Monday, October 29, 2012

मां ना होती तो मैं क्या होती?

मम्मा, भूलना मत कि आज बॉम्बे जाना है आपको।

स्कूल जाने से पहले आदित की इत्ती-सी बात पर चेहरे पर एक बड़ी-सी मुस्कुराहट आ गई है। हम सिर्फ अपने बच्चों से ही उम्मीदें पाले नहीं रखते। हमारे बच्चों को भी हमसे बड़ी-बडी़ उम्मीदें होती हैं। इन्हीं उम्मीदों के वास्ते आदित अपनी मां से दो रातों की जुदाई बर्दाश्त करने को तैयार हो गया है, बावजूद इसके कि उसे मां की उंगलियों को अपनी उंगलियों में फंसाए बग़ैर नींद नहीं आती।

इतनी सारी ज़िन्दगी जी लेने के बावजूद मैं ठीक-ठीक नहीं कह सकती कि मुझे ज़िन्दगी से आख़िर चाहिए क्या? दौलत, शोहरत, ताक़त या सिर्फ हिम्मत? या इनमें से कुछ भी नहीं और बेइंतहा मोहब्बत? या थोड़ा-थोड़ा सबकुछ?

मैं नहीं जानती मुझे क्या चाहिए। आदित और आद्या जानते हैं, उनकी मां को क्या चाहिए।

तेरह या चौदह साल की थी जब इंग्लिश टीचर ने एक लेख लिखने को दिया - व्हाट वुड आई लाईक टू बी वेन आई ग्रो अप। बड़ी होकर मैं क्या बनना चाहूंगी?

मैंने बड़े मन से साढ़े तीन सौ-चार सौ शब्दों में लिखा था - आई वुड वॉन्ट टू बी ए मदर।

मैं जानती थी कि मैं बच्चों को पैदा करने और उनको पालने का सुख तो चाहती ही थी। ऐसा क्यों था, इस बारे में कभी सोचा नहीं। बच्चों से इतना ही प्यार था तो मैं किसी किंडरगार्डन में टीचर भी तो हो सकती थी।

लेकिन अपनी मां को देखकर लगता था कि मुझे भी मां बनना है। अपनी मां जैसी, ये ठीक-ठीक नहीं बता सकती। या बताना नहीं चाहती, क्योंकि एक पीढ़ी के फ़ासले के बीच हम कई मायने में अलग-अलग हैं, कई मायनों में एक जैसे होते हुए भी।

हम एक संयुक्त परिवार में पले-बढे, जहां मेरी मां का दिन सुबह चार बजे शुरू हो जाता था। घर में मर्दों का ऐसा आधिपत्य था कि अब सोचती हूं तो सिहर जाती हूं। आख़िर ये औरतें इतना बर्दाश्त कैसे करती थीं? पुरुषों की इतनी ज़्यादती के बीच मेरी मां हम तीन भाई-बहन में ही अपने सुख तलाशती रहती थी। उसकी सुबह हमारे लिए होती थी, उसकी थकन में आराम के सिलसिले भी हम ही से आते थे। जिस परिवार में प्यार से बात करने, एक-दूसरे को गले लगाने, हाथ थामने, प्यार जताने, इज़्जत देने का चलन नहीं था वहां उस भीड़ में मेरी मां ने गोद में सिर रखना सिखाया, एक-दूसरे के बालों में तेल लगाना, एक-दूसरे के साथ गुनगुनाना, एक-दूसरे की पीठ पर हाथ रखकर मुस्कुराना और बिंदास एक-दूसरे को गले लगाना सिखाया। मां उस परिवार में रहते हुए भी खुलकर अपने प्यार का इज़हार करती थीं, जहां अपने बच्चों को गोद में लेना शान का विरूद्ध समझा जाता था। उसी का नतीजा है कि इतने बड़े हो जाने के बावजूद हम भाई-बहन एक-दूसरे को गले लगाने से बिल्कुल नहीं कतराते। हमारी संस्कृति में इसे उचित नहीं माना जाता, फिर भी।

मां ने अपने बेटों को बिस्तर लगाना, मच्छरदानी खोलना और घर की औरतों के दुख-सुख समझना सिखाया। उन्होंने कुछ कहा हो, ऐसा याद नहीं। हम कई बातें उन्हें देखकर समझ जाते थे। भाई के घर से लौटी हूं अभी-अभी, और इस बात का गुमान है कि उसमें मां की संवेदनशीलता और सहनशक्ति है। मां ने और कुछ सिखाया या नहीं, ज़िन्दगी को लेकर उदार बनना ज़रूर सिखाया।

जो मां ने सिखाया और जो मां ने नहीं सिखाया, वही अपनी बच्चों को सिखाना चाहती थी मैं। मैं अपनी ज़िन्दगी अपने बच्चों से बांटना चाहती थी, ऐसे कि जैसे किसी और का हक़ ना हो। मैं उनके साथ दुनिया को नई नज़र से देखना चाहती थी। इसलिए, मैं मां की तरह ना होते हुए भी मां की तरह की मां बनना चाहती थी।

मैं ये सही-सही जानती थी कि मुझे ज़िम्मेदारियां उठानी हैं और उन ज़िम्मेदारियों को बच्चे मुक़म्मल बनाते हैं। अपनी ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा अपने शरीर के हिस्से के नाम यूं कर देना कि उनसे बंधे भी रहें और उनसे जुदा भी, इंसानियत की क़िताब का उपसंहार होता है। हम जब अपने बच्चों के साथ जीना सीख जाते हैं तो  बाहर की दुनिया से जूझ जाने का हुनर अपने-आप आ जाता है।

मैं कभी महत्वाकांक्षी नहीं थी। छोटे-छोटे ख़्वाब थे, और ये यकीन था कि उन्हें पूरा होते देखूंगी एक दिन। इन ख़्वाबों में इतनी ही आज़ादी थी कि किसी सेंकेंड हैंड गाड़ी की स्टीयरिंग व्हील पर बैठकर अपने तरीके से अपनी गाड़ी चला सकूं। इन ख़्वाबों में इतने ही पैसों का शौक़ था कि ट्रेन की टिकटें कराकर एक जगह से दूसरे जगह जा सकने की आज़ादी हो। मुझे कपड़ों, जूतों, गहनों का शौक़ नहीं। मैं अक्सर कहती हूं कि कमाती तो मैं दरअसल अपने लिए टिकटें खरीदने के लिए हूं, और उन टिकटों से किए जा सकने वाले सफ़र में अपनी खरीदी हुई किताबें पढ़ सकने के लिए।

इत्ती-सी ही है ख़्वाहिश। इत्ती-सी ही थी ख़्वाहिश ।

और उन ख़्वाहिशों को अचानक बच्चों ने पर दे दिया। उन्हें घर में रहनेवाली बेसलीका, बेतरतीब, बेढंगी मां रास नहीं आती। तीन साल की थी आद्या जब कहा था उसने, आप भी ऑफिस जाया करो मम्मा। हम नहीं रोएंगे आपके लिए।

मेरे बेसलीका काम का कितना हिस्सा समझ में आता है उन्हें, मैं नहीं जानती। लेकिन मेरे बच्चे अक्सर अजनबियों से बताते हैं, मेरी मम्मा राईटर है। कहानियां लिखती हैं।

राईटर? जाने राईटर होने का मतलब उन्हें क्या समझ में आता होगा? लेकिन मेरे लिए उनकी आवाज़ का फ़ख़्र मेरा सबसे बड़ा ईनाम है।

मेरे बच्चे जानते हैं कि उनकी मां और दूसरी मांओं से अलग है। इसलिए उन्होंने अपनी मां को अपने तरीके से स्पेस दिया है। मैं बच्चों को अपने साथ क्लायंट मीटिंग्स में ले गई हूं। ऐसा भी हुआ है कि एक बच्चे को सोफे पर सुलाकर दूसरे को गोद में लिए मैंने डॉक्युमेंट्री फिल्मों पर चर्चा की है। अपनी मजबूरी में उन्हें अपने काम का हिस्सा बना लेना और अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल ज़िन्दगी में मची गड्डमड्ड का जो असर उनपर दिखाई दे रहा है, वो दिल को बहुत सुकून पहुंचाता है।

बच्चों ने सिखाया है मुझे कि नामुमकिन कुछ भी नहीं होता, और अगर आप मां हैं तब तो कुछ भी नहीं। मां बनते ही पांच गेंदों को एक साथ उछालकर उन्हें संतुलित करते हुए ज़िन्दगी के सर्कस में बने रहने की बाज़ीगरी अपने आप आ जाती है।

इसका ये मतलब कतई नहीं कि ये जगलिंग आसान होती होगी। कई-कई बार मुंह के बल गिरने-संभलने-चोट खाने के बाद आता है ये हुनर। मां से मां बनना सीखने के बाद अब अपने बच्चों से मां बनना सीख रही हूं। मेरी मां ने मुझे सोचने-समझने-जूझने-बर्दाश्त करने की शक्ति दी। मेरे बच्चों ने मुझे अभिव्यक्ति की ताक़त दी। मेरी मां ने मुझे दूसरों के लिए जीना सिखाया। मेरे बच्चे उनकी ख़ुशी के लिए ख़ुद को बचाए रखना सीखा रहे हैं। मेरी मां ने मुझे बांटना-देना-उदार होना सिखाया। मेरे बच्चों ने मुझे सहेजना-समेटना सिखाया है। मेरी मां ने मुझे जो पंख दिए उन्हें मेरे बच्चे परवाज़ देने में लगे हैं।

मां ना होती तो मैं क्या होती?

मैं मां ना होती तो क्या होती?











10 comments:

Sonal Rastogi said...

कुछ भी नहीं कहूँगी ...बस दोनों बच्चो के माथे पर प्यार कर देना मेरी तरफ से भी

Manu Tyagi said...

भावनात्मक लेखनी जो आंखो में आंसू ला दे

Ramakant Singh said...

शायद अमेरिका का संविधान माँ को समझने में सक्षम रहा तभी वहां संतुलन और नियंत्रण का सिद्धांत लागू है . सुन्दर बचपन की याद और उसे समृद्ध कर परिमार्जन के साथ जीने की अदा......मुबारक

crypticrow said...

bahut sundar likha aapne..kafi kuch sochne/samajhne par majboor bhi kar diya :) i could relate to this post even more because i have been wanting to be a mother too for sometime now. glad to have come across the blog. shukriya :)

shikha varshney said...

बच्चे वाकई ताक़त होते हैं और कई बार तो हमारी माँ भी.

monali said...

Lovely write up.. bachcho ko dher saara pyar :)
Waise m bhi jab 13-14 saal ki thi tab apne bachcho k lie naam soch lie the aur jab pehli baar orkut a/c banaya tha to apne intro me likha tha k at tymes i feel dat m born to b a mother.. :D

Rahul Singh said...

लिखें-न लिखें, आपका राइटर-मां होना नियति लगता है.

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रश्न अब उतना कठिन नहीं है, उत्तर साथ में हैं।

Pallavi saxena said...

बच्चे ही आलसी जीवन जीना सीखा सकते हैं हम बड़ों को और यह हुनर किसी के पास नहीं :)

अनूप शुक्ल said...

बच्चे बहुत समझदार हैं। उनकी मां के हौसले सलामत रहें।