Monday, April 22, 2013

फ़िज़ूल है मन की बात कह देना



मैं क्या लिखूं? 

कोई इस बारे में क्या लिख सकता है? 

इस लिखने का हासिल भी क्या होगा? 

उस दिन सुबह टीवी पर पहला फ्लैश देखा था। पांच साल की बच्ची इस बार पीड़िता है। बच्ची। पांच साल की। पांच साल की बच्ची जिसके साथ ना सिर्फ़ बलात्कार हुआ बल्कि उसके साथ ऐसी हैवानियत हुई कि सोचकर रोआं-रोआं कांप उठता है। मैं क्या लिखूं इस बारे में? सारे अख़बारों की पहली ख़बर रही ये। आपने भी पढ़ी होगी। नहीं चाहा होगा फिर भी पढ़ी होगी। अपने सिर को दीवार पर मार देने की ख़्वाहिश जागी थी क्या भीतर? कुछ खौला था? कुछ दरका था अंदर? या पन्ने पलट दिए थे आपने, कि एक दिल्ली का गैंगरेप, एक सीकर रेप केस, एक भंडारा रेप केस भूले नहीं कि एक और। पांच साल की बच्ची है वो, ये कैसे भूलेंगे हम? साढ़े चार साल की एक और बच्ची है जो कहीं दूसरे शहर में अस्पताल में जूझ रही है। शहर का नाम क्या है, इससे फर्क़ नहीं पड़ता। गूगल कीजिए तो चार-पांच साल के बच्चों से जुड़ी ऐसी ६९,४००० ख़बरें मिल जाएंगी आपको - सिर्फ़ भारत के वेब पन्नों से। नहीं जानती कि ऐसी बच्चियों के लिए मर जाने की दुआ ज्यादा शिद्दत से करूं या उसके बच जाने की।

मैं आंकड़ों में बात नहीं करना चाहती फिर भी सुना है कि हमारे देश में हर डेढ़ मिनट में एक बलात्कार होता है। मुझे घिन आती है फिर भी मैंने गूगल करके देखा कि हमारे देश के तकरीबन पचास फ़ीसदी बच्चे यौन शोषण का शिकार हुए हैं – किसी ना किसी रूप में। बच्चे – यानी बेटे और बेटियां दोनों। कभी कोशिश मत कीजिए जानने की, या इस बारे में पढ़ने की। इसलिए क्योंकि हमें अपनी ख़ुशफ़हमियों की दुनिया में रहना है, हमें रातों की अपनी नींदें गुम करना गवारा नहीं। और ये जो ख़बर पढ़ी होगी ना आपने – ये ताज़ा ताज़ा – इससे अब सूखकर जम चुके ख़ून की भी बदबू नहीं आती। ये बलात्कार, यौन शोषण, अत्याचार की पराकाष्ठा है। नर्क की आग की तकलीफ़ इससे वीभत्स होती होगी, मुझे शक है।

मैं क्यों लिख रही हूं इस बारे में? सही है कि फ़ायदा भी क्या है। लेकिन मुझे भी याद रहे और आपको भी कि हमारे आस-पास हो क्या रहा है आख़िर। हम उस समाज के बाशिंदे हैं जहां पीड़ित परिवार को दो हज़ार रुपए का लालच देकर रिपोर्ट ना लिखाने की गुज़ारिश की जाती है। फिर डराया-धमकाया जाता है। हम उस समाज के बाशिंदे हैं जहां बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने के लिए जाने वालों को पुलिस थानों में बंद किया जाता है, उन्हें मारा-पीटा जाता है। हम उस कमबख़्त समाज के बाशिंदे हैं जो लड़की-औरत, बूढ़ी-बच्ची या फिर बच्चे तक - किसी को बख़्शने में यकीन नहीं करता। हम उस बदकिस्मत समाज के बाशिंदे हैं जो अपने से कमज़ोर पर हावी होने में अपनी शान, अपनी मर्दानगी समझता है। हम उस बदनाम समाज के बाशिंदे हैं जो अब ना बदला तो गर्त में जाकर अपनी वजूद के निशान भी ढूंढ पाएगा, मुमकिन नहीं।

कौन-सा एंटी-रेप कानून? इस देश में कानून का ख़ौफ़ होता तो यही हाल होता? हमें अपने कानून पर उतना ही यकीन है जितना इस बात पर कि कानून-प्रक्रिया कानून के हाथों से भी लंबी होगी। मैं क्रांतिकारी नहीं। मैं एक सभ्य समाज में सबके समान अधिकारों की पक्षधर रही हूं। आप भी मेरे जैसा ही सोचती होंगी, है ना? लेकिन इस बार कानून और सज़ा का अधिकार अपने हाथ में लेने की तीव्र इच्छा जागी है। जब तक हवस के आगे किसी को कुछ ना समझने वाले शैतान के लिए उतनी ही दरिंदगी से पेश नहीं आया जाएगा, कुछ नहीं हो सकता। अपने हाथ में पत्थर उठाकर सरे-बाज़ार एक रेपिस्ट पर पत्थरबाज़ी नहीं होगी तो ये बंद नहीं होगा। जब तक उसके हवस की वजह काटकर उसके हाथ में नहीं थमा दी जाएगी तबतक अपने आप को, अपनी बेटियों, मांओं, बहनों को कितना भी बचाकर रख लें हम, डर पीछा नहीं छोड़ेगा। लेकिन एक बात बताऊं आपको? सब बातें फ़िज़ूल हैं। विकास की, जीडीपी की, तरक्कीयाफ्ता - अतुल्य भारत की। फ़िज़ूल हैं कानून। फ़िज़ूल है शासन, प्रशासन, व्यवस्था। फ़िज़ूल है शोर-शराबा, हल्ला-गुल्ला, विरोध-प्रदर्शन। फ़िज़ूल है मेरे आपके भीतर की ये तकलीफ़, हमारा ये गुस्सा। फ़िज़ूल है हमारी शर्मिंदगी और हमारा डर, ठीक उसी तरह जिस तरह फ़िज़ूल है मेरा अपने मन की बात आज इस तरह लिख देना। 

(गांव कनेक्शन में मेरा इस हफ़्ते का कॉलम - मन की बात) 

9 comments:

Vikesh Badola said...

......विषय आहत करता है, मन विषादमय है।

Pooja Sharma Rao said...

Anu aisa hi bahut gussa ,avsad,nirasha har bar mehsoos karti hoon.Kya neri beti saari zindagi dar kar jeene wali hai is desh mein?kya mein use surakshit rakh paoongi?kya sirf apni beti ke bare mein sochan sahi hai?

this is what I wrote
http://poojasharmarao.blogspot.in/2013/04/blog-post_8472.html

arvind mishra said...

मैंने अपने एक साईंस फिक्शन में भविष्य के एक ऐसे समाज का खाक खींचा है जो अपराध मुक्त है -मतलब वहां जीरो अपराध हैं .ऐसा इसलिए हो पाता है कि गर्भधारण के एक पखवारे के बाद से ही बच्चे के जींस की स्क्रीनिंग शुरू हो जाती है और समग्र रूप से उनके प्रत्येक विकारयुक्त जीन का विश्लेषण किया जाता है अगर विकारग्रस्त जीन का सुधार संभव हुआ तो ठीक वर्ना उसे जन्म देने की अनुमति नहीं दी जाती

राजेश सिंह said...

आपसे पूरी-पूरी सहमति है
जब तक उसके हवस की वजह काटकर उसके हाथ में नहीं थमा दी जाएगी तबतक अपने आप को, अपनी बेटियों, मांओं, बहनों को कितना भी बचाकर रख लें हम, डर पीछा नहीं छोड़ेगा।

ब्लॉग बुलेटिन said...

आज की ब्लॉग बुलेटिन भारत की 'ह्यूमन कंप्यूटर' - शकुंतला देवी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

निवेदिता श्रीवास्तव said...

व्यथित है मन कारण और निवारण खोजते - खोजते ......

डॉ. मोनिका शर्मा said...

मन दहला देने वाला परिदृश्य प्रस्तुत कर रहा है आज के दौर का समाज....व्यथित मन असहाय महसूस करता है

अनूप शुक्ल said...

अफ़सोसजनक घटना हुई एक बार फ़िर। संवेदनशील पोस्ट!

प्रवीण पाण्डेय said...

इस हलचल को भी निष्कर्ष मिले, नहीं तो कहाँ नींद आयेगी।