पूछती हैं - हाऊ मच टाईम बिफोर आईएनए? मैं उन्हें बगल में बैठ जाने को न्योत देती हूं। स्ट्रैटेजी काम आई है और मैं बेशर्म की तरह उन्हें कहती हूं, एक्चुअली वी कैन अकॉमोडेट द किड्स एज़ वेल। दो लोगों की सीट पर बैठे चार लोग, और दुबक कर बैठी मैं। सर्दी बर्दाश्त करने लायक हो गई है। अब मैं किताब निकाल सकती हूं।

लेकिन रंग-बिरंगे और दिलकश चेहरों के बीच किताब खोल लेने का हासिल? ज़िन्दगी क्या है, किताबों को हटाकर देखो - अपनी मां को टीनएज में पढ़ाई से बचने के लिए ऐसे शेर ख़ूब सुनाया करती थी। मां से याद आया है, किसी लड़की के बारे में पूछ रही थीं मुझसे फोन पर। देखा है उसको? शादी का मामला है। सुन्दर तो है लड़की? मैं हैरान-परेशान मां से पूछती हूं - सुन्दर कौन होता है? सौन्दर्य का पैमाना क्या है? सुन्दरता बहुत सब्जेक्टिव मसला नहीं? अरे बाबा, जो आंखों को भाए। मैंने मां का कहा हुआ यहां मेट्रो में आजमाने का फ़ैसला किया है। देखते हैं कौन सुन्दर है और कौन नहीं।

मेरे ठीक सामने मैजेंटा रंग की सलवार-कमीज़ में बैठी लड़की (या महिला?) का वज़न 100 किलो से कम क्या होगा। लेकिन सलीके से बनाए गए बाल, तरतीब से लिया गया दुपट्टा, पैरों में मैचिंग चप्पलें और नाखूनों पर मैचिंग नेलपॉलिश के साथ-साथ उसका हैंड बैग और हाथ में मौजूद एक आईफोन और एक टैबलेट उसके बारे में जो राय बना रहा है वो सुन्दर और ग्रेसफुल के बीच का कुछ है। उसके बगल में नेपाली नैन-नक्श वाली लड़की। आंखें मूंदे, सिर पीछे की तरफ टिकाए, कान में ईयर-प्लग्स लगाए वो जिन भी ख़्यालों में हो, उसके चेहरे पर उतर आई आभा से मैं हतप्रभ हूं। सुन्दर! तीसरी लड़की। चेहरे पर टीनएज की निशानियां इस उम्र में भी। कसकर पीछे की ओर बंधे बाल। पलकों पर आईलाईनर और फीकी पड़ गई लिप्स्टिक, साथ-साथ थकी हुई उंगलियां को तोड़कर थकान उतारने की कोशिश। सुन्दर ही है, ये भी। चौथी - गहरे लाल रंग का टॉप, खुले हुए बाल, गर्दन पर झूलता क्रॉस और गहरा सांवला रंग। फिर भी चेहरे में एक अजीब-सा आकर्षण है। फोन पर किसी से बात करते हुए मुस्कुराती है तो दाहिने गाल पर पड़नेवाले गड्ढे की तस्वीर खींचने का मन करता है। ज़ाहिर है, मेरी आंखों को भा ही रही है। पांचवीं, छठी, सातवीं, आठवीं... पंद्रहवीं... अठारहवीं और मेरे बगल में बैठी एनआरआई। सब सुन्दर। टेढ़े-मेढ़े दातों की भरपाई बालों ने किया, बालों की रंग ने, रंग की आंखों ने, आंखों की होठों ने, होठों की गर्दन ने, गर्दन की मुस्कुराने के तरीके ने... मां को फोन करके कह दूंगी, मुझसे ऐसे ऊटपटांग सवाल ना पूछा करें कि कौन सुन्दर है और कौन नहीं।

मुझे तो वो गुलाबी अंगूरों को पैरों पर सजाए, दरवाज़े से टिककर फ्लोटर्स वाली अपनी सहेली के साथ ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाती पीले-से चेहरे, छोटे-से बालों और नारंगी रंग की शर्ट को जींस में डालकर अपने अंदाज़ पर ख़ुद ही इतराती बेहद गंवार-सी दिखनेवाली शहर की लड़की सुन्दर दिखती है मां! उसमें कुछ तो होगा जो बहुत सुन्दर होगा।

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

और ये रही मेरी अंतिम इच्छा...

मैं लखनऊ में थी जब पल्लवी ने फोन किया। किसी की शोक सभा के लिए जाना था, और उसे कुछ दो सौ-तीन सौ लोगों से बात करनी थी वहां। मुद्दा था, व्हाट शुड आई से। इससे भी बड़ा मुद्दा था शोकसंतप्त परिवार के दुख के लम्हों के बीच आभार व्यक्त करना  - इसलिए क्योंकि जानेवाले ने जाते-जाते अपना अंगदान कर किसी की ज़िन्दगी बचाई थी। मैं उस परिवार की कहानी नहीं जानती, सिर्फ़ इतना जानती हूं कि दो भाईयों ने मिलकर अपनी मां के अंगों का दान किया।

ऐसा भी होता है? मरने के बाद भी दो-चार ही सही, लोग सोचते हैं कि अंगदान किया जाए? बल्कि हमारा तो अपने कपड़ों, जूतों, घर-गृहस्थी, नाते-रिश्ते के साथ-साथ उस इंसान की अस्थियों और राख से भी मोह नहीं छूटता जो चला जाया करता है। क्या कहोगी पल्लवी? अपनी हैरानी और अविश्वास से लौटी हूं तो हमने फोन पर ही एक छोटा-सा नोट तैयार कर लिया है। (पल्लवी के वोट ऑफ थैंक्स का ये असर रहा कि शोकसभा के बाद ना सिर्फ अंगदान की प्रक्रिया के बारे में और जानकारी लेने के कई लोगों ने उससे संपर्क किया, बल्कि उनमें से कई ने अंगदान की शपथ लेने की इच्छा भी ज़ाहिर की।)

लखनऊ से नोएडा लौट आई, और उन सारी चीज़ों को टटोल-टटोलकर देखती रही जिन्होंने बांध रखा है। परदों के रंग, सोफे पर बेतरतीबी से डाले हुए कुशन, आले पर सजाकर रखी गईं यादगारियां, शीशे और क्रिस्टल के ग्लास, कुछ फिल्मों के पोस्टर्स, 469 किताबें, 128 सीडीज़, अनगिनत तस्वीरें, चौके के बर्तन, बेड कवर्स, चादरें, दरियां, रजाईयां, साड़ियां, दुपट्टे, लहंगे, जनपथ से लाई गई जंक ज्वेलरी और लिकिंग रोड की चप्पलें... ये गृहस्थी है और इनमें से किसी एक चीज़ को भी ख़ुद से जुदा कर देना लाज़िमी नहीं लगता। हम मोह के ऐसे मकड़जाल में उलझे हैं कि बाहर निकलने का कोई रास्ता ही नहीं। ये क्या है और इसके लिए है? जब इन छोटी-छोटी चीज़ों से मन नहीं भरता तो अपनी ज़िन्दगी से क्या भरेगा? मरना कौन चाहता है, और दूसरी दुनिया के रास्ते को भी दुरुस्त बनाए रखने के लिए कैसे-कैसे जुगत भिड़ाते हैं हम! जो आज किसी के उठ जाने की बारी आ गई तो? तो फिर ये सब किस काम का? इतनी उलझनें क्यों पैदा करते हैं हम अपने लिए? मरने के बाद खाक हो जाने वाले शरीर की सुविधाओं का सामान क्यों जुटाते रहते हैं फिर भी? इसलिए कि हम जोगी, साधु-संन्यासी नहीं। हमारी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन इन क्षणभंगुर सुखों की परिणति में माना जाता है। 

मुझे मालूम नहीं कि मोहभंग हो जाना किसको कहते हैं। ये भी नहीं मालूम कि मैस्लो के आवश्यकता सिद्धांत के पिरामिड पर पांचवें और अंतिम स्तर की आवश्यकता की सिद्धि कभी हो भी पाती है या नहीं। लेकिन इतना जानती हूं कि प्रेम, सुरक्षा, आत्मसम्मान और आत्मसिद्धि का मूल केन्द्र अहं होता है - ये मेरा है, मेरी दुनिया, मेरी बात, मेरी गुरूर, मेरे ख्वाब, मेरी इच्छाएं, मेरा स्वार्थ - इन सबसे जुड़ा हुआ अहं का बोध। उस अहं को तोड़ने के लिए मेरे आस-पास की चीज़ों से मोह तोड़ना होता होगा शायद। और उस मोह को तोड़ देने का सबसे सुन्दर ज़रिया होता होगा दान - कंबल दान, या 101 रुपए का चढ़ावा नहीं, बल्कि सही मायने में दान। 

इतना लिख लेने के बाद मैं इस मुगालते में आ गई हूं कि आत्मबोधनुमा कुछ हुआ है मेरे साथ, और अपने परिवार के लिए मैं एक विश-लिस्ट छोड़ रही हूं जो मैंने पूरे होश-ओ-हवास में, बहुत सोच-समझकर तैयार की है। नॉट दैट आई एम गोईंग टू डाई एनी टाईम सून, लेकिन डोनेशन विशलिस्ट लिख लेने में क्या बुराई है? कॉरपोरेट्स भी तो भरवाते हैं बेनेफिशियरी फॉर्म। तो बस, इसे यही समझ लिया जाए। 

1. आंखें, लीवर, लिगामेंट और बाकी जो भी अंग काम में आ सकते हैं, उनका दान कर दिया जाए। इसके लिए किसी भी नज़दीकी सरकारी अस्पताल से संपर्क साधा जा सकता है। बाकी, अंगदान का शपथपत्र, जितनी जल्दी हो सके, मैं भर दूंगी। मेरे शरीर को ना जलाया जाए, ना दफ़न किया जाए बल्कि शव को छात्रों के रिसर्च और एनैटॉमी की बेहतर समझ के लिए मेडिकल कॉलेज को दान कर दिया जाए। इसे वाकई मेरी हार्दिक इच्छा माना जाए।

2. अपने शरीर के बाद अपनी जमा की हुई चीज़ों में सर्वाधिक प्रिय मेरी किताबें हैं। उन्हें किसी गांव या किसी छोटे से शहर के वाचनालय को दान कर दिया जाए।

3. मेरे मरने के वक्त मेरे सेविंग अकाउंट में जितने भी पैसे हों, उसे किसी गांव के स्कूल को दे दिया जाए और मुमकिन हो तो उस फंड से उनके लिए वोकेशनल ट्रेनिंग (ख़ासकर, खेती-किसानी और बागवानी; और कार्पेन्ट्री जैसे हुनर) की व्यवस्था की जाए। मैं इसकी शुरूआत अपने जीते-जी करके जाऊंगी वैसे।

4. लॉकर में सदियों से पड़े मेरे गहनों को मेरी मां और मेरी सासू मां में बांट दिया जाए (वो ना रहे तो परिवार की सबसे बड़ी महिला को दिया जाए)। जो जहां से आया, वहीं लौट जाए क्योंकि मुझे इस बात का शत-प्रतिशत यकीन है कि सोने-चांदी-हीरों के गहनों से मेरे बच्चों या अगली पीढ़ियों को भी कोई सुख नहीं होना है।

5. कांजीवरम, बनारसी, पोचमपल्ली, जामावार, संबलपुरी, इकत, पटौला और कांथा जैसी साड़ियां और पश्मीने की दो शॉल एक-एक करके उन बहनों, बेटियों, भतीजियों और बच्चों में बांट दी जाए जिनकी अगले बीस सालों में शादी होगी। बाकी साड़ियां और कपड़े 'गूंज' को दे दिए जाएं। 

6. मेरी सबसे अनमोल अमानत - मेरे कॉन्सेप्ट नोट्स, आधी-अधूरी कहानियां, स्क्रिप्ट्स और स्क्रिनप्लेज़, रिसर्च के फोल्डर और ब्लॉग मेरे भाई की संपत्ति मानी जाए। वो जैसे चाहे, इस दो कौड़ी के कॉन्टेन्ट का इस्तेमाल कर सकता है।

7. सैकड़ों तस्वीरों की थाती दोस्तों को सौंप दी जाए - यादगारियां जहां कीं, उन्हीं को मुबारक।

8. बच्चों को परवरिश और पतिदेव को भरोसा देने के अलावा मेरे पास और कुछ नहीं - ना कोई और चल संपत्ति ना अचल ही।  
  
यदि मेरी विशलिस्ट से प्रेरित होकर आप भी दान का शपथपत्र भरना चाहते हैं तो http://donateyourorgan.com/ और https://www.facebook.com/pages/Mohan-Foundation/239983060819?ref=ts से संपर्क कर सकते हैं।

रही बात मेरी, तो मेरा कुछ भी ना होने की बात मन से मान लेते ही आस-पास सब हल्का हो गया है।

और रह गई बात एक रूह की तो चचा ग़ालिब के हवाले से, "क़यामत है कि होवे मुद्दई का हम-सफ़र ग़ालिब/ वो काफ़िर जो ख़ुदा को भी ना सौंपा जाए है मुझ से।"