Tuesday, February 25, 2014

'हाईवे' के बहाने प्रेम और यायावरी

सिर दर्द से फटा जा रहा हो तो क्या करना चाहिए?

सिर दर्द से फटा जा रहा हो तो कोई फिल्म देख आना चाहिए। फिर दो ही संभावनाएं बचेंगी - या तो दर्द इस हद तक बढ़ जाएगा कि अस्पताल जाना पड़ जाए, या फिर कुछ देर के लिए सही, दर्द से बढ़कर कोई और दर्द जी रहे होंगे हम।

ये बेतुका ख़्याल साइनस का इलाज करते हुए स्टीमर में चेहरा घुसाए अचानक से कौंधा था, बिजली की तरह। फिर कब ख़्याल फितूर बन गया, और कब बिजली की रफ़्तार से तैयार होकर मैं घर से बाहर निकल गई, मालूम ही न चला। होश तब आया जब मेरे पीछे ऑटो-लॉक दरवाज़ा बंद हो चुका था, और घर की चाभी भीतर रह गई थी।

अब मेरे पास 'पिच्चर' देखकर वक्त काटने के अलावा कोई चारा नहीं था।

लेकिन अपनी जल्दबाज़ी के फल मिलने बाकी थे अभी।

गाड़ी में बैठकर कुछ दूर आ गई तो होश आया कि पर्स तो घर पर ही छूट गया। पर्स माने छोटा वाला बटुआ। हम दो पर्स लेकर चलते हैं - एक झोलानुमा पर्स और एक पर्सनुमा बटुआ।

तो पैसों वाला बटुआ रह गया उस घर में, जिसकी चाभी मेरे पास नहीं थी और झोलानुमा पर्स झाड़-झुड़ कर लेने के बाद उससे निकल आए ठीक दो सौ तीस रुपए - जिससे फिल्म देखने का इंतज़ाम पूरा हो गया। दो सौ रुपए की टिकट, और तीस रुपए की पार्किंग। पिच्चर तो हम देखकर ही रहेंगे आज, चाहे पॉपकॉर्न से समझौता क्यों न करना पड़े।

तो दोपहर के शो के लिए नाक सुड़काते, छींक मारते, अपने बढ़े हुए साइनस को कोसते हुए हम पहुंच गए स्पाईस मॉल। पूरा टिकट काउंटर खचाखच भरा हुआ। 'हाईवे' देखने के लिए अंकल-आंटी, मम्मी-पापा-बेबी सब पहुंचे हुए थे। टिकट ले चुके थे तो मालूम पड़ा किसी की बर्थडे ट्रीट है। ये लो! जिस अकेलेपन का मज़ा उठाने के लिए हम अकेले पिच्चर देखने आए थे, उस अकेलेपन के मुंह पर तो लोगों ने बटर स्कॉच केक थोप दिया!

हम भी ज़िद्दी! बर्थडे पार्टी से दस कतार छोड़कर आगे जा बैठे। शोर-शराबे से जितना दूर रहेंगे, सिर दर्द का इलाज उतना जल्दी हो सकेगा। हाईवे में साउंड डिज़ाईन रेसुल पुकुट्टी का है, इसलिए साउंड के सेन्सिबल बने रहने की उम्मीद तो की ही जा सकती है।

फिल्म शुरू होती है तो लगता है कि जैसे एडिटर टाईमलाईन पर भारत दर्शन के शॉट्स डालकर एडिट करना भूल गई हो। जाने क्यों मुझे खटका लगता है। कुछ है जो कहीं से टूटने वाला है, कुछ लंबी-बड़ी उम्मीदें।

लेकिन जो बिल्कुल नहीं टूटता, एक किस्म का अंतर्ध्यान है जो हाईवे के साथ-साथ चलता रहता है। फिल्म का इंटरवल कब आता है, मालूम भी नहीं चलता। बल्कि इंटरवल आता है तो लगता है कि इस पहले हिस्से की तो फिल्म में ज़रूरत ही नहीं थी। Prelude के नाम पर फिल्मकार ने बहुत लंबा वक्त ले लिया हमारा। लेकिन कहानी भी इंटरवल के पहले हिस्से में ही है। फिल्म का दूसरा हिस्सा एक सफ़र है, एक अंतहीन सफ़र। एक ऐसा अंतहीन सफ़र जिसपर मैं और आप होने की कामना करते हैं, लेकिन उसे जीता शायद इम्तियाज़ अली जैसा ही सनकी, पागल, eccentric फिल्मकार है।

'हाईवे' सिर्फ एक रईस बाप की इकलौती बेटी वीरा के उठा लिए जाने की कहानी नहीं है।

'हाईवे' एक अक्खड़ गुज्जर महादेव भाटी की ज़िद, उसके अमीरों के प्रति नफरत से उपजनेवाले नतीजों की कहानी भी नहीं है।

हाईवे प्रेम कहानी भी नहीं है।

हाईवे स्टॉकहोम सिंड्रोम तो बिल्कुल नहीं है।

हाईवे इन सबसे बढ़कर कुछ है।

जिस साउंड डिज़ाईन से बहुत उम्मीदें थी, वही साउंड डिज़ाईन फिल्म से बांधे रखती है हमको। दूर निकलती ट्रेन, घुप्प अंधेरे में आती झींगुरों की आवाज़, गाड़ियों के पहिए, गलती से कहीं किसी बर्तन के गिरने की आवाज़ और इन थोड़ी सी आवाज़ों के बीच ढेर सारा सन्नाटा। इस साउंड डिज़ाईन में ए.आर. रहमान का बैकग्राउंड स्कोर क्या कर रहा है, कहीं समझ में नहीं आता। बल्कि 'माही वे' और 'पटाका कुड़ी' अलग से न सुना होता, तो शायद फिल्म में ए.आर.रहमान की भूमिका को लेकर बहुत देर तक पिच्चर हॉल में बैेठे-बैठे सिर खुजा सकती थी।

कहने को तो सिनेमैटोग्राफी पर भी कुछ कहा जा सकता है, लेकिन वो मेरी विशेषज्ञता का दायरा नहीं है। हालांकि फिर भी इस बात पर हैरानी होती है कि जो फिल्म पूरी तरह आउटडोर है, जहां लोकेशन्स अपना काम खुद कर रहे हैं वहां भी कुछ ऐसे शॉट्स क्यों नहीं लिए जा सके जो याद में ठहर जाने के काबिल हों?

लेकिन 'हाईवे' सिनेमैटोग्राफर की फिल्म भी नहीं है। बल्कि हाईवे किसी टेक्नीशियन की फिल्म तो है ही नहीं। हाईवे पूरी तरह इम्तियाज़ अली की फिल्म है, या फिर आलिया भट्ट और रणदीप हुड्डा की।

वैसे मैंने ये पोस्ट फिल्म की आलोचना या रिव्यू के लिए लिखना शुरू नहीं किया था। मैं तो फिल्म देखने के बाद पैदा हुई बेचैनी को कम करने के लिए ये पोस्ट लिखना चाहती थी।

तकनीकी तौर पर फिल्म कैसी भी रही हो, मेरे लिए 'हाईवे' बचपन के ज़ख्मों से समझौता करके जीने, उन्हें भूलने और भूलने के लिए कुछ ऊटपटांग करने की हिम्मत रखने की कहानी है।

हम सब अपने सीने पर अपने गुज़रे दिनों के भारी पत्थर लिए चलते हैं। उन पत्थरों को पिघलाने का रास्ता किसी ऐसे ही हाईवे से होकर जाता है शायद, जिसपर हम कभी चले नहीं। जिसे कभी देखा नहीं। जिसे देखने की, जीने की हिम्मत नहीं रखते हम। हम तो प्लानिंग में जीते हैं। कम्पार्टमेंट्स में। इतने पैसे हो जाएंगे, तो इतने दर्शनीय स्थल, इतने टूरिस्ट प्लेस देख लेंगे हम। बच्चे इतने बड़े हो जाएंगे तो ये-ये देख लेंगे।

लेकिन एक ज़िन्दगी वैसी भी होती है जिसमें कोई प्लानिंग नहीं होती। जो अपने-आप चलती रहती है। जेब के बचे-खुचे दो सौ तीस रुपए ख़त्म भी हो जाएं तो क्या रुकता है? लेकिन एडवेंचर हमारे लिए पैकेज टूअर के साथ मिलने वाला पैम्फलेट है जिसपर टिक मार्क लगाकर हम खुद को बहुत एडवेंचरस, बहुत बड़े घुमक्कड़ मान लेते हैं।

मेरे लिए 'हाईवे' अपने घुमंतूपन से बेइंतहा प्यार करने, अपने भीतर का यायावर बचाए रखने का यकीन दिलाने वाली फिल्म है, जो प्लानिंग नहीं करता, जो इम्पलसिव है, एक छोटे बच्चे की तरह ज़िद्दी भी।

यूं भी जो इंसान किसी मंज़िल का नहीं होता, वो इंसान सबका होता है - उसी शुद्धता, उसी ईमानदारी के साथ, जिस ईमानदारी के साथ वो रास्ते का होता है।

मंज़िलें हमें सीमाओं में जकड़ती हैं। रास्ते हमें स्वच्छंद छोड़ते हैं। मंज़िलें अनुरक्ति का ज़रिया हैं, अटैचमेंट हैं। रास्ते हमें अनासक्त रखते हैं। रास्ते हमें विरक्त रखते हैं, बिल्कुल डिटैच्ड। बौद्ध भिक्षुएं के यायावर होने के पीछे का राज़ अब समझ में आया है। रास्ते हमें ईश्वर के क़रीब रखते हैं। रास्ते हमारे भीतर का प्रेम बचाए रखते हैं।

मेरे लिए 'हाईवे' उस एक लम्हे को समझने की राह खोलने वाली फिल्म है जिसमें  प्रेम अपने शुद्ध रूप में होता है - अपेक्षाओं के परे, उम्मीदों से दूर। वीरा से महावीर पूछता है कि तुम आख़िर चाहती क्या हो? मेरे साथ शादी करोगी? बच्चे पालोगी? वीरा बहुत मासूमियत से कहती है, ऐसा कोई प्लान तो नहीं है।

ये वो प्रेम है जो उदार है, सिर्फ समर्पण जानता है। ये प्रेम बांधता नहीं है। सामने वाले से कोई उम्मीद नहीं करता, सिवाय इसके कि जितना हासिल हो, वो सांस-सांस जी लिया जाए। इस प्रेम में भी कहीं कोई प्लानिंग नहीं है। लेकिन हममें से कितने लोग कर पाते हैं इस तरह अपने घर-परिवार-बच्चों से प्यार? हमारा प्यार कितना अनुरक्त होता है, कितना डरपोक, किस हद तक असुरक्षित!

'हाईवे' मेरे इस यकीन को बचाए रखता है कि हर प्रेम कहानी का अंत सुखांत ही नहीं होना चाहिए। जो अधूरा है, वही सुन्दर है। दैवीय। कभी न ख़त्म होने वाले रास्ते की तरह। उन रास्तों की तरह, जिनपर मैपरीडिंग करते हुए नहीं चला जा सकता। उन रास्तों की तरह, जिनकी अहमियत सिर्फ और सिर्फ आप समझते हैं, या फिर आपकी ये आत्मा। 'हाईवे' पर चलना उसी रूहानियत को बचाए रखना है।

एक पहाड़ी नदी की तेज़ धार के ठीक बीच पत्थर पर बैठी हुई वीरा जब पहले हंसती है, और फिर रो पड़ती है तो उसके साथ-साथ उतनी ही ज़ोर-ज़ोर से रोने को जी चाहता है। अपनी ज़िन्दगी की आपाधापी में हम कैसे ख़ुद को खो देते हैं! और ख़ुद से मिलते भी हैं तो कहां! वो तेज़ धारा वीरा को बहाकर ले ही गई होती तो क्या अफ़सोस होता। किसके लिए जीना है, और किस जीवन के लिए इतनी हाय-तौबा!

पहाड़ पर का घर एक वीरा का ही सपना नहीं, हममें से जाने कितनों का सपना है वो। लेकिन सपने सपने ही रहे तो अच्छा। सच होते ही उनका रोमांस भी खत्म हो जाता है, रोमांच भी।

मैं इम्तियाज़ अली की बड़ी फैन नहीं हूं। बड़ी तो क्या, छोटी-मोटी भी नहीं हूं। लेकिन जाने क्यों भीतर से ये इच्छा होती रही कि 'हाईवे' इम्तियाज़ की पहली फिल्म होनी चाहिए थी, या फिर आख़िरी। इसके पहले, या इसके बाद का सफ़र कुदरत से दूर करने की हरसंभव कोशिश करता हो शायद। लेकिन हाईवे कुदरती तौर पर imperfect है, और यही imperfection इस फिल्म की ख़ूबी है।

फिल्म खत्म होने के बाद मैं बहुत देर तक बैठी सोचती रही हूं कि जो जिया उसमें सबसे ख़ूबसूरत यायावरी थी - अजमेर से पुष्कर तक अकेले एक बस में किया गया सफ़र, मुक्तेश्वर के एक कैंप से दिखाई देने वाला खुला आसमान, सातताल के पास के किसी अनाम गांव में किसी अनजान घर में परोसा गया राजमा-चावल, अलवर के एक गांव से दूसरे गांव की धूल खाती जीपयात्रा, नगापट्टिनम के प्लेटफॉर्म पर किया गया इडली-चटनी का नाश्ता, आणंद की किसी सड़क पर गिरती हुई दोपहर का सुकून, गोड्डा के किसी पहाड़ी गांव में गुज़री कोई रात, कॉर्बेट के किसी गांव में मनाई गई भांग में डूबी कोई एक अलमस्त होली...

ये हाईवे है। कीकर, पीपल, साल, बांस, टेसू, अमलतास, गेहूं, मक्का, सरसों, गोभी, बाजरा, चीड़, देवदार और जाने कौन से नामी-बेनामी खेतों, जंगलों, रास्तों के बगल से होकर गुज़रने वाला हाईवे। फिल्म देखिए न देखिए, अपने आप को बचाए रखने के लिए साल में दो-चार बार हाईवे पर ज़रूर उतरते रहिए। बिना मैप, बिना प्लान के। ख़ुद से मिलने का इससे बेहतर और कोई रास्ता नहीं होगा।

अपनी ज़िन्दगी में जिए गए हाईवे के बारे में सोच-सोचकर अब सिर तो क्या, ऊपर की छत भी घूम रही है। इसलिए कई विरोधाभासों की उंगलियां थामे मैं अपनी मंज़िल की ओर रूख कर चुकी हूं।

Monday, February 17, 2014

कविताएं पढ़ते रहना तुम्हें प्यार करते रहना है

यूं कहां होता है कि कोई रात ऐसे गुज़रे जैसे बूंदों-बूंदों पिघल रही हो, टिक-टिक-टिक-टिक खिसक रही हो।

रात के ऐसे गुज़रने की दो ही वजहें होती हैं शायद - एक कि प्यार के आग़ोश में होना, और दूसरा कि अपने भीतर से जो आवाज़ें निकल न पाती हों, उनके लिए शब्द, शब्दों के मायने, मायनों में आवाज़ें ढूंढने की बेजां कोशिशें करना।

बीती हुई एक रात ऐसे ही गुज़री है शायद।

मैं नहीं जानती, मैंने कब और कहां, क्यों और कैसे कविताएं पढ़ना छोड़ दिया था। अचानक। यूं ही। बेवजह।

कविताओं के लिए वक़्त कहां था?

वक़्त भी नहीं था और वजह भी नहीं थी। कविताएं पढ़ना ख़ुद की तलाश करना होता है अगर, तो एक हद के बाद हम ख़ुद की तलाश बंद कर देते हैं।

बालों में तेज़ी से उतरती सफ़ेदी और उससे भी तेज़ी से निकलती उम्र अपने आप ख़ुद से मिलाने के बहाने छीनने लगती है। ये ख़ुद से मिलने के बेसलीका बहाने अपनी ज़रूरत के पूरा करने के तरीके होते हैं बस। ये ख़ुद से मिलना गद्य में लिखने की तरह होता है, बेहद ज़रूरी और एक कम्पलसिव डिसॉर्डर की तरह, लेकिन उतना ही क्षणिक और तात्कालिक भी, जैसे हर तरह से अपने जिस्म की फ़ौरी ज़रूरतें पूरी करना। भूख लगी तो खा लिया कुछ भी। स्वस्थ रहना है तो आठ घंटे की नींद बनी रहे, और निस्बत है तो सुपुर्दगी भी हो ही जाए कभी-कभार।

लेकिन रूह जगी है तो करवटें भी लेती है।

और यूं रूह के जागने का रिश्ता कविताओं से कैसे होता है, मैं भी नहीं जानती। लेकिन बीती रात कविताओं ने गिरहों को खोल देने का काम ज़रूर किया है। विलियम कार्लोस विलियम्स ने लिखा है कि कविताओं से ख़बरें नहीं मिला करतीं। लेकिन फिर भी दुनिया भर में इतना संघर्ष कविताओं में मिलने वाले सुकूं के हर रूह तक न पहुंच पाने की वजह से ही है।

जिस दिन लड़ते-लड़ते थक जाएगी दुनिया, जिस दिन जंग को मिल जाएगा अंजाम और ले लिए जाएंगे फ़ैसले, उस दिन सूरज के डूबने से पहले, पर्दों को गिराकर पीली रौशनी से भरे हुए कमरे में दो कुर्सियों पर आमने-सामने बैठे हुए मैं तुम्हें सुनाऊंगी अपनी पसंदीदा कविताएं। उस दिन खुलकर रोना हो जाएगा आसान। उस शाम मर भी गई तो अफ़सोस नहीं होगा।

सुनना परवीन शाकिर का लिखा 'प्यार' कि...

'अब्र-ए-बहार ने
फूल का चेहरा
अपने बनफ़्शी हाथ में लेकर
ऐसे चूमा

फूल के सारे दुख
ख़ुश्बू बन कर बह निकले हैं'


जब किसी ज़ख़्म के न भर पाने का दुख कचोटेगा... जब अपनी कई सारी बातों पर बेबात सालेगा कोई अफ़सोस, तो अपनी बेहद बेसुरी आवाज़ में सिसकियों के बीच सुनाऊंगी अमीर ख़ुसरो कि 'किसे पड़ी है जो जा सुनावे पियारे पी को हमारी बतियां'

जब हम और तुम ज़िन्दगी के फ़लसफ़ों पर, जिए हुए और ज़बर्दस्ती जिए हुए लम्हों पर रौ में हंसते जाएंगे और बेसिर-पैर का काफ़िया मिलाएंगे तो दुहराऊंगी मैं अज्ञेय कि

'हर किसी के भीतर
एक गीत सोता है
जो इसी का प्रतीक्षमान होता है
कि कोई उसे छूकर जगा दे
जमी परतें पिघला दे
और एक धार बहा दे'


मौसम के फिर भी न खुल सकने की बेकसी के बीच जब पेट को भूख सताएगी और सूखते हुए होठों को चाय की याद आएगी तो सामने लाल मिर्च की सालन और सूखी हुई रोटी चाय में डुबो कर खाते हुए अपनी बातों को आगे बढ़ाने का काम उस्ताद मोईन ख़ान और छाया गांगुली को सौंप देंगे, और उन्हें गाने देंगे एक दिलरूबा अहमद फ़राज़।

'मैं तो समझा था भर चुके सब ज़ख़्म 
दाग़ शायद कोई कोई है अभी 

ज़िन्दगी कु-ए-ना-मुरादी से
किसको मुड़ मुड़ के देखती है अभी 


मुद्दतें हो गईं 'फ़राज़' मगर
वो जो दीवानगी थी, वही है अभी'


फिर याद आएगा ग़म-ओ-रोज़गार, और ये ख़्याल कि टिक-टिक-टिक-टिक करती रात भी गुज़र जाती है और सुबह कई ज़िम्मेदारियां लेकर आती है। उनमें से बच्चों को स्कूल भेजने, वक़्त पर एयरपोर्ट पहुंचने और उससे पहले कई सारे ई-मेल्स भेजने का काम भी शामिल होता है।

इन सबके बीच मैं बचाए रखूंगी कविताएं, और वो प्यार - ऐसी इकलौती शय जो उम्र, रंग, रूप, जगह, नाम, जिस्म, जीने-मरने के परे होती है और इस रूह से रिसती रहती है, बेतुकी कविताओं की तरह।

तुम्हें एक बार और अलविदा कहते हुए तुम्हारे सीने पर रखकर हाथ सुनाऊंगी अमृता प्रीतम, और दिलाऊंगी यकीन कि वक़्त लिनीयर नहीं होता, न एक सीधी रेखा में चला करता है। वक़्त तो पहिया है जो घूमता रहता है। इस घूमते हुए वक़्त पर इतना तो भरोसा करो कि कहीं किसी रोज़ वो शाम भी मिलेगी, जिस शाम हम साथ पढेंगे ढेर सारी कविताएं।

इस शाम ढेर सारी कविताएं पढ़ लेने के बाद मैं अपने उस रूप की केंचुली उतारकर उसी कमरे की खिड़की से बाहर फेंक दूंगी, और दुनिया में वापस लौट आऊंगी।

उस एक शाम के बाद मैं कविताएं पढ़ना बंद कर दूंगी।

'मैंने फिर कहा-
कि तुम्हें सीने में लपेट कर
मैं बादलों की भीड़ से
कैसे गुज़रूंगी?
और चक्कर खाते बादलों से
कैसे रास्ता मांगूगी?'


और जाते-जाते सुन जाओ डेरेक वालकॉट की उस कविता का अनुवाद, जो पिछले तीन दिनों में मैं पचहत्तर बार पढ़ चुकी हूं। कविता का टेढ़ा-मेढ़ा अनुवाद मैंने किया है, इसलिए भूल-चूक लेनी-देनी।

प्यार के बाद प्यार 
'कभी तो ऐसा वक़्त आएगा
जब, प्रफुल्लित होकर
ख़ुद को सामने देखकर
बढ़कर करोगे अभिवादन
अपने ही दरवाज़े पर,
अपने ही आईने में।
फिर दोनों एक-दूसरे की ख़ुशामदीद में मुस्कुरा उठेंगे
तुम कहना उससे,
बैठो न। कुछ खा क्यों नहीं लेते? 

तुम फिर उस अजनबी से करने लगोगे प्यार, जो तुम ही तो थे
तुम उसे पिलाना अच्छी शराब। देना रोटी का एक निवाला।
और अपने ही दिल को लौटा देना उसी का दिल,
उसी अजनबी को, जिसने किया था तुमसे प्यार।

पूरी ज़िन्दगी, जिसे तुमने किया नज़रअंदाज़
किसी और के लिए, जो समझता नहीं था तुम्हारा प्यार। 

किताबों की अलमारियों से निकाल लेना प्रेमपत्र

तस्वीरें, और वो बेताब चिट्ठियां।
फिर आईने से खुरचकर हटा देना अपना वो अक्स। 


बैठो न! ज़िन्दगी का जश्न मनाते हैं।' 



Friday, February 14, 2014

वैलेंटाईन डे पर लव ई-मेल

हाय, 

मैं कुछ रैंडम लिखना चाहती हूं।

एकदम रैंडम। एकदम आर्बिट टाईप। राईटर लोग टाईप। आर्टिस्ट टाईप। बुद्धिजीवी, इंटेलेक्चुअल टाईप।  

प्यार-मोहब्बत-मिलन-बिछोह टाईप के कुछ बहुत सेंटी से सब्जेक्ट पर। कुछ ऐसा लिखना चाहती हूं कि मैं लिखते हुए जितना न रोऊं, लोग पढ़ते हुए रोएं। आंखों से ज़ेहन तक, ज़ेहन से रूह तक - सब ऐसे भींग जाए जैसे आज की सुबह भींगी हुई थी। 

कुछ ऐसा लिखना चाहती हूं जो सदियों तक पढ़ा जाता रहे, देखा जाता रहे, सुना जाता रहे।

लेकिन कमबख़्त लिखना ही नहीं आता उस टाईप का। आर्टिस्ट हूं नहीं, तो आर्टिस्ट होने का ढोंग किसलिए? मुझसे ई-मेल्स लिखवाओ न? मुझसे इन्वॉयस बनवाओ न? मैं कोई प्रोमो लिख दूं तुम्हारे लिए? या फिर कोई ऐसी स्क्रिप्ट, जिसमें हिट हो जाने के सारे फॉर्मूले हों? मैं सिर्फ इस लम्हे, इस वक्त के लिए लिख सकती हूं। मैं सिर्फ टू-डू लिस्ट को पूरा कर देने के लिए लिख सकती हूं। मैं सिर्फ सौंप दिए गए असाईनमेंट्स के लिए लिख सकती हूं। 

मैं अपने लिए नहीं लिख सकती। मैं तुम्हारे लिए भी नहीं लिख सकती। मुझे तो प्रेम की कविताएं भी लिखना नहीं आता। ई-मेल लिखना आता है। पढ़ोगे? प्रोपोज़ल्स लिखने आते हैं। तुम्हारे काम आएंगे? कॉन्सेप्ट नोट्स? अंतहीन, वक्तहीन, इंतज़ार से लंबे कॉन्सेप्ट नोट्स। लेकिन तुम उनका क्या करोगे? 

वैसे सुनो... मुझे लिखने के लिए नहीं लिखना है। मुझे तो उस instant gratification के लिए लिखना है जो लिखने के साथ हासिल हो जाता है। मुझे उसके लिए लिखना है जिसकी नियति मुकम्मल होती है, और भीड़ में जिसके ग़ुम हो जाने का अफ़सोस नहीं होता। 

मुझे इसलिए लिखना है क्योंकि स्साला और कोई काम ही नहीं आता। (लिखना मुझे बदज़ुबान भी बनाता जा रहा है।)

तुम्हें कौन-कौन से काम आते हैं? तुम प्रेज़ेंटशन अच्छा बना लेते होगे? या फिर एक अदद सी नौकरी होगी, जिसके चक्रव्यूह में फंसे रहने के बदले महीने के आख़िर में तनख़्वाह मिल जाया करती होगी? या फिर सेल्स का काम आता होगा? या फिर नेटवर्किंग? वो तो आती होगी? तुम ज़रूर सॉफ्टवेयर डेवेलपर होगे। तुम्हें कोडिंग आती होगी। मुझे नहीं आती। मुझे कोड्स समझ में नहीं आते। मुझे metaphors भी समझ में नहीं आते। सीधी-सरल भाषा आती है।  

मुझे तो वो सब कुछ भी नहीं आता, जो एक राईटर बनने के लिए ज़रूरी होता है। वैसे मुझे लिखने के अलावा कुछ भी नहीं आता। खाना बनाना भी नहीं जानती। घर ठीक से रख पाने का हुनर भी नहीं है। मेरी सास को मुझ-सी नालायक बहू नहीं मिलती शायद। मैं वैसी बीवी हूं जिसे मालूम ही नहीं कि पति की सुफेद शर्ट्स वॉशिंग मशीन में जाती है तो हमेशा रंगीन या प्रिंटेड होकर कैसे निकला करती है? मैं वैसी मां हूं जो अपने बच्चों को सेट मैक्स पर 'सूर्यवंशी' देखने देती है, और पीछे से फिल्म के सारे गाने गुनगुनाती रहती है - एक एक करके, मुखड़े से अंतरे तक, एक एक लाईन, एक एक शब्द। गाती है उनके सामने कि जोगी तेरे प्यार में मर जाएगी, मिट जाएगी, लुट जाएगी जोगन तेरी।

हां, मुझे गाड़ी चलाना आता है। लेकिन वो किस काम आएगा? पैरों में पहिए हों या गाड़ी में, किस काम के? थमना-रुकना तो पड़ेगा ही एक दिन। मुझे रिझाना-मनाना-मोहना-फ्लर्ट करना नहीं आता। बहस करना आता है। बात करना भी आता है। मुझे पटरी पर सामान बेचते दुकानदारों से बार्गेनिंग करना नहीं आता। मैं घर में इलेक्ट्रिशियन और प्लंबर बुलाकर घर के काम भी नहीं करवा पाती। मुझे कामवाली से काम करवाने का शऊर भी नहीं। मैं डस्टिंग करना नहीं जानती। दराजों को सहेज कर रखने के मामले में अव्वल दर्ज़े की आलसी हूं। हां, मैं बीमार बच्चे के सिरहाने रातभर बैठ सकती हूं। किसी मरीज़ को देखने, उसे खून देने कूदकर दस बार अस्पताल जा सकती हूं। अब मुझसे खतम कौन होगा, सोच लो। 

तो मैं कर क्या सकती हूं फिर? और क्या मैं राईटर हूं? किसने कहा कि मैं राईटर हूं? लिखने के लिए थिज़ॉरस में कोई और शब्दार्थ देख लो न।

लेकिन मैं क्या करूं कि मुझे और कुछ भी नहीं आता, लिखने के अलावा। सिर्फ टाइपिंग आती है। हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में। जितनी तेज़ी से सोच रही होती हूं, उतनी ही तेज़ी से कीबोर्ड पर टाइप करने का हुनर आता है। प्रति मिनट मेरी स्पीड 60 होगी शायद। 70 भी हो सकती है। लेकिन फिर भी मुझे कुछ और नहीं आता। और मैं स्टेनोग्राफर भी नहीं बन सकती इस उम्र में तो। तो अब क्या करूं? :( 

सुनो, अब जब कुछ और आता ही नहीं तो वैलेंटाईन डे पर  हैपी वैलेंटाईन्स डे का एसएमएस भेजकर भी क्या करूंगी? इसलिए आज मुझे क्लायंट्स को ई-मेल्स ही लिख लेने दो। 

थैंक्स। 
वॉर्मली, 
अनु 

Thursday, February 13, 2014

रौशनी की हिफ़ाज़त है इबादत की तरह

जो आमतौर पर ज़्यादा ख़ुश या आशावादी होता है, उसके तेज़ी से मन की अंधेरी गुफ़ाओं में गिरने की आशंका भी ज़्यादा होती है। जिससे सबसे ज़्यादा उम्मीदें रखी जाएं, सबसे ज़्यादा निराशा भी तो वही करता है।

पिछला एक हफ़्ता जाने क्यों बहुत भारी रहा है। अगर ये सिर्फ इसलिए है क्योंकि पिछले एक हफ़्ते में मैंने कोई मुक़म्मल काम नहीं किया, कहीं बाहर नहीं गई, किसी से मिलने का कोई बहाना नहीं ढूंढा तो ये सारी वजहें आधारहीन मानी जाएंगी। मन के नासाज़ होने का रिश्ता इन सबसे जुड़ा हुआ होता है क्या?

मुमकिन है कि हो भी। मैं वर्कॉहॉलिक कही जाती हूं। काम की धुनी। एक काम ख़त्म हुआ नहीं कि दूसरा सिर पर ले लेने के लिए बदनाम। मुझे अपनी ज़िन्दगी में जितनी ही सहजता और तरतीबी चाहिए, मेरा काम उतना ही बेतरतीब और बेसलीका होता है। मेरी टू-डू लिस्ट कभी ख़त्म नहीं होती। मेरी टू-डू लिस्ट अगर सुरसा का मुंह है तो मैं हनुमान।

मेरे लिए ये आत्मचिंतन का वक़्त है। सोचने का मौका भी कम ही मिलता है मुझे। इसलिए सुबह-सुबह ध्यान लगाने की जगह इस पन्ने पर आ बैठी हूं। क्या जाने आत्मालाप से ही कोई हल निकले?

वो कौन-सी चीज़ है जो मुझे इस हद तक परेशान कर रही है कि मुझसे कोई काम नहीं हो रहा? मेरे भीतर बैठे emotional guidance system के कॉम्पास की सूई बार-बार हताशा, डर, anxiety, उद्वेग, पलायन कर लेने के ख़्याल की ओर क्यों इंगित कर रही है? मैं किस चीज़ से भागना चाहती हूं? और क्यों? मुझे किस बात का डर है? और क्यों? मुझे दुनिया भर से इतनी ईर्ष्या क्यों हो रही है?

हर हाल में गहरे उतरकर वजहों की जड़ों तक जाना होगा। अगर बीमारी की जड़ न मिले तो सिर्फ एन्टीबायॉटिक्स पर मन के इंफेक्शन का कब तक इलाज करेंगे हम? आओ अनु सिंह, चलो इसलिए अपना इलाज ढूंढते हैं क्योंकि मरीज भी तुम, चाराग़ार भी तुम। बाहर कोई हल नहीं मिलता। इसलिए लाख बत्तियां जला लें, मन को रौशन कैसे करेंगे? बाहर वैसे भी बहुत अंधेरा है। सब अपने-अपने अंधेरों से जूझ रहे हैं। इसलिए अपने भीतर का मेन स्विच ढूंढना होगा। जब वो मिल जाए तो आस-पास जहां जो भी बाकी है, उस रौशनी को बचाए रखने के तरीके ईजाद करने होंगे।

किस बात का ख़ौफ़ है तुम्हें? क्या हासिल किया था जो खो जाएगा? और क्या न मिल पाने का डर? निडरता फ़ाकाकशी में भी है और ख़ौफ़ सब हासिल कर के भी। इसलिए, जो है सब ठीक है। जो मिल रहा है उसकी शुक्रगुज़ारी मनाओ, और आगे बढ़ जाओ। यहां बेचैनियों का कोई अंत नहीं है। सुख बड़े-बड़े माइलस्टोन्स तय करने में नहीं, सफ़र करते जाने में है। छोटी-छोटी अड़चनें पार करने में है। माइलस्टोन्स का तो यूं भी कोई अंत नहीं होता। ज़िन्दगी एक अंतहीन रेस है और आख़िरी सांस तक दौड़ते हुए भी कुछ हासिल नहीं होगा। अपनी स्पीड का सम्मान करना सीखो, और अपने लिए रास्ते भी ख़ुद चुनो और अड़चनें भी।

किससे ईर्ष्या है और क्यों? किसकी ज़िन्दगी जीना चाहती हो? जब किसी और की ज़िन्दगी से अपने की अदला-बदली ही नहीं करनी तो फिर ये डाह क्यों? तुम किसी और की तरह नहीं हो सकती, कोई और 'तुम' नहीं हो सकता। अपने-अपने वजूदों में सब अपनी-अपनी असुरक्षाओं से जूझ रहे होते हैं। इसलिए, किसी और को देखकर उस जैसा हो जाने की कामना करना ही व्यर्थ। इसलिए, मेरे हुनर भी मेरे अज़ीज़ और मेरी कमियां भी मेरी ही अपनी, मेरे अपने बच्चों की तरह।

मैं कहां होना चाहती हूं, मैं कहां की हो गई हूं, ऐसे सवालों का कोई मायने नहीं होता। मैं जहां हूं, वहां की हो जाऊं यही सबसे बड़ी जीत है।

तय कर लो तो हर चीज़ परेशान करेगी (किचन के नल से बूंद-बूंद टपकता पानी भी, और अपनी तन्हाई भी) और मान लो तो हर चीज़ का हल है। ये जो है, वो भी गुज़र जाएगा। दिस टू शैल पास।

इसलिए आज के लिए टू-डू इतना ही कि बगल में ठुनकते हुए बच्चे को हंसाया जाए।


Wednesday, February 12, 2014

निर्दोष दोशीज़ाओं के हज़ार दोष

किसी भी पब्लिक स्पेस में आकर ये किस्सा बताने के लिए बहुत हिम्मत जुटानी पड़ी है। लेकिन हम इसलिए अपने तजुर्बे बांटते हैं ताकि सुनने-पढ़ने वाला उन तजुर्बों से कुछ हासिल करे। चार साल पहले की बात है, घर के काम-काज और अपने बच्चों की देखभाल में मदद लिए रांची से मैं एक लड़की लेकर आयी थी। सोलह-सत्रह साल उम्र रही होगी उसकी, लेकिन वो लड़की दिल्ली में पहले भी काम कर चुकी थी। जैसा कि बड़े शहरों में अक्सर होता है, धीरे-धीरे आप अपनी कामवाली पर भरोसा करने लगते हैं, और फिर घर भी उसपर छोड़कर जाने लगते हैं। 

उस लड़की के लिए हमारे घर में एक अलग-से कमरा था - सर्वेंट क्वार्टर के तौर पर, जिसका दरवाज़ा अलग से बाहर की ओर खुलता था। सब ठीक ही चल रहा था, कि उस लड़की की बहन (कुछ महीनों बाद दोनों बहनें मेरे साथ रहने लगी थीं) ने मुझे बताया कि लड़की की तबीयत ठीक नहीं रहती और उसे बहुत ब्लीडिंग होती है। हम भी देख रहे थे कि लड़की धीरे-धीरे पीली पड़ने लगी थी। कई कई दिन तक वो अपने कमरे से नहीं निकलती थी, और घर लौट जाने की ज़िद करती रहती थी। मैं जितनी बार डॉक्टर को दिखाने की बात करती, उतनी बार वो कहती कि उसने अपने डॉक्टर को दिखा लिया है। दोनों लड़कियां महीने में दो दिन की छुट्टी लेकर अपने रिश्तेदारों से मिलने जाया करती थीं, और मुझे लगा कि शायद वाकई किसी डॉक्टर को दिखा ही लिया होगा। फिर एक दिन उसकी तबीयत इतनी ही बिगड़ गई कि मैं ज़िद करके अपनी एक डॉक्टर दोस्त को घर बुला लाई। जब मेरी दोस्त ने उसका चेक-अप किया तो मालूम हुआ कि लड़की ने अबॉर्शन की गोलियां खाई थीं, और बहुत ब्लीडिंग की वजह से उसे सीवियर अनीमिया हो गया था। उसका ब्लड प्रेशर बहुत कम होने लगा था, और अब इतनी कमज़ोरी हो गई थी कि चलना-फिरना भी मुश्किल।

मुझे लगा कि किसी ने मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली हो! ये कब हो गया था? मेरे साथ ही तो रहती थी ये लड़की! क्या मेरे घर में...? लड़की ने ख़ुद ही 'बॉयफ्रेंड' के होने की बात क़ुबूल कर ली, और बहुत पूछने पर भी नहीं बताया कि वो लड़का कौन था। बाद में उसकी बहन ने मुझे बताया कि लड़का नहीं, दरअसल अधेड़ उम्र का एक रिश्तेदार था जिसने लड़की से शादी का वायदा किया था। मैं उस आदमी को पकड़कर पुलिस के हवाले कर देना चाहती थी, लेकिन इस लड़की की हालत देखकर सिर पीट लेने के अलावा कोई और चारा नहीं सूझा। वो पागल लड़की समझने को तैयार ही नहीं थी कि जिस प्यार में वो जान गंवाने चली है, और अपने शरीर की वो दुर्गति कर चुकी है उस "प्यार" को न लड़की की कद्र है न उसकी जान की। उस आदमी को एक शरीर मिल गया था, जिससे जीभर कर खेल लेने के बाद मरने के लिए छोड़ दिया था उसने। (उस आदमी ने किसी तरह के संबंध से साफ तौर पर इनकार कर दिया, और लड़की हमेशा के लिए घायल मन और शरीर लिए वापस गांव लौट गई)

राजस्थान में नाबालिग की गर्भपात के बाद मौत की ख़बर पढ़ने के बाद मन का फिर से विचलित हो जाना जायज़ था। इंटरनेट पर मौजूद एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर 1000 गर्भवती में 62 किशोरियां होती हैं और हर साल होने वाले गर्भपातों का 30 प्रतिशत 20 साल के कम उम्र की लड़कियों का होता है। ये कानूनी तौर पर होने वाले क्लिनिकल गर्भपातों का आंकड़ा है, और मुमकिन है कि इनमें से एक बड़ी संख्या शादी-शुदा किशोरियों की भी हो। लेकिन बिनब्याही किशोरियों के गर्भरातों की संख्या करने की ज़रूरत भी क्यों महसूस होगी भला?

14 से 20 साल की उम्र लड़के और लड़कियों, दोनों के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण होते हैं। लेकिन लड़कियां शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक, तीनों रूपों से कई तरह के बदलावों से होकर गुज़र रही होती हैं। शरीर को लेकर कई सारी जिज्ञासाएं होती हैं उस उम्र में, बहुत सारी भावनात्मक ज़रूरतें भी होती हैं। इसलिए जहां थोड़ी-सी भी चिकनाई दिखती है, वहां बहकावे में आने की गुंजाईश बन जाती है। उनकी इस कमसिन बेवकूफ़ियों का फ़ायदा उठाने वालों के किस्से मैंने, आपने - हम सबने अपने इर्द-गिर्द देखा है।

इसका फौरी तौर पर समाधान क्या हो सकता है, ये बताना मुश्किल है। लेकिन ये ज़रूर है कि सेक्स शिक्षा और अपने शरीर के बारे में बात किशोर-किशोरियों के लिए इसलिए ज़रूरी है क्योंकि उन्हें सही और ग़लत का 'इन्फॉर्म्ड' फ़ैसला लेना होगा। जिन मुद्दों पर मांएं बात नहीं करतीं, स्कूल में शिक्षिकाएं चुप्पी साधे रहती हैं, जिन मुद्दों पर फुसफुसाहटों और उठी हुई उंगलियों के अलावा कुछ सुनने-देखने को नहीं मिलता, उन मुद्दों पर किशोरियों से संवाद की सख़्त ज़रूरत है। उन्हें ये बताए जाने की ज़रूरत है कि जिस शरीर को हम 'प्यार' के नाम पर दूसरों के सामने खुला छोड़ देते हैं, उस शरीर के ज़ख़्मों पर मरहम लगाने कोई नहीं आता। 'प्यार' के नाम पर शरीर पुरुष के लिए अक्सर सिर्फ और सिर्फ एक ज़रूरत होती है, जिसे पूरा कर वो लड़की के शरीर से भी निजात पा लेता है, उस लम्हे के प्यार से भी। लेकिन एक लड़की के शरीर पर जो रह जाता है, वो 'गर्भ' के रूप में उसे तबाह न कर दे तो अपराधबोध के रूप में ज़िन्दगी भर थोड़ा-थोड़ा ज़रूर तबाह करता रहता है।

(डेली न्यूज़ के "खुशबू" में प्रकाशित)

कोई पूछे है कभी...

सुबह-सुबह इत्मिनान से मिलने वाली एक प्याली चाय भी कितनी बड़ी नेमत है न?

कम से कम मेरे लिए तो है। सुबह उठते ही जिसके पैरों में घिरनी लग जाती हो, उसके लिए तो इत्मीनान का कोई एक पल भी अनमोल है। देखिए, कोई शिकायत नहीं कर रहे हैं हम कि ये सब चुनी और बुनी हुई दुविधाएं भी हमारी ही हैं। लेकिन कोई तो ऐसी जगह हो कि जहां खुलकर अपना दुखड़ा रोया जा सके। 

सोचती हूं कि पहले के दिन अच्छे थे। चुपचाप डायरियों में लोग टूटी-फूटी कविताएं और अपने मन का संताप लिखकर रख दिया करते थे, और फिर उन डायरियों के संदूकों में बंद कर दिया जाता था। ये और बात है कि वही डायरियां फिर गृहस्थियों में भूचाल भी ले आया करती थीं। कम-से-कम यहां जो है, खुले में तो है। सनम ये दुख भी तेरे, दुख का रोना भी तेरा। कहीं कोई दुराव-छिपाव नहीं। आओ कर लो, जो ठीक करना है। संवाद में कोई तो ताक़त होगी। कम-से-कम घुटते हुए ख़ामोश मरते हुए जीने से तो ज़्यादा ही होगी। 

ख़ैर, सुबह धूप लेकर आई है। सामने चंपा के पेड़ पर गौरैया शोर मचाए हैं। ठंड गई नहीं कि इनकी दिल्लगी शुरू। दो-चार दिन में कोयलें भी निकलकर आ जाएंगी जाने कहां से। वसंत राग छेड़ो साजन, छेड़ो कोई गान।

सुजाता सुबह साढ़े छह बजे सफाई कर गई है। मुझे इतनी सुबह इतना शांत घर देखने की आदत नहीं। मुझे बिना शोर मचाए बच्चों को स्कूल भेजने की भी आदत नहीं। लेकिन आद्या अकेली बहुत कम परेशान करती है। अकेले उसका सारा काम वक़्त पर, बिना किसी अड़चन के हो जाता है। अजब होती है बेटियां। अटेंशन न मिले, तो मां का ध्यान खींचने के लिए हर वो शैतानी कर गुजरती हैं जिससे और कुछ नहीं तो उनके हिस्से डांट तो आए। भाई बीमार सो रहा है तो आद्या को कुछ नहीं चाहिए - न अपने हिस्से का प्यार, न उसके हिस्से की डांट। उसका शांति से तैयार हो जाना, अपने कपड़े और जूते आप पहन लेना, अपने हाथ-पैरों में आप क्रीम मल लेना मुझे इतना बेचैन क्यों कर रहा है? 

हम रात भर नहीं सोए - मैं और आदित। बीमार बच्चे की तामीर भीतर की कई खिड़कियां खोल देती हैं। ये बीमार न पड़ता तो मैं रुककर न सोचती कि वो कौन-सा हिस्सा है अपने भीतर का, जिसकी मरम्मती की ज़रूरत है? अगर ये बीमार न पड़ता तो मैं इसके और आद्या के हिस्से का प्यार, उनके हिस्से जाने वाली मेरी अपनी ऊर्जा पता नहीं कहां लगा आती। बच्चे बीमार इसलिए पड़ते हैं क्योंकि उन्हें अपने हिस्से का अटेंशन, अपने हिस्से का प्यार चाहिए होता है। बच्चे मेरी आंखें खोलने के लिए बीमार पड़ते हैं, मुझे टू-डू लिस्ट में वरीयता के क्रमों को बदल देने की ज़रूरत है, ये याद दिलाने के लिए बीमार पड़ते हैं। बच्चे मुझी को मुझसे मिलाने के लिए बीमार पड़ते हैं। वरना तो हर अज़ीज़ को ग्रान्टेड लेना शाश्वत इंसानी फ़ितरत है। 
  
आदित को सोता छोड़कर मैं धीरे-धीरे कई काम निपटा रही हूं। बिस्तर की चादर बदलना, तकिए-कुशन अपनी जगह पर रखना, बच्चों को कपड़े तह करके अलमारियों में डालना और अपने लिए बहुत सारी चाय बना लेना - ग्रीन टी। हर काम का सलीका मुझे ख़ुद को सहेजने में मदद कर रहा है। वरना मुझे लगने लगा था कि मेरी हालत लॉन्ड्री बैग में पड़ी जीन्स की तरह होती जा रही है। न इस्त्री का वक़्त मिलता है, न उनके बिना काम चलता है। इसलिए जो मिला, जैसे मिला पहन लिया और चल पड़े। सलीका थोड़ा-सा ही सही, ख़ुद को बचाए रखने के काम आता है।

बच्चों के कमरे में धूप का एक कोना बिखरा पड़ा है। समेट पाती तो एक डिब्बे में समेटकर रख लेती। लेकिन धूप का वो कोना अपने भीतर बचाए रखना होता है। इस मन का कोई ठिकाना नहीं। बेमौसम बरसात है। जब जी में आए, बरस जाए। उन दिनों काम आती ये धूप, मगर फिर... 

मां सब सीख जाती है। मां बरसना, गरजना, बिखरना, सहेजना सब सीख लेती है धीरे-धीरे। सब्र भी सीख जाएगी और सलीका भी। आज के दिन के कई कामों के बीच एक बीमार बच्चे को वक़्त देते हुए, उसकी जायज़-नाजायज़ मांगें पूरी करते हुए जिए जीना भी एक काम है। जिए जाने के इस नए सलीके के बीच हम आपस में ये तय कर लेंगे कि आज लिटल मिस सनशाइन देखी जाए या फिर तारे ज़मीन पर। 

ज़िन्दगी खुशगवार नहीं तो इतनी भी ज़ालिम नहीं।  

मैंने तो किसी दुख में निकाला था ये पन्ना। मुझे तो गिले-शिकवों से भरनी थी पंक्तियां। फिर ये क्या हो गया? क्यों आशा ताई और उस्ताद शुजात दिमाग़ में गुनगुनाए हुए हैं? कहीं के लिए निकलने और कहीं पहुंच जाने की तो मेरी बुरी आदत है!

कोई पूछे है कभी फूल की महकार का नाम
आप जो चाहें वो रख दें, मेरे दिलदार का नाम...  

Tuesday, February 11, 2014

रुदन का हंसना ही तो गान

जब लिखने के लिए कुछ न हो, तभी ज़रूरी होता है लिखना।

बीती रात सोए नहीं हम दोनों - मैं और आदित। कभी उसका बुखार तेज़ हो रहा था, कभी सांस लेने में परेशानी। ऐसे कौन से कर्म होते हैं जिनकी सज़ा ऐसे निकालनी पड़ती है? बच्चों को बख़्शने का कोई तो इंतज़ाम करो हे प्रभु!

ऐसे कौन से कर्म होते हैं जिनकी सज़ा बीमारियों के रूप में निकलती है? दुनिया में इतनी तकलीफ़ क्यों है?

रात से ज़्यादा तो सुबह भारी हुई है। मर जाने की ख़बर से भारी और क्या ख़बर होगी?

मर ही जाना होता है तो उससे पहले इतनी सारी तकलीफ़ें क्यों देता है ईश्वर? एक ज़िन्दगी और कितने सारे दुख! इसी ज़िन्दगी में कितनी सारी बीमारियां, एक दिल के बार-बार टूटने के कितने सारे इंतज़ाम, कितने सारे इम्तिहान, कितनी सारी बेचैनियां। और फिर एक दिन अचानक सब की सब बेचैनियां शांत हो जाती हैं।

लेकिन इन सब के बीच प्रभु की अद्भुत दुनिया में ज़िन्दगी लगातार चलती रहती है। बीमार बच्चे को अस्पताल ले जाने के काम, खाना पकाने और खाने का काम, कपड़े धोने और संभालने का काम, स्वस्थ बच्चे के स्कूल से लौट आने के बाद उसे डांस क्लास ले जाने का काम, और ज़िन्दगी के बाकी सारे रोज़गारी वाले काम चलते रहते हैं, चलते रहते हैं।

निर्लिप्तता - डिटैचमेंट - किसे कहते हैं? क्या अन्यमनस्कता से अपने काम किए जाने निर्लिप्त हो जाना होता है? या किसी दुख से प्रभावित न होना निर्लिप्तता होती है? ऐसे कैसे कोई सद्भावना के साथ निर्लिप्तता के स्टेज तक पहुंच जाता होगा? रोज़-रोज़ के संघर्षों में कौन सा ऐसा रास्ता होगा कि इसी दुनिया में रहते हुए भी हम इस दुनिया के न हों? शाक्यमुनि का बुद्ध रूप क्या पिता, पुत्र, प्रियजनों की बीमारी या मृत्यु से निर्लिप्त रह पाए होंगे? ये वियोग, ये अनासक्ति ख़ुदग़र्ज़ी नहीं है?

देखती हूं कि दुख चाहे कितना ही बड़ा हो, धीरे-धीरे पिघलने लगता है। अपने छोटे-छोटे कामों में उलझाए रखने वाली ज़िन्दगी हाथ पकड़ कर आगे ले जाने का हुनर भी जानती है। यादों के ज़ख़्म कितने ही गहरे क्यों न हों, जो ताक़त विछोह देती है उसी ताक़त ने इस शरीर में उन ज़ख़्मों को भरने की ख़ातिर metabolism भी तैयार रख छोड़ा है।

बाहर अजीब सी ठंड है आज। जैकेट के बाद भी हवा शरीर पर ठंडे पानी के छींटों की तरह वार कर रही है। फरवरी में इतनी सर्दी!

दिन आज बहुत भारी रहा है, लेकिन इतना भी नहीं कि आद्या को उसके डांस क्लास के लिए लेकर न जा सकूं।
आद्या म्युज़िक रूम में है, और मैं बाहर एक कुर्सी पर। 'संगीत साधना केन्द्र' की दूसरी मंज़िल पर शाम काली गीली चादर में लिपटी इतनी तेज़ी से उतरी है कि जैसे ठंड ने उसे भी न बख़्शा हो।

भीतर आद्या कोई लड़ी सीख रही है और उसके बोलों और पैरों की थाप ने न जाने कौन से मरहम का काम किया है कि मन अचानक बिल्कुल शांत हो गया है। साधना - मन को बांधने का, दुखों से निजात पाने का यही एक रास्ता है।

त कि ट धि कि ट त क त क त क त क त कि ट धि कि ट त कि ट धि कि ट...

भीतर आवर्तन चालू है, और मन में चलता बवंडर उसी आवर्तन के साथ बहुत तेज़ और फिर चौगुन, तिगुन, दुगुन पर थमने लगा है।

पता नहीं किस कवि की पंक्तियां हैं, लेकिन अटक गई हैं ज़ुबां पर आकर उन्हीं बोलों के बीच कि रुदन का हंसना ही तो गान... (और मन के चक्कर ही तो नृत्य?)




 

Saturday, February 8, 2014

कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा

"तुम बहुत थकी हुई लग रही हो... You look exhausted", कॉन्फ्रेंस रूम में मुझे देखते ही उसने कहा था। उसी दफ़्तर में किसी और मिलने गई तो उन्होंने भी यही बात दुहराई, "You look exhausted."

मैं यूं किसी अजनबी के सामने बहुत जल्दी खुलती नहीं, लेकिन पता नहीं क्यों कल मैं बोल पड़ी थी, "मुझे ऐसा लगने लगा है कि जैसे भीतर की जो टंकी है, वो रीतती जा रही है। मैं उससे निकालती जा रही हूं बस..."

"उसे भरने का सबसे अच्छा तरीका है कि कोई अच्छी सी क़िताब ले लो, और कमरे में बंद कर लो ख़ुद को," उन्होंने कहा तो मैं सोचती रही कि कोई पब्लिशर एक एडिटर को और क्या सलाह देगा भला!

ये बहुत दिनों के बाद हुआ है कि ब्लॉग पर मैं बहुत बेचैनी में लौटी हूं। बहुत दिनों बाद लग रहा है कि पहले की तरह लिखना आता तो इस बेचैनी को शायद को मुकम्मल पोस्ट का रूप भी दे चुकी होती अब तक। लेकिन भीतर की टंकी के खाली होते जाने का एक बड़ा ख़ामियाज़ा ये भी भुगतना पड़ रहा है कि जो कहना चाहती हूं, वो कहना नहीं आ रहा। ये भी मुमकिन है कि ये पोस्ट कभी पब्लिक स्पेस में न भी जाए। लेकिन ये करना अपनी ही स्थिति से आंख चुराना होगा, और फिर आंख चुराकर, आंख बचाकर कब तक रहा जाए भला?

इससे पहले कि मेरा इरादा बदल जाए और मेरे ऊपर मेरी ही समझदारी भारी पड़े, मैं कुछ बहकी-बहकी बातें करना चाहती हूं।

मैं भीतर की टंकी को भरने का कोई तरीका चाहती हूं। कोई सफ़र, कोई नया शहर। कोई नई बात, कोई नई किताब। कुछ नए चेहरे, कुछ नए किरदार। मेरे भीतर की टंकी को भरने का एक ही रास्ता है। उसमें जमी काई की सफाई हो, और क्लोरीन के टैब्लेट्स के तौर पर कुछ नए अनुभव, कुछ नए लम्हे डाले जाएं उसमें। मैं किसी लंबे सी ट्रेन यात्रा में कुछ नए से दोस्त बनाना चाहती हूं।

मैं नागापट्टिनम या वडणेरा या कोडरमा जैसे किसी छोटे से स्टेशन पर भिनभिनाती हुई मक्खियों से लड़कर निकले प्याज़ के पकौड़ों के साथ कुल्हड़ वाली चाय पीना चाहती हूं। मैं किसी अंतहीन सफ़र पर होना चाहती हूं।

मैं ऐसी जगह पर होना चाहती हूं जहां धूप जलते-बुझते रात-शाम-सुबह-दोपहर में न बांटती हो ज़िन्दगी। थोड़ी सी रौशनी के लिए मैं आंखों की स्याही में होठों के उजाले भरना चाहती हूं।

मैं ऐसे जंगल में घुसना चाहती हूं जहां की पगडंडियां वन-वे हों। लताओं-पत्तियों-झाड़-झंखाड़ों की बनैली ख़ुशबू में जिस स्वच्छंदता का सुख है, वो सुख चाहिए। थोड़ी देर के लिए ही सही।

मैं पलाश के फूल चुनना चाहती हूं। पेंटिंग करना नहीं आता लेकिन उनकी पंखुड़ियों को मसलकर रंग बना दूंगी किसी कलाकार के लिए।

तैरना नहीं जानती लेकिन जाने क्यों गहरे पानी में कूद जाने का ख़्याल तारी रहता है। जिन खोजा तिन पाईयां, गहरे पानी पैठ। जाने क्या डूबना है, जाने क्या पाना है।

मैं किसी पुराने से शहर के पुराने से बाज़ार की किसी पुरानी सी स्टेशनरी शॉप में हार्ट शेप्ड वाले कार्ड्स खरीदना चाहती हूं किसी के लिए, जिनपर माया एंजेलो की कविताएं छपी हों, और हों कुछ वैसे बेमानी से कोट्स जिन्हें पढ़कर झूठ-मूठ ही सही, लेकिन ज़िन्दगी पर यकीन हो आए। मैं किसी पोस्टऑफिस में जाकर दूर-दराज़ से शहरों में रहने वाले भूले-बिसरे दोस्तों को वो ग्रीटिंग कार्ड्स पोस्ट करना चाहती हूं। बस तकलीफ़ ये है कि किसी का पता नहीं है अब मेरे पास।

मैं चावल, प्याज़ और ओल का अचार जी भर कर खा लेने के बाद किसी खाट पर लेटे-लेटे सरसों के फूलों से उलझते-उलझते नींद की हल्की झपकियां लेना चाहती हूं। फिर उठते हुए मैनों की जोड़ी को देखकर अपनी दो उंगलियां आप ही चूमते हुए कहना चाहती हूं, गुडलक।

दूर से पटाखों का शोर खिड़की को बींधते हुए चला आता है। ये पागल लोग सारी शादियां आज की रात ही कर डालेंगे। ऊपर की मंज़िल पर रहने वाले पड़ोसियों की तो शाम शुरू हुई है अभी। जैसे-जैसे अंधेरा चढ़ता जाता है, उनकी आवाज़ें और एक-दूसरे पर लगाए जा रहे लांछन और तीखे होने लगते हैं। ये कैसी बस्ती है पागलों की? रात के किसी पहर तो सुकून हो!

अभी तो ग्यारह ही बजे हैं। आधी रात भी नहीं हुई कि नींद न आने की दुहाई दी जाए। टुकड़ों-टुकड़ों में दिमाग ख़्यालों का मकान बना रहा है... कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा... कई ग़म हैं ज़माने में...

नींद में ही आदित ने एक तपता हुआ करवट लिया है मेरी ओर। बुखार उसे है, बड़बड़ा मैं रही हूं।