Tuesday, April 23, 2013

एक बिचारा प्यार, एक मैं और एक तुम

अजीब-सा सपना था। मैं आदित की बुरी तरह पिटाई कर रही थी। इतनी ही बुरी तरह कि ये लिखते हुए सपने का ख़्याल भी दिल की धड़कनें तेज़ कर देता है। घबराकर उठी और सबसे पहले उसके चेहरे को टटोला। वो चैन से सो रहा था।

मुझे कमरे में हल्की कुदरती रौशनी के साथ सोने की आदत है। मैं पर्दे गिराकर, खिड़कियां बंदकर नहीं सो सकती। बाहर से आती रात की अंधेरी रौशनी चाहिए। सबकुछ नियंत्रण में लगता है फिर, कि जैसे भीतर-बाहर सामंजस्य हो। शुक्र है कि रौशनी थी। वरना ऐसे ख़तरनाक ख़्याल ने मुझे और बेचैन कर दिया होता। खिड़की से आती स्ट्रीटलाईट की रौशनी में आदित का चेहरा देखती रही - बहुत देर तक, एकटक। हां, रात के आठ बजे इसे एक थप्पड़ पड़ा था - कई मिनटों की मशक्कत के बाद भी हैंडराइटिंग ठीक ना कर पाने के लिए। नहीं जानती कि सच था कि ख़्याल था - उस थप्पड़ का लाल निशान मुझे अंधेरे में अब भी दिख रहा था उसके दाहिने गाल पर। थप्पड़ तो आद्या को भी लगा था एक, पांच बार बताने के बावजूद सेन्टेन्स का पहला लेटर कैपिटल नहीं लिखने के लिए।

यही गिल्ट रहा होगा कि ऐसे आधी रात सताने आ गया। हम हालांकि सुकून से ही सोए थे। बच्चों से सख़्ती कर लेने के तुरंत बाद मैं उन्हें अपने आस-पास रखना चाहती हूं। उन्हें कहीं, किसी और के पास नहीं भेजती। मेरे बच्चों के साथ की ये उठापटक, सख्ती, प्यार, अनुशासन - सबपर मेरा एकाधिकार है। आदित मुंह खोलकर सो रहा था। दूसरी तरफ़ आद्या थी। तकिए पर बेसुध उसके काले घुंघराले बालों को देखकर सोचती रही - इसे और मुझे - दोनों को हेयरकट की ज़रूरत है। नए कपड़ों, नए जूतों की भी। शायद हम तीनों को एक छुट्टी की ज़रूरत है - जहां किसी चौथे का कोई दख़ल न हो। हां, अपने बच्चों के साथ अपने वक़्त को लेकर मैं ख़ुदग़र्ज़ हूं, बहुत ख़ुदग़र्ज़। इसलिए क्योंकि दिन-रात, दर्द-बीमारी, सीखने-बिगड़ने के कई अकेले लम्हे हम तीनों ने अकेले बिताए हैं।

मैं गगन के बारे में सोच रही थी। गगन मेरी दोस्त है, मेरी डॉक्टर भी। सुबह-सुबह फोन किया था उसने - रोते हुए। मैं बहुत बुरी हूं। मैं मर जाना चाहती हूं। मैंने आज सिमर को बाल से खींचा और उसे ज़ोर से थप्पड़ मारा। मैं अपने इकलौते बेटे के साथ ऐसे पेश आई। गगन रोती रही और मैं उसे फोन पर समझाने की नाकाम कोशिश करती रही।

मुझे अपनी मां बेतरह याद आ रही है इस वक़्त। मम्मी हम तीनों को लेकर ऑब्सेस्ड थी। इस हद तक कि हमारी नींद सोने और हमारी नींद जागने की कई सालों की उनकी आदत अबतक नहीं बदली है। मम्मी हमें उस चिड़िया की तरह अपने डैनों में छिपाए रखने की कोशिश करती रही जिसे हर वक़्त किसी ख़ूखार बिल्ली के हमले का डर सताता रहता है। मम्मी हमारी पढ़ाई को लेकर भी हद से ज़्यादा संजीदा थी। उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती थी, लेकिन अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों का शब्दज्ञान बढ़ाने के लिए उन्होंने डिक्शनरी रटना शुरू कर दिया था। हमें कई सालों तक मम्मी ने ख़ुद पढ़ाया - खुद पढकर। हमें अपनी हथेली के पीछे पड़े दाग़ अभी तक नहीं भूले जो ख़राब हैंडराइटिंग लिखने की सज़ा के रूप में मिलते थे। मम्मी अपनी बेवकूफ़ी में मेडिकल की पढ़ाई अधूरी छोड़कर आई थी और इसका अफ़सोस इतना गहरा था कि हमें कोई भी काम अधूरा छोड़ने की अनुमति नहीं थी। ये मेरी मां का सख़्त चेहरा था। उनका नर्म रूप एक सौ अस्सी डिग्री का घुमाव था। मम्मी हमें हर रोज़ सुबह भजन या गीत गाकर उठाती। बहुत बड़े हो जाने तक भी हमें गले से लगाना, अपने गोद में लेना, सिर के बाल सहलाना - इन सबमें उन्हें कोई बुराई नज़र नहीं आई।

फिर एक दिन मम्मी ने हमें आज़ाद छोड़ दिया। उनका अब हमारी ज़िन्दगी पर कोई दख़ल नहीं। आज तक सिर्फ़ एक बार उन्होंने मेरे न आने की शिकायत की है, वरना हमसे ये तक नहीं पूछतीं कि तुम लोग मुझसे मिलने आते क्यों नहीं। मेरी मां से फ़ोन पर मैं ज़िन्दगी को लेकर कोई शिकायत नहीं कर पाती। मैंने आजतक और बेटियों की तरह उनसे कभी ससुराल का रोना नहीं रोया। वो पूछती नहीं। मैं बताती नहीं। फिर भी मैं जानती हूं कि उनसे बेहतर मेरे हालात, मेरी तकलीफ़, मेरे सुख और मेरा अच्छा-बुरा कोई नहीं समझ पाता होगा।

मैं अक्सर हैरान होती हूं कि सोलह साल तक बच्चों की ज़िन्दगी को सांस-सांस जीने के बाद उन्हें उन्मुक्त छोड़ दिया जाना कैसे किया होगा उन्होंने? कैसे तय कर लिया होगा कि मैंने अपनी जिम्मेदारी निभाई, अब इनका किया इनके नाम? दो दशक के बाद धीरे-धीरे कैसे काटी होगी गर्भनाल?

मैं इसी वक्त - रात के तीन बजे - गगन को फोन लगाना चाहती हूं। उसे कहना चाहती हूं कि मेरी मां अक्सर हमसे अपनी नाराज़गी, प्यार न मिल पाने की तकलीफ़ और ख़ुद को मिले अपमानों का बदला निकालती थी। मेरी मां भी अक्सर हमसे ठीक वैसे ही पेश आ जाया करती थी कि जैसे हम अपने बच्चों से आते हैं आजकल। फिर भी मेरी मां से बेहतर मुझे किसी ने समझा नहीं, न उतना प्यार किसी ने दिया। मम्मी के दिए हुए प्यार का ख़्याल भर अंदर के ज़ख़्मों पर मरहम लगा देता है। मम्मी की गर्दन में मुंह घुसाकर सो पाने की एक ख़्वाहिश हर मुश्किल दिन को आसान कर देती है। मम्मी को गले लगाने का सोचते ही लगता है कि सब ठीक हो जाएगा।

मैं गगन को ठीक यही बताना चाहती हूं, कि प्यार हर दर्द का इलाज होता है। हर अपमान की टीस प्यार से भरी जा सकती है। अपनी मां के बारे में प्यार से सोच लो तो पूरी दुनिया को उसकी दी हुई तकलीफ़ों के लिए माफ़ करना आसान हो जाएगा। अपने बच्चे की गर्दन में हाथ डालकर उसे अपनी तरफ़ खींचकर उसकी आंखों में आंखें डाले उसकी नाक चूम लो तो हर ख़लिश भर जाएगी। सच तो है कि बच्चों पर हाथ उठाना सही नहीं, लेकिन ये भी सच है कि हम और तुम भी तो ढेर सारे प्यार के हक़दार हैं। जो प्यार मिलेगा नहीं तो हम प्यार बांटेंगे कैसे? जो हिस्से में अपमान और क्लेश ही आएगा तो हम बदले में और क्या दे पाएंगे?

हम उस समाज के वाशिंदे हैं जहां औरत को सेविका मानने का प्रचलन रहा है, यहां उनके हिस्से कुछ नहीं आता। मां सारे नाज़-नखरे उठाएगी, बीवी घर चलाएगी और सब्ज़ी का झोला उठाएगी, बहन पानी का ग्लास थमाएगी और खाना लगाएगी, एक ख़ूबसूरत बेटी हमारे परिवार की शान कहलाएगी। उस औरत को ढेर सारा प्यार दिया जाए, ख़ूब सारा प्यार - ये किसी के ज़ेहन में भी नहीं आता। मेरे भी नहीं, कि मुझे अपनी मां को आई लव यू कहना चाहिए, मुझे अपनी सास को बार-बार गले लगाना चाहिए या फ़िर मुझे अपनी भाभियों का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि सबने कितने-कितने तरीकों से क्या-क्या संभाले रखा है।

गगन से मिलूंगी जल्द। उसे गले लगाऊंगी और उसका हाथ थामकर हम ख़ामोशी से पार्क की बेंच पर बैठे रहेंगे देर तक। प्राणायम करने के बहाने अपनी हथेलियों से चेहरे पर लुढ़क-लुढ़क कर आते आंसुओं को पोंछ डालेंगे और फिर रूख़सती लेंगे - अपने-अपने घरों का रूख करेंगे कि वहां जाकर ढेर सारा प्यार बांटा जा सके - बच्चों से, पति से, घर के और लोगों से। अपने हिस्से का प्यार अपने नाम करने की नाजायज़ कोशिश भी कर लेंगे।

सुबह हो चली है और बच्चों को उठाया है। बासी मुंह मेरी तरफ़ करके मेरी नाक में अपनी नाक सटाते हुए, मेरी गर्दन से लटकते हुए आदित ने कहा है, मम्मा, मैंने गॉड से प्रे किया था कि मुझे आप-जैसी मम्मा मिले। गॉड ने तो दुनिया की बेस्ट मम्मा दे दी।

मेरे सपने का डर धुल गया है और मन भर आया है - ढेर सारे प्यार से, ढेर सारी मुआफ़ी से। अपनी पहली माफ़ी की हक़दार मैं ख़ुद हूं। कमबख़्त रात के उस पल को भी माफ़ कर दूंगी जिसमें ख़ामख़ा की एक सोच आती है जो मेरी पूरी रात ख़राब करती है। 





12 comments:

monali said...

वो पूछती नहीं। मैं बताती नहीं। फिर भी मैं जानती हूं कि उनसे बेहतर मेरे हालात, मेरी तकलीफ़, मेरे सुख और मेरा अच्छा-बुरा कोई नहीं समझ पाता होगा।

Your write up made crying easy for me... now when i have shed ol da frustration in form of my tears then I m sure dat i shall behave lyk a gud wife in da evening :)

arvind mishra said...

"हां, अपने बच्चों के साथ अपने वक़्त को लेकर मैं ख़ुदग़र्ज़ हूं, बहुत ख़ुदग़र्ज़।"
ये आलम शौक (पढ़ें खुदगर्जी ) का देखा न जाय ....
ये बुत है या खुदा देखा न जाए :-)
लिखती तो आप टूट कर हैं मगर आपकी लेखनी आपके पाठकों को संवार जाती है !

Archana said...

माँ के दिल को कोई जान नहीं पाया है ..पल में गुस्सा पल में प्यार और तो और गुस्से में भी प्यार ...

प्रवीण पाण्डेय said...

लगता है कि एक झापड़ से प्यार बाधित होता है, नहीं, उसमें भी आत्मीयता थी, अनियन्त्रित सी बस।

अनूप शुक्ल said...

प्यार हर दर्द का इलाज होता है। हर अपमान की टीस प्यार से भरी जा सकती है।

जे बात!

बहुत अच्छा और दिल को छू लेने वाला लिखा है।

डॉ. मोनिका शर्मा said...

हृदयस्पर्शी ...मातृत्व का एक रंग ये भी .....

Vikesh Badola said...

इसलिए क्योंकि दिन-रात, दर्द-बीमारी, सीखने-बिगड़ने के कई अकेले लम्हे हम तीनों ने अकेले बिताए हैं।.......बाकी जो प्रवीण ने बोला है वही मैं भी कह रहा हूँ।

PD said...

बस ये बताने के लिए कमेन्ट कर रहा हूँ कि मैंने यह पढ़ लिया है. और पढने के बाद कुछ लिखने लायक आपने नहीं छोड़ा है इस पर.

Mohmed Zakariya said...

Nice

Mohmed Zakariya said...
This comment has been removed by the author.
Pallavi saxena said...

इस रचना के मायने भी केवल एक औरत और एक माँ ही बेहतर समझ सकती है :-)

Rizwan khan said...

bahut umda shabdon ka tanabana...
hamesha esa hi likhti rahiye...!!