रविवार, 22 जुलाई 2012

हमको मन की शक्ति देना!

सुबह की हलचल रास्तों और पगडंडियों पर  उतर आई है। साइकिलों पर बाज़ार और शहर की ओर काम के लिए निकलते लोग हैं, खेतों में धान की रोपनी की तैयारी करती महिलाएं हैं, पेपरमिंट के खेतों में खर-पतवार उखाड़ते बच्चे हैं और चारों ओर कई रंग-रूपों में पसरी हई ज़िन्दगी है। उसी ज़िन्दगी से एक टायर उधार मांग कर धूल भरे रास्तों पर उसे दौड़ते-नचाते छोटे बच्चे हैं। इनमें से कुछ स्कूल के यूनिफॉर्म में हैं, कुछ ने निकर तक नहीं पहनी। और हम एक बड़ी-सी गाड़ी में बैठे हुए इन सब के बीच से होकर गुज़रते हैं। इन दृश्यों और मेरी नज़रों के बीच की जो खिड़की है, वो पहियों पर सवार है।

मैं एक बाहरवाली हूं और यहां के जिग-सॉ पज़ल में कहीं फिट नहीं बैठती। मेरी तमाम कोशिशों के बावजूद स्कूल और बच्चे, टीचर और परिवेश एक सब्जेक्ट ही बना रहता है; उसमें मेरा घुलना-मिलना मुमकिन नहीं। मेरा वास्ता इस जगह से सिर्फ इतना-सा ही है कि यहां की कहानी सुननी है, कुछ अनुभवों को लम्हा-भर जीना है और बेहद ख़ूबसूरत वाक्य-विन्यासों में भारी-भरकम विशेषणों के साथ डालकर उसे छाप देने के लिए तैयार कर देना है। मेरा जॉब प्रोफाइल इससे ज़्यादा और कुछ करने का स्पेस नहीं छोड़ता, कि एक स्टोरी ख़त्म होती है तो दूसरी की तलाश शुरू हो जाती है। एक केस स्टडी के माध्यम से जिस बड़े ट्रेन्ड पर अख़बार और रिपोर्टों के ज़रिए बहस-मुहाबिसे होंगे, और कोई बात कह दी जाएगी, उनसे मेरा नाता कुछ घंटों से ज़्यादा का नहीं होता।

एक पत्रकार का, या एक संचारकर्मी का दायित्व क्या होता है? यही ना, कि निष्पक्षता से एक स्टोरी रिपोर्ट की जाए, और उनसे बिना अटैच हुए अगली स्टोरी की ओर बढ़ चला जाए? मैं मेनस्ट्रीम पत्रकार नहीं, ना मुझपर हर रोज़ एक स्टोरी फाइल करने का दबाव है। फ्रीलांसिंग का सबसे बड़ा फ़ायदा होता है कि आप अपने पसंद की स्टोरिज़ अपने तरीके से कर सकते हैं। उनमें थोड़ी देर जी भी सकते हैं और उनसे ज़िन्दगी भर का रिश्ता भी बनाए रख सकते हैं। डेली रिपोर्टिंग वन-नाइट स्टैंड की तरह होती है - थ्रिल वैसी ही देती है, लेकिन उससे टिकाऊ बने रहने की उम्मीद करना बेवकूफ़ी होती है।

इसलिए मुझे स्कूल में नंगे पांव मीलों लंबा रास्ता तय करके आए बच्चों के बारे में बैठकर सोचने की लक्ज़री है, प्रतीक और प्राची के घर-परिवार का अनुमान लगा सकने का भी वक्त है। भाई-बहन हैं प्रतीक और प्राची। प्रतीक तीसरी में पढ़ता है, प्राची पहली में है। दोनों स्कूल यूनिफॉर्म में हैं, और पैरों में हवाई चप्पल है। टिफिन का वक्त है और प्रतीक अपनी बहन का हाथ पकड़े चापाकल की ओर ले जा रहा है। इनके पास टिफिन नहीं? खाली पानी पीकर भर लेंगे अपना पेट? मैं दोनों से पूछती हूं, "कुछ खाया अभी?" "नहीं।" "कुछ खाना है?" दोनों मेरा चेहरा देखते रहते हैं। फिर मैं सोचती हूं, इन्हें दूं क्या? मेरे पर्स में बिस्किट भी तो नहीं। कम-से-कम टॉफ़ियां ही होतीं। दस सेकेंड के बाद प्राची कहती है, "पानी पीना है।"

मैं पूछती हूं, "कुछ खाया था सुबह?"

"हां, रोटी-सब्ज़ी खाई थी।"

मुझे राहत मिली है सुनकर।

"कैसे आते हो स्कूल?"

"पैदल।"

"अच्छा कितनी दूर है घर?"

दोनों चुप। इन्हें दूरी का क्या अंदाज़ा होगा? मैं भी कितनी बड़ी बेवकूफ़ हूं।

"अच्छा,  वक्त कितना लगता है आने में?"

दोनों चुप। अब खुद पर कोफ़्त हो रही है। इन बच्चों से कैसे ऊलजलूल सवाल पूछ रही हूं? दोनों चापाकल की ओर बढ़ गए हैं, और मुझे अचानक अपने बच्चों के साथ किए जाने वाले एक सौ मनुहार याद आ गए हैं। लंच में क्या दूं? काजू-किशमिश? चीज़ स्लाइस? आलू के परांठे? सैंडिविच? वो भी तब, जब दिन में ब्रेकफास्ट और लंच उसी फैंसी एयरकंडीशन्ड स्कूल में मिलता है, जहां वो पढ़ने जाते हैं। दोनों बच्चों की एक महीने की फ़ीस शायद प्रतीक और प्राची के परिवार की सालाना आमदनी हो। उत्तर प्रदेश की सालाना प्रति व्यक्ति आय क्या है? शायद 26,000 के आस-पास। और मेरे गृह राज्य बिहार का? वो भी शायद इतना ही। हम कितनी सारी विसंगितयों के साथ जीने वाले लोग हैं!!!

मैं यहां से लौट जाऊंगी, और भूल जाऊंगी कि प्राची और प्रतीक को स्कूल आने के लिए कड़ी धूप में पैदल चलना होता है; भूल जाऊंगी कि अपनी ज़रूरतें बढ़ाने वाले हमीं होते हैं, अपने दुख बढ़ाने वाले भी हम ही। मैं भूल जाऊंगी कि जिस शिक्षा और जिस शानदार जीवन-शैली को हम अपने बच्चों का मौलिक अधिकार समझ लेते हैं, देश की तीन-चौथाई आबादी के लिए वो मयस्सर भी नहीं। 

रही बात काम की, तो देखिए ना कितना फैंसी काम है हमारा! हम गरीबी, भुखमरी, बाल मजदूरी, आदिवासी जन-जीवन और जनसाधारण से जुड़े सरोकारों पर काम करते हैं और फील्ड विज़िट्स के लिए हवाई यात्राएं करते हैं। देश को गांवों को कुछ उसी तरह जानने का दावा करते हैं जैसे ट्रेन की खिड़की से बाहर दिखाई देनेवाले दृश्यों को देखकर लगे कि आपने तो सकल ग्राम्य-जीवन समझ लिया। 

हम विसंगतियों को और बढ़ाने वाले लोग हैं। पोस्ट पर मिली वाहवाहियों को देख कर तय करूंगी कि अगली कहानी को लोकप्रिय बनाने के लिए कौन-कौन से एलीमेंट्स डाले जाने हैं। प्राची और प्रतीक का क्या है, सब अपनी-अपनी किस्मत लेकर आते हैं। बाकी, झूठी-सच्ची बातों को ऐसे पेश करना कि सामने वाले को वही सबसे बड़ा सच लगे, कम्युनिकेशन स्किल्स इसी को तो कहते हैं ना? हमें अब अगली स्टोरी की तलाश करने दो और दुआ मांगो मन की शक्ति की कि ख़ुद को निरपेक्ष ही रख सकें। 
कुनौरा के भारतीय ग्रामीण विद्यालय में 'हमको मन की शक्ति देना' गाते बच्चे


11 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ल ने कहा…

अच्छा लगा यह पोस्ट पढ़कर। यह संवेदना बची रहे तो और बहुत कुछ होता रहेगा।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सबको मन की शक्ति मिले।

के सी ने कहा…

bahut achcha likha hai... bahut.

Arvind Mishra ने कहा…

आपका हुनर शब्द चित्र तैयार करने का है जाने अनजाने आप यह काम पूरी खूबी के साथ करती हैं -इन शब्द चित्रों के सहारे ही
कसी हुई पटकथाएं तैयार हो सकती है या फिर कोई पेपर 'स्टोरी' या फिर ब्लॉग पोस्ट-माल रेडी है बहुविध उपयोग के लिए -हैट्स आफ!

Pallavi saxena ने कहा…

यथार्थ का आईना दिखा रही है आपकी यह पोस्ट...बस यदि यही संवेदनायें बनी रहे तभी कुछ हो सकता है मगर वास्तविकता तो वही है जो आपने लिखी।

poonam ने कहा…

dil ko chuti post

सदा ने कहा…

भावमय करती प्रस्‍तुति।

raj ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
डा. गायत्री गुप्ता 'गुंजन' ने कहा…

जिन्दगी का यथार्थ, कलम के आईने में...

Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता ने कहा…

thanks. sad state.. :(

jitinindian ने कहा…

कई लेखकों को मैं ये कह चूका हूँ कि ऐसे रुला देने वाले लेख लिखने के लिए मुझे आपसे नफरत हो रही है क्योंकि मैं पढने के बाद चाह के भी अपनी संवेदनाओं को बहने से नहीं रोक पाता । परन्तु सोचने पे एहसास होता है कि गलती कलमकार की नहीं हालत की है, लेखक ने जो देखा जो महसूस किया उसकी लेखनी ने बयान कर दिया ।
कब तक, कितने प्रतीक और प्राची ऐसे ही लिखने पढने वालो की संवेदना का विषय रहेंगे ? ऊपर वाला यदि कहीं है तो सबको "मन की शक्ति" दे ।