Saturday, February 8, 2014

कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा

"तुम बहुत थकी हुई लग रही हो... You look exhausted", कॉन्फ्रेंस रूम में मुझे देखते ही उसने कहा था। उसी दफ़्तर में किसी और मिलने गई तो उन्होंने भी यही बात दुहराई, "You look exhausted."

मैं यूं किसी अजनबी के सामने बहुत जल्दी खुलती नहीं, लेकिन पता नहीं क्यों कल मैं बोल पड़ी थी, "मुझे ऐसा लगने लगा है कि जैसे भीतर की जो टंकी है, वो रीतती जा रही है। मैं उससे निकालती जा रही हूं बस..."

"उसे भरने का सबसे अच्छा तरीका है कि कोई अच्छी सी क़िताब ले लो, और कमरे में बंद कर लो ख़ुद को," उन्होंने कहा तो मैं सोचती रही कि कोई पब्लिशर एक एडिटर को और क्या सलाह देगा भला!

ये बहुत दिनों के बाद हुआ है कि ब्लॉग पर मैं बहुत बेचैनी में लौटी हूं। बहुत दिनों बाद लग रहा है कि पहले की तरह लिखना आता तो इस बेचैनी को शायद को मुकम्मल पोस्ट का रूप भी दे चुकी होती अब तक। लेकिन भीतर की टंकी के खाली होते जाने का एक बड़ा ख़ामियाज़ा ये भी भुगतना पड़ रहा है कि जो कहना चाहती हूं, वो कहना नहीं आ रहा। ये भी मुमकिन है कि ये पोस्ट कभी पब्लिक स्पेस में न भी जाए। लेकिन ये करना अपनी ही स्थिति से आंख चुराना होगा, और फिर आंख चुराकर, आंख बचाकर कब तक रहा जाए भला?

इससे पहले कि मेरा इरादा बदल जाए और मेरे ऊपर मेरी ही समझदारी भारी पड़े, मैं कुछ बहकी-बहकी बातें करना चाहती हूं।

मैं भीतर की टंकी को भरने का कोई तरीका चाहती हूं। कोई सफ़र, कोई नया शहर। कोई नई बात, कोई नई किताब। कुछ नए चेहरे, कुछ नए किरदार। मेरे भीतर की टंकी को भरने का एक ही रास्ता है। उसमें जमी काई की सफाई हो, और क्लोरीन के टैब्लेट्स के तौर पर कुछ नए अनुभव, कुछ नए लम्हे डाले जाएं उसमें। मैं किसी लंबे सी ट्रेन यात्रा में कुछ नए से दोस्त बनाना चाहती हूं।

मैं नागापट्टिनम या वडणेरा या कोडरमा जैसे किसी छोटे से स्टेशन पर भिनभिनाती हुई मक्खियों से लड़कर निकले प्याज़ के पकौड़ों के साथ कुल्हड़ वाली चाय पीना चाहती हूं। मैं किसी अंतहीन सफ़र पर होना चाहती हूं।

मैं ऐसी जगह पर होना चाहती हूं जहां धूप जलते-बुझते रात-शाम-सुबह-दोपहर में न बांटती हो ज़िन्दगी। थोड़ी सी रौशनी के लिए मैं आंखों की स्याही में होठों के उजाले भरना चाहती हूं।

मैं ऐसे जंगल में घुसना चाहती हूं जहां की पगडंडियां वन-वे हों। लताओं-पत्तियों-झाड़-झंखाड़ों की बनैली ख़ुशबू में जिस स्वच्छंदता का सुख है, वो सुख चाहिए। थोड़ी देर के लिए ही सही।

मैं पलाश के फूल चुनना चाहती हूं। पेंटिंग करना नहीं आता लेकिन उनकी पंखुड़ियों को मसलकर रंग बना दूंगी किसी कलाकार के लिए।

तैरना नहीं जानती लेकिन जाने क्यों गहरे पानी में कूद जाने का ख़्याल तारी रहता है। जिन खोजा तिन पाईयां, गहरे पानी पैठ। जाने क्या डूबना है, जाने क्या पाना है।

मैं किसी पुराने से शहर के पुराने से बाज़ार की किसी पुरानी सी स्टेशनरी शॉप में हार्ट शेप्ड वाले कार्ड्स खरीदना चाहती हूं किसी के लिए, जिनपर माया एंजेलो की कविताएं छपी हों, और हों कुछ वैसे बेमानी से कोट्स जिन्हें पढ़कर झूठ-मूठ ही सही, लेकिन ज़िन्दगी पर यकीन हो आए। मैं किसी पोस्टऑफिस में जाकर दूर-दराज़ से शहरों में रहने वाले भूले-बिसरे दोस्तों को वो ग्रीटिंग कार्ड्स पोस्ट करना चाहती हूं। बस तकलीफ़ ये है कि किसी का पता नहीं है अब मेरे पास।

मैं चावल, प्याज़ और ओल का अचार जी भर कर खा लेने के बाद किसी खाट पर लेटे-लेटे सरसों के फूलों से उलझते-उलझते नींद की हल्की झपकियां लेना चाहती हूं। फिर उठते हुए मैनों की जोड़ी को देखकर अपनी दो उंगलियां आप ही चूमते हुए कहना चाहती हूं, गुडलक।

दूर से पटाखों का शोर खिड़की को बींधते हुए चला आता है। ये पागल लोग सारी शादियां आज की रात ही कर डालेंगे। ऊपर की मंज़िल पर रहने वाले पड़ोसियों की तो शाम शुरू हुई है अभी। जैसे-जैसे अंधेरा चढ़ता जाता है, उनकी आवाज़ें और एक-दूसरे पर लगाए जा रहे लांछन और तीखे होने लगते हैं। ये कैसी बस्ती है पागलों की? रात के किसी पहर तो सुकून हो!

अभी तो ग्यारह ही बजे हैं। आधी रात भी नहीं हुई कि नींद न आने की दुहाई दी जाए। टुकड़ों-टुकड़ों में दिमाग ख़्यालों का मकान बना रहा है... कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा... कई ग़म हैं ज़माने में...

नींद में ही आदित ने एक तपता हुआ करवट लिया है मेरी ओर। बुखार उसे है, बड़बड़ा मैं रही हूं।  

2 comments:

sushma 'आहुति' said...

कोमल भावो की और मर्मस्पर्शी.. अभिवयक्ति ..

प्रवीण पाण्डेय said...

मैं तो कब से स्वयं को उलीच रहा हूँ, मन है कि खाली ही नहीं होना चाहता है।