Sunday, August 11, 2013

हज़ार दुश्वारियों के बीच

संडे का दिन संडे की तरह ही गुज़ारा जाए तो अच्छा। संडे का मतलब है देर से जागना, देर से नहाना, देर तक बिस्तर पर पड़े रहकर किताब और अख़बार पढ़ना, पूड़ी-भुजिया टाईप का कुछ नाश्ता करना और फिर से देर तक बिस्तर पर पड़े रहकर कोई थ्रिलर पढ़ना। मन हुआ तो बीच में अपनी पसंद के गाने सुनते जाना। ऐसा संडे बहुत दिनों के बाद लौटा है। आज जी लेते हैं कि कल से यूं भी डेडलाई्न्स की चिंता में जान गंवाना है। ज़िन्दगी की दुश्वारियां यूं भी कमबख़्त कहां कम होती हैं?

स्कूल में थी तो नया-नया बीटल्स सुनने का शौक़ चढ़ा था।  वो भी टार्गेट मैग़ज़ीन पढ़कर। जॉन लेनेन, पॉल मैककार्टने, जॉर्ज हैरिसन और रिंगो स्टार हमारे पोस्टर बॉयज़ थे जिनके पोस्टर्स मैगज़ीन से फाड़कर दीवारों पर लगाने की इजाज़त कभी नहीं मिली, लेकिन लव, लव मी डू/यू नो आई लव यू बजता तो लगता, जीवन का शाश्वत सत्य यही है। सत्य के चेहरे क्रश के हिसाब से बदलते रहते, लेकिन भावना उतनी ही शाश्वत रही। तब हमारी उम्र क्या थी, ये मत पूछिएगा। हम अस्सी के दशक में बड़े हो रहे बच्चे थे, लेकिन हमें मैडोना, माइकल जैक्सन और द पुलिस उस तरह पसंद नहीं आए जिस तरह अपने दादा-परदादा के ज़माने के क्लासिक्स भाए। हम पॉप, रॉक, मेटल के ज़माने में भी बीट और ब्लूज़ ढूंढते। या फिर क्लिफ रिचर्ड, नील डायमंड के अटरली होपलेसली रोमांटिक गाने। हां, बॉब डिलैन के गानों के बोलों की वजह से फोक रॉक ज़रूर सुनने लगे। मेटल और हार्ड रॉक से वास्ता बहुत बाद में पड़ा, इसलिए रोलिंग स्टोन्स, एरिक क्लैप्टन और लेड ज़ेपलिन भी अपने दौर के कुछ बीसेक साल बाद मेरी ज़िन्दगी में आएं। डायर स्ट्रेट्स के लिए तो अभी भी कानों को उस तरह तैयार नहीं कर पाई, जैसे घर में बाकी लड़कों को देखती हूं। जब मेरी अंग्रेज़ी की डिक्शनरी में साइकेडेलिक शब्द जुड़ा तब समझ में आया कि पिंक फ्लॉयड को कल्ट क्यों माना जाता है। 

आज एक-एक करके सब सुनती रही। बीटल्स, कार्पेन्टर्स, सीलिन डियॉन, मैरिया कैरे, साइमन एंड गारफंकल, एरिक क्लैप्टन और यहां तक कि मैडोना भी। फेसबुक पर बिना सोचे-समझे डाल दिए गए एक गाने पर मिली प्रतिक्रिया ने साबित कर दिया है कि अभिव्यक्त करने के तरीके, वाक्य-विन्यास बेशक अलग-अलग हों, लेकिन नोस्टालजिया की शब्दावली एक-सी होती है।

इस नोस्टालजिया को लिए-लिए पार्क आ गई हूं।

दूर कोने में एक-दूसरे की ओर पीठ किए खो-खो खेलने के लिए बैठ बच्चे, आस-पास के स्कूलों को लेखा-जोखा लेने निकली मम्मियां,रिसेशन के ज़माने में नाम भर के इन्क्रिमेंट को सिर धुनते पापा लोग, दूर विदेशों में अपने-अपने बेटे-बहुओं, बेटी-दामादों का बखान करती दादियां और करप्शन का रोना रोते दादाजी लोग, और फिर पुराने गानों पर शुरू हुई बातचीत में धीरे-धीरे जुड़ते, अपनी पसंद के गाने जोड़ते सभी उम्र के लोग - संडे की शाम पार्क कुछ ऐसे गुलज़ार हुआ है कि पूरे हफ्‍ते का टॉनिक मिल जाने का गुमां हुआ है।

टॉनिक ही टॉनिक है। ठीक सात से ठीक आठ बजे तक चलने वाले रंग-बिरंग फव्वारे से मिलने वाला विज़ुअल टॉनिक। आठ लोगों की ज़िन्दगियों के फ़साने के अठहत्तर रूपों के बारे में सोचते रहने के लिए ज़ेहन को टॉनिक। सोचते रहिए कि उनकी ज़िन्दगी में ये न होता तो क्या होता, यूं हुआ होता तो क्या हुआ होता।

कुल मिलाकर सबकी तकलीफ़ें एक-सी हैं। एक सी महंगाई। एक-सी बेवफाई। एक-से धोखे। एक-सा भ्रष्टाचार। एक-सी बीमारी। मर जाने का एक-सा डर। एक-सा प्यार। एक-सी उम्मीद। एक-सा नोस्टालजिया। नोस्टालजिया के लिए भी एक-सा नोस्टालजिया। सिर्फ बाहर का आवरण अलग है। खरोंचो तो भीतर सब एक-सा। हम फिर भी कितने अलग-अलग हैं!

इन एक-से लोगों की अलग-अलग कहानियां सुनते हुए ज़िन्दगी गुज़ार पाते तो क्या ही अच्छा होता। लेकिन ग़म-ए-रोज़गार भी है, ग़म-ए-इश्क भी। अब यही इकलौता जस्टिफिकेशन है इस बात का कि मैं बोलने बहुत लगी हूं आजकल, बात कम करती हूं। सुनती भी बहुत हूं, लेकिन ध्यान कम देती हूं। लिखती भी ख़ूब हूं आजकल, लेकिन सोचती नहीं। पढ़ती हूं, लेकिन मनन नहीं करती।

जब जीने को बहुत हो और वक्त की कमी हो तो ऐसा ही होता होगा शायद।

संडे ढलने लगा है और कल के डेडलाईन की चिंता सताने लगी है। लेकिन बीटल्स ने शाम को डूबने से बचा लिया है।

3 comments:

अनुपमा पाठक said...

जीने को हमेशा बहुत कुछ रहे... और जीते जाने के लिए निकलने वाला समय भी यूँ इतवार की शक्ल में आता रहे!

Ramakant Singh said...

गजब की जीवन शैली किन्तु संग रहकर यह भी संभव वाह जी

प्रवीण पाण्डेय said...

खबरों के कुप्रभाव से अपना जीवन बचाने लगा हूँ, कम सुनता हूँ। पुरानी चीजों में, अच्छी लगने वाली चीजों में समय बीते।