Thursday, January 19, 2012

रांची डायरी 3: मनु मुंडा के साथ एक दोपहर

ऐसा नहीं कि पहली बार किसी गांव आई हूं लेकिन हर बार आना पहली बार-सा ही लगता है। हर गांव का चरित्र अलग होता है, सभी गांवों की पहचान का तरीका भी अलग होता हो शायद। हालांकि पाकुड़ से लेकर लोहरदगा तक झारखंड के गांवों में एक गंध है जो कॉमन होती है – हंड़िया की। हंड़िया यहां का स्टेट ड्रिंक है और इस एक गंध की वजह से मुझे कभी आउटसाइडर होने का या अजनबीपन का अहसास नहीं होता।
डेवलपमेंट सेक्टर और स्वयंसेवी संस्थानों के ख़िलाफ़ तमाम भाषण देने और बहस-मुबाहिसों में शामिल होने के बावजूद मैं ये एक बात दावे के साथ कह सकती हूं कि विकास का जो भी थोड़ा-बहुत काम गांवों में नज़र आता है, वो इसलिए है क्योंकि डोनर और इम्पिलिमेंटिंग एजेंसी, दोनों गैर-सरकारी संस्थाएं हैं। वरना यहां दुनियाभर के टैक्सपेयर्स की गाढ़ी कमाई बड़े लोग हजम कर जाते हैं और डकार भी सुनाई नहीं देती।

दोपहर का वक्त है और गांव में शांति पसरी है। क्रॉयलर मुर्गों की कुक्डूकू से कभी-कभी हवा में हलचल होती है या फिर बगल की पगडंडी से साइकिल पर गुज़रता हुआ कोई युवक मोबाइल पर ‘मोय चलातो रे धन सालो’ सुनते हुए जाता है तो लगता है, आवाज़ों में ज़िन्दगी बाकी है। हम प्राइमरी स्कूल पर खड़े हैं। मैं दीवारों पर बने टीचिंग और लर्निंग टूल्स देख रही हूं। राइट टू एडुकेशन एक्ट के तहत हर गांव में एक विलेज एडुकेशन कमिटी (वीईसी) होती है आजकल। गांव के कुछ अभिभावकों को भी इस कमिटी का सदस्य बनाया जाता है। मनु मुंडा वीईसी के चेयरमैन हैँ।

“ड़ेखिए न मैड़म, हम्मी लिखवा ड़हे थे – एबीसीडी लिखवाए हैं,” मुंह खोलते हुए लटपटाई ज़ुबान और हंडिया की तेज़ गंध अपना कमाल दिखाती है। मैं दो कदम पीछे हट जाती हूं।

“ड़ेखिए न…” डोलते हुए झुककर वो एक बच्ची की कॉपी हमें दिखाते हैं। “अच्छा है” से ज़्यादा हम कुछ कह नहीं पाते। “मेड़ा नाम मनु मुंडा है, हम... क्या बोळते हैं उउउउसको... हम अथी के चेयरमैन हैं, कमिटी के।” “अच्छा।” मैं आगे बढ़ जाना चाहती हूं। भरी दोपहर में पीकर झूमते शख्स को संभाल पाना किसी के बस की बात हो ना हो, मेरे वश की तो नहीं है।

“पाइप बिछवा दीजिए ना मैड़म... अथी... पाइप से अथी हो जाएगा।”

“क्या हो जाएगा?”

“अथी, अच्छा हो जाएगा, खेत अच्छा हो जाएगा। नदी से खेत तक पाइप बिछ जाएगा फिड़.... फिड़ देखिएगा हम कइसा खेती कड़ के दिखाएंगे।”

क्या हम इनसे पीछा छुड़ा सकते हैं? मैं बड़ी हसरत भरी नज़रों से अपने सहयोगियों की ओर देखती हूं। गांव का ही कोई एक वाशिंदा मनुजी को पकड़कर वापस स्कूल की ओर पहुंचा देता है और कच्चे बेर चुनने और गांव की डेमोग्राफी समझने के बीच मेरा डायरी में लिखना बदस्तूर जारी रहता है।

धान के खेत कट चुके हैं, कहीं गेहूं लगा है कहीं सब्ज़ियां। गेहूं की एसआरआई तकनीक को समझने के लिए हम ठीक खेतों के बीच खड़े हैं। वसु के हाथ में कैमरा है और उसे पहाड़, खेत, गांव, जंगल, पेड़, नदी के पैनोरमिक शॉट्स लेने हैं।

“मैड़म... मैड़म...,” मनु जी यहां भी धमक आते हैं, ठीक खेतों के बीचोंबीच। मैं किनारे आ जाती हूं। लेकिन वसु परेशान है, इन्हें फ्रेम से बाहर कैसे निकाला जाए। मैं चंद अच्छी तस्वीरों के लिए कुर्बानी देने के लिए तैयार हो जाती हूं और वसु से मनु को मेरे पास भेजने के लिए कहती हूं। अब बैठने की जगह तलाशनी होगी। या इसके मुंह से आती बास मुझे बेहोश करेगी या इसकी बकबक। खेत के किनारे मेड़ पर मनु मुंडा मेरे बगल में आकर बैठ जाते हैं।

“ये साड़ा हमड़ा ही खेत है, मैड़म।”

“हूं...”

“हमको अच्छा अथी दीजिए... अथी... बीज आ खाद... तो हम इधर सोलहआना का बत्तीस आना कड़ेगे...”

“हूं...”

“ये मटड़ देख ड़रे हैं मैडम... विकलांग हो गया है विकलांग... विकलांग समझते हैं ना?”

“हां? हूं...”

“अब विकलांग बड़ा भी होगा तो क्या कड़ेगा... घाटा है... साफे घाटा है...”

सोचती हूं, किसी और डेवलमेंट सेक्टर वाले के सामने मत बोलना, हंगामा मच जाएगा। इस बीच बेर खाना, एसएमएस करना और फोन पर मेल चेक करने का काम उसी धाराप्रवाह गति से चल रहा है, जितनी तेज़ी से मनु बोल रहे हैं।

“हम खूब तड़क्की कड़ेंगे मैडम... खूब अच्छा बीजा भेजवा दीजिएगा... खूब अच्छा फसल होगा...”

“हूं...”

“एक ठो बेटा है मेड़ा... कौन दो क्लास में है यादे नहीं आ ड़रा है... का बोलते हैं... उधड़ पढ़ता है... स्साला नामे नहीं याद आ ड़हा है...”

“कोई बात नहीं दादा, आप टाईम लेकर सोचकर मुझे बताइएगा।”

“ड़ुकिए ना मैडम... बूढ़ा रहे हैं ना, सो भूलने लगते हैं... अड़े नौवां में है... उधर बूंडू में... आप अपने साथ ड़ख लीजिए... कुछ काम-धाम सीखेगा...”

“गांव में इतना काम तो है दादा, आपकी मदद कौन करेगा? खेत कौन देखेगा? आपकी बकरी? मुर्गे?”

“मैड़म, आप नहीं समझते हैं... इधड़ क्या ड़खा है... क्या कड़ेगा इधड़.... बर्बाद हो जाएगा... हमड़ा जइसा हंड़िया पिएगा औड़ दिनभड़ इधड़ से उधड़ कड़ेगा। वहां आपलोग के पास ड़हेगा तो आदमी बनेगा।”

“आदमी इधर भी बनेगा दादा। सब शहर चले जाएंगे तो गांव में कौन रहेगा?”

“गांव तो शहड़े हो गया है मैड़म। खाली नाम के लिए गांव है। लेकिन नौकड़ी नहीं है इधड़, पइसा भी नहीं है...”

“दादा, शांति है इधर, शहर में तो कितनी भागमभाग है।”

“क्या मैड़म... नहीं ले जाएगी उधड़ तो कौनो बात नहीं। इधड़ हम उसको अथी भेजेंगे, अथी... कॉळेज...”

“हां दादा, लेकिन उसके लिए खेती करनी होगी, काम करना होगा, पैसा कमाना होगा और हंड़िया पीना कम करना होगा।”

“एकदम स्सही... एकदम स्सही मैड़म... बीजा दीजिएगा... पाइप दीजिएगा... खाद दीजिएगा... अथी दीजिएगा... अथी... घास निकालनेवाला वीडड़... इधर खेत में मटड़ लगाएंगे... बड़का बड़का होगा, ऐसा विकलांग नहीं... मटड़ बेचेंगे... सोलह आना का बत्ती आना कड़ेंगे... खूब पइसा आएगा...”

“पइसा का क्या कीजिएगा दादा?”

“हंड़िया पिएंगे दीदी, हंड़िया... हें हें हें...”

6 comments:

shashwati said...

HI anu
behtareen post. ek baar padhna shuru kiya to ek baar me poora post pdh gyi. pooja ke blog se tumhare theekane pr aayi aur phir yanha ane ki lat lg gyi...

Kishore Choudhary said...

हाय ! मेरे हथकढ से भी अधिक नशीली पोस्ट. शहर और गाँव के हालत की परतें खोलती हुई. सब कुछ कितना उलझ गया है कि शहर गाँव चला आया और शहर की उम्मीद में गांव पलायन कर गया है.

अनु, आखिर हंडिया ही काम आएगी जब तक रोज़गार और शिक्षा का तालमेल न होगा. रांची डायरी पढ़ने में आनंद है.

प्रवीण पाण्डेय said...

हड़िया में बहुधा छिप जाती है उनके हृदय की पीड़ा, पास से देखा है..

Rahul Singh said...

हंडिया से हंडिया तक जीवन-चक्र और उसका नशा.

Pallavi said...

गाव और गावों के लोगों कि मानसिकता या यूं कहे कि उनका दर्द जो छिपा होता है हड़िया में उसका बखूबी चित्रण किया है आपने ऐसा लग रहा था जैसे सब कुछ आँखों के सामने ही हो रहा हो ...।सार्थक आलेख आभार समय मिले कभी तो ज़रूर आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

nausikhiya said...

Ranchi Dairy :Manu Munda pasand aaya. Hindustan me Main Ghumantu padha karta hu. Jigyasawas ghumantu ko browse kiya.Thot ka khazzzannnna mila.
Sushil Kumar
PATNA