Monday, October 22, 2012

बेंगलुरू डायरिज़ 1: छुक छुक छक छक

शुक्रवार के दिन किसी गुम हो गए बच्चे की तरह महसूस करती रही।

दर-दर भटकती, अपने घर का पता पूछती वो गुम हो गया बच्ची, जिसे मालूम तो है कि उसे पहुंचना कहां है, लेकिन जानती नहीं कि वहां जाने का रास्ता कहां से होकर जाता है। ये ट्रैवल एन्क्ज़ाईटी का नतीजा हो सकता है। घुमन्तू तो हूं, लेकिन शहर से बाहर जाने से पहले अभी भी हाथ-पांव ठंडे होने लगते हैं, हलक में कुछ ऐसा अटका हुआ-सा रहता है कि जैसे उंगली डालो और सब बाहर। कुछ छूट जाने का डर, वक्त पर स्टेशन ना पहुंचने का डर, तबीयत ख़राब हो जाने का डर... और डर कई गुना ज़्यादा बढ़ गया है क्योंकि इस बार दो बच्चों को लेकर छत्तीस घंटे के सफ़र पर जाना है।

दिन किसी बेख़्याली में गुज़रा है। किसी प्यारी चीज़ के खो जाने के ग़म में, जतन से संभालकर रखे गए याद के किसी टुकड़े के छिटककर दूर चले जाने के अफ़सोस में... सफ़र कई दुखों की दवा होता है, कई तकलीफ़ों का इलाज। एक जगह से दूसरे जगह पहुंचने के क्रम में रास्ते में जमा किए गए अनुभव उस लम्हे में जीने का सलीका सिखाते हैं, सिखाते हैं कि ना गुज़रा हुआ लम्हा मायने रखता है, ना आनेवाले लम्हों की चिंताएं किसी काम की होती हैं। जो है, इसी एक लम्हे में है। ट्रेन में बैठे हुए मुसाफ़िरों की लाचारी और बंधन बड़े कारगर होते हैं।

ऐन्क्ज़ाइटी में इतनी गड़बड़ ज़रूर हुई है कि मैंने आनेवाले सफ़र की टिकट देखकर बच्चों को सामान सहित गलत बोगी में चढ़ा दिया है। फिर अटे्न्डेंट की दुहाई है, सामान और बच्चों को उतारने की मशक्कत है और हांफते-दौड़ते ट्रेन खुलने के ठीक एक मिनट पहले अपनी सीट पर बैठ पाने की राहत है।

"हमें गलतफ़हमी हो गई थी, इसलिए हम यहां देर से पहुंचे", आदित सामने की सीट पर बैठी महिला से कहता है और वो हैरान होकर मेरी तरफ़ देखती है।

"वाऊ! डज़ ही ऑल्वेज़ टॉक लाइक दिस?" वो मुझसे कहती है।

"लाइक व्हॉट? हम घर में हिंदी में ही बात करते हैं," मैं उससे कहती हूं।

"दैट वॉज़ स्वीट।"

तबतक महिला का पति और चार साल का बेटा सीट पर आ जाते हैं।

हो गई छुट्टी। अब तीन बच्चे मिलकर पूरी बोगी में उत्पात मचाएंगे। टोटल हैपी हॉलीडेज़ की शुरूआत हो गई अभी ही।

"मॉम, हाउ लॉन्ग डज़ ईट टेक टू रीच नागपुर? आई होप इट्स नॉट अ वेरी टफ़ एंड आर्डुअस जर्नी!" चार साल का बच्चा कहता है।


"वाऊ! डज़ ही ऑल्वेज़ टॉक लाइक दिस?" अब हैरान होने की बारी मेरी है।

बात-बात में समझ आ गया है कि सजीव नाम का ये चार साल का जीव अंग्रेज़ी भी बोलता है और मलयालम भी। आद्या-आदित को उतनी अंग्रेज़ी आती नहीं, इसलिए उनसे टूटी-फूटी हिंदी में बात भी कर लेता है।

बीस मिनट के भीतर हम सब में दोस्ती हो गई है। तीनों बच्चों में, मेरी बच्चे की मां के साथ - इतना कि सजीव के बढ़े हुए नाखून के लिए मेरा नेलकटर निकल आता है और आदित की बहती नाक पोंछने के लिए उसकी मां के वाइप्स। खेलते-खेलते सो चुके आदित को सजीव के पापा गोद में उठाकर उसे बिस्तर पर डाल देते हैं। मेरी नॉन-स्टॉप छींक और खांसी के लिए एक्स ऑयल निकाल कर हाथ में थमा दिया गया है।

सोने से पहले सजीव की मां मुझसे पूछती है, "विक्स लगा दूं?" फिर धीरे से कहती है, "माई हस्बैंड हैज़ बैड साइनस। ही मे स्नोर इन हिज़ स्लीप। प्लीज़ बेयर विथ हिम।" मैं हंस देती हूं। खर्राटे मारनेवाले पतियों के लिए क्या शर्मिंदा होना?

सोने जाने से पहले सजीव के डैड भी हमें आगाह कर जाते हैं, "आई विल ट्राई नॉट टू स्नोर। बट इन केस आई डू, प्लीज़ डोन्ट माइंड।"

कंपार्टमेंट का सन्नाटा, पटरियों पर दौड़ती ट्रेन का शोर और सजीव के डैड के खर्राटे फिर दिमाग को लुकाछिपी के किसी खेल की ओर धकेल देता है।

एक सफ़र, बस एक सफ़र में रिश्ते बनते हैं क्या?

मैंने बनाए हैं एक सफ़र के, एक दिन के रिश्ते। सफ़र में मिलनेवालों से सालों का रिश्ता क़ायम किया है। ट्रेन में साथ सफ़र करनेवाले लोगों के नंबर बदलते हुए फ़ोनबुक और फोन के साथ मेरे पास बने हुए हैं अभी भी। मुझे याद आया है कि In life everything happens for a reason, People meet not by chance, but by fate. लोग अगर मिलते हैं तो कोई ना कोई वजह होती है, और हर रिश्ते की, हर मुलाक़ात की मियाद तय होती है। वक़्त से ज़्यादा किसी को उस रिश्ते का सुख नहीं मिलता, और अच्छा भी है क्योंकि कुछ तो ऐसे रिश्ते हों जो बिना गिरहों के हों, बिना अपेक्षाओं को, बिना किसी कारण, बिना किसी स्वार्थ के।

सुबह के शोर में ख़्यालों ने ख़ामोशी का जामा ओढ़ लिया है और नागपुर आने ही वाला है अब। सजीव और आदया-आदित की टेढ़ी-मेढ़ी ड्राईंग्स के साथ हमने एक रात की यादों को तह लगाकर अपने-अपने बैग्स में रख लिया है।

उतरते हुए सजीव की मां अपना नंबर दे जाती है, माई नेम इज़ अश्वथी - दैट्स अ मलयालम नेम पर अश्विनी, एंड आई लिव इन ग्रेटर नोएडा। वी मस्ट मीट सून!

वी मस्ट। आख़िर कोई ना कोई वजह है कि हम मिले अश्वथी। शायद इसलिए कि कल रात मुझे ऐक्स ऑयल और विक्स की सख़्त ज़रूरत थी और सजीव के नाखून काटे बिना तुम्हारा गुज़ारा नहीं हो सकता था। शायद इसलिए कि ग्रेटर नोएडा में मुझे कुछ और जान-पहचान वालों की ज़रूरत हो। शायद इसलिए कि सजीव को सिखनी थी थोड़ी सी हिंदी और मेरे बच्चों को इतनी-सी अंग्रेज़ी। लेकिन इतना सोचकर क्या होगा?

इसलिए, एक और वायदे के साथ फोन बुक में एक और नंबर जुड़ जाता है। इतने सारे रिश्तों की भीड़ में एक और रिश्ता बन जाता है।

वैसे बैंगलोर तक का हमारा सफ़र जारी है...


5 comments:

rashmi ravija said...

शिवानी के एक संस्मरण में पढ़ा था जब लन्दन से आते वक़्त एक पाकिस्तानी महिला से उनकी बड़ी जल्दी दोस्ती हो जाती है,
शिवानी कहती हैं, " ये पूर्व जनम के रिश्ते होते हैं जो इस जनम में ज़रा सा खाद-पानी पाकर पल्लवित पुष्पित हो जाते हैं "

देवांशु निगम said...

अरे वाह !!!
स्टेशन पहुँच कर मुझे भी घर का ताला याद आता है कि लगाया भी कि नहीं :)

उनको अपने बेटे के पसंदीदा गानों के बारे में बता देतो तो पक्का वो कहती :
"वाऊ! डज़ ही ऑल्वेज़ लिसेन लाइक दिस?" :) :) :)

यात्रा जारी रखिये :)

प्रवीण पाण्डेय said...

बंगलोर में हम स्वागत को तैयार बैठे।

Rahul Singh said...

आपके इस सफर में यहां और भी हमसफर हैं.

अनूप शुक्ल said...

सफ़र की दास्तान बहुत अच्छी लगी। कानपुर के प्रमोद तिवारी की कविता याद आ गयी:
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं
आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं
अपने संग थोड़ी सैर कराते हैं।


सुनिये आपको भी अच्छी लगेगी।