Friday, August 23, 2013

इस कहानी को कौन रोकेगा?

दो हफ्ते भी नहीं हुए इस बात को। आपको सुनाती हूं ये वाकया। मैं अलवर में थी, दो दिनों के एक फील्ड विज़िट के लिए। मैं फील्ड विज़िट के दौरान गांवों में किसी महिला के घर में, किसी महिला छात्रावास में या किसी महिला सहयोगी के घर पर रहना ज़्यादा पसंद करती हूं। वजहें कई हैं। शहर से आने-जाने में वक़्त बचता है और आप अपने काम और प्रोजेक्ट को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं - ये एक बात है। दूसरी बड़ी बात है कि आप किसी महिला के घर में और जगहों की अपेक्षा ख़ुद को ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। मेरी उम्र चौतीस साल है और मैं दो बच्चों की मां हूं। बाहर से निडर हूं और कहीं जाने में नहीं डरती। डरती हूं, लेकिन फिर भी निकलती हूं। रात में कई बार अकेले स्टूडियो लौटी हूं। देर रात की ट्रेनें, बसें या फ्लाइट्स ली हैं। कई बार मेरे पास कोई विकल्प नहीं होता, कई बार ख़ुद को याद दिलाना पड़ा है कि डर कर कैसे जीएंगे।

लेकिन यकीन मानिए, अंदर का डर वही है जो छह साल की एक बच्ची के भीतर होता होगा।

ख़ैर, इस बार अलवर में मेरे लिए एक होटल में रुकने का इंतज़ाम किया गया। मैं दिल्ली से अकेली गई थी, एक टैक्सी में। (यूं तो मैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेने में यकीन करती हूं, लेकिन यहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट में भी 'safety' है?) दिन का काम खत्म करने के बाद बेमन से होटल में चेक-इन किया। मुझे अकेले होटलों में रहने से सख़्त नफ़रत है। फैंसी होटल था - सुना कि अलवर के सबसे बड़े होटलों में से एक। कार्ड लेकर कमरे में गई। पीछे से एक हेल्पर ने आकर मेरा सामान रखा। मैंने दरवाज़ा खोला और दरवाज़े पर ही खड़ी रही, तब तक जब तक वो हेल्पर मेरा सामान और टिप लेकर बाहर नहीं चला गया (मैं कमरे में अंदर किसी अनजान इंसान के साथ खड़ी होने का ख़तरा भी नहीं मोल लेती)। तब तक सहायक कार्ड लेकर उसे जैक में डालकर कमरे की बत्तियां जला चुका था।

अंदर आई। सबसे पहले दरवाज़ा देखा। दरवाज़े में भीतर कोई कुंडी, कोई चिटकनी नहीं थी। लोहे की एक ज़ंजीर थी बस, जिसके ज़रिए आप दरवाज़े को हल्का-सा खोलकर बाहर देख सकते थे। सेफ्टी के नाम पर बस इतना ही। वो ज़ंजीर भी बाहर से खोली जा सकती थी। वैसा दरवाज़ा बाहर से किसी भी डुप्लीकेट कार्ड से खोला जा सकता था।

मैंने रिसेप्शन पर फोन किया। पूछा, "भीतर से दरवाज़ा बंद कैसे होता है?" एक आदमी आया और कमरे में घुसते ही उसने सबसे पहले कार्ड निकाल लिया, "इसी कार्ड से बंद होगा कमरा", उसने कहा और कार्ड निकालकर मोबाइल की रौशनी में दरवाज़ा बंद करने का तरीका बताने लगा। कमरे में घुप्प अंधेरा, मोबाइल की हल्की रौशनी के अलावा। मैं इतनी ज़ोर से डर गई थी कि मुझे पक्का यकीन है, उस आदमी को मेरे मुंह में आ गई जान और मेरी धड़कनें साफ़ सुनाई दे गई होंगी। (विडंबना ये कि मैं अभी-अभी गांव में लड़कियों के स्कूल में सेल्फ-डिफेंस की ज़रूरत पर बक-बक करके आई थी)

मैंने ज़ोर से चिल्लाकर कहा, "लाइट जलाइए आप पहले।"

उसने मुझे घूमकर देखा और कहा, "मैडम मैं तो..."

"मैं समझ गई हूं कि दरवाज़ा कैसे बंद होता है। पुट द डैम थिंग बैक एंड स्विच ऑन द लाईट्स", मैंने चिल्लाकर कहा, उस आदमी को कमरे के बाहर भेजा, रिसेप्शन पर फोन करके उन्हें कमरे में चिटकनियों की ज़रूरत पर भाषण दिया (जो महिला रिसेप्शनिस्ट को समझ में आया हो, इसपर मुझे शक़ है) और फिर दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया। उसके बाद मैंने जो किया वो हर उस कमरे और नई जगह पर करती हूं जहां सोने में मुझे घबड़ाहट होती है। मैंने कमरे के स्टडी टेबल को खींचकर दरवाज़े के पीछे लगाया। फिर उसके ऊपर भारी-भरकम बेडसाईड टेबल रखा। फिर उसके ऊपर अपना सूटकेस रखा।

नहीं, उस रात मुझे नींद नहीं आई थी और वो रात कई उन रातों में से थी जिस रात मुझे अकेले (या अपने बच्चों के साथ अकेले) सफ़र करते हुए नींद नहीं आती। क्यों? मैंने ट्रेन में अपनी बर्थ पर सो रही एक अकेली लड़की के साथ रात में बदतमीज़ी होते देखा है। वो लड़की डर के मारे नहीं चिल्लाई थी। मैं चिल्लाई थी। हर हिंदुस्तानी लड़की की तरह मैंने अपने बचपन में एक भरे-पूरे घर में छोटी बच्चियों तो क्या, बड़ी लड़कियों और छोटे लड़कों के साथ होती गंदी हरकतें देखी हैं जिसे सेक्सुअल अस़ल्ट कहा जाता है। देखा है कि उन्हें कहां-कहां और कैसे छुआ जाता है। ये भी बताती हूं आपको कि इनमें से कई बातें मुझे आजतक किसी को भी बताने की हिम्मत नहीं हुई, मां को भी नहीं और मुझे पक्का यकीन है कि उन लड़कियों ने भी किसी से कहा नहीं होगा। चुप रह गई होंगी। क्यों, वो एक अलग बहस और विमर्श का मुद्दा है। उस दिन भी मैंने गांव के स्कूल की बच्चियों की ज़ुबान में उनके अनुभव सुने थे। आप सुनेंगे तो आपको शर्म आ जाएगी।

उस दिन मेरा हौसला पूरी तरह पस्त हो गया जिस दिन मेरी साढ़े छह साल की बेटी ने स्कूल ड्रेस पहनते हुए कहा, "मम्मा, स्कर्ट के नीचे साइकलिंग शॉर्ट्स पहना दो।" "क्यों", मैंने उसे तैयार करते हुए एक किस्म की बेफ़िक्री के साथ पूछा, "आज हॉर्स-राइडिंग है?" "नहीं मम्मा। कुछ भी नहीं है। स्कूल में लड़के नीचे से देखते हैं। सीढ़ी चढ़ते हुए, चेयर पर बैठते हुए। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।"

मैं शब्दों में अपना शॉक बयां नहीं कर सकती। मैंने उसे मैम और मम्मा को बताने की दो-चार बेतुकी हिदायतों के बाद साइकलिंग शॉर्ट्स पहना दिया और पूरे दिन परेशान होकर सोचती रही। छह साल की बच्ची को अच्छी और बुरी नज़र का अंदाज़ा लग गया। हम अपनी बेटियों की कैसे समाज में परवरिश कर रहे  हैं! उसे विरासत में क्या सौंप रहे हैं? डर?

आद्या अभी भी पार्क में साइकलिंग शॉर्ट्स में जाती है, या फिर वैसे कपड़ों में जिससे उसकी टांगें ढंकी रहें। यकीन मानिए, मैंने उसे कभी नहीं बताया कि उसे क्या पहनना चाहिए। इस एक घटना ने मुझपर एक बेटे की मां होने के नाते भी ज़िम्मेदारी कई गुणा बढ़ा दी है। मैं रिवर्स जेंडर डिस्क्रिमिनेशन करने लगती हूं कभी-कभी, न चाहते हुए भी। बेटे को संवेदनशील बनाने की ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी है। बेटा पालना ज़्यादा मुश्किल है, ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी है।

फिर भी 'रेप' या यौन हिंसा को रोकने के लिए ये काफ़ी नहीं है। जब तक छोटे से छोटे यौन अपराधों (ईवटीज़िंग, छेड़छाड़) को लेकर कानून को अमल करने के स्तर पर ज़ीरो टॉलेरेन्स यानी पूर्ण असहिष्णुता का रास्ता अख़्तियार नहीं किया जाएगा, महिलाओं, लड़कियों, बच्चियों के ख़िलाफ़ हिंसा को लेकर बड़े बदलाव की उम्मीद बेकार है। दरअसल, इतना भी काफ़ी नहीं। जब तक ज़्यादा से ज़्यादा लड़कियां और औरतें पब्लिक स्पेस में नहीं आएंगी, डिस्क्रिमिनेशन कम नहीं होगा। समस्या ये है कि एक समाज के तौर पर हम अभी भी लड़कियों और औरतों से घरों में रहने की अपेक्षा करते हैं। सार्वजनिक जगहों पर उनकी संख्या को लेकर हम कितने पूर्वाग्रह लिए चलते हैं, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मेट्रो में, लोकल ट्रेनों में महिलाओं के नाम के एक ही कोच होते हैं। बाकी जनरल कोचों में गिनी-चुनी महिलाएं। अपने दफ्तरों, बाज़ारों, दुकानों, सड़कों, गलियों में देख लीजिए। क्या अनुपात होता है पुरुष और महिला का? को-एड स्कूलों में? कॉलेजों में? डीटीसी की बसों में महिलाओं के लिए कितनी सीटें आरक्षित होती हैं? शहर की सड़कों पर कितनी महिलाओं को गाड़ी चलाते देखा है आपने? ६६ सालों में सोलह राष्ट्रीय आम चुनाव, लेकिन देश की ४८ फ़ीसदी आबादी के प्रतिनिधित्व के लिए ३३ फ़ीसदी सीटों के आरक्षण को लेकर बहस ख़त्म ही नहीं होती। जो पुरुष औरतों को बराबरी का हक़दार मानते ही नहीं, वे उसे अपमानित, शोषित और पीड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे। फिर हमारे यहां तो यूं भी पुरुषों के इस बर्ताव को मर्दानगी समझा जाता है। जब तक मर्दानगी की परिभाषा बदलेगी नहीं, मर्द नहीं बदलेंगे, बराबरी की बात फ़िज़ूल है। हम हर बलात्कार का मातम ही मना सकते हैं बस।   

रह गईं औरतें और लड़कियां तो सदमे में होते हुए भी, अपने डर से लड़ते हुए भी बाहर जाने और काम करने का हौसला रखेंगी ये। हमारे पास चारा क्या है? फिर भी मैं अकेले अनजान जगहों पर सफ़र करने की हिम्मत रखूंगी, चाहे इसके एवज़ में मुझे कमरे को भीतर से कई सारे फर्नीचर लगाकर ही क्यों न बंद करना पड़े। फिर भी मैं मर्दों पर, लड़कों पर भरोसा करती रहूंगी। पूरी ईमानदारी से इस भरोसे को बचाए रखने की कोशिश करूंगी और इसके ख़िलाफ़ उठने वाले हर शक़ का इलाज ढूंढने की कोशिश करूंगी।  मैं फिर भी अपने बच्चों को एहतियात बरतने के साथ-साथ भरोसा करना ही सिखाऊंगी। बेटी नज़र और 'टच' पहचानने ही लगी है। बेटा भी शायद धीरे-धीरे अपनी बहन की ख़ातिर और उसके जैसी कई लड़कियों की ख़ातिर ख़ुद को बदलना सीख जाए, मर्दानगी की परिभाषा बदलना सीख जाए। आमीन! 

30 comments:

Anju (Anu) Chaudhary said...

शायदा तुम से ज्यादा मैं इस वक्त shocked हूँ...मुझे यहाँ कमेन्ट करने के लिए शब्द नहीं मिल रहें ....इस वक्त हालात काबू से बाहर हो चुके हैं ...बच्चों को कैसे संभाला जाए ...शायद हम में से कोई भी इसे बहुत अच्छे से नहीं जान पा रहा है

Nidhi Tandon said...

shocking...depressing

सतीश सक्सेना said...

क्या कहें, बस बच्ची को कुत्तों से सावधान रहने की ट्रेनिंग देनी होगी !
मंगलकामनाएं !

Pallavi saxena said...

आजकल वर्तमान स्थिति में जो हालात है उसके चलते मुझे कोई खास आश्चर्य नहीं हुआ आपकी छे साल की बेटी की बात पढ़कर। क्यूंकि माहौल ही ऐसा है, न सिर्फ समाज बल्कि हमारे चारों ओर यही सब तो चल रहा है। फिर चाहे फिल्मों में हो टीवी पर हो, समाचारों पत्रों में हो, या ओर कहीं बच्चों की आँखों के सामने और कानो में यह बाते किसी न किसी माध्यम से पहुँच ही रही है जिसे हम ना चाहते हुए भी रोक पाने में असमर्थ है। आपकी लिखी एक बात से पूर्णतः सहमत हूँ कि बेटा पालना वाकई बेटी पालने से ज्यादा कठिन काम है बहुत ही अच्छा, सच्चा और विचारणीय आलेख...आभार

poonam said...

सही कहा , कितनी घटनाए घरों मे हो जाती हाए और लड़किया मुंह नहीं खोल पाती । कितना घिनोना सत्य

Nisha Jha said...

Well, I am a solo traveller and mostly I travel alone in this world. Believe me, the safety issue for women is everywhere but India tops the list.

When people ask me which country I am from, I know what reaction they'd have when I tell them. My own countrymen call me traitor if I say I feel unsafe in India but that's the reality!

Well written post, you touched a chord.

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन अमर मरा करते नहीं - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

प्रवीण पाण्डेय said...

खतरा भाँप कर निकल आने के बाद ही उससे लड़ा जा सकता है। वातावरण में घुटन फैली है।

प्रतिभा सक्सेना said...

बच्चाशुरू से ही चारों ओर आपराधिक गति-विधियाँ देखता है. एक से एक सिनेमा और टीवी सीरियल्स ,अखबार सारे ऐसी ख़बरो से भरे और समाजिक-जीवन में कोई ऐसा उदाहरण सामने नहीं जो चरित्र निर्माण की प्रेरणा बन सके न सुनने को शिक्षाप्रद कहानियाँ जो कुछ दिशा दिखा सकें ! .मनोरंजन का नाम पर नायक ,नायिका के साथ ऊलजलूल हरकतें कर उसे पटाते दिखाई देते हैं स्कूल-कॉलेज को तो मौज मस्ती का अड्डा दिखाते हैं ,वहाँ शिक्षक और छात्र तमाशे करने जाते हैं ,लड़के-लड़कियाँ हाहा-हूहू करते रहते हैं.संयमहीन उच्छृंखल जीवन पद्धति.बची-खुची कमी पूरी कर दी एक से एक रंगीन और चटाकेदार विज्ञापनों ने .इंटरनेट पर क्या-क्या देखते हैं उनके बच्चे ,माता-पिता को पता भी नहीं होता होगा! हर क्षेत्र में जीवन मूल्यों का क्षरण ,दिन-रात यही सब देखते बड़े हो रहे हैं .अधिकतर तो माँ-बाप को भी कहाँ फ़ुर्सत!
लेकिन शुरू से सावधानियाँ और घर के संस्कार लड़कों को सँभाले रहते हैं, उनकी संगति कैसी है उससे भी पता लग जाता है बस थोड़ी सावधानी और उसका विश्वास अपनों पर, कि हर बात सामने कह पाये .
काश सभी माता-पिता चेत जाएँ !

अनूप शुक्ल said...

तुम्हारी बेटी की बात से परसाई जी के एक लेख का अंश याद आय। ’एक लड़की पांच दीवाने’ में वे लिखते हैं:

"मोहल्ला ऐसा है कि लोग 12-13 साल की बच्ची को घूर-घूर कर जवान बना देते हैं। वह समझने लगती है कि कहां घूरा जा रहा है। वह उन अंगो पर ध्यान देने लगती है। नीचे कपड़ा रख लेती है।"

बहुत अच्छी तरह से बाहर निकलकर काम करने वाली स्त्री के खतरे और डर बयान किये। तुम्हारा हौसला बरकरार रहे। हौसले की वजहें भी। मर्दानगी की परिभाषा बदलने की कोशिश सबको करनी होगी।

वाणी गीत said...

स्त्रियों की इस घुटन का कोई जवाब है किसी के पास !!!

Dr.NISHA MAHARANA said...

जागरूकता ही एकमात्र तरीका…… अंजू जी के तरीके से सहमत हूँ ,…. बेटे और बेटियों सभी को स्व-सुरक्षा की बारीकियाँ समझानी होगी क्योंकि हर जगह हैवान घूम रहे हैं।

prashant dasen said...

aap bilkul sahi kah rahi hay,suraksha kee geemanderi hamari he hay.merey bacche jo ke 8 aur 12 saal ke hay,unko sari baatey samjahana bahaut aasan nahai hay,kintu pita honey ke karan aur aaj ke mahoul ko dektte hua unhey sex education dena mare jimmeredari hay sath he saath amir khan ke satya may jayte ne bhi mujhe sikhaya ke bacco ko kaise educate kro ,yeh aap he ke problum nahai hay sabhi ke hay,sesh subh

देवेन्द्र पाण्डेय said...

महिलाओं की पीड़ा को बेहतरीन ढंग से अभिव्यक्त किया है आपने।

यह आलेख अधिक से अधिक लोग पढ़ें, महसूर करें और भरोसा बचा रहे ..आमीन।

vibha rani Shrivastava said...

आमीन!

अनुपमा पाठक said...

इस भयावह स्थिति, इस बेहद निराशापूर्ण समय में क्या बन कर आएगा समाधान...
हादसों से दहला हृदय कुछ भी सोच समझ पाने में अक्षम है!

कुछ परिभाषाओं को बदलना तो होगा ही!

Rahul Singh said...

इस विषय में कुछ जानना, न जानने जैसा ही, कहना, न कहने जितना, खतरनाक और डरावना होता है.

RAKESH BHARTIYA said...

kya kahu ? khud ke hindustani purush hone par sharam aati hai

Gulshan Toppo said...

Stupid story....

Swati Vallabha Raj said...

जागरूकता हीं उपाय है और सच में मर्दानगी की परिभाषा बदलनी की जरुरत है.…… बहुत से प्रश्न और डर हैं मन में …उपाय दूर दूर तक नहीं सूझता ….

अजय कुमार झा said...

बेबाक , बेलौस और बेखौफ़ लेखनी । बिल्कुल सीधा सीधा खरा खरा लिखना इसी को कहते हैं शायद । आज के हालातों पर इससे बेहतर कहने सुनने पढने और महसूसने के लिए और क्या हो सकता है भला । धार बनाए रखिए , बहुत जरूरी है ये

Satish Chandra Satyarthi said...

घर से निकलते ही मर्दों की नज़रें बदल जाती हैं और हर औरत बस एक 'चीज़' नजर आने लगती है.. यह स्थिति सारे देशों में है पर भारत में एक्सट्रीम है.

Archana said...

ऐसा आलेख.. जिसे महसूस किया ,पर लिख नहीं पाई , शायद डर ही के कारण ... पर किससे और कैसा ? सवाल अब भी वही ...

राजीव कुमार झा said...

महिलाओं की पीड़ा को बेहतरीन ढंग से अभिव्यक्त किया है.
http://dehatrkj.blogspot.com

Darshan jangra said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - रविवार -01/09/2013 को
चोर नहीं चोरों के सरदार हैं पीएम ! हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः10 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra




सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आपके हौसले को सलाम।
हमने जो समाज बनाया है उसपर हमें शर्मिन्दा होना चाहिए। हम तो बहुत शर्मसार हैं उन बेशर्मों को अपने बीच पाकर।

nivedita said...

bahot sahi kaha apne... nishabd ho gayee hoon.. lekin apke lekh ne mujhe bolne ka hausala diya hai... :) shukriya apka bahot sara... :)

ब्लॉग बुलेटिन said...

पिछले २ सालों की तरह इस साल भी ब्लॉग बुलेटिन पर रश्मि प्रभा जी प्रस्तुत कर रही है अवलोकन २०१३ !!
कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !
ब्लॉग बुलेटिन के इस खास संस्करण के अंतर्गत आज की बुलेटिन प्रतिभाओं की कमी नहीं (28) मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

sadhana vaid said...

एक अरसे के बाद इतना धारदार आलेख पढ़ा है अनु जी ! बधाई स्वीकार कीजिये ! नारी नाम ही ऐसी शख्सियत का है जो चौका चूल्हा सम्हालते सम्हालते आग से बचने के गुर भी सीखती जाती है ! भय और आशंकाओं के साथ उसमें साहस और कुछ कर गुजरने के हौसले की भी कमी नहीं है ! वह हर हाल में अपनी राह बनाना जानती है ! पठनीय आलेख !

Fahmida Laboni Shorna said...

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