Friday, February 14, 2014

वैलेंटाईन डे पर लव ई-मेल

हाय, 

मैं कुछ रैंडम लिखना चाहती हूं।

एकदम रैंडम। एकदम आर्बिट टाईप। राईटर लोग टाईप। आर्टिस्ट टाईप। बुद्धिजीवी, इंटेलेक्चुअल टाईप।  

प्यार-मोहब्बत-मिलन-बिछोह टाईप के कुछ बहुत सेंटी से सब्जेक्ट पर। कुछ ऐसा लिखना चाहती हूं कि मैं लिखते हुए जितना न रोऊं, लोग पढ़ते हुए रोएं। आंखों से ज़ेहन तक, ज़ेहन से रूह तक - सब ऐसे भींग जाए जैसे आज की सुबह भींगी हुई थी। 

कुछ ऐसा लिखना चाहती हूं जो सदियों तक पढ़ा जाता रहे, देखा जाता रहे, सुना जाता रहे।

लेकिन कमबख़्त लिखना ही नहीं आता उस टाईप का। आर्टिस्ट हूं नहीं, तो आर्टिस्ट होने का ढोंग किसलिए? मुझसे ई-मेल्स लिखवाओ न? मुझसे इन्वॉयस बनवाओ न? मैं कोई प्रोमो लिख दूं तुम्हारे लिए? या फिर कोई ऐसी स्क्रिप्ट, जिसमें हिट हो जाने के सारे फॉर्मूले हों? मैं सिर्फ इस लम्हे, इस वक्त के लिए लिख सकती हूं। मैं सिर्फ टू-डू लिस्ट को पूरा कर देने के लिए लिख सकती हूं। मैं सिर्फ सौंप दिए गए असाईनमेंट्स के लिए लिख सकती हूं। 

मैं अपने लिए नहीं लिख सकती। मैं तुम्हारे लिए भी नहीं लिख सकती। मुझे तो प्रेम की कविताएं भी लिखना नहीं आता। ई-मेल लिखना आता है। पढ़ोगे? प्रोपोज़ल्स लिखने आते हैं। तुम्हारे काम आएंगे? कॉन्सेप्ट नोट्स? अंतहीन, वक्तहीन, इंतज़ार से लंबे कॉन्सेप्ट नोट्स। लेकिन तुम उनका क्या करोगे? 

वैसे सुनो... मुझे लिखने के लिए नहीं लिखना है। मुझे तो उस instant gratification के लिए लिखना है जो लिखने के साथ हासिल हो जाता है। मुझे उसके लिए लिखना है जिसकी नियति मुकम्मल होती है, और भीड़ में जिसके ग़ुम हो जाने का अफ़सोस नहीं होता। 

मुझे इसलिए लिखना है क्योंकि स्साला और कोई काम ही नहीं आता। (लिखना मुझे बदज़ुबान भी बनाता जा रहा है।)

तुम्हें कौन-कौन से काम आते हैं? तुम प्रेज़ेंटशन अच्छा बना लेते होगे? या फिर एक अदद सी नौकरी होगी, जिसके चक्रव्यूह में फंसे रहने के बदले महीने के आख़िर में तनख़्वाह मिल जाया करती होगी? या फिर सेल्स का काम आता होगा? या फिर नेटवर्किंग? वो तो आती होगी? तुम ज़रूर सॉफ्टवेयर डेवेलपर होगे। तुम्हें कोडिंग आती होगी। मुझे नहीं आती। मुझे कोड्स समझ में नहीं आते। मुझे metaphors भी समझ में नहीं आते। सीधी-सरल भाषा आती है।  

मुझे तो वो सब कुछ भी नहीं आता, जो एक राईटर बनने के लिए ज़रूरी होता है। वैसे मुझे लिखने के अलावा कुछ भी नहीं आता। खाना बनाना भी नहीं जानती। घर ठीक से रख पाने का हुनर भी नहीं है। मेरी सास को मुझ-सी नालायक बहू नहीं मिलती शायद। मैं वैसी बीवी हूं जिसे मालूम ही नहीं कि पति की सुफेद शर्ट्स वॉशिंग मशीन में जाती है तो हमेशा रंगीन या प्रिंटेड होकर कैसे निकला करती है? मैं वैसी मां हूं जो अपने बच्चों को सेट मैक्स पर 'सूर्यवंशी' देखने देती है, और पीछे से फिल्म के सारे गाने गुनगुनाती रहती है - एक एक करके, मुखड़े से अंतरे तक, एक एक लाईन, एक एक शब्द। गाती है उनके सामने कि जोगी तेरे प्यार में मर जाएगी, मिट जाएगी, लुट जाएगी जोगन तेरी।

हां, मुझे गाड़ी चलाना आता है। लेकिन वो किस काम आएगा? पैरों में पहिए हों या गाड़ी में, किस काम के? थमना-रुकना तो पड़ेगा ही एक दिन। मुझे रिझाना-मनाना-मोहना-फ्लर्ट करना नहीं आता। बहस करना आता है। बात करना भी आता है। मुझे पटरी पर सामान बेचते दुकानदारों से बार्गेनिंग करना नहीं आता। मैं घर में इलेक्ट्रिशियन और प्लंबर बुलाकर घर के काम भी नहीं करवा पाती। मुझे कामवाली से काम करवाने का शऊर भी नहीं। मैं डस्टिंग करना नहीं जानती। दराजों को सहेज कर रखने के मामले में अव्वल दर्ज़े की आलसी हूं। हां, मैं बीमार बच्चे के सिरहाने रातभर बैठ सकती हूं। किसी मरीज़ को देखने, उसे खून देने कूदकर दस बार अस्पताल जा सकती हूं। अब मुझसे खतम कौन होगा, सोच लो। 

तो मैं कर क्या सकती हूं फिर? और क्या मैं राईटर हूं? किसने कहा कि मैं राईटर हूं? लिखने के लिए थिज़ॉरस में कोई और शब्दार्थ देख लो न।

लेकिन मैं क्या करूं कि मुझे और कुछ भी नहीं आता, लिखने के अलावा। सिर्फ टाइपिंग आती है। हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में। जितनी तेज़ी से सोच रही होती हूं, उतनी ही तेज़ी से कीबोर्ड पर टाइप करने का हुनर आता है। प्रति मिनट मेरी स्पीड 60 होगी शायद। 70 भी हो सकती है। लेकिन फिर भी मुझे कुछ और नहीं आता। और मैं स्टेनोग्राफर भी नहीं बन सकती इस उम्र में तो। तो अब क्या करूं? :( 

सुनो, अब जब कुछ और आता ही नहीं तो वैलेंटाईन डे पर  हैपी वैलेंटाईन्स डे का एसएमएस भेजकर भी क्या करूंगी? इसलिए आज मुझे क्लायंट्स को ई-मेल्स ही लिख लेने दो। 

थैंक्स। 
वॉर्मली, 
अनु 

4 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

लिखती रहें, नयापन मिलता रहेगा।

Atul said...

"valentine day" ka "concept note" hi "proposal" bana kar draft kar dijiye...

प्रतिभा सक्सेना said...

जो हैं,सो हैं.सब थोड़े-बहुत ऐसे-वैसे होते हैं,ईमानदारी से अपने को जितना जानती हैं, आपने मान लिया ..पर कोई अपने को भी कहाँ पूरा जानता है.दुनिया ऐसे ही चलती है ,चलती रहेगी!

Vikesh Badola said...

ऐसी विवशताएं शक्ति बन सकती हैं, अगर औरों की विवशताओं को मित्र बना लिया जाए।