Tuesday, October 23, 2012

बेंगलुरू डायरिज़ 2: इत्तिफ़ाक़ ऐसा और उसका बयां

एक ऐसे ही ट्रेन वाले सफ़र पर मिली थी वो मुझे।

नौकरी अभी-अभी शुरू ही की थी मैंने, और इतने पैसे नहीं होते थे कि एसी की टिकटें कराई जा सकीं। घर जाने का बहाना ढूंढती रहती थी, और याद नहीं कि उस बार कौन-सा बहाना था। कोई त्यौहार नहीं था, कोई छुट्टी भी नहीं थी, कोई शादी-ब्याह नहीं था घर में। फिर भी घर जा रही थी। ऑफ़िस से सीधे पुरानी दिल्ली स्टेशन स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस पकड़ने चली गई थी, तब भी जब पेट में ऐसा दर्द था कि सीधे खड़े होना मुश्किल। लेकिन लगता था, घर पहुंचते ही सब तकलीफ़ों के हल निकल आएंगे।

मेरी सीट नीचे की थी, और मेरे सामने वाली सीट पर दो लड़कियां थीं, और उनके साथ एक लड़का। कौन थे, कहां जा रहे थे, सोचने-समझने की ताक़त नहीं थी। मैं बोगी में घुसते ही सीट पर पसर गई थी। ट्रेन चलने के वक़्त सिर्फ़ एक लड़की रह गई थी सामने। बाकी दो लोग ढेर सारी हिदायतों के साथ उतर गए थे।

ट्रेन चल दी। मैं फिर भी अपनी सीट से नहीं उठी। याद भी नहीं कि ट्रेन में भीड़ थी या नहीं, या उस कंपार्टमेंट में हम दो लड़कियों के अलावा कोई और भी था। ये भी याद नहीं कि टीटीई टिकट देखने आया था या नहीं। ये भी याद नहीं कि वैसे पेट के बल लेटे हुए जाने कितना वक्‍त गुज़ारा था मैंने।

ये याद है कि वो लड़की मेरे पास आई थी और मेरी पीठ पर हाथ रखकर कहा था, आर यू ओके?

उसका अपनापन-भरा स्पर्श था या देर से दर्द बर्दाश्त करते रहने की तकलीफ़, मैं सिसकियां लेकर रोने लगी थी। उसने मुझे सीट पर उठाकर बिठाया था, मुझे पानी पिलाया था, मैकडॉनल्ड्स के पैक किए हुए डिनर में से कुछ खिलाया था और कोई दवा निकालकर दी थी मुझे। फिर क्या हुआ, याद नहीं। मैं सो गई थी शायद।

सुबह उठते ही एक मुस्कुराती हुई शक्ल नज़र आई थी। फीलिंग बेटर? उसने पूछा तो ध्यान आया, मैं वाकई बहुत बेहतर महसूस कर रही थी।

थोड़ी देर में दिमाग पर से पिछली रात का धुंधलका छंटा और फिर धीरे-धीरे होश में आने लगी। तब देखा था मैंने कि सामने बैठी सत्रह-अठारह साल की इस लड़की की शक्ल बहुत ख़ूबसूरत थी। उसके सांवले चेहरे पर बहुत बड़ी काली, गहरी आंखें थीं और उसकी पलकें कमाल की घनी थीं। उसके होंठ के नीचे बाईं तरफ ठुड्डी से थोड़ा ऊपर एक तिल था। वो ख़ूब मुस्कुराती थी और अक्सर ऊंची आवाज़ में ही बात करती थी। उसके बाल लंबे थे, सीधे और रेशमी।

"मेरा नाम शुभशंसा है, शुभा। लेकिन घर में सब मुझे ऋतु बुलाते हैं। आप मुझे ऋतु बुला सकती हैं। हम डाल्टनगंज जा रहे हैं। आपको कहां जाना है?"

हमारी बातचीत वहीं से शुरू हो गई। फिर याद नहीं कि ट्रेन कितनी लेट थी। ये भी याद नहीं कि हमने बातें क्या-क्या कीं। लेकिन कुछ घंटों में हम दिल-विल, क्रश-वश की भी बातें कर रहे थे, ये याद है। लड़कियों के लिए एक-दूसरे से खुल जाने के लिए शराब की ज़रूरत नहीं पड़ती, वो हर वक़्त अपने नशे में होती हैं।

डाल्टनगंज उतरने से पहले ऋतु जाते हुए एक क़ागज़ पर अपना पता लिख गई थी। पटना वीमेन्स कॉलेज हॉस्टल का था। मैंने भी कोई पता लिख दिया था अपना, कटवारिया सराय का था या वसुंधरा एन्क्लेव का, ये याद नहीं।

ट्रेन में मिलनेवाले लोग दुबारा मिला करते हैं? सफ़र पूरा होने के साथ दोस्तियां ख़त्म हो जाती हैं।

लेकिन मेरी और ऋतु की दोस्ती ख़त्म नहीं हुई। मुझे याद नहीं कि पहली चिट्ठी किसने लिखी थी। लेकिन हम एक-दूसरे को गाहे-बगाहे चिट्ठियां लिख दिया करते थे। फिर किसी चिट्ठी में ही नई-नई बनाई गई ई-मेल आई़डी भी शेयर कर दिया था। ऋतु तब कॉलेज के तीसरे साल में थी।

फिर हमारा संपर्क नहीं रहा। मैं मुंबई चली गई और वो एक साल किसी फास्ट-फॉरवर्ड मोशन में चलती फिल्म की तरह गुज़रा। फिर मैं मुंबई से रांची आ गई, तेईस साल की उम्र में ही थक-हारकर... कुछ रिश्तों से थकी हुई, कुछ ख़ुद से, और कुछ अपनी पैदा की हुई उलझनों से। जिस दिन मुंबई में अपना सामान पैक कर रही थी, उसी दिन इंटरनेट कैफ़े ई-मेल चेक करने गई थी। एक ई-मेल शुभशंसा बख़्शी का था - ऋतु का। ऋतु नोएडा आ गई थी, यूपीएससी की तैयारी करने। उसने अपना पता और फोन नंबर लिखकर भेजा था। मैंने कोई जवाब नहीं दिया। कोई जवाब सूझा नहीं। कहां से शुरू करती बताना कि एक साल में पुल के नीचे से गुज़रती पहाड़ी नदी की ज़िन्दगी में कैसे-कैसे उफ़ान आ चुके थे।

फिर महीनों संवाद नहीं रहा। फिर एक दिन मैंने उसे ई-मेल किया था। मैं दिल्ली वापस आ रही थी, और नोएडा के पास ही रहनेवाली थी। ऋतु ने तुरंत जवाब भेजा था - कोई ज़रूरत हो तो मुझे बताना। मुझसे तीन साल छोटी लड़की मेरी इतनी फ़िक्र क्यों कर रही थी? मैं तो अब उसकी शक्ल भी भूल गई थी शायद। हम डेढ़ साल पहले मिले थे, और ट्रेन में मिले एक सहयात्री को भूल जाने के लिए डेढ़ दिन का वक्त काफ़ी होता है।

मुझे वाकई ऋतु की ज़रूरत पड़ी थी। मेरे पास नौकरी नहीं थी, घर नहीं था, मैं होश में नहीं थी। ऋतु ने अपना दरवाज़ा मेरे लिए खोल दिया था। अपनी बड़ी बहन के घर में उसने अपने कमरे में मेरे लिए जगह बना दी। फिर मेरे इंटरव्यू में जाने के लिए अपनी बहन के कपड़े पहनाकर भेजने भी लगी। उसके मम्मी-पापा और उसकी बहन को जाने कैसा लगता होगा तब, लेकिन ऋतु टस से मस नहीं हुई। मैं पीजी में रहने चली गई, फिर भी ऋतु से मिलने आती रही।

फिर जिस दिन एनडीटीवी में मुझे मिसेज़ रॉय और डॉ रॉय से मिलना था, उस दिन नोएडा से साथ गई थी वो। नीचे बैठकर इंतज़ार करती रही मेरा, और फिर लोदी रोड के साईं बाबा मंदिर ले गई थी। मन्नतों की भीड़ में उसने मेरे नाम की एक मन्नत खड़ी कर रखी थी।

फिर हम लगातार मिलते रहे। मैंने एक दोस्त के साथ घर ले लिया, और ऋतु उस घर में हक़ से आकर रहने लगी। जिस रात मैं मनीष से पहली बार मिलने गई थी, उस रात भी ऋतु मेरे घर पर थी। किसी लड़के पर उसकी मुहर लगे बिना मेरी शादी हो जाती, हो ही नहीं सकता था। मेरी पहली प्रेगनेंसी पर मुझे अस्पताल ले जाने वाली ऋतु ही थी, अपनी बहन की शादी की आपाधापी में भी समय निकाल लिया था उसने मेरे लिए। फिर धौलपुर हाउस से यूपीएससी की इंटरव्यू देकर लौटी और सबसे पहले मेरे जुड़वां बच्चों को देखने भी आई। मैं अपनी सासू मां को ठीक-ठीक समझा नहीं पाई कि मैं ऋतु को कैसे जानती हूं। ट्रेन की दोस्त है, बताती तो उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक जाती।

फिर ऋतु की शादी हो गई और वो बैंगलोर आ गई। हमें आदित को लेकर उसकी आंखों के चेकअप और सर्जरी के लिए कई बार बैंगलोर आना पड़ा। अपने सगे भाई के होने के बावजूद हमलोग ऋतु के घर रुके। मनीष को मैंने बताया नहीं कि हम ट्रेन के दोस्त हैं। ऋतु मनीष की साली होने के सारे सुख उठाती है, और एक वही है जिसके ताने और मज़ाक मनीष हंसते-हंसते झेलते हैं। हर्ष ऋतु के पति होने के साथ बच्चों के मौसा है, मनीष के करीबी दोस्त हैं और हम साल में एक बार भी बात करें तो हमें मालूम होता है कि बातचीत के सिरे कहां से पकड़ने हैं। ऋतु, शुभशंसा बख्शी, मेरी ट्रेन वाली दोस्त है।

उसके पास तीन बड़ी बहनें थीं, मेरे पास छोटे भाई-बहनों की जमात थी। लेकिन फिर भी हम अपनेआप एक-दूसरे के लिए बड़ी बहन और छोटी बहन की भूमिका में फिट हो गए थे। हमारे पास सैकड़ों दोस्तों की जमात थी, फिर भी हमने अपना ख़ास रिश्ता बचाए रखा था।

बैंगलोर निकलने से पहले ऋतु को वॉट्सऐप पर मेसेज भेजा। मौसम कैसा है वहां का? बच्चों के लिए जैकेट लाऊं या नहीं? जो ऋतु मेरे और बच्चों के बैंगलोर आने का एक महीने से इंतज़ार कर रही थी, उसने घंटों जवाब नहीं भेजा। फिर दोपहर में जवाब आया, हर्ष का। ऋतु और हर्ष पटना में थे, और ऋतु के पापा क्रिटिकल थे। फिर अगली सुबह अंकल का हाल पूछने के लिए मेसेज किया था शाम को हर्ष ने ही जवाब दिया, ऋतु के पापा नहीं रहे।

मैं बैंगलोर में हूं और ऋतु यहां नहीं है। मैं हमेशा की तरह फिर नहीं जानती कि कैसे बताऊं उसे, उसे कितना याद कर रही हूं। कैसे बताऊं कि आंटी के बारे में सोच रही हूं, और सांत्वना में क्या कहा जाता है, ये नहीं जानती। अपनी दुआओं में ऋतु के लिए, उसकी बड़ी बहनों के लिए, आंटी के लिए ढेर सारी हिम्मत भेज रही हूं।

ऋतु, तुम शुभशंसा बनी रहना - केप ऑफ गु़ड होप - जहां खड़े होकर आंटी ने सोचा था कि अगली बेटी होगी तो उसका नाम शुभशंसा ही रखेंगे। तुम उन लोगों में से हो जो ज़िन्दगी में मेरी आस्था बचाए रखते हैं। जब कोई भरोसा डगमगता है तो मैं उस भरोसे के बारे में सोचती हूं जो तुमने एक अनजान पर बिना सोचे-समझे दिखाया था। शरीर आता-जाता रहता है, लेकिन रूह के साथ जो अजर-अमर बना रहता है, कुछ ऐसे ही रिश्ते होते हैं जिनका कोई सिर-पैर नहीं होता। इन्हीं रिश्तों को देखकर यकीन हो जाता है कि हम किसी ना किसी वजह से मिलते हैं, हमारी नियतियां कहीं ना कहीं जाकर जुड़ती हैं और हर हादसे या खुशी के लम्हे का वक़्त पहले से तय होता है।

वरना इत्तिफ़ाक़ ऐसा क्यों कि मैं बैंगलोर में हूं और तुम यहां नहीं हो, अपने सबसे बड़े सदमे से जूझ रही हो इस वक्त। इत्तिफ़ाक़ ऐसा इसलिए कि तुम्हारी अहमियत मुझे आज सुबह समझ आई है। इत्तिफ़ाक़ इसलिए कि ये कह सकूं कि तुमसे बहुत प्यार करती हूं शुभशंसा बख़्शी, मेरी ट्रेन वाली दोस्त।   

 

11 comments:

डा. गायत्री गुप्ता 'गुंजन' said...

लड़कियों के लिए एक-दूसरे से खुल जाने के लिए शराब की ज़रूरत नहीं पड़ती, वो हर वक़्त अपने नशे में होती हैं।

ट्रेन में मिलनेवाले लोग दुबारा मिला करते हैं? सफ़र पूरा होने के साथ दोस्तियां ख़त्म हो जाती हैं।

शरीर आता-जाता रहता है, लेकिन रूह के साथ जो अजर-अमर बना रहता है, कुछ ऐसे ही रिश्ते होते हैं जिनका कोई सिर-पैर नहीं होता। इन्हीं रिश्तों को देखकर यकीन हो जाता है कि हम किसी ना किसी वजह से मिलते हैं, हमारी नियतियां कहीं ना कहीं जाकर जुड़ती हैं और हर हादसे या खुशी के लम्हे का वक़्त पहले से तय होता है।

:)

Sonal Rastogi said...

किसी रिश्ते के जुड़ने के वक़्त पता नहीं कौन से ग्रह काम करते है जीवन भर का रिश्ता जुड़ जाता है .... ऋतु के जीवन के इस कठिन पल में हमारी संवेदनाये भी जोड़ देना

Manu Tyagi said...

रात स्टूडैंट आफ द ईयर देखी उसकी टैगलाइन है कि दोस्त् हमें कितना अच्छा समझते है​ जितना कि मां बाप भी नही ये दोस्ती भी कुछ ऐसी ही है

PD said...

जिंदगी के कितने पेग लगाने के के बाद आपने इसे लिखा था? इतने दिल से दिल की बात कोई नशे में ही कर सकता है. ऐसे नहीं...
मैं शायद अगले साप्ताहांत पर बैंगलोर आऊंगा. आपको फेसबुक पर अपना नंबर भेजता हूँ. अगर मौका मिला तो आपसे जरूर मिलना चाहूँगा.

देवांशु निगम said...

इम्तियाज़ अली ने भी अपने एक इंटरव्यू में बोला था ट्रेन में हुई दोस्ती के बारे में , जब वो दिल्ली और मुंबई के बीच अक्सर सफ़र करते रहते थे | "जब वी मेट" वहीं से इंस्पायर्ड थी | स्पेशली "रतलाम की गलियां" | :) :)

वैसे लड़कों को भी खुलने में अक्सर "शराब" की ज़रुरत नहीं पड़ती | मैंने खुद कई बार ये महसूस किया है :) :) :) ट्रेन में ही मिले कई मेरे दोस्त मेरे फेसबुक फ्रेंड्स हैं :)

सागर said...

@ पी डी,

थोडा पहले बताता तो तेरा ३६० रूपया इन्ही के हाथों भिजवा देता

PD said...

@सागर - बात तो सही है. तुम्हें भी कष्ट नहीं उठाना पड़ता. :)
दरअसल मुझे भी ठीक-ठीक नहीं पता की मैं जा रहा हूँ या नहीं, पर दोस्त सब बिलकुल जिद्द पर अड़े हुए हैं की इस दफे ना आये तो दोस्त मत कहना. पिछले लगभग दस हफ़्तों से उन्हें बहाने सुना रहा हूँ नहीं आने की.

Mukesh Kumar Sinha said...

Ritu jaise logo ke karan hi jindagi aur jindagani hai...:)

shikha varshney said...

कुछ रिश्ते जो इश्वर बनाकर नहीं भेजता हम बना लेते हैं पर कैसे , कहाँ नहीं मालूम. बहुत कुछ याद आ गया अनु !!! पूरा नहीं पढ़ा..पढ़ ही नहीं पाई.

प्रवीण पाण्डेय said...

मैं ट्रेन में ही बैठा हूँ और आपका लेख पढ़ रहा हूँ, ट्रेन में यह सहृदयता और ऋतु, दोनों ही मन को छूने वाली हैं। ईश्वर ऋतुजी को संबल दे।

अनूप शुक्ल said...

संयोग कि यह पोस्ट मैंने ट्रेन में ही पढ़ी थी। मोबाइल पर। उस समय सोचा था कि जबलपुर पहुंचकर टिपियायेंगे। आज इत्ते दिन बाद दुबारा देखी तो सोचा बता दें। :)

बहुत संवेदनशील पोस्ट!