Tuesday, February 11, 2014

रुदन का हंसना ही तो गान

जब लिखने के लिए कुछ न हो, तभी ज़रूरी होता है लिखना।

बीती रात सोए नहीं हम दोनों - मैं और आदित। कभी उसका बुखार तेज़ हो रहा था, कभी सांस लेने में परेशानी। ऐसे कौन से कर्म होते हैं जिनकी सज़ा ऐसे निकालनी पड़ती है? बच्चों को बख़्शने का कोई तो इंतज़ाम करो हे प्रभु!

ऐसे कौन से कर्म होते हैं जिनकी सज़ा बीमारियों के रूप में निकलती है? दुनिया में इतनी तकलीफ़ क्यों है?

रात से ज़्यादा तो सुबह भारी हुई है। मर जाने की ख़बर से भारी और क्या ख़बर होगी?

मर ही जाना होता है तो उससे पहले इतनी सारी तकलीफ़ें क्यों देता है ईश्वर? एक ज़िन्दगी और कितने सारे दुख! इसी ज़िन्दगी में कितनी सारी बीमारियां, एक दिल के बार-बार टूटने के कितने सारे इंतज़ाम, कितने सारे इम्तिहान, कितनी सारी बेचैनियां। और फिर एक दिन अचानक सब की सब बेचैनियां शांत हो जाती हैं।

लेकिन इन सब के बीच प्रभु की अद्भुत दुनिया में ज़िन्दगी लगातार चलती रहती है। बीमार बच्चे को अस्पताल ले जाने के काम, खाना पकाने और खाने का काम, कपड़े धोने और संभालने का काम, स्वस्थ बच्चे के स्कूल से लौट आने के बाद उसे डांस क्लास ले जाने का काम, और ज़िन्दगी के बाकी सारे रोज़गारी वाले काम चलते रहते हैं, चलते रहते हैं।

निर्लिप्तता - डिटैचमेंट - किसे कहते हैं? क्या अन्यमनस्कता से अपने काम किए जाने निर्लिप्त हो जाना होता है? या किसी दुख से प्रभावित न होना निर्लिप्तता होती है? ऐसे कैसे कोई सद्भावना के साथ निर्लिप्तता के स्टेज तक पहुंच जाता होगा? रोज़-रोज़ के संघर्षों में कौन सा ऐसा रास्ता होगा कि इसी दुनिया में रहते हुए भी हम इस दुनिया के न हों? शाक्यमुनि का बुद्ध रूप क्या पिता, पुत्र, प्रियजनों की बीमारी या मृत्यु से निर्लिप्त रह पाए होंगे? ये वियोग, ये अनासक्ति ख़ुदग़र्ज़ी नहीं है?

देखती हूं कि दुख चाहे कितना ही बड़ा हो, धीरे-धीरे पिघलने लगता है। अपने छोटे-छोटे कामों में उलझाए रखने वाली ज़िन्दगी हाथ पकड़ कर आगे ले जाने का हुनर भी जानती है। यादों के ज़ख़्म कितने ही गहरे क्यों न हों, जो ताक़त विछोह देती है उसी ताक़त ने इस शरीर में उन ज़ख़्मों को भरने की ख़ातिर metabolism भी तैयार रख छोड़ा है।

बाहर अजीब सी ठंड है आज। जैकेट के बाद भी हवा शरीर पर ठंडे पानी के छींटों की तरह वार कर रही है। फरवरी में इतनी सर्दी!

दिन आज बहुत भारी रहा है, लेकिन इतना भी नहीं कि आद्या को उसके डांस क्लास के लिए लेकर न जा सकूं।
आद्या म्युज़िक रूम में है, और मैं बाहर एक कुर्सी पर। 'संगीत साधना केन्द्र' की दूसरी मंज़िल पर शाम काली गीली चादर में लिपटी इतनी तेज़ी से उतरी है कि जैसे ठंड ने उसे भी न बख़्शा हो।

भीतर आद्या कोई लड़ी सीख रही है और उसके बोलों और पैरों की थाप ने न जाने कौन से मरहम का काम किया है कि मन अचानक बिल्कुल शांत हो गया है। साधना - मन को बांधने का, दुखों से निजात पाने का यही एक रास्ता है।

त कि ट धि कि ट त क त क त क त क त कि ट धि कि ट त कि ट धि कि ट...

भीतर आवर्तन चालू है, और मन में चलता बवंडर उसी आवर्तन के साथ बहुत तेज़ और फिर चौगुन, तिगुन, दुगुन पर थमने लगा है।

पता नहीं किस कवि की पंक्तियां हैं, लेकिन अटक गई हैं ज़ुबां पर आकर उन्हीं बोलों के बीच कि रुदन का हंसना ही तो गान... (और मन के चक्कर ही तो नृत्य?)




 

6 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

कौन भला निर्लिप्त रहा है जीवन से,
कौन पार पायेगा अपने ही मन से।

प्रतिभा सक्सेना said...

क्लान्त मन पर शीतल प्रलेप लगा जाते हैं ऐसे साधनालीन तन्मय क्षण!

Anupama Tripathi said...

सुर ताल का अभेद सा भेद जब परत दर परत हटता है, जीवन बसंतमय होने लगता है ....!!

राजेंद्र कुमार said...

बहुत ही सुन्दर और उत्कृष्ट प्रस्तुति, धन्यबाद .

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस प्रस्तुति को आज की आज कि बुलेटिन - क्या हिन्दी ब्लॉगजगत में पाठकों की कमी है ? में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Vikesh Badola said...

वाकई कल सर्दी बहुत थी। शाम होते ही ठिठुरन बढ़ने लगी थी।