Friday, March 30, 2012

ऐसे लिखा एक औरत ने (Thus wrote a woman)

मैंने कहा ना कि मैं फेमिनिस्ट नहीं हूं? मैं ऐसे परिवार में पली-बढ़ी जहां पित्तृ-सत्ता को पैदा होते ही स्वयंभू सर्वसर्वा मान लिया जाता है, जहां बेटों-भाईयों-पतियों की सेवा करना जीवन का एकमात्र उद्देश्य होता है, जहां रसोई का इकलौता काम घर के पुरुषों की जिव्हा को संतुष्ट करना होता है, जहां बहुएं अगली पीढ़ियां पैदा करने और घर-बार चलाने के लिए ही लाई जाती हैं। ये सब बिना किसी सवाल या रत्ती-भर बदलाव के पीढ़ी-दर-पीढ़ी होता आ रहा है। हमें भी सवाल पूछना नहीं सिखाया गया था। ना उंगली उठाने की इजा़ज़त थी। घर के दरवाज़े पर लगे रेशमी पर्दे के इस तरफ जो भी हो रहा हो, पर्दे के बाहर से दुनिया वाहवाहियां ही करती तो अच्छा था।

शादी ऐसे परिवार में हुई जो मातृप्रधान था। महिलाओं पर घर और ज़मीन-जायदाद की प्रशासनिक ज़िम्मेदारियां निभाने का दारोमदार था। बहुएं चौके में नहीं जाती थीं, खाना महाराज बनाया करते। इस परिवार में पचास के दशक से ही बहुएं पटना वूमेन्स कॉलेज से पढ़कर आईं। कोई बहू प्रशिक्षित भरनाट्यम नर्तकी थी तो कोई अंग्रेज़ी साहित्य की प्रकांड विदुषी। कोई श्वेत-श्याम एलबम में नेहरू के साथ सनग्लासेस लगाकर खड़े होने की तस्वीरें बार-बार दिखाया करतीं तो किसी के भाई-बंधु नामी-गिरामी मंत्री होते। सुना तो ये भी है कि मेरी एक काकी सास अपने ज़माने में घुटने तक बूट्स डाले दोनाली बंदूक लिए जीप चलाती हुई जंगलों में शिकार के लिए जाया करती थीं। फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में दो-चार को हलाल करने के बाद जाम भी उठातीं, जश्न भी मनातीं।

फिर तो ऐसे परिवारों में रहते हुए अपने वजूद के बारे में सोचने की कोई वजह ही नहीं थी। फेमिनिस्म को अपनी किताबों की अलमारी का हिस्सा भी बनाया जाए, इसकी तो बिल्कुल नहीं। फिर ये एड्रियन रिच को कैसे पढ़ लिया मैंने? मेरी सिरहाने एक फेमिनिस्ट कवयित्री कब और कैसे आकर बैठ गई? क्यों एड्रियन का लिखा पढ़ा तो बार-बार पढ़ती रही?

एड्रिएन रिच के लाइफ इवेन्ट्स से तादात्म्य स्थापित करने जैसा कुछ भी महसूस नहीं किया कभी। लेकिन क्यों उसके लिखे हुए में वो नज़र आता था जिसे कहने-सुनने की हिम्मत मुझमें नहीं थी, ना होगी? क्यों फुल वूमेन्स लाइफ को लेकर मेरे मन में कई सवाल उमड़ते-घुमड़ते रहे? क्यों उसके लिखे प्रेम गीत पढ़ती रही, बंद करती रही, फिर हिम्मत की एक बार और पढ़ने की?

एड्रिएन क्रांतिकारी थीं और वियतनाम युद्ध विरोधियों को अपने घर में बुलाकर बहस-मुबाहिसे करतीं, ब्लैक पैंथर आतंकियों के लिए पैसे जुटाने का काम करतीं। उनके पति को लगने लगा कि उनकी बीवी सनक गई है और अपनी पत्नी से अलग होने के तुरंत बाद उन्होंने जंगल में जाकर खुद को गोली मार ली। इस व्यक्तिगत त्रासदी ने भी एड्रिएन को वो होने से नहीं रोका, जो वो बनना चाहती थी।

शादी के तकरीबन बीस साल बाद एड्रिएन अपनी सेक्सुएलिटी को लेकर मुखर हुईं और बाद में उनकी कई कविताओं में लगातार उनकी सेक्सुअल आईडेंडिटी कविताओं का केन्द्रीय विषय भी रही। वो युद्ध के खिलाफ लिखती रही, अपने निज को बचाए रखने के लिए लड़ती रही। वो इन्टेलेक्ट की पराकाष्ठा थी, उसने ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जिया और जीवन से जुड़े तमाम अंदरूनी और वाह्य कॉन्फलिक्ट्स, तमाम संघर्षों के बारे में बेबाकी से लिखा। एड्रियन रिच को पढ़ती हूं तो लगता है, ज़रूरी नहीं एक अच्छी औरत बने रहना, क्योंकि दुनिया में लाखों-करोड़ों औरतों ने अच्छाई का ये ख़ूबसूरत सतरंगी मखमली दुपट्टा ओढ़ रखा है बखूबी। कोई तो हो जो चिलमन हटाने की हिम्मत रखता हो, किसी की आवाज़ में तो हो सत्ताओं को हिलाने की ताक़त, कोई तो हो जिसे छुपकर आधी रात को पढ़ा जा सके और नींद में ही सही, उसकी हिम्मत की दाद दी जा सके।

आद्या, तुम्हारे लिए मम्मा ने एड्रियन की एक कविता का अनुवाद किया है। तुम्हारे लिए इसलिए क्योंकि पीढ़ियां गुज़र जाती हैं, देश-परिवेश बदल जाते हैं लेकिन कई परिस्थितियां सार्वभौमिक होती हैं। हमारे-तुम्हारे वजूद और मुकम्मल पहचान की लड़ाई भी उनमें से एक है। ये कविता मेरी सबसे पसंदीदा कविता-संग्रह 'स्नैपशॉट्स ऑफ ए डॉटर-इन-लॉ' से ली गई है।

"To have in this uncertain world some stay
which cannot be undermined, is
of the utmost consequence."
Thus wrote
a woman, partly brave and partly good,
who fought with what she partly understood.
Few men about her would or could do more,
hence she was labeled harpy, shrew and whore.

"इस अनिश्चित दुनिया में रहा जा सके कुछ ऐसे
जिसे आंका ना जाए कमतर, वह
प्रतिष्ठा की पराकाष्ठा है"
ऐसे लिखा
एक औरत ने, जो थोड़ी साहसी थी और थोड़ी भली
जो लड़ती रही उससे जिसे थोड़ा-सा भी समझी।
थोड़े ही थे वो आदमी जो उसका बिगाड़ पाते कुछ,
इसलिए उसे कह दिया गया क्रूर, कर्कशा और वेश्या।

4 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

शक्ति प्राधान्य जब तक रहा, शक्ति ने राज किया। जीवन शक्ति तक ही तो सीमित ही नहीं।

Rahul Singh said...

प्रशंसक भी जरूर रहे होंगे उनके, जिन्‍होंने कहा होगा साहसी, बहादुर, शाबास...,उनका भी जिक्र जरूरी लगता है, होता कम ही है, यहां भी नहीं है.

Arvind Mishra said...

एड्रियन रिच के बारे में जानकारी साझा करने के लिए आभार

Arvind Mishra said...

और उन्हें श्रद्धांजलि भी ...