Saturday, November 29, 2014

हलक में अटकी 'मम्मा की डायरी'

आज कल मुझे 'मम्मा की डायरी' के अलावा कुछ नहीं सूझता।

'मम्मा की डायरी' क्या है - इसका सही-सही जवाब देना भी ज़रा मुश्किल है। ये संस्मरण है या आत्मकथा, कथेतर रचना है या शब्दचित्र - ठीक-ठीक किसी को बता नहीं पाती। अपने प्रकाशक को भी नहीं। इसलिए, ये किताब मम्मा की डायरी है - एक माँ की डायरी के कुछ २०० पन्ने।

अब इस रचना प्रक्रिया से गुज़रते हुए मुझे समझ में आने लगा है कि कहानियाँ लिखना ज़्यादा आसान है, अपनी ज़िन्दगी बाँटना नहीं। कितना मुश्किल है सिर झुकाकर सरेपब्लिक ये कह देना कि मुझसे ग़लतियाँ हुई, और एक माँ परफेक्शन का पुतला नहीं होती है। कितना मुश्किल है बेख़ौफ़ ये कह देना कि माँ बनने को लेकर एक परिवार या समाज में जितना हाईप पैदा किया जाता है, उतनी ही संजीदगी से एक लड़की को माँ बनने के लिए तैयार किया जाता तो वो बेचारी लड़की औरत बनते-बनते अपने वजूद को चिंदी-चिंदी बिखरने और कतरा-कतरा समेटने के अतिरिक्त बोझ से बच जाती।

डायरी में प्रेग्नेंसी से लेकर बच्चों को आठ साल का कर देने के बीच का उतार-चढ़ाव है। डायरी में कई ज़रूरी सवाल भी हैं, जिनका जवाब इतनी सारी औरतों से, माँओं से, बच्चों से बात करने के बाद भी मुझे नहीं मिला। डायरी में मेरे कन्फ़ेशन्स भी हैं और कई पन्नों पर तो मैं बुरी तरह बिखरी हुई नज़र आती हूं। मम्मा की डायरी सिर्फ़ एक माँ की डायरी नहीं है, कई परिवारों, परिवारों की संरचनाओं, हमारे ज़माने की परवरिश के तौर-तरीकों का लेखा-जोखा है।

सवाल ऐसे हैं कमबख़्त की जवाब फिर भी नहीं मिलते।

किताब के पन्ने अभी तक प्रकाशक को सौंप नहीं पाई। ये भी नहीं मालूम कि मैं कब पूरी तरह आश्वस्त हो जाऊंगी कि अब मैं क्लोज़ेट से बाहर निकलने को तैयार हूँ। शायद उस दिन, जिस दिन किसी टीनेजर की माँ से बात करते हुए 'abandoned' सुनने पर रुलाई नहीं आएगी। शायद उस दिन, जिस दिन अपने जवान बेटे की मौत का शोक़ मनाती एक बदकिस्मत माँ का स्यापा रात में पूरी कायनात को गालियाँ देने को जगाए नहीं रखेगा। शायद उस दिन, जिस दिन मुझे लगेगा कि बहुत सुन लिया, झेल भी लिया अब तो। अब जाने दो कि हर हाल में जीने की सज़ा की मियाद कम नहीं होनी है।

उस दिन किताब के पन्ने प्रकाशक को सौंप दिए जाएंगे जिस दिन मैं अपने दो कांधों पर मुँह घुसाए सो रहे बच्चों की साँसों के अलावा सब भूल जाएंगे। उस दिन किताब के पन्ने प्रकाशक को सौंप दिए जाएंगे जिस दिन सुबह उठकर मैं कहूँगी कि बस, अब बहुत हुआ - अब कुछ नया सोचते और करते हैं। एक नए तरीके से एक नई पहचान के साथ जीते हैं।

यकीन रखो कि वो दिन जल्द ही आनेवाला है।

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