Friday, January 27, 2012

जिन खोजा तिन पाईयां...

एक जगह बैठकर मैं सोच नहीं सकती, मेरा दिमाग ही काम नहीं करता। पैरों में पहियों के साथ दिमाग के भी दर-दर की ठोकरें खाने को अभिशप्त पैदा हुई हूं। आज फिर से सोचना होगा, आज फिर से डेडलॉक से आगे कोई रास्ता तलाश करना होगा। सो, ब्लैक लेबल है और है ब्लैक लेबल की स्टीयरिंग व्हील। एफएम पर उमड़ आई देशभक्ति में कोई दिलचस्पी नहीं और 'रॉकस्टार' अब घिसने लगा है। इसलिए नादान परिंदों को चुप रहने की हिदायत देनी होगी और चलना होगा घर से थोड़ी दूर। रास्ते में आए मोड़ों और मंज़िलों पर से ध्यान हटाते हुए ज़िन्दगी के कुछ अहम फ़ैसले लिए जा सकते हैं, कुछ उलझे हुए रेशम के धागों को सुलझाने की हिम्मत जुटाई जा सकती है, उनकी गिरहें खोलने के बारे में सोचा जा सकता है।

धूप मेहरबान है और हरे-पीले पत्तों के गुलदस्तों से होकर गुज़रती हवा पुरवाई-सी लगती है। दो-चार दिनों में बसंत के आने का उत्सव मना रहे होंगे हम। सरसों के पीले फूल खिले होंगे कहीं, मटर की फलियों में दाने मीठे हो गए होंगे, बेर के पेड़ों ने छोड़ दिया होगा फलों को उन्मुक्त और साइबेरियन क्रेन्स के घर लौट जाने का वक्त आने लगा होगा क़रीब। 

डीएनडी फ्लाईओवर पर चढ़ने से पहले ऐसे ही कुछ बेमानी ख़्यालों में डूबी एक लड़की मिलती है। उम्र उसकी कोई बारह साल की होगी। तरुणायी अभी दूर है उससे, कि माह-दर-माह आनेवाली बेचारगी और लड़की होने के अहसास से वो अभी वाकिफ़ नहीं। 'द मिल ऑन द फ्लॉस' की मैगी से हिम्मत लेकर उसने भी एक विलक्षण काम किया है। अपने काले घने घूंघराले बालों के माथे पर बेतरतीबी से आ जाने से परेशान उसने शीशे के सामने खड़े होकर सामने की कुछ लटें काट ली हैं। अब बाल आंखों पर नहीं आया करेंगे, कोई उसके माथे को चिड़िया का खोता नहीं बुलाएगा और जो किसी ने चिढ़ाया भी तो वो सिर और लट झटककर आगे बढ़ जाएगी। वो लड़की नज़रों से ओझल हो गई अचानक। मैं फ्लाईओवर से नीचे उतर आई हूं।

आश्रम से महारानी बाग़ की ओर जाते हुए मिलनेवाली लड़की पर अभी-अभी सोलहवें की ख़ुमारी आई है। उसकी आंखों से उतकर ख़्वाबों ने पूरी की पूरी न्यू फ्रेन्ड्स कॉलोनी जैसी बस्ती बसा ली है यहां। इस बस्ती में कुछ भी नामुमकिन नहीं। यहां सपनों के वितान के नीचे राग है, विराग है, गीत हैं और बादलों में उडते फिरने की बेचैनी है। उसका छोटा-सा शहर उसे ऐसी अनोखी बस्ती बसाने की इजाज़त नहीं देता, इसलिए उसने सबसे छुपाकर नए ठिकानों का पता अपनी डायरी में नोट कर रखा है। यकीन है कि वो पते एक दिन अजनबी नहीं होंगे, यकीन है कि कोई तो ऐसा शहर होगा जहां उड़ने की आज़ादी होगी। वो लड़की इस महानगर में आकर कहीं गुम हो गई है।

बीस-इक्कीस की जो लड़की मोदी मिल फ्लाईओवर पर साथ ऑटो में चलती है उसने विद्रोह की तमाम सीमाओं के भीतर हर वो नामुमकिन काम कर लिया है जिससे थोड़ी-सी भी आज़ादी की खुशबू आती हो। कमर तक लटकनेवाले घूंघर कटते-कटते कान तक आ गए हैं, कानों में रुई के फाहों को भी जगह मिल गई है इन दिनों। मैं हॉर्न बजाती हूं, वो मुड़कर फिर भी देखती नहीं मुझे। उसे मीडियोक्रिटी से, सेकेंड रेटर्स से और हार मान लेनेवालों से सख़्त नफ़रत है, ऐसा कुछ याद आया है मुझको।

जीके वन की तरफ़ एसी कैब में गाने सुनते हुए जाती लड़की आज़ादी की पराकाष्ठा है। यहां से दो मोड़ दूर शहर के इलिट बाबालोगों का दफ़्तर है, सिगरेट का धुंआ है, मोका की क़ॉफ़ी है, फ़ैब इंडिया के वेजिटबल डाई वाले हरे-नीले कुर्ते हैं। ये दफ़्तर और ये नौकरी भी उसकी मंज़िल नहीं। उसकी बेचैनी कोई रनडाउन नहीं बांध पाता। किसी एविड न्यूज़कटर पर सपनों को टाईमलाइन पर डालकर एडिट करने की कला चार सालों में भी नहीं आई उसे। किसी वॉयसओवर से वो अपने सपनों को आवाज़ नहीं लगा पाती। वो लड़की अपने ऑफ़िस से निकलकर मेरी गाड़ी में बैठ जाती है।

सपनों का जो डिज़ाईनर बैग उसने गाड़ी की पिछली सीट पर डाला है उसमें उसके नाम का कुछ भी नहीं। यहां से निकलते हुए घर-परिवार-दोस्त-यार-प्यार की उम्मीदों का खोयचा बनाकर उसे सौंप दिया गया है। यहां से रिंग रोड की ओर जानेवाला रास्ता सीधा-सपाट है। सरपट भागती गाड़ियों की दौड़ में शामिल होकर दरअसल किसी मंज़िल पर नहीं पहुंचा जा सकता। रिंग रोड की तरह ही वो रास्ता गोल-गोल घूमता रहता है - साउथ एक्स, एम्स, धौला कुंआ, नारायणा, सराय काले खां और फिर साउथ एक्स। जहां ज़रूरत पड़ी, रुककर पेट्रोल डलवा लो, लेकिन मुद्रिका का रास्ता वही है - गोल गोल, गोल गोल। 

मैंने गाड़ी एक ओर खड़ी कर दी है। रास्ता बदलना होगा। ज़रूरत पड़ी तो जल-थल-नभ-पाताल में उतरना होगा। पिछले पंद्रह सालों में गुम हो गई लड़कियों की तलाश करनी होगी। उनसे हिम्मत का कर्ज़ लेना होगा, सपने उधार मांगने होंगे। बहुत शोक मना चुकी उनके छूट जाने का, उनकी उम्र के चूक जाने का विलाप भी बहुत हुआ। अपने बगल में बैठी इस 'भली' लड़की को उतारना होगा कहीं, उसे खुदकुशी के लिए उकसाना होगा, उसके बैग की तिलांजलि यमुना में देनी होगी, उसकी हर पहचान मिटानी होगी। 

बहुत हुआ आंखों का बहना कि ख़्यालों की ज़मीन जो बंजर दिखती थी, अब गीली हो चली है। सही वक्त है कि बीज डाल दें। 

अब सही वक़्त है कि कूदकर देखें। जब तैरना नहीं आता था तो बच गए थे। अब तो पानी की गहराई की अंदाज़ भी हो चला है, सर्वाइवल जैकेट्स साथ लिए चलते हैं। गहरे पानी में उतरकर सीपियों में दम तोड़ते मोतियों की तलाश के लिए इससे बेहतर वक्त और क्या होगा?

7 comments:

Puja Upadhyay said...

एक पोस्ट में कितने आईने सजा रखे हैं आपने?

Kailash Sharma said...

बहुत खूब! दिल्ली भ्रमण के साथ बदलते रूपों को बहुत खूबसूरती से चित्रित किया है. आलेख का प्रवाह किसी मोड़ पर साथ छोडने की इज़ाज़त नहीं देता..लाज़वाब...

Pallavi said...

सार्थक आलेख ....

***Punam*** said...

बहुत हुआ आंखों का बहना कि ख़्यालों की ज़मीन जो बंजर दिखती थी, अब गीली हो चली है। सही वक्त है कि बीज डाल दें।

yahi sahi waqt hai...
sundar...

जयकृष्ण राय तुषार said...

बहुत ही मार्मिक आलेख |

sushma 'आहुति' said...

sarthak...

indianrj said...

कैसे लिखती हो अनु जी ये सब? पता नहीं पढ़ते-२ मन कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है और बड़ी मुश्किल से किसी जिद्दी बच्चे की तरह पैर पटकते मन को किसी तरह वापस पकड़कर लाया जाता है. बहुत सुंदर