Friday, April 12, 2013

थक के बैठे हों कि जैसे ज़मीं-आसमां

गुज़री हुई रात की उद्विग्नता लिए जगने का कोई मतलब नहीं होता। रात गई, बात गई। लेकिन कुछ बातें बेसबब बेवजह बेमतलब हैंगओवर की तरह आस-पास टंगी रह जाती हैं। मैं रात भर रोने की वजह ढूंढती रही - यूं जैसे कि कोई गुबार था जिसे निकालने का रास्ता न दिखता हो। रेशमा नाक़ाम रही। गुलज़ार नाक़ाम रहे। बेग़म अख़्तर काम न आईं। किसी ठुमरी-किसी दादरा से जी न बहला। कभी यूं भी होता है कि फ़नकारों और शब्दों के जादूगरों की जादूगरी भी किसी काम नहीं आती। हमें अपने दर्द के फ़साने ख़ुद लिखते होते हैं। उनका आग़ाज़ भी, उनका अंजाम भी।

ये क्या है कि जो शहद-सी रात में भी ज़हर घोलता रहता है? ये क्या है कि जिसको मैं अपने हाथ से धक्का देकर दूसरी ओर कर देना चाहती हूं? ख़ुद से परे। ख़ुद से जुदा। उसके पहलू में होते हुए बहुत सारा आराम, बहुत सारी दिलासाएं और मीठी थपकी जीत लेने के बाद भी मैं नींद में परेशान हूं। टुकड़ों-टुकड़ों में डरावने सपने आते हैं। ट्रक के उन पहियों के नीचे आ जाने का सपना जिनपर गुडईयर लिखा है। गांव के आंगन में बने मिट्टी के चूल्हे में दाहिने हाथ के जल जाने का सपना। पहनने के लिए अपनी अलमारी से साड़ी निकालते हुए हर पल्लू पर मिलनेवाले पैबंद का सपना। यस, वी आर लिविंग इन ए वर्ल्ड ऑफ़ अ कॉमन पीपल, स्माइल्स फ्रॉम द हार्ट ऑफ़ अ फ़ैमिली मैन... पॉल यंग के साथ मैं गाने की कोशिश करती हूं ख़्वाब में, और न गला साथ देता है न सुर।

आंख आदतन पौने छह बजे खुलती है। गीले तकिए और बढ़ी हुई धड़कनों से घबड़ाकर मैं अपनी ही नब्ज़ टटोलती हूं। ऐसा हुआ नहीं कभी कि सुबह का पहला ख़्याल डर हो - संगीन डर, गहरा डर, स्याह डर, भयंकर डर। मुझे कुछ हो गया है। मैं मनीष को जगाना चाहती हूं लेकिन उसको आदित की तरह मुंह खोलकर सोते देखकर उठाने को मन नहीं माना। डर से ख़ुद ही जूझना होगा। मैंने इससे भी मुश्किल घड़ियां देखी हैं। कम-से-कम घर भरा हुआ तो है। लोग साथ तो हैं।

डर से डील करने का मेरा तरीका बहुत ख़राब है। तनाव और दबाव से भी। ये अक्सर या तो नासूर की तरह अंदर पकता रहता है और एक दिन गंदी तरह फूट जाता है या फिर मैं अपने आस-पास के सबसे कमज़ोर शिकार को हल्के-हल्के खरोंचती रहती हूं, उसे चोट पहुंचाती रहती हूं। जब तक अपनी मां के साथ रही, उनके साथ करती रही। आज हाथ में आदित आया है और ट्रिगर है उसका स्कूल जाने से मना कर देना। आद्या का सिक्स्थ सेंस बहुत ज़बर्दस्त है। वो ठीक-ठीक जानती है कि उसे अपनी मां से कब और कितनी दूरी बनाए रखनी है और कब बेहद नज़दीक आना है। वो जानती है कि कब खाना खिलाने के लिए मां की गोद में ठुनकना है और कब मां के हाथ में पानी का ग्लास पकड़ाना है। आद्या आज बिना किसी की मदद के ख़ुद नहा चुकी है, ख़ुद यूनिफॉर्म पहनकर, जूतों में पॉलिश लगाकर नाश्ता करने बैठ चुकी है। आदित कोने में कान पकड़कर खड़ा है। नहीं, मैंने सज़ा नहीं दी। मैंने उससे कुछ कहा तक नहीं, सिवाय इसके कि ठीक है, तुम स्कूल नहीं जाओगे।

आद्या ही नहीं, आदित भी जानता है कि कब कहां कितना रुठना-मनाना है। हम बच्चों की समझ को अक्सर नज़रअंदाज़ करते हैं। उन्हें किससे कहां कैसे पेश आना है, ये बात वो बड़ों से बेहतर जानते हैं।

सुलह की पहल आदित ने की है और हम मिस होती-होती बस भी पकड़ लेने में क़ामयाब हो जाते हैं। आदित बस को हाथ से रोकता है और मेरी तरफ़ घूमकर कहता है, मम्मा, अब तो बस भी आ गई। एक मिट्ठू तो दे दो। मैं उसे गले लगाकर रोना चाहती हूं, लेकिन उसे बस में बिठाकर स्कूल भेज दिया है।

घर आने का कोई मतलब नहीँ। बच्चों के जाने के बाद बेचैनी और बढ़ जाएगी। मैं पार्क में आ गई हूं। दो चक्कर के बाद रोड टू पैराडाईज़ नाम के पौधों की क्यारियों के बग़ल में हरे रंग की बेंच पर बैठ जाती हूं। ऐन्ज़ाइटी कम नहीं हुई। मैं फ़ोन पर बहुत देर तक बेमतलब के स्टेटस अपडेट्स पढ़ती रहती हूं। सब बेचैन हैं। सबके पास वक़्त कम है, शब्द थोड़े हैं और कहने को बहुत सारी बातें हैं। मेरी तरह। यहां भी सुकून नहीं।

"बिटिया, आप प्राणायम नहीं करते?" मुझे ख़्याल ही नहीं रहा कि कब मेरे बग़ल में ये बुज़र्ग़ आकर बैठ गए हैं। एक्स-आर्मी आफ़िसर ही होंगे। शहीद स्मारक पार्क में अस्सी फ़ीसदी जमात इन्हीं की होती है। इनकी मूंछें और हाव-भाव को देखकर जाने-क्यों फ़िल्म 'छोटी-सी बात' के कर्नल जूलियस नागेन्द्रनाथ विल्फ्रेड सिंह यानी अशोक कुमार याद आए हैं जो अरुण यानी अमोल पालेकर को प्रभा का दिल जीतने के हुनर सिखाते हैं। अंकल मुझे पंद्रह मिनट तक अनुलोम-विलोम और भ्रामरी जैसे प्राणायम सिखाते हैं। जल-नेति के फ़ायदे बताते हैं। मेरा ध्यान इनकी बातों के कॉन्टेन्ट से ज़्यादा इनके बोलने के लहज़े पर है जिसे सुनते हुए मुझे जीजाजी कर्नल शर्मा की बात याद आई है, "वी आर ऑल प्रॉडक्ट्स ऑफ़ द सेम असेम्बली लाईन। वी विल ऑल साउंड द सेम।"

मैं शुक्रिया कहकर उठने लगती हूं तो वो कहते हैं, "आई सी यू हियर एवरीडे। यू रिमाइंड मी ऑफ़ माई डॉटर। मैंने तुम्हें तुम्हारे बच्चों के साथ भी देखा है अक्सर। वाई डू दे वेयर ग्लासेस ऐ ट सच एन यंग ऐज? कल मैं तुम्हें एक और एक्सरसाईज़ सिखाऊंगा - आंखों की, बच्चों के लिए।"

मैं हैरान हूं। जिसे मैंने कभी देखा तक नहीं, उसने मुझमें क्या ढूंढ लिया? ये कैसे कनेक्शन हैं? हम कहां से आए लोग हैं? हमारे बीच का कैसा रिश्ता है? ये भी सच है कि पंद्रह मिनट के लिए मैं एन्क्ज़ाईटी हैंगओवर भूल गई हूं। सब अच्छा तो है। मुझपर अजनबी लोग भरोसा करते हैं। मेरे बच्चे मेरी बदली हुई नज़रों को बदल देते हैं। आठ साल की उठा-पटक के बाद मैंने अपने रिश्ते को उस मुक़ाम तक पहुंच दिया है कि जहां लड़ लेने के बाद भी हम एक-दूसरे के मुंह पर दरवाज़े बंद करने की बदतमीज़ी नहीं करते। न मुंह घुमाकर सोते हैं कभी। हम एक-दूसरे की पसंद के लायक चाय बनाना और अख़बार मंगाना भी सीख रहे हैं। मेरी सास अपनी बेटी को आशीर्वाद देते हुए कहती हैं कि बहू मिले तो मेरी बहू जैसी मिले तुमको। मम्मी-पापा अपने-अपने हिस्से की शिकायतें मेरे रजिस्टर में दर्ज कराते हैं। मुझसे सात साल छोटी मेरी भाभी मुझे लगे लगाकर कहती है कि आप ख़ुश रहती हैं तो हम ख़ुश रहते हैं दीदी। भाई मेरी ज़ुबान को पत्थर की लकीर मानते हैं। चंद अपवादों को छोड़कर मुझमें दोस्ती बचाए और बनाए रखने का क़ुदरती हुनर है।

फिर ये डर क्यों है? ये कैसी बेचैनी है? 

घर लौटकर आई हूं तो तूफ़ान मचा है। पापा के फ़िर से कहीं चले जाने और लौट के आ जाने पर। गेट में ताला बंद ना होने पर। मां की थकान और झल्लाहट पर। मनीष की झुंझलाहट पर। मां थककर ठाकुर-स्थान के ठीक नीचे बैठी हैं। मनीष की आंखों में जो बेबसी है उसने रात के गुबार को बाहर निकालने का बहाना दे दिया है।
बेबसी ही है हम सब की। पापा अपनी बीमारी से बेबस हैं। मां अपने जीवन-साथी की बीमारी और थकान से बेबस हैं। मनीष अपने मां-बाप की बेबसी से बेबस है। मैं कुछ कर ना पाने की बेबसी से बेबस हूं और हम सबने अपने-अपने बेबसियों से समझौते कर लिए हैं। हम अपने समझौते के साथ ख़ुश होकर जी ना पाने की हालत में बेबस हैं। एक बीमारी पूरे परिवार को बेबस कर सकती है - कम से कम तीन पीढ़ियों को।

लेकिन किसको अपने मर्ज़ी की मुकम्मल दुनिया मिलती है, बोलो? कोई तरीका नहीं वरना ग़ुलाम अली की एक ग़ज़ल सुनाती जो कल रात से दिमाग़ में घूम रही है -

"हल्के-हल्के ज़मीं पर वो मिटते निशां
थक के बैठे हों कि जैसे ज़मीं-आसमां

ये अंधेरों की बातें अब ना करो
बात मुद्दत के सुलझी है ये दास्तां

जो सुनाए थे तुमने मुझे किस्से कभी
कहते-कहते रुकी है वो मेरी ज़ुबां

तेरी हर बात पे मैंने सिज्दे ही किए
बंदिगी ऐसी देखी है तुमने कहां"



10 comments:

Arvind Mishra said...

ये कैसी बेबसी है!

प्रवीण पाण्डेय said...

मैं रात से घबराता हूँ,
बहुधा चुपचाप सो जाता हूँ,
जो चाह रहा मन से होना
दिन चढ़ता है, हो जाता हूँ।

rashmi ravija said...

हमें भी मॉर्निंग वॉक पर एक मेजर अंकल मिलते हैं...और दूर से हमें देखते ही हाथ फैला कर कहते हैं.." my daughters "
सच है, ये अनजान रिश्ते कब अपनेपन की मिठास सहेज लेते हैं..जो ताजिंदगी बनी रहती है.

PD said...

"आदित बस को हाथ से रोकता है और मेरी तरफ़ घूमकर कहता है, मम्मा, अब तो बस भी आ गई। एक मिट्ठू तो दे दो। मैं उसे गले लगाकर रोना चाहती हूं, लेकिन उसे बस में बिठाकर स्कूल भेज दिया है।"

जिंदगी के सारे रंग तो इस दो लाइन में ही सिमट आई है.

Vikesh Badola said...

रोड टू पैराडाईज़ ......... के बीच(बेबसी। इसके कारण दूसरों और अपने लिए जीने का सच्‍चा आधार संकुचित होता जा रहा है। ना इसमें आपकी,आपके परिवार की गलती नहीं, यह दोष व्‍यवस्‍थागत है। जिसका जिक्र आपके नितांत निजी संस्‍मरण में भावनातिरेक के कारणवश नहीं हो पाया है। हम सब ऐसे ही कैटाक्लिज्‍म से परेशान हैं। संवेदनशील लोगों का मनभावन जीवन व्‍यवस्‍थागत दोषों से बुरी तरह लिपट गया है।

..............मुझसे सात साल छोटी मेरी भाभी मुझे (लगे) लगाकर कहती है कि आप ख़ुश रहती हैं तो हम ख़ुश रहते हैं दीदी।...... (लगे) को (गले) कर लें। महत्‍वपूर्ण आलेख में यह मुझे पकड़ में आ गया।

Vikesh Badola said...

"आदित बस को हाथ से रोकता है और मेरी तरफ़ घूमकर कहता है, मम्मा, अब तो बस भी आ गई। एक मिट्ठू तो दे दो। मैं उसे गले लगाकर रोना चाहती हूं, लेकिन उसे बस में बिठाकर स्कूल भेज दिया है।"...........ऐसी स्थितियों में मुझे भी रोना आता है।

तुषार राज रस्तोगी said...

वाह!!! बहुत अच्छी | भावपूर्ण और गहन वेदना से भरी लेखनी | आभार

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
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Pooja Sharma Rao said...

Aditi you write my story and many more stories in your own !!

Ramakant Singh said...

ऐसा भी हो जाता है कभी कभी

Vikesh Badola said...

आपका यह अनुभव समीचीन है। अपना सा लगता है। रास्‍तेभर आज इस पोस्‍ट के बाबत ही सोच रहा था।