Wednesday, January 25, 2012

एक कविता, एक अनुवाद

Hometown no more 

Various silences
She is acquainted with
And noises 
that aren't unknown
The applause 
which has died down
And the sniggers some more
An ache and
minnows packed in 
a bag with a pair of wheels,
She leaves the hometown
like a stealthy lover
For beloved seems so far away
Tonight
And so does home.


शहर अब अपना नहीं

कई चुप्पियां
जिनसे वाकिफ है वो,
और आवाज़ें
जो अनजान भी नहीं,
वाहवाहियां
जो होने लगी हैं ख़ामोश,
और पीठ पीछे उड़ाए गए
कुछ भद्दे मज़ाक,
एक दर्द 
और कुछ तुच्छ-सी चीज़ें
बंद हो गई हैं एक 
पहियोंवाले बैग में।

वो शहर छोड़ देती है अपना
छुप के आई महबूबा की तरह
कि महबूब बहुत दूर है 
आज की रात,
घर भी तो है उतनी ही दूर।


2 comments:

Ramakant Singh said...

beautiful with deep emotions.
thanks

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दर भावानात्मक अनुवाद..