Wednesday, March 21, 2012

ज़िन्दगी से वादा तो नहीं था

उससे बातें करने में डर लगता है कभी-कभी। किसी की निगाहें आर-पार देख पाती होंगी, ऐसा उसकी कोमल, तरल आंखों को देखकर लगता है। उसके सामने छुपाना मुश्किल, बताना मुश्किल। वो डॉक्टर ठहरी। पहले मर्ज़ के लक्षण पूछेगी, फिर नब्ज़ टटोलेगी, दिल का हाल बिना स्टेथोस्कोप के समझ जाएगी और रगों में दौड़ते लहू के प्रेशर का अंदाज़ा मेरे चेहरे का रंग देखकर पता कर लेगी। उसके बेलौस, बेबाक सवाल मुझे परेशान करते हैं। छुपाओ तो मुश्किल, बताओ तो आफ़त।

"क्या हुआ है तुझे, कोई मन का रोग है?" गुस्से में होती है तो उसकी पंजाबियत लहज़े में उतर ही आती है।

"मन के ही रोग तो होते हैं सारे। तुम तो डॉक्टर हो, साइकोसोमैटिक डिसॉडर के बारे में तुमसे बेहतर कौन जानेगा?"

"सायकियाट्रिस्ट, क्योंकि तेरा दिमाग खराब हो गया है।"

"दिमाग खराब नहीं, दुरुस्त हुआ है अब तो। पहले बेसबब गुज़र जाया करते थे दिन, अब उन्हें थामकर रखना चाहती हूं। अब होश में आई हूं कि ज़िन्दगी गुज़रती जा रही है और सपनों की टोकरी में से जादूगर ने खरगोश तो निकाले ही नहीं, रंग-बिरंगे प्लास्टिक के फूलों का गुलदस्ता हाथ में थामा नहीं, सिर पर लटकती छतरी ने रंग बदले नहीं। तो फिर ये कैसी माया थी? कैसा जादू था?"

"किसने सिखाया था कि ख़्वाबों में जादुई दुनिया बुनते रहो?"

"जाने किसने। बचपन से ही ऐसी हूं।"

"हम सब बुनते हैं जादू की दुनिया। हम सबको रंगों के बाज़ार से प्यार होता है। देख तो सही, आस-पास सब जादू ही तो है।"

"हां है ना। लेकिन मन बहलता क्यों नहीं?"

"चल उम्र के पहिए को उलटा घुमाते हैं। दस साल पीछे गए तो क्या-क्या बदलेगी तू?"

"कुछ भी नहीं। सब वैसा का वैसा ही चाहिए। मैंने ये कब कहा कि मुझे कोई शिकायत है ज़िन्दगी से?"

"शिकायत ना सही, मोहब्बत ही सही। लेकिन देख ना, हर हाल में तो हम जी ही लिया करते हैं, वक्त कट ही जाता है, साल निकल ही जाते हैं।"

"वही तो। दिन, महीने, साल तो निकल ही जाया करते हैं। मंथरचाल चलते इन लम्हों का बोझ नहीं ढोया जाता।"

"लम्हे नहीं कटते?"

"हां।"

"लम्हे ही भारी पड़ते हैं?"

"शायद।"

"फिर तो तुझे कोई परेशानी नहीं। धीरे-धीरे खिसकते लम्हों में जीना कितना आसान होता होगा। मुझे तो वक्त के तेज़ी से भागने का डर लगा रहता है।"

"अच्छा? डॉक्टर को भी डर लगता है?"

"क्यों नहीं लग सकता?"

"नहीं, मुझे लगता था डॉक्टर बड़े ज़हीन होते हैं, बड़े समझदार। उन्हें दर्द की समझ होती है, इलाज का शऊर होता है।"

"डॉक्टरों को अपना इलाज करना नहीं आता। तुझ जैसे मरीजों के मर्ज की भी कोई दवा नहीं उनके पास।"

"फिर? मैं और तुम एक ही नाव पर? हम ऐसे ही मर जाएंगे एक दिन, किसी भलमानस चारागर के इंतज़ार में?"

"ना, हम ऐसे ही जिए जाएंगे एक-एक दिन। ऐसे ही जादू भरे ख़्वाब देखते हुए। किसी को चारागरी नहीं आती, यहां कोई मसीहा नहीं बैठा।"

"ऐसा ना कहो मेरी जान। दिल डूबा जाता है।"

"तो संभालो उसको। आधी गुज़र गई और जो आधी बची है, उसे जीने का इंतज़ाम करो कोई। आउट ऑफ द बॉक्स करो कुछ, कुछ वाइल्ड, कुछ ऐसा कि मरते वक्त अफ़सोस ना बचे कोई।"

"मैं भाग जाना चाहती हूं। किसी ऐसी ट्रेन में बैठकर जिसकी मंज़िल का पता ना हो, जिसके स्टेशन्स पर लगे पतों की भाषा मुझे पढ़नी ना आए, जहां कोई मुझे जानता ना हो।"

"बैड आईडिया। तुझे अपने शहर की पगली की कहानी सुनाऊंगी कभी। फिलहाल कुछ और सोच।"

"फ्लिंग। लेट्स हैव अ फ्लिंग।"

"इवेन वर्स। कुल्हाड़ी पर जाकर पैर मारने की बात ना कर। कुछ और सोच।"

"नहीं सूझता। कुछ नहीं सूझता।"

"यू आर अ क्रिएटिव पर्सन। लुक फॉर ए क्रिएटिव सोल्यूशन।"

"माने?"

"माने अपने लिए तिलस्म रच। माया की एक दुनिया। ऑल्टर इगो तलाश कर। अपने नेमेसिस ढूंढ के ला। किरदारों में उन्हें रख और आउट ऑफ द बॉक्स एक ऐसी दुनिया रच जहां तू नहीं, लेकिन वो तेरी अपनी है। उस दुनिया में अपने प्यार के लिए अपनी शर्तें चुन। अपने दुखों पर छाती पीटने के अपने तरीकों का इजाद कर। अपने आंसुओं को जगह दे, लोट-पोट कर हंस और ऐसे जी कि जैसे कभी ना जिया हो कहीं। लुक एट वॉट पावर यू हैव गॉट वूमैन।"

"ये लो कर लो बात। कहां तो मैं जादू की दुनिया से निकलकर रियल वर्ल्ड में जीने की बात कर रही हूं, कहां तो तुम मुझे अंधेरे कुंए में ढकेल रही हो।"

"अंधेरे में ही दिखेगी रोशनी। जहां हम और तुम बैठे हैं वहां सब धुंधला-धुंधला है, ना उजला ना स्याह, ना शाम ना सुबह। अंधेरे में जाने की हिम्मत कर। वहीं से ख़ज़ाना हाथ आएगा।"

"ये क्या था? हमारे बीच ये कैसी बातचीत थी?"

"काउंसिलिंग सेशन था। बहुत सारा वक्त है, बहुत सारे लम्हे हैं। उनका कुछ तो हासिल हो।"

"तब भी जब ज़िन्दगी से ऐसा कोई वादा नहीं था?"

"तब भी जब ज़िन्दगी से ऐसा कोई वादा नहीं था?"

 "और मायूसियों से शामें भरने का था?"

"नहीं था। ज़िन्दगी से कोई वादा नहीं था।"

"देन यू पुल थ्रू, गर्ल।"

5 comments:

Nidhi Shukla said...

Mayajaal mein uljha diya aaj aapne :-)...Nice 1 again, Di it seems content is copied twice with in the same article. Plz have a look na! Sorry yaar Tester Nigahon ka rog hai, yahan bhi defect log kar diya ;-)

Arvind Mishra said...

एक बात कहूं?
जीवन को स्पंदित रहने के लिए रागात्मकता और सपने बेहद जरुरी हैं ..
अभी रहने दो सागरों मीना मेरे सामने :)

प्रवीण पाण्डेय said...

मन को समझ पाना कितना कठिन है, मन उलझाये उससे पहले मन को ही उलझा दीजिये।

वाणी गीत said...

सपनों की दुनिया में जीना मन को बहलाने का साधन ही सही , क्या बुरा है !

सागर said...

बड़ी आग है आपके अन्दर... ! आंच लगती है.