Wednesday, August 20, 2014

ख़ानाबदोशियों पे ही जाने क्यों, इलाही मेरा जी आए!

टूटा हुआ एक घोंसला, बिस्तर पर फुदकते दो चूजे, फ़र्श पर घूमती बेपरवाह निर्भीक मोटी छिपकली, बिखरा हुआ घर और बाथरूम का एक नल जो बंद ही नहीं हो रहा... रात कुछ ऐसे बिंबों से होकर गुज़री है।

शुक्र है, सुबहों का वजूद रातों से आज़ाद होता है।

साढ़े छह बज गए हैं, लेकिन मैं उठना नहीं चाहती। छह चालीस हो गए हैं, लेकिन मैं फिर भी उठना नहीं चाहती। अगले पैंतीस मिनट में बच्चों की बस आ जाएगी, लेकिन मैं फिर भी उठना नहीं चाहती।

जाने वजह क्या है। रात जल्दी सो गई थी। लेकिन फिर भी मैं उठना नहीं चाहती। मैं बच्चों के बहाने अपनी छुट्टी चाहती हूँ।

बच्चों का इंटर-हाउस कविता पाठ है आज, और दोनों ने बहुत तैयारी की है। आदित तो साढ़े नौ बजे तक होमवर्क करता रहा था, और अपने क्लास के नोटिस बोर्ड पर लगाने के लिए पुलिसवाले का एक स्केच बनाता रहा था। नींद में भी दोनों अपनी-अपनी रटी हुई कविताएं दोहराते रहे थे।

मुझे उठना ही होगा। मुझे दोनों को स्कूल भेजना ही होगा, वरना दिल टूट जाएगा दोनों का।

साढ़े सात से थोड़ा पहले ही घर एकदम खाली हो जाता है। यूं कि जैसे तूफ़ान गुज़र गया हो, और आपाधापियों की निशानियां चुनते हुए एक ही ख़्याल तारी रहता है - बिस्तर पर जाऊं और सो जाऊं बस। गहरी नींद। बहुत गहरी। मर जाने के माफ़िक। और जब उठूं तो किसी अनजान शहर में उठूं, जहां से बिस्तर से बाथरूम तक जाने तक का दरवाज़ा ढूंढना पड़े, रसोई खोजनी पड़े, घर से बाहर निकलने का दरवाज़ा ख़ुद ही बनाना पड़े।

हम सबसे ज़्यादा जो छुपाते हैं, अपनी थकान को छुपाते हैं। जिस्म से ज़्यादा मन की थकान को।

मन को थकान दूर करने का कोई तरीका चाहिए।

ऐसे थके हुए मन को रिजुवेनेट करने के लिए जुलिया कैमेरॉन आपको आर्टिस्ट डेट पर जाने की सलाह देती हैं। कहती हैं कि अपने 'इनर चाइल्ड', अपनी भीतर के 'आर्टिस्ट चाइल्ड' को घर से बाहर निकालिए। शहर में बेवजह घूमिए। सूखी हुई पत्तियाँ अपनी जेबों में भरिए। टूटे-फूटे पत्थर गली-मोहल्लों से लाकर अपनी मेज़ों पर सजाईए। हफ़्ते में एक घंटे का वक़्त अपने लिए, सिर्फ़ अपने लिए निकालिए। ये वक़्त आपके भीतर के 'आर्टिस्ट चाइल्ड' की ज़िद पूरी करने का है।

मैं सोचती हूं, जूलिया कैमरॉन हिंदुस्तान में - ख़ासकर - उत्तर भारत में नहीं रही होंगी। सितंबर की चिलचिलाती धूप और गंदी-सी उमस में भला कोई पत्ते-पत्थर चुनने घर से बाहर जाए? मेरे भीतर का आर्टिस्ट चाइल्ड कभी सोता, कभी रोता हुआ ही ठीक है। हमारे देश में बच्चे ऐसे ही पाल लिए जाते हैं। हमारा समाज बच्चों को नर्चर करने में यकीन नहीं करता, इस बात पर यकीन करता है कि बच्चे बड़े हो ही जाते हैं। रोज़़-रोज़ का संघर्ष जो है, वो बच्चों और बच्चों की तरह भीतर के आर्टिस्ट बच्चे की बात सुनने का वक़्त नहीं देता।

फिर क्या है कि मन ज़िद पर अड़ा है? फिर क्यों मैं बेवजह इंटरनेट पर दुनिया के सबसे तन्हां और अलहदा शहरों के नाम ढूंढ रही हूं? क्यों गूगल पर अचानक टाईप कर बैठी - the 25 most remote places in the world? वो कौन-सी हैरतें हैं जो मैं जीना चाहती हूं, महसूस करना चाहती हूं? रोज़मर्रा की ज़िन्दगी कम हैरतअंगेज़ है? आस-पास कम हैरानियां, कम सदमे हैं कि कहीं दूर जाकर डूबते हुए देखना है सूरज को?

वो कौन-सा शहर होता होगा जहाँ रात उगती नहीं होगी कभी?

वो कौन-सा पहाड़ होगी जिसके चिकने पत्थरों पर से फिसलकर सीधे प्लूटो पर लैंड किया जा सके?

वो कौन-सी नदी होगी जिससे निकलकर मछलियां रेत पर आराम फ़रमाती हों?

दुनिया का सबसे ऊंचा, और सबसे नीचा शहर कैसा होता होगा?

मछुआरों की बस्तियों में क्या वाकई समंदर से निकलकर नाचने के लिए आती होंगी रूहें?

जंगल की बीचोंबीच सड़क जब बल खाना भूल जाती होगी तो कहाँ ठहरती होगी?

एक ज़िन्दगी में ये सब देख लें और जान लें, क्या मुमकिन है ये भी?

दो किताबें और एक आर्टिकल दूसरी ज़ुबान की शक्ल में ढलने का इंतज़ार कर रहे हैं। टूृ-लिस्ट है कि ख़त्म नहीं होती। क्लायंट मीटिंग्स और कॉनकॉल्स आज की ज़िन्दगी का इकलौता सच है। ड्राफ्ट्स में अधूरी कहानियां पुकार पुकार कर थक चुकी हैं। बाज़ार के सौ काम हैं, और बाज़ार जाने के नाम पर आनेवाली उबकाई कम नहीं हुई। मेरा बस चले तो दूध और सब्जी भी ऑनलाइन खरीद लूं। दोस्तों को आवाज़ देना चाहती हूं, लेकिन शुक्र है कि मेरे पास किसी का फोन नंबर नहीं। एक ही रोना क्या रोना हर रोज़? काम के अलावा ख़ुद को बचाए रखने का कोई दूसरा रास्ता नहीं। डेडलाइन जिए जाने की इकलौती वजह है।

सब जानती हूं, लेकिन फिर भी...

ख़ानाबदोशियों पे ही जाने क्यों,
इलाही मेरा जी आए, आए।
इलाही मेरा जी आए...

बूंदों पे नहीं, गहरे समंदर पे
इलाही मेरा जी आए, आए
इलाही मेरा जी आए!!!

 





6 comments:

kuldeep thakur said...

सुंदर प्रस्तुति...
दिनांक 21/08/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
सादर...
कुलदीप ठाकुर

jyoti khare said...

वाकई सच है -- सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति
उत्कृष्ट प्रस्तुति
सादर ----

आग्रह है मेरे ब्लॉग में सम्मलित हों
कृष्ण ने कल मुझसे सपने में बात की -------

आशीष भाई said...

बढ़िया लेखन , धन्यवाद !
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Asha Saxena said...

सटीक लेख |

कविता रावत said...

सच कहा आपने ..बच्चों के स्कूल जाने के बाद घर सूना लगता है..ऐसे में जूलिया कैमरॉन के बारे में जानना अच्छा लगा ..

Ayaan Gupta said...

Hi

Very Nice blog. Haal me maine bhi ek blog hindi me likhna shuru kiya hai. Mere blog per aakar apne comments ya sujhav dijiye. Mere blog ka naam hai Dainik Blogger (http://dainikblogger.blogspot.in/)

Thank you
Ayaan