Monday, February 17, 2014

कविताएं पढ़ते रहना तुम्हें प्यार करते रहना है

यूं कहां होता है कि कोई रात ऐसे गुज़रे जैसे बूंदों-बूंदों पिघल रही हो, टिक-टिक-टिक-टिक खिसक रही हो।

रात के ऐसे गुज़रने की दो ही वजहें होती हैं शायद - एक कि प्यार के आग़ोश में होना, और दूसरा कि अपने भीतर से जो आवाज़ें निकल न पाती हों, उनके लिए शब्द, शब्दों के मायने, मायनों में आवाज़ें ढूंढने की बेजां कोशिशें करना।

बीती हुई एक रात ऐसे ही गुज़री है शायद।

मैं नहीं जानती, मैंने कब और कहां, क्यों और कैसे कविताएं पढ़ना छोड़ दिया था। अचानक। यूं ही। बेवजह।

कविताओं के लिए वक़्त कहां था?

वक़्त भी नहीं था और वजह भी नहीं थी। कविताएं पढ़ना ख़ुद की तलाश करना होता है अगर, तो एक हद के बाद हम ख़ुद की तलाश बंद कर देते हैं।

बालों में तेज़ी से उतरती सफ़ेदी और उससे भी तेज़ी से निकलती उम्र अपने आप ख़ुद से मिलाने के बहाने छीनने लगती है। ये ख़ुद से मिलने के बेसलीका बहाने अपनी ज़रूरत के पूरा करने के तरीके होते हैं बस। ये ख़ुद से मिलना गद्य में लिखने की तरह होता है, बेहद ज़रूरी और एक कम्पलसिव डिसॉर्डर की तरह, लेकिन उतना ही क्षणिक और तात्कालिक भी, जैसे हर तरह से अपने जिस्म की फ़ौरी ज़रूरतें पूरी करना। भूख लगी तो खा लिया कुछ भी। स्वस्थ रहना है तो आठ घंटे की नींद बनी रहे, और निस्बत है तो सुपुर्दगी भी हो ही जाए कभी-कभार।

लेकिन रूह जगी है तो करवटें भी लेती है।

और यूं रूह के जागने का रिश्ता कविताओं से कैसे होता है, मैं भी नहीं जानती। लेकिन बीती रात कविताओं ने गिरहों को खोल देने का काम ज़रूर किया है। विलियम कार्लोस विलियम्स ने लिखा है कि कविताओं से ख़बरें नहीं मिला करतीं। लेकिन फिर भी दुनिया भर में इतना संघर्ष कविताओं में मिलने वाले सुकूं के हर रूह तक न पहुंच पाने की वजह से ही है।

जिस दिन लड़ते-लड़ते थक जाएगी दुनिया, जिस दिन जंग को मिल जाएगा अंजाम और ले लिए जाएंगे फ़ैसले, उस दिन सूरज के डूबने से पहले, पर्दों को गिराकर पीली रौशनी से भरे हुए कमरे में दो कुर्सियों पर आमने-सामने बैठे हुए मैं तुम्हें सुनाऊंगी अपनी पसंदीदा कविताएं। उस दिन खुलकर रोना हो जाएगा आसान। उस शाम मर भी गई तो अफ़सोस नहीं होगा।

सुनना परवीन शाकिर का लिखा 'प्यार' कि...

'अब्र-ए-बहार ने
फूल का चेहरा
अपने बनफ़्शी हाथ में लेकर
ऐसे चूमा

फूल के सारे दुख
ख़ुश्बू बन कर बह निकले हैं'


जब किसी ज़ख़्म के न भर पाने का दुख कचोटेगा... जब अपनी कई सारी बातों पर बेबात सालेगा कोई अफ़सोस, तो अपनी बेहद बेसुरी आवाज़ में सिसकियों के बीच सुनाऊंगी अमीर ख़ुसरो कि 'किसे पड़ी है जो जा सुनावे पियारे पी को हमारी बतियां'

जब हम और तुम ज़िन्दगी के फ़लसफ़ों पर, जिए हुए और ज़बर्दस्ती जिए हुए लम्हों पर रौ में हंसते जाएंगे और बेसिर-पैर का काफ़िया मिलाएंगे तो दुहराऊंगी मैं अज्ञेय कि

'हर किसी के भीतर
एक गीत सोता है
जो इसी का प्रतीक्षमान होता है
कि कोई उसे छूकर जगा दे
जमी परतें पिघला दे
और एक धार बहा दे'


मौसम के फिर भी न खुल सकने की बेकसी के बीच जब पेट को भूख सताएगी और सूखते हुए होठों को चाय की याद आएगी तो सामने लाल मिर्च की सालन और सूखी हुई रोटी चाय में डुबो कर खाते हुए अपनी बातों को आगे बढ़ाने का काम उस्ताद मोईन ख़ान और छाया गांगुली को सौंप देंगे, और उन्हें गाने देंगे एक दिलरूबा अहमद फ़राज़।

'मैं तो समझा था भर चुके सब ज़ख़्म 
दाग़ शायद कोई कोई है अभी 

ज़िन्दगी कु-ए-ना-मुरादी से
किसको मुड़ मुड़ के देखती है अभी 


मुद्दतें हो गईं 'फ़राज़' मगर
वो जो दीवानगी थी, वही है अभी'


फिर याद आएगा ग़म-ओ-रोज़गार, और ये ख़्याल कि टिक-टिक-टिक-टिक करती रात भी गुज़र जाती है और सुबह कई ज़िम्मेदारियां लेकर आती है। उनमें से बच्चों को स्कूल भेजने, वक़्त पर एयरपोर्ट पहुंचने और उससे पहले कई सारे ई-मेल्स भेजने का काम भी शामिल होता है।

इन सबके बीच मैं बचाए रखूंगी कविताएं, और वो प्यार - ऐसी इकलौती शय जो उम्र, रंग, रूप, जगह, नाम, जिस्म, जीने-मरने के परे होती है और इस रूह से रिसती रहती है, बेतुकी कविताओं की तरह।

तुम्हें एक बार और अलविदा कहते हुए तुम्हारे सीने पर रखकर हाथ सुनाऊंगी अमृता प्रीतम, और दिलाऊंगी यकीन कि वक़्त लिनीयर नहीं होता, न एक सीधी रेखा में चला करता है। वक़्त तो पहिया है जो घूमता रहता है। इस घूमते हुए वक़्त पर इतना तो भरोसा करो कि कहीं किसी रोज़ वो शाम भी मिलेगी, जिस शाम हम साथ पढेंगे ढेर सारी कविताएं।

इस शाम ढेर सारी कविताएं पढ़ लेने के बाद मैं अपने उस रूप की केंचुली उतारकर उसी कमरे की खिड़की से बाहर फेंक दूंगी, और दुनिया में वापस लौट आऊंगी।

उस एक शाम के बाद मैं कविताएं पढ़ना बंद कर दूंगी।

'मैंने फिर कहा-
कि तुम्हें सीने में लपेट कर
मैं बादलों की भीड़ से
कैसे गुज़रूंगी?
और चक्कर खाते बादलों से
कैसे रास्ता मांगूगी?'


और जाते-जाते सुन जाओ डेरेक वालकॉट की उस कविता का अनुवाद, जो पिछले तीन दिनों में मैं पचहत्तर बार पढ़ चुकी हूं। कविता का टेढ़ा-मेढ़ा अनुवाद मैंने किया है, इसलिए भूल-चूक लेनी-देनी।

प्यार के बाद प्यार 
'कभी तो ऐसा वक़्त आएगा
जब, प्रफुल्लित होकर
ख़ुद को सामने देखकर
बढ़कर करोगे अभिवादन
अपने ही दरवाज़े पर,
अपने ही आईने में।
फिर दोनों एक-दूसरे की ख़ुशामदीद में मुस्कुरा उठेंगे
तुम कहना उससे,
बैठो न। कुछ खा क्यों नहीं लेते? 

तुम फिर उस अजनबी से करने लगोगे प्यार, जो तुम ही तो थे
तुम उसे पिलाना अच्छी शराब। देना रोटी का एक निवाला।
और अपने ही दिल को लौटा देना उसी का दिल,
उसी अजनबी को, जिसने किया था तुमसे प्यार।

पूरी ज़िन्दगी, जिसे तुमने किया नज़रअंदाज़
किसी और के लिए, जो समझता नहीं था तुम्हारा प्यार। 

किताबों की अलमारियों से निकाल लेना प्रेमपत्र

तस्वीरें, और वो बेताब चिट्ठियां।
फिर आईने से खुरचकर हटा देना अपना वो अक्स। 


बैठो न! ज़िन्दगी का जश्न मनाते हैं।' 



2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

मेरे लिये कविता कहती नहीं, बहती है।

Kishore Choudhary said...

रात उतनी भी गहरी न थी मगर अफीम उगाते लोगों की सबसे सस्ती ज़िन्दगी की कविता सुनते हुए। नमक भरे रन से गुज़रती हुई बस में क़ैद शक्लों की तस्वीरों को समझते हुए, कविता एक आवाज है आवाज़ एक कविता।