Sunday, March 25, 2012

किसने कहा मैं फेमिनिस्ट हूं?

इन दिनों हालत ये है कि यमराज अपने भैंसे को लेकर यमलोक ले जाने के लिए दरवाज़े पर पहुंच जाएं तो हाथ जोड़कर विनती करूंगी, दो दिन और छोड़ दो। अपने अदृश्य भैंसे को मृत्युलोक के किसी दर्शनीय स्थल की स्वादिष्ट घास चर लेने दो, खुद यहीं आराम फरमाओ, काम से छुट्टी पाओ और मुझे अपनी डेडलाइन पूरी कर लेने दो। मर तो मैं यूं भी रही हूं, तुम्हारे तरीके से कल-परसों मर जाऊंगी, और क्या।

एक दोस्त ने निमंत्रण भेजा था, फेसबुक पर। ज़ुबान बुक्स एक बातचीत आयोजित कर रहा है इंडिया हैबिटेट सेंटर में। विषय है, वीमेन्स राइटिंग्स एंड द वीमेन्स मूवमेंट। ये लो कर लो बात। माने कि फेमिनिस्टों का एक और जमावड़ा। इस आपाधापी में कहां जा पाऊंगी माथे पर बड़ी बिंदी लगाए, कंधे पर झोला लटकाए स्त्री-विमर्श पर धाराप्रवाह बोलने की क्षमता रखनेवाली ईलिट महिलाओं की बात सुनने के लिए?

फेमिनिस्म पर मैं कई पूर्वाग्रह पाले चलती हूं। फेमिनिस्म का अर्थ क्या है? मेरी समझ से फेमिनिस्म उन आंदोलनों का नाम है जो महिलाओं के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की लड़ाई के लिए एक मंच प्रदान करते हैं। मैं हमेशा मन में कई सवाल लिए चलती रही - क्या बिना संघर्ष के अधिकार नहीं मिल सकते? कॉन्फिल्क्ट बनाए रखना ज़रूरी है? हम किस तरह की बराबरी मांगते हैं? ये संघर्ष झूठे यकीनों और दिलासाओं के पुलिंदों  के अलावा आख़िर है ही क्या? फेमिनिज़्म के नाम पर उठाई जानेवाली ये आवाज़ क्या आम स्त्रियों का जीना मुहाल नहीं कर देती? हम बिना अपने शरीर और सेक्सुएलिटी की बात किए विमर्श को आगे नहीं बढ़ा सकते?

ज़िन्दगी को लेकर मेरे फंडे बड़े स्पष्ट हैं - घर बनाए, बचाए रखना प्राथमिकता होना चाहिए। बच्चों के लिए मिसाल बनो। ऐसा कुछ भी मत करो, कहो और बोलो जिससे तुम्हारे अपनों को शर्मिंदा होना पड़े। अपेक्षाओं की गठरी ताउम्र उठाए रखो अपने कंधों पर। सवाल मत पूछो। जितना हो सके, हामी भरो। अच्छी और भली बनो। दूसरों के ख्यालों की कद्र करो, हर क़ीमत पर। एक तय दायरे में ही ज़िन्दगी हसीन लगती है। बेतरतीबी बेचैन करती है, उलझाती है। इसलिए दायरे भूलो मत। इसमें गलत भी क्या है?

गलत क्या है - इस सवाल का जवाब मिले, ये जरूरी है। इसलिए जरूरी है कि आप इस तरह की बातचीत में शिरकत करें। वरना मैं उन लोगों में से हूं जिन्हें फेमिनिस्ट कह दिया जाए तो वे इसे गाली की तरह लिया करती हैं। तो आख़िर ये वूमेन्स राइटिंग की दुनिया है क्या? आधी दुनिया से आते ही अभिव्यक्ति के तरीके कैसे बदल जाया करते हैं? आख़िर इन घिसे-पीटे सप्रेशन और इमैन्सिपेशन की कहानियों के अलावा इन राइटिंग्स में किन औऱ भावनाओं को जगह मिलती होगी। मीना कंडास्वामी को पढ़ा तो लगा, ओवर द टॉप राइटिंग है, एक्स्ट्रावैगेंट एक्जैजरेशन। निवेदिता मेनन के लिखे हुए लेख पढ़े तो लगा, इस अकादमिक लेखन में राजनीति शास्त्र और समाज शास्त्र है, लेकिन मैं कहां हूं। विनीता कोएल्हो के गोवा वाले घर में उनकी बनाई हुई पेंटिग्स देखीं तो लगा, टीवी और फिल्मों की दुनिया में अपनी आधी ज़िन्दगी गुज़ार देने के बाद अब उन्हें यही करने को मिला - एक्टिविज्म? कैनवस पर अपना बदन उघाड़े पीठ दिखाती ज़ुल्फें लहराती स्त्री की पेंटिंग बनाना और बात है, हर रोज़ अपने वजूद के लिए नई रणनीतियां बनाते हुए इस दुनिया में दाल-रोटी-मकान जैसी ज़रूरतों को पूरा करने की कोशिश में लगे रहना और। ये तस्वीरें, ये कविताएं, ये कहानियां, ये उपन्यास क्या काम आएंगे? अपने-अपने घरों में, अपने-अपने काम की जगहों पर संघर्ष किसी तरह के आंदोलन में शामिल हो जाने से मुश्किल ही होते होंगे, इसका मुझे पुख्ता यकीन था।

शायद यही डर था कि मैं फेमिनिस्टों की परछाई से भी बचकर चला करती हूं। बहरहाल, मैं इस बातचीत में शामिल होने के लिए बैठ ही गई, थोड़ी देर के लिए ही सही। पहला झटका ए. रेवती की ओर से आया। रेवती  हिजरा हैं, और ये उनकी पहचान का एक अहम हिस्सा है। मैं औरत हूं, मेरी फीलिंग्स औरत जैसी, मैं भी मां बनना चाहती, सुन्दर दिखना चाहती... टूटी-फूटी हिंदी में रेवती कहती हूं। निवेदिता मेनन जैसी स्कॉलर के सवालों का जवाब रेवती इतनी आसानी और सादगी से दे जाती हैं कि निवेदिता भी प्रभावित हैं, हम भी। रेवती ना सिर्फ लेखिका हैं, बल्कि एक अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं जो महिलाओं के अलावा हिजरा और ट्रांसजेन्डर समुदायों के लिए क्राइसिस इन्टरवेंशन में लगी हैं। मुझसे भी बुरी हालत में हैं कई महिलाएं, मेरे अपने समाज के लोग। उनके लिए आवाज़ कौन उठाएगा? उनको हिम्मत कौन देगा?

मुझे अचानक लगा है कि वाकई शुतुरमुर्ग बन जाने में मैं चैन महसूस करती हूं। कौन कहे कि ज़्यादतियां हैं हर तरफ। मेट्रो स्टेशन पर गाड़ी लगाते हुए पार्किंग वाला मुझे दस बजे तक आने की हिदायत देता है तो मैं सोचती हूं, दस बजे क्यों। आठ बजे के बाद तो घरों में ही होना चाहिए हम लोगों को। ट्रेनों और बसों में महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बे और सीटें ढूंढती हूं। सुनसान सड़कों और गलियों से होकर गुज़रने से बचती हूं। बलात्कार जैसे सेन्सेटिव मुद्दों पर कोई राय नहीं रखती, रखती भी हूं तो कहती नहीं कुछ। डोमेस्टिक वायलेंस पर तो बिल्कुल बात नहीं करती। ये किसी और दुनिया के हिस्से होंगे, मेरी दुनिया के तो नहीं हैं। आर्थिक आजा़दी जैसे विषय दुरूह लगते हैं। सीए और बैंकों से बात करना मेरा काम थोड़े है? मुझे घर बचाए रखना है। मुझे अपने बच्चों को एक आसान, अनकॉम्पलिकेटेड, सुलझी हुई, सहज दुनिया देनी है जहां कोई आइडेन्टिटी क्राइसिस नहीं, कोई कॉन्फ्किक्ट नहीं। ये रेवती मेरे लिए मिसाल नहीं बन सकती। मैं दबी-कुचली महिला थोड़े हूं? ये और बात है कि मैं रेवती को गले लगाकर रोना चाहती हूं, जाने क्यों।

दूसरी लेखिका हैं सलमा। असली नाम कुछ और है, लिखती सलमा के नाम से हैं। त्रिची की हैं और ना हिंदी जानती हैं ना अंग्रेजी। लेकिन टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में अपनी जो कहानी कहती हैं उसका सार कुछ ऐसा है - स्कूल १३ साल में छूट गया। भाई लाइब्रेरी से किताबें लाकर दिया करता था जो वो छुप-छुपकर पढ़ती रहीं। फिर शादी हो गई। पहले मायके से बिना हिजाब निकलने की इजाज़त नहीं थी, अब ससुराल जेल बन गई। कविताएं लिखना शुरू किया। कभी पड़ोसी, कभी मां की मदद से स्थानीय पत्रिकाओं में छपती रहीं। पति को पता चला तो बहुत नाराज़ हुए। कहा, ये अच्छी औरतों का काम नहीं है, यूं घर के बाहर अपने बागी विचारों को पेश करना। सलमा नहीं मानी तो चेहरे पर एसिड फेंक देने की धमकी दी। फिर भी ये जुनूनी औरत लिखती रही, जाने क्यों। क्या गरज थी? उसके लिख देने से क्या बदलना था? उपन्यास छप गया, मशहूर हो गईं, फिर किस्मत के ऊंट ने करवट बदली और पंचायत की कुर्सी हाथ आ गई। इस शोहरत के बावजूद कहती हूं, आई एम नॉट ए गुड वूमैन, नो। माई पीपल्स टेल मी, शी इज नॉट गुड। शी राइटिंग थिंग्स नॉट नाईस। शी सेईंग थिंग्स नॉट गुड। फिर क्यों सलमा? अपनी इज्ज़त की धज्जियां उडाकर मिली शोहरत का क्या करोगी? ये और बात है कि उनकी सुनाई कविता मैं अपने साथ घर ले आईं हूं -

चमगादड़ कमरे में बंद/
अलमारियों से टकराकर/
गिर जाया करता है ज़मीन पर/
चिडिया पार कर जाया करती है/
चहारदीवारियां, खेत-खलिहान, नदी-नाले और पहाड़।

बातचीत के सिलसिले खत्म हुए हैं। मैंने हार्डकोर फेमिनिस्टों की लिखी हुई कई किताबें खरीद लीं हैं, उस पैसे से जो मां ने होली के कपड़े खरीदने के लिए दिख थे। ये जानते हुए भी, कि इन किताबों को पढ़ने के लिए ताने भी सुनने पड़ सकते हैं। ये जानते हुए भी कि गलती से इनके बारे में कुछ लिख दिया तो और भी बड़ी फेमिनिस्ट कहलाई जाऊंगी।

विनीता कोएल्हो ने फिर भी अपनी किताब पर मेरे लिए लिख दी हैं दुआएं - टु मच मोर दैन टेलीविज़न। टु फिल्म्स, बुक्स एंड वंडरफुल स्टोरिज़... हैपी राइटिंग! विनीता, इस दुआ को अमल में लाने की हिम्मत मुझमें नहीं कि मैं सलमा नहीं, रेवती नहीं, फेनॉमेनल वूमैन नहीं, फेमिनिस्ट नहीं। मुझे तो अपने वजूद पर भी गुमां नहीं।

सही ही कहती है नताशा। फेमिनिस्ट बनने के लिए कई अनफेमिनिस्ट काम करने पड़ते हैं पहले।

6 comments:

सागर said...

"फेमिनिस्ट बनने के लिए कई अनफेमिनिस्ट काम करने पड़ते हैं पहले। "

-यथार्थ की ज़मीन पर खड़े लोगों के तेवर बड़े कड़े होते हैं... वो दिख भी रहा है...

"ये रेवती मेरे लिए मिसाल नहीं बन सकती। मैं दबी-कुचली महिला थोड़े हूं? ये और बात है कि मैं रेवती को गले लगाकर रोना चाहती हूं, जाने क्यों। "

- "अंदाज़ अपने देखते हैं आईने में वो,
और ये भी देखते हैं कोई देखता ना हो"

प्रवीण पाण्डेय said...

सहेजना कठिन है, तोड़ना तो कुछ पलों में हो जाता है।

Arvind Mishra said...

फिक्रे मआश और गमें रोज़गार आधी दुनिया को भी है, मैटर्नल इंस्टिंक्ट है और नारीवाद की पगुराहट भी!
सच्ची बड़ी मुश्किल है !

Ramakant Singh said...

एक तय दायरे में ही ज़िन्दगी हसीन लगती है। बेतरतीबी बेचैन करती है, उलझाती है। इसलिए दायरे भूलो मत। इसमें गलत भी क्या है?

kisi bat ko kahana aasan hota hai
use jina mushkil aur sthai banaye
rakhana aur bhi kathin.
bahut sundar abhiwyakti yadi yah
blog ka lekh hai shukriya aur isase hatakar ek aawahan hai to aapake
aawaj ka main intazar nahin karunga
aap kadi hon apane sang payengi.

Arvind Mishra said...

अरे मेरी टिप्पणी कहाँ गयी ?
अब फिर से नहीं लिखने वाला :(

देवेन्द्र पाण्डेय said...

:)