Tuesday, January 17, 2012

रांची डायरी: ये घर और शहर बहुत हसीन था!

जिस शहर में बड़े हुए हों, वहां लौटकर आने के बहाने खोजते हैं हम। आने के बाद हर बार भ्रम टूटते हैं क्योंकि शहर भी उसी रफ़्तार से उम्रदराज़ हुआ है जितनी तेज़ी से आपके कानों के पीछे से सफ़ेदी झांकने लगी होगी। लेकिन जैसे हम मूल रूप से नहीं बदलते, शहर का मौलिक चरित्र भी नहीं बदलता। फिर भी समीकरण वो नहीं रहते जिन्हें पाइथोगोरस थ्योरम की तरह प्रूव करने का एक तरीका मुकर्रर कर दिया जाए – ना लोगों से, ना शहर से, ना शहर की गलियों से। हर बार नए सिरे से अपने आपसी रिश्तों को समझने की कोशिश करनी होती है। हर बार कुछ टूटता, कुछ बनता-बिखरता है।
मैं पूरे एक साल बाद रांची लौटी हूं। घर के रास्ते नहीं बदले, गलियों के मोड़ वही हैं और मोड़ों पर खड़े दुकानों की जमात भी वैसी ही है। लेकिन रास्तों पर खड़े घर बदल गए हैं, खेतों की जगह अपार्टमेंट्स ने ले ली है और अब सड़कों के किनारे पेड़ कम, गाड़ियां अधिक दिखाई देती हैं। ये बात और है कि लिट्टी-चोखा वाले का ठेला अब भी दुर्गा मंदिर के सामने वहीं लगता है जहां हमारे बचपन में होता था, प्लास्टिक सेंटर अब भी वहीं हैं और रेडियो स्टेशन के पास एक दूसरे से सटकर खड़ी सेकेंड हैंड किताबों की तीन दुकानें अब भी वहीं से नई पीढ़ी के एस्पायरिंग डॉक्टर्स और इंजीनियर्स की ज़रूरतें पूरी कर रही हैं। कुछ मॉल्स और ज़रूर खुल गए हैं, उपहार नाम का सिंगल स्क्रीन डाउनमार्केट थिएटर जल्दी ही मल्टीप्लेक्स कम मॉल हो जाएगा और हम रातू रोड वालों के पास भी एक इलिट पता होगा बताने को।

हमारे कुछ बैचमेट्स अब नई शोहरत, पैसे, रुतबे, बढ़ी हुई तोंद और जिमखाना क्लब की मेंबरशिप वाले प्रतिष्ठित डॉक्टर हैं तो कुछ के चेहरों पर उम्र और मातृत्व की थोपी हुई गरिमा ने कोई मोटा लेप चढ़ा रखा है। अपनी गली में उतरते ही जाने-पहचाने चेहरे ऐसे आपके चेहरे पर उम्र की परछाईयां तलाश करने लगते हैं कि मैं अपनी आंखें नीची किए घर में घुस जाना ज़्यादा मुनासिब समझती हूं।

घर में घुसने के बाद भी सुकून नहीं। आंखें वो लॉन खोजती हैं जिन्हें कंक्रीट में तब्दील कर दिया गया। गमलों में कैक्टस ज़्यादा हैं, फूलों का कहीं नामोनिशान नहीं। जिस किचन गार्डन पर नाज़ हुआ करता था वहां सरसों के थके हुए कुछ सिक्के गिरकर शहीद हो जाने पर आमादा हैं। अमरूद का पेड़ शीत में जल गया है, आंवला धराशायी होने की कगार पर है। आम ने जाने किस शोक में जान दे दी है और केले के पेड़ नहीं, बृहस्पति देव नाराज़ हैं हमसे। गुलाबी पर्दों की जगह कौन-से रंग ने ली है, देखना भी नहीं चाहती। आए हुए कई घंटे गुज़र गए हैं, मैं पहली मंज़िल पर अपने और मम्मी के कमरों की ओर गई तक नहीं। सामान भी नीचे मेहमानों वाले कमरे में रखा है। तीस के इस पार हम कितनी आसानी से अपनी जगह तय कर लिया करते हैं!

घर में ख़बरों का पिटारा खुल गया है। गली के बाहर का मछली बाज़ार वही है, लेकिन अवधा अब भी अंडे और मुर्गे बेचकर पचास करोड़ की संपत्ति के इज़ाफ़े में लगा हुआ है। मनु मौसी की भतीजी उसी कॉलेज में लेक्चरार हो गई है जहां मुझे पढ़ाना चाहिए था और सीमा बुआ का बेटा मुंबई में नाम रौशन कर रहा है। पड़ोसवाले शर्माजी की बेटी की शादी बारह लाख कैश का दहेज ना दे पाने की मजबूरी की वजह से इस साल भी नहीं हुई और मेरी बचपन की दोस्त ने शादी के दस साल और आठ साल की बेटी के बाद अपने भलमानस पति को डिवोर्स देकर दूसरी शादी कर ली। उसके पिता अब नहीं रहे और कैसी दोस्त हूं कि ये ज़रूरी ख़बरें मुझे मालूम तक नहीं। तीस के इस पार हम कितनी आसानी से अपनी ख़बरें भी चुन लिया करते हैं!

रुक्का डैम के किनारे बसे गांवों में फील्ड विज़िट करने और टेसू के जंगलों में दोपहर गुज़ारने का सारा उत्साह फिलहाल काफ़ूर हो गया है। शहद जैसी गाढ़ी और मीठी नींद का टुकड़ा मैं अक्सर मम्मी के तकिए के नीचे संभालकर रख जाया करती थी। इस बात का गुमान था कि इस एक घर में, इस एक बिस्तर पर, इस एक तकिए पर, इस एक रज़ाई को ओढ़कर सोते हुए मुझे नौ घंटों तक वो चैन की नींद मिलती है जो जन्नत में भी नसीब ना हो शायद। आज की रात एक और इम्तिहान की रात होगी। तीस के इस पार हम कितनी आसानी से इम्तिहानों में फेल हो जाना भी स्वीकार कर लिया करते हैं!

(15 फरवरी, 8:30 PM)

6 comments:

सागर said...

30 ke is paar .......kitne halchal

प्रवीण पाण्डेय said...

वापस आना अच्छा लगता है...

Kailash Sharma said...

बदलाव अच्छा लगता है, लेकिन हर बदलाव बीते जीवन की कुछ यादों को इतिहास बना जाता है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

Manish Kumar said...

राँची शहर के उस हिस्से में कभी कभी ही जाना होता है। फिरायालाल के इधर अपनी सीमाएँ खत्म हो जाती हैं। वक़्त के साथ हर शहर बदल रहा है तो राँची में भी बदलाव आया है। वैसेएक बात गौर की आपने, आपके स्वागत में राँची ने अपनी ठंड भी कम कर दी है। :)

Anonymous said...

There is someone maybe something you need to apologize. In your writing there is a pain i cant pin point.

Not being god i still pray. God be with you....

Rahul Singh said...

कहा जाता है कि शहर में वापस लौटने पर जरूरी यह नहीं कि हम शहर को कितना जानते हैं, यह भी जरूरी होता है कि शहर हमें कितना जानता है... कई बार शहर हम पर ध्‍यान न दे, चलता है, लेकिन अजनबी की तरह देखे, यह परेशानी पैदा करने वाला होता है.