Thursday, February 13, 2014

रौशनी की हिफ़ाज़त है इबादत की तरह

जो आमतौर पर ज़्यादा ख़ुश या आशावादी होता है, उसके तेज़ी से मन की अंधेरी गुफ़ाओं में गिरने की आशंका भी ज़्यादा होती है। जिससे सबसे ज़्यादा उम्मीदें रखी जाएं, सबसे ज़्यादा निराशा भी तो वही करता है।

पिछला एक हफ़्ता जाने क्यों बहुत भारी रहा है। अगर ये सिर्फ इसलिए है क्योंकि पिछले एक हफ़्ते में मैंने कोई मुक़म्मल काम नहीं किया, कहीं बाहर नहीं गई, किसी से मिलने का कोई बहाना नहीं ढूंढा तो ये सारी वजहें आधारहीन मानी जाएंगी। मन के नासाज़ होने का रिश्ता इन सबसे जुड़ा हुआ होता है क्या?

मुमकिन है कि हो भी। मैं वर्कॉहॉलिक कही जाती हूं। काम की धुनी। एक काम ख़त्म हुआ नहीं कि दूसरा सिर पर ले लेने के लिए बदनाम। मुझे अपनी ज़िन्दगी में जितनी ही सहजता और तरतीबी चाहिए, मेरा काम उतना ही बेतरतीब और बेसलीका होता है। मेरी टू-डू लिस्ट कभी ख़त्म नहीं होती। मेरी टू-डू लिस्ट अगर सुरसा का मुंह है तो मैं हनुमान।

मेरे लिए ये आत्मचिंतन का वक़्त है। सोचने का मौका भी कम ही मिलता है मुझे। इसलिए सुबह-सुबह ध्यान लगाने की जगह इस पन्ने पर आ बैठी हूं। क्या जाने आत्मालाप से ही कोई हल निकले?

वो कौन-सी चीज़ है जो मुझे इस हद तक परेशान कर रही है कि मुझसे कोई काम नहीं हो रहा? मेरे भीतर बैठे emotional guidance system के कॉम्पास की सूई बार-बार हताशा, डर, anxiety, उद्वेग, पलायन कर लेने के ख़्याल की ओर क्यों इंगित कर रही है? मैं किस चीज़ से भागना चाहती हूं? और क्यों? मुझे किस बात का डर है? और क्यों? मुझे दुनिया भर से इतनी ईर्ष्या क्यों हो रही है?

हर हाल में गहरे उतरकर वजहों की जड़ों तक जाना होगा। अगर बीमारी की जड़ न मिले तो सिर्फ एन्टीबायॉटिक्स पर मन के इंफेक्शन का कब तक इलाज करेंगे हम? आओ अनु सिंह, चलो इसलिए अपना इलाज ढूंढते हैं क्योंकि मरीज भी तुम, चाराग़ार भी तुम। बाहर कोई हल नहीं मिलता। इसलिए लाख बत्तियां जला लें, मन को रौशन कैसे करेंगे? बाहर वैसे भी बहुत अंधेरा है। सब अपने-अपने अंधेरों से जूझ रहे हैं। इसलिए अपने भीतर का मेन स्विच ढूंढना होगा। जब वो मिल जाए तो आस-पास जहां जो भी बाकी है, उस रौशनी को बचाए रखने के तरीके ईजाद करने होंगे।

किस बात का ख़ौफ़ है तुम्हें? क्या हासिल किया था जो खो जाएगा? और क्या न मिल पाने का डर? निडरता फ़ाकाकशी में भी है और ख़ौफ़ सब हासिल कर के भी। इसलिए, जो है सब ठीक है। जो मिल रहा है उसकी शुक्रगुज़ारी मनाओ, और आगे बढ़ जाओ। यहां बेचैनियों का कोई अंत नहीं है। सुख बड़े-बड़े माइलस्टोन्स तय करने में नहीं, सफ़र करते जाने में है। छोटी-छोटी अड़चनें पार करने में है। माइलस्टोन्स का तो यूं भी कोई अंत नहीं होता। ज़िन्दगी एक अंतहीन रेस है और आख़िरी सांस तक दौड़ते हुए भी कुछ हासिल नहीं होगा। अपनी स्पीड का सम्मान करना सीखो, और अपने लिए रास्ते भी ख़ुद चुनो और अड़चनें भी।

किससे ईर्ष्या है और क्यों? किसकी ज़िन्दगी जीना चाहती हो? जब किसी और की ज़िन्दगी से अपने की अदला-बदली ही नहीं करनी तो फिर ये डाह क्यों? तुम किसी और की तरह नहीं हो सकती, कोई और 'तुम' नहीं हो सकता। अपने-अपने वजूदों में सब अपनी-अपनी असुरक्षाओं से जूझ रहे होते हैं। इसलिए, किसी और को देखकर उस जैसा हो जाने की कामना करना ही व्यर्थ। इसलिए, मेरे हुनर भी मेरे अज़ीज़ और मेरी कमियां भी मेरी ही अपनी, मेरे अपने बच्चों की तरह।

मैं कहां होना चाहती हूं, मैं कहां की हो गई हूं, ऐसे सवालों का कोई मायने नहीं होता। मैं जहां हूं, वहां की हो जाऊं यही सबसे बड़ी जीत है।

तय कर लो तो हर चीज़ परेशान करेगी (किचन के नल से बूंद-बूंद टपकता पानी भी, और अपनी तन्हाई भी) और मान लो तो हर चीज़ का हल है। ये जो है, वो भी गुज़र जाएगा। दिस टू शैल पास।

इसलिए आज के लिए टू-डू इतना ही कि बगल में ठुनकते हुए बच्चे को हंसाया जाए।


3 comments:

राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (14.02.2014) को " "फूलों के रंग से" ( चर्चा -1523 )" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है,धन्यबाद।

प्रवीण पाण्डेय said...

यदि हम कुछ करते रहने को जीवन की सिद्धता मान लेते हैं और ख़ाली रहने को अकर्मण्यता, तब तो यह सोचना होगा कि आकाश की रिक्तता जघन्य अपराध है।

Neeraj Kumar said...

Everything has to paas everything shall pass.. bahut gahan lekhan.