Wednesday, March 28, 2012

बावरा मन, मन की बावरी बातें

आद्या,

अजीब-से दिन हैं ये बेटा। बड़ी दिनों से कोई अच्छी ख़बर नहीं मिली। गुड़गांव में एक मेदान्ता अस्पताल है। हमारी तीन करीबी लोग उस अस्पताल में हैं आजकल, अलग-अलग वजहों से, अलग-अलग हादसों के शिकार। तीनों मौत के मुहाने पर खड़े हैं लेकिन उम्मीद बाकी है, हार किसी ने मानी नहीं और मोह की रेशमी डोर ने ज़िन्दगी को भी बांध रखा है अबतक। इन दिनों सोचती हूं कि ज़िन्दगी का वाकई कोई ठिकाना नहीं होता, हादसे रास्ते के किसी भी मोड़ से टकरा सकते हैं हमसे। यही वजह है कि तुम्हारे लिए ख़्यालों की अमानत सहेजती रहती हूं। जो वक़्त मेहरबां ना हुआ तब भी तुम्हारे औचक सवालों का कोई सोचा-समझा-योजनाबद्ध जवाब तो हो।
आज तुम पूछ बैठी कि दिल और दिमाग तो समझ गई, ये मन क्या है? मन हमारे भीतर का वो हिस्सा है जहां से ख़्याल पैदा होते हैं। यही मन चिंताएं करता है, सोचता है, स्मृति के टुकड़े पालता-पोसता है, अहसासों की चादर पसारता है, हमारे व्यवहार और सोच और कई बार काम-काज को नियंत्रित करता है। इस दुरूह मन को तो बड़े-बड़े ऋषि-मुनि-तपस्वी-देव-गंधर्व बूझ नहीं पाए, तो मैं क्या समझा पाऊंगी तुमको। लेकिन ये बता सकती हूं कि इस मन की सुनें कैसे। कैसे जाने कि अंदर से आनेवाली कौन-सी आवाज़ सही है, कौन-सी बेमानी क्योंकि हम अक्सर ख़ुद को बीच बाज़ार में भरी भीड़ के टकराते हुए भी चौराहों पर खुद को बेहद तन्हां पाते हैं। कोई जीवनी शक्ति भीतर ही होती है अपनी मददगार, वरना यहां कंधे कई होते हैं सिर रखकर रोने के लिए फिर भी गीली-धुंधली आंखों से अपनी उलझनों के धागे हमें खुद ही सुलझाने पड़ते हैं।
अपनी इसी जीवनी शक्ति का स्रोत होता है मन। और इस मन के बारे में क्या कहूं मैं तुमसे? अरण्यक पर्व में झील के किनारे यक्ष ने पूछा था युधिष्ठिर से, कौन धरती से भारी है और है पर्वत से भी ऊंचा? कौन वायु से भी तेज है और किसकी संख्या खर-पतवार से भी है ज़्यादा? युधिष्ठिर ने कहा, मां धरती से भी भारी है और पिता पर्वत से ऊंचे हैं। मन वायु से तेज़ है और हमारी चिंताएं हैं असंख्य।
ये असंख्य चिंताएं भी दरअसल मन के हवाई घोड़े पर ही सवार रहती हैं। घोड़े की लगाम थामना असंभव है, लेकिन सुना है कि उसकी आंखों पर पट्टियां बांधी जा सकती हैं। सुना है कि मन को एकाग्र किया जा सकता है।
मन का एकाग्र, एकचित्त हो जाना एक ही हालत में मुमकिन होता है, जब आप प्रेम में होते हैं। कोई निस्वार्थ, निश्छल प्रेम ही आपके मन को आपके अनुरूप बना दिया करता है। तुम दोनों पैदा हुए थे तो मुझे बहुत दिनों तक ऐसे किसी प्रेम में एकाग्र होने की अनुभूति हुई थी। अब हमारा वजूद अलग-अलग होने लगा है तो प्रेम भी बंटने लगा है शायद। घनीभूत है अब भी, लेकिन मन कई और जगहों पर लौट गया है फिर से।
एक और बात बताऊं? मन कई नामुमकिन लगनेवाली चीज़ों को ज़िन्दगी का हिस्सा बना देने का माद्दा रखता है। मन चक्करघिनी भी है, आपको एक बवंडर में डालकर अविराम गोल-गोल घुमाकर पछाड़ भी सकता है। मन थकाता है, मन जिलाता है, मन बनाता है, मन रुलाता है। कई लेयर्स पर काम करनेवाले इस मन को मांजना-बांधना एक कला होती है जो तुम वक्त के साथ सिखोगी। नहीं भी सीख पाई तो क्या? दुनिया में आजतक कोई एक शख्स मन को एक्सपर्ट नहीं बन पाया है और मैं फ्रॉयड की बात नहीं कर रही। मनोविज्ञान को पढ़कर ज्ञानी बन जाना और बात है, अपने मन को ठीक-ठीक एक ही ज़िन्दगी में समझ पाना और।
तो इस मन को बांधने की कोशिश मत करना। अपनी तर्कशक्ति को बचाए रखना, इच्छाओं को भी। अपने फ़ैसले खुद लेना और सही-गलत के भेद के लिए सलाह-मशविरे कम करना। तुम सबसे बेहतर जानती हो, ये याद रखना। जो गल्तियां हुईं भी तो क्या? मन पर मरहम लगाने की कला भी हम इन द प्रोसेस ऑफ लिविंग सीख ही जाते हैं। मन हो तो कभी मन मार कर ही सही, मम्मा से कुछ और सवाल पूछ लेना। मेरा मन तुम्हारे मन की मम्मा है।
मन को जीती,
तुम्हारी मम्मा 

8 comments:

monali said...

Reading ur blog since long bt laziness nvr allowed me to comment ... u knw wat i like most abt ur blog da u address ur kids in almost evry post.. ur kids r very lucky to hav a mom who nvr forget dem, nt even for a second.. not even wen she is livin her own dreams...

waise to saari maa aisi hi hoti hain bt expressive hona sabko nahi aata.. :)

अनुपमा पाठक said...

जो गल्तियां हुईं भी तो क्या? मन पर मरहम लगाने की कला भी हम इन द प्रोसेस ऑफ लिविंग हम सीख ही जाते हैं।
Such trustful lovely words...
Loved reading this!

प्रवीण पाण्डेय said...

अधिक सोचने से भ्रम उत्पन्न होता है, मन को समझना सर्वाधिक उपयोगी कार्य है।

Rahul Singh said...

मनोविज्ञानी भी दूसरों की तरह अवसाद के शिकार होते हैं, आत्‍महत्‍या भी कर बैठते हैं.

Arvind Mishra said...

मन की ऐसी व्याख्या कि मन बाग़ बाग़ हो गया ...
ऋग्वेद से लेकर गीता तक मन को अनेक बार व्याख्यायित किया गया है ..
ऋग्वेद में चंद्रमा मनसो जातः है तो गीता में कृष्ण अर्जुन को चेताते हैं कि
"अर्जुन मन बहुत चंचल है निरंतर अनुशासन से ही इसे नियंत्रण में रखा जा सकता है !"
@संदर्भ:
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्‌ ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्‌ ॥
भावार्थ : क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए उसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ॥34॥
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌ ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
भावार्थ : श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास (गीता अध्याय 12 श्लोक 9 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए।) और वैराग्य से वश में होता है॥35॥

Bhoopesh Dhurandhar said...

Very well written...... really appreciate the writing and the contenets.

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

बढिया आलेख ……… आभार

Anupama Tripathi said...

बड़ी गूढ़ बातों को सरलता से समझा गयीं आप ...बड़ा अच्छा लगा इस लेख को पढ़ कर ....एक जुड़ाव सा अनुभव किया|बहुत दिनों बाद लगा माँ की बात सुन रही हूँ ...!
...बहुत गहन आलेख है ...
अनेक शुभकामनायें ....