Tuesday, March 27, 2012

हर ख्वाहिश पे दम निकले

आद्या-आदित,

कल रात मम्मा को एक दोस्त ने कहा था, कितना अच्छा होता जो हमारे बारह-चौदह हाथ, दो-चार दिमाग और आठ-दस दिल होते। अपनी इसी ज़िन्दगी में अपने दो-चार क्लोन्स रखने की ख्वाहिश तो वैसे कई बार मैंने भी की है। फिर भी कह दिया उनसे कि कितना अच्छा होता जो ख़्वाहिशें ही नहीं होतीं। हम अक्सर अपनी ख्वाहिशों को कबूलना नहीं चाहते। गीता पढ़नेवाली पीढ़ियों की संतानें हैं ना, जहां कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, मेरे पास तब आ सकोगे जब तुम्हारे मन में कोई इच्छा बाकी ना रहे।

हे नारायण, तुम्हारी रची हुई मायावी दुनिया में रहते हुए ये कैसे मुमकिन है? इससे तो अच्छा था इंसानों और जानवरों के बीच के इकलौते भेद - दिमाग - को रखा ही नहा होता। इसी दिमाग की उपज है कि घास-फूस की झोंपड़ी जैसी ज़िन्दगी पर ख़्वाहिशों के छप्पर डालकर हम अपने लिए मुश्किलों के सामान जुटाने लगते हैं उस झोंपड़ी में, आनेवाली आंधियों, आग और बारिश से बेख़बर।

इस झोंपड़ी में मैंने कई कोने मुकर्रर कर दिए हैं कई तरह की ख़्वाहिशों के लिए। कुछ तुम दोनों के लिए, कुछ तुम्हारे पापा के लिए। कुछ मेरे भाई-बंधुओं-भाभियों के लिए, कुछ जिगरी यार-दोस्तों, सखी-सहेलियों के लिए। एक कोना पूरी क़ायनात के लिए भी तय है कि कोई तो वो दिन होगा कि जो लौह-ए-अज्ल में लिखा है।

कमाल की होती हैं ये ख्वाहिशें, नहीं? बच्चों के हाथ में आ गए पिघलते हुए चॉकलेट के बड़े-बड़े टुकड़ों की तरह। खाओ तो मुश्किल, बचाओ तो मुश्किल।

जापान में बौद्ध धर्म की एक नई धारा सोका गक्काई के प्रवर्तक निचिरेन दाइशोनिन लिखते हैं, बॉन्नो सोकू बुदाई यानि अर्थली डिज़ायर्स आर एन्लाइटन्मेंट यानि यही ख़्वाहिशें ज्ञान के दरवाज़े खोलती हैं। ख़्वाहिशें हमारी चिंताओं, द्वेष और मानसिक परेशानियों की स्रोत हैं। वो ज्ञान की ओर हमें कैसे ले जाती होंगी भला? ख़्वाहिशें तो भ्रम हैं, साक्षात माया - ज्ञान की राह में रोड़ा। दाइशोनिन के मुताबिक लालच, क्रोध, बेवकूफी, दर्प और शक से पैदा होनेवाली ख़्वाहिशें हमारी ज़िन्दगी पर नकारात्मक असर डालती हैं। लेकिन हम सब में ये ख़्वाहिशें बहुत स्वाभाविक तरीके से उपस्थित होती हैं, इसलिए ये ज़रूरी है कि हम स्वयं में वो समझ और अंदरूनी ताक़त पैदा करें जिनसे हमारी ख़्वाहिशें हमारी निजी बेहतरी का मार्ग प्रशस्त करें। जिस दिन हमने अपनी ख्वाहिशों से बचना, उनके कतराना छोड़ दिया, उस दिन उन्हें पूरा करने के रास्तों की समझ पैदा हो जाएगी। कहना आसान, करना मुश्किल। लेकिन नामुमकिन नहीं।

इस वक्त मेरी क्या ख्वाहिश है? एक अच्छी नींद से ज़्यादा कुछ नहीं। कल सुबह? एक अच्छे दिन से ज़्यादा कुछ नहीं। कल दोपहर? चंद तयशुदा ज़िम्मेदारियों के निभ जाने से ज्यादा कुछ नहीं। कल शाम? चंद हसीन दोस्तों के साथ से ज्यादा कुछ नहीं। कितनी थोड़ी-सी तो हैं ख्वाहिशें हर दिन के लिए। प्यार के दो बोल, गर्दन में झूलती बांहें, ना खत्म होनेवाली कहानियां और जेब को हाजत-ए-रफू से बचा लिए जाने के दो-चार उपाय। सब कितना आसान, कितना सहज, कितना सुलझा हुआ।

बस कमबख़्त दिमाग उलझा दिया करता है। लम्हों-लम्हों से बेमानी सवाल पूछता है। ये ऐसा क्यों? वो ऐसा कैसे? ये ना होता तो क्या होता? वो जो होगा तो क्या होगा? जिस दिन हर रोज़ की ख़्वाहिशों को अपनाकर जीना सीख गए, ज़िन्दगी की जंग आसान हो गई बस। कहना आसान, करना मुश्किल। सुनो बच्चों, मम्मा की लिखी हुई एक और टूटी-फूटी कविता। 

मैंने लिख डाली हैं ख़्वाहिशें
अपनी मेरी जान,
जो पूछो कभी कि
क्या चाहोगी, मरने से पहले।

मुझे ख्वाहिश है नीले समंदर की
जहां आती-जाती लहरों-सी
प्रेम की घड़ियां
सख़्त चट्टानों से टकराती हो।

मुझे चाहिए हरी-भरी वसुंधरा
तुम्हारे नेह की बारिश में
भीगी हुई
बंजर ज़मीं से भी फूटेगा बीज।

मुझे ख्वाहिश है
बर्फ से ढंके एक पहाड़ की
कि लाल सूरज
वहीं दिखा पाता है इन्द्रलोक।  

मुझे चाहिए एक जंगल
पलाश के फूलों से दहकता
कि खुशबू टिकती नहीं,
रंग बचा रहता है देर तक।

मुझे दिलाना नमकीन रेगिस्तान
सुना है कच्छ में
आधी रात को
चांद आकर बैठता है पहलू मेँ।

मुझे सौंपना चंद शब्दों की दौलत,
कह डालने की थोड़ी-सी हिम्मत
चुटकी-भर में,
तुम्हारे लिए भर सकूं अपनी सतरंगी डायरी।

पर सुनो, ख़्वाहिशें बची रहें दो-चार बाकी
तो ज़िन्दगी पर
किया जा सकता है भरोसा
जिया जा सकता है फिर, आज की रात।

11 comments:

Nidhi Shukla said...

बहुत खूब...और मेरी भी एक ख्वाइश है, की आप यूँ ही लिखती रहें, हम यूँ ही पढ़ते रहें :-)

Arvind Mishra said...

"अपनी इसी ज़िन्दगी में अपने दो-चार क्लोन्स रखने की ख्वाहिश तो वैसे कई बार मैंने भी की है।"
मगर मन न भयो दस बीस मैडम! :)
तक़रीर भी उम्दा और कविता भी बेजोड़!

प्रवीण पाण्डेय said...

आजकल तो अगले ४-५ घंटे तक ही सीमित रहती हैं हमारी ख्वाहिशें।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत ख़्वाहिश हैं ....




आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 29-०३ -2012 को यहाँ भी है

.... नयी पुरानी हलचल में ........सब नया नया है

अनुपमा पाठक said...

जिस दिन हर रोज़ की ख़्वाहिशों को अपनाकर जीना सीख गए, ज़िन्दगी की जंग आसान हो गई बस।
so true!

Swati Vallabha Raj said...

पहली बार पढा आपको...बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति...विचारणीय तथ्य...

Anupama Tripathi said...

पर सुनो, ख़्वाहिशें बची रहें दो-चार बाकी
तो ज़िन्दगी पर
किया जा सकता है भरोसा
जिया जा सकता है फिर, आज की रात।

बहुत सार्थक और सटीक रचना ...!!

Saras said...

बहुत सुन्दर अनुजी ..सोचती रही कौनसी पंक्तियाँ चुनूँ....लेकिन हर पंक्ति दूसरी से सुन्दर लगी ..सोचा मुकम्मल कविता ही जब सुन्दर है ...हर भाव मोती की तरह पिरोया हुआ ...तो पूरी कविता दोबारा कट पेस्ट क्या करून .....बहुत बहुत बधाई !

दिगम्बर नासवा said...

ख्वाहिशें बची रहेंगी तो जीवन की आस बंधी रहेंगी ... फिर छोटी छोटी ख्वाहिशें तो हर दिल में होती हैं ... उनको जिन्दा रखना बुरा भी नहीं ... भावों की उडान है ये लाजवाब रचना ...

avanti singh said...

umda post!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

खूबसूरत विश्लेषण/चिंतन और उतनी ही सुंदर ख्वाहिशें....

सादर बधाई।