बुधवार, 27 जुलाई 2011

आजा नच लें (भाग एक)

(कला विहार का एक अपार्टमेंट। जाली का दरवाज़ा एक प्यारी-सी लड़की खोलती है और हाथ जोड़कर प्रणाम करती है। मां हिचकती, सहमती, डरती, घबराती अंदर आ जाती है। पूरा कमरा खाली है, कोने पर एक छोटी-सी चौकी लगी है बस, जिसपर एक हारमोनियम रखा है - झालर वाले कवर से ढंका हुआ। लड़की मां से फर्श पर बैठने का इशारा करती है। अंदर से सफेद कुर्ते और अलीगढ़ी पायजामें में एक बुज़ुर्ग शख्स निकलते हैं। अंदाज़ लगाना मुश्किल नहीं कि यही गुरुजी होंगे - लखनऊ घराने की परंपरा के वाहक, अच्छन जी महाराज और बिरजू महाराज की प्रतिभा और कला के उत्तराधिकारी। मां आमतौर पर किसी के पैर छूती नहीं, लेकिन इन्हें देखकर अपने-आप उठकर प्रणाम करती है। मां को यहां एक और शास्त्रीय संगीत के साधक ने भेजा है, जिनपर मां की असीम श्रद्धा है।)


गुरुजी: जी बताएं, शमशेर जी ने फोन किया था मुझे। मैं कैसे मदद कर सकता हूं आपकी?

मां: पंडित जी, मैं चाहती हूं कि मेरी बिटिया कथक सीखे, और आपसे सीखे।

गुरुजी: बिटिया की उम्र कितनी है?

मां: गुरुजी, पांच साल की होगी अक्टूबर में। लेकिन घंटों नाचती रहती है। हस्तक मुद्राओं में हाथ घुमाती है और कहती है, मुझे हिंदी वाला डांस ही सीखना है। अब जहां तक मेरी जानकारी है, कथक को ही तो हिंदी नृत्य कहते हैं ना?

गुरुजी (मुस्कुराते हुए): वाह! बच्ची को ले आईए। आजकल बच्चे हिप-हॉप, जैज़, फिल्मी संगीत के ठुमके सीखना चाहते हैं। शास्त्रीय नृत्य कौन सीखना चाहता है? रुझान है तो ज़रूर ले आईए।

मां: जी। (रुककर सोचते हुए) क्या मैं भी सीख सकती हूं आपसे? मैं बत्तीस की हूं, डिस्क की भी परेशानी है, लेकिन अगाध इच्छा है। बचपन में सीखा था, और आज तक लगता रहा है कि मुहाने पर खड़ी रही, समंदर में मिल जाने से बचती रही। समंदर में डूबना चाहती हूं। डूब गई तो ठीक, सांस ऊपर-नीचे हुई तो धार मोड़ लूंगी और मुहाने पर लौट आऊंगी। लेकिन कोशिश करना चाहती हूं।

गुरुजी: (कुछ सोचते हुए) कला दो तरीके से सीखी जाती है - शौक़ से औऱ ख़ौफ़ से। ख़ौफ़ से सीखो तो सीख तो लोगे, लेकिन कुछ हासिल ना होगा। तो आपकी मेहनत भी बेकार और मेरी भी। लेकिन शौक़ से सीखोगे तो अंदर से कुछ बह निकलेगा, उन्मुक्त होकर जियोगे, हवा में संगीत सुनाई देगा, पैरों की आहट में लय दिखाई देगी।

मां: (उत्साहित होकर) शौक़ है गुरुजी। बहुत शौक़ है। क्या कहूं कि कई सालों से नृत्य सीखना चाहती थी, लेकिन पैरों ने अपने-आप कई बंधनों को स्वीकार कर लिया था। कुछ मन के भी बंधन थे। मैं एक बार कोशिश करना चाहती हूं, मन के बंधन खोलने की हिम्मत बड़ी मुश्किल से जुटा पाई हूं।

गुरुजी: लेकिन नृत्य सीखने से क्या होगा? नाच ही क्यों?

मां: नाच मेरे लिए अभिव्यक्ति का एक ज़रिया है। वो कई बातें जो मैं बोल नहीं सकी, लिख नहीं सकी, नाच के माध्यम से कहना चाहती हूं।

गुरुजी: लेकिन एक छोटे बच्चे के साथ आप सिखेंगी कैसे? फिर घर-परिवार की भी तो ज़िम्मेदारियां होती हैं।

मां: एक नहीं, दो छोटे बच्चों के साथ। मेरे जुड़वां बच्चे हैं। घर-परिवार के अलावा बाहर की भी ज़िम्मेदारियां हैं। लेकिन मैं सब कर लूंगी। अभी ना किया तो ज़िन्दगी में कभी ना कर पाऊंगी और मैं किसी अफ़सोस के साथ ना जीना चाहती हूं ना मरना चाहती हूं।

गुरुजी: आपका शरीर साथ नहीं देगा। हो सकता है, आपका मन भी साथ ना दे... संगीत साधना होती है, मनन-चिंतन होता है, संगीत उम्रभर की आहुति मांगता है।

मां: जो उम्र गुज़र गई, मेरे बस में नहीं थी। जो बस में है, उससे निकालकर अपनी साधना के हवाले कर सकती हूं। शरीर और मन को भी वश में करने की कोशिश करूंगी। मुझे एक मौका तो दीजिए।

गुरुजी: लेकिन वक्त चाहिए। वो आपके बस में है? अभ्यास चाहिए। वो होगा आपसे? स्टेज पर आने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है।

मां: मुझे स्टेज पर आना नहीं है गुरुजी। मैं बंद कमरे में नाच लूंगी। लेकिन मुझे ताल की दुनिया से वाकिफ कराइए। मुझे साधना और अनुशासन में बंधने का एक मौका तो दीजिए, यही मेरे लिए खुद को मुक्त करने, लिबरेट करने का एक रास्ता है।

(गुरुजी सोचते हैं, कमरे में उपस्थित लड़की की ओर देखते हैं। मां को इतनी देर में पहली बार उस लड़की के होने का अहसास हुआ है, नटराज की मूर्ति के बगल में सिर झुकाए कुछ सोचती लड़की को मां ने मूर्ति ही मान लिया था क्या?)

गुरुजी: ठीक है, लेकिन आप सिखेंगी कैसे?

मां: मैं बेटी के साथ नहीं सिखूंगी गुरुजी (मां ने इन्हें गुरु तो मान लिया अब। चाहे मां की शागिर्दी इन्हें स्वीकार हो कि ना हो)।

गुरुजी: वो क्यों?

मां: मैं अपने नाच पर भी ध्यान देना चाहती हूं। बेटी साथ रही तो मैं उसे देखती रह जाऊंगी। और मेरा मकसद ये नहीं है। बेटी सिखेगी तो अपनी प्रतिभा और लगन से, मैं अपनी मेहनत से। दोनों साथ नहीं हो सकता, दोनों में तुलना भी नहीं की जा सकती।

गुरुजी: आपकी इसी बात पर मैं आपको सिखाने के लिए तैयार हूं। बेटी कोने में बैठी उस लड़की से सीख सकती है। ना, ना। उसे कम ना आंकिए। मैं किसी को बताता नहीं, लेकिन वो मेरी शिष्या ही नहीं, मेरी बहू भी है और बचपन से नृत्य-साधना में लीन है। और फिर बच्चों को सिखाने का धैर्य है इसमें। आप तैयार हैं इसके लिए?

मां (चहकते हुए): जी गुरुजी, फिर मैं कल बेटी को लेकर आऊं? रही बात मेरी तो मैं तो अभी से सिखूंगी बस...

(कक्षा प्रारंभ और वार्तालाप जारी...)

7 टिप्‍पणियां:

Rahul Singh ने कहा…

सधी, लय भरी वार्ता.

P.N. Subramanian ने कहा…

बेहद अच्छा लगा.

अनाम ने कहा…

ZNMD dekha kya madam :-)

मनोज कुमार ने कहा…

सुंदर पोस्ट!

Arvind Mishra ने कहा…

गुरु -शिष्य संवाद के बाद अब शुरू हो तालीम और हम भी देखें (अपनी किस्मत आजमा के :) !

Manoj K ने कहा…

two thums up !! atb

Arvind Mishra ने कहा…

कब आएगा दूसरा भाग :)