सोमवार, 13 जुलाई 2015

अटकी हुई फ़िल्म स्क्रिप्ट - डे वन

दिनभर लिखती रहती हूँ - कभी किसी के लिए, कभी किसी के लिए। काम अब सिर्फ़ शब्दों का खेल हो गया है। इसलिए कहानियाँ गायब हो गई हैं, शब्द बचे रह गए हैं।

एक थकन सी तारी रहती है इन दिनों। टीएसएच लेवल बहुत बढ़ा हुआ है। जी में आता है, रोती रहूँ। लेकिन रोने की भी फ़ुर्सत नहीं। दिन हरसिंगार की डाल है तो डेडलाइन वो अजगर जो उस डाल की जान ही नहीं छोड़ता। माली को फिर भी उम्मीद है कि मौसम बदलेंगे। पेड़ों से पत्ते झर-झरकर गिरेंगे जिस रोज़, उस रोज़ अजगर किसी और डाल का रास्ता अख़्तियार करेगा। या कोई सँपेरा ही कहीं आ जाए कहीं से। काबू में अजगर भी होगा एक दिन, डेडलाइन का डर भी।

तब तक एक बोझिल गर्दन पर जलती आँखें और तपता माथा कायम रहे, यही उम्मीद है।

कोहिनूर की कहानी आंतों में जाकर अटक गई है कहीं। ग़म के क़िस्से लिखना आसान है। हँसी और मज़ाक से कहकहे ढूंढ निकालने के बहानों के लिए लिखना बहुत मुश्किल। वो भी, कहानी अगर बच्चों की ज़ुबां में कहनी हो तो...

इन दिनों यही सोचती रहती हूँ कि बच्चे अपने आस-पास के लोगों को किस तरह देखते हैं, उनके बारे में क्या सोचते हैं, उनके भीतर क्या डिस्ट्रक्टिव और क्या कन्सट्रक्टिव है, रिबेलियन की भावना पहली बार कब और क्यों आती है, वो कौन-सी वाइब होती है जो एक खूंखार दिखनेवाले इंसान की बेतरतीबी उन्हें बहुत आसानी से जोड़ देती है जबकि एक शांत दिखनेवाला, दुनिया की नज़र से सफल और क़ायदे का इंसान उन्हें बिल्कुल रास नहीं आता। बच्चों के लिए मुमकिन क्या है और असंभव की परिभाषा क्या है?

दस सीन के इर्द-गिर्द ही घूम रही हूं पिछले कितने दिनों से। कहानी आगे बढ़ने से इंकार कर रही है। कहती है, पहले जितना बनाया है, उसे अच्छी तरह तैयार तो करो, उससे संतुष्ट तो हो जाओ। भीतर का एडिटर नुक्ताचीं करता रहता है। बाहर का दबाव लिखने से रोके रहता है। अजीब सी हालत है। न हरसिंगार के पत्ते झड़ने का नाम ले रहे हैं, न अजगर किसी और चंदन की तलाश में निकलने को तैयार है।

फिर भी ये उम्मीद है कि कहानी एक न एक दिन ख़ुद को कह ही डालेगी। फ़िल्म की स्क्रिप्ट लिखने का हुनर भी एक न एक दिन आ ही जाएगा।

3 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, फ़िल्मी गीत और बीमारियां - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

लिखती रहें शब्द भी खत्म नहीं होते कभी ।

श्री ने कहा…

एक कलमकार का भी अपना स्ट्रगल है। कभी-कभी तो खुद ब खुद कीबोर्ड पर हाथ चलते रहते हैं, कागज़ पर स्याही बहती रहती है; और फिर एक दिन सब शांत। कोशिश करते रहिए पर लिखना असंभव हो जाता है ।
बाइ द वे अनु जी, आपके ब्लॉग पर पिछले ५ साल से नदारद रहने के लिए क्षमाप्रार्थी हूं ।