Monday, November 5, 2012

तेरे मेरे बीच में

मैं बहुत सोच-समझकर उसके और मेरे रिश्तों के बारे में लिखना चाहती थी। अपने दिमाग के बंद दीवान को खोलकर उनमें तह लगाकर डाल दिए गए पुराने कपड़ों की तरह सहेज-संभालकर रखे गए, लेकिन किसी काम के नहीं रह गए पुराने कपड़ों की तरह पड़े कुछ कहानियों और उपन्यासों के पात्रों, कथानकों में से कोई मिसाल ढूंढकर लाना चाहती थी (ताकि मेरे भी कुछ पढ़े-लिखे होने का गुमां होता)।

लेकिन की फरक पैंदा या है यार? ये दिखावा किसके लिए? जिसके होने ना होने से फर्क़ पड़ता है उसे तो इससे बिल्कुल फर्क नहीं पड़ेगा कि मैंने मोपासां की कहानियां पढ़ी हैं या नहीं, गॉथे की कविताओं पर मेरी क्या राय है और गिरिश कर्नाड वर्सेस वीएस नायपॉल डिबेट पर मैंने कोई त्वरित टिप्पणी पेश की है या नहीं।

और चूंकि उसे इन सबमें से किसी भी चीज़ से कोई फ़र्क पड़ना नहीं है, इसलिए मैं बिंदास धाराप्रवाह अनएडिटेड अनसेन्सरर्ड अननेसेसरी बातें लिखने जा रही हूं।

मेरे अंग्रेज़ी के टीचर (जो अब अच्छे दोस्त भी हैं) ने एक बार कहा था मुझसे, एवरी रिलेशनशिप कम्स विथ एन एक्सपायरी डेट। मुमकिन है कि हर रिश्ता अपनी मियाद लिखवाकर आता हो। दुनिया की तमाम उलझनों और इतने सारे कामों के बीच कहां याद रहता है कि किस रिश्ते को कहां कहां कैसे इलाज की ज़रूरत है, कौन-से रिश्ते की डायगनॉसिस गलत हो गई, किसे अब ऑक्सीजन सिलेंडर की ज़रूरत है और कौन-सा रिश्ता वेंटिलेटर पर है अभी।

ज़्यादातर रिश्ते यूं भी मतलब के होते हैं। मेरा वक्त नहीं कटता, इसलिए अपनी खलिश भरने के लिए मैंने तुम्हें फोन लगा लिया; मेरे पास करने को कुछ नहीं था, इसलिए मैंने तुम्हें ई-मेल भेज दिया, तुमसे चैट कर लिया; मुझे बेवजह की रुलाई आ रही थी, इसलिए मैंने तुमसे तुम्हारी एक शाम उधार मांग ली; मैं लिखती हूं और तुम्हारे फेसबुक फ्रेंडलिस्ट में मैंने कई और अपने जैसे लिखनेवालों को देखा है, इसलिए मैंने दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया... हर दोस्ती के पीछे कोई मतलब, हर रिश्ते का कोई मानी।

ऑल बट वन। हर रिश्ते का, लेकिन एक को छोड़कर।

मैं तुम्हारे पास क्यों आती हूं, नहीं जानती। लेकिन एक ऐसी क्रेविंग-सी होती है कि जिसमें तुम्हें जोर से गले लगा लेने के अलावा कुछ नहीं सूझता। तुम्हारे और मेरे बीच का फ़ासला ठीक-ठाक बड़ा है, उम्र के लिहाज़ से भी और मीलों की दृष्टि से भी। लेकिन तुम्हारी शक्ल में अपना चेहरा दिखता है - कुछ सालों बाद वाला। तुम्हारी ओर चलते हुए मीलों का जो फ़ासला घटता है,  वो अंदर किसी खाई को भर रहा होता है। जाने मैंने तुम्हें कभी बताया है या नहीं, बट इट इज़ थेरेपियॉटिक - तुम तक सिर्फ चल कर जाना, अपने फोन की स्क्रीन पर तुम्हारा नाम चमकते हुए देख लेना, तुम्हारी आवाज़ में 'हां जानू' सुन लेना...

कई ज़ख़्म ऐसे होते हैं जिनके भरने का कोई रास्ता नहीं होता। हम अपने-अपने हिस्सों की तकलीफ़ें लेकर पैदा हुए हैं। हम सब नक्कारखाने में पड़े हुए अपने-अपने राग अलापते बेसुरे लोग हैं, जिन्हें अपनी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी उपलब्धि इन्हीं दर्द के तिनकों-तिनकों से बनाया गया भानुमति का वो कुनबा लगता है जहां कोई किसी का नहीं। हम अपने-अपने ज्ञान, अपने-अपने अहं के तले दबे नाकारा लोग हैं जो अपने बगलवाले की भी बात सुनने को तैयार नहीँ। इतना शोर है अपने भीतर कि दूसरों की कौन सुने? इसी शोर से घबराकर मैं चली आती हूं तुम्हारे पास।

तुम्हारे पास आकर सब ठहर जाता है। ज़िन्दगी की हर मुश्किल आसान लगने लगती है। अपने औरत होने पर गुमान होने लगता है। मां होने की ज़िम्मेदारियां दिखने लगती हैं। बचपन में घुट्टी में घोलकर पिलाए गए नैतिक मूल्यों पर सवाल उठाने की हिम्मत जगती है। तुम्हारे साथ होती हूं तो लगता है कि अपने आस-पास की दुनिया को जीने लायक बनाया जा सकता है, क्योंकि ये दारोमदार हमीं पर तो है। तुम्हारे पास होती हूं तो लगता है कि जो नहीं है, उसका मलाल क्यों हो और जो है, सब बोनस है कि ज़िन्दगी अपनेआप में बड़ी नेमत है। तुम्हारे पास होती हूं तो याद रहता है कि अपनी ज़िन्दगी के सही-गलत फ़ैसलों को सिर उठाकर हिम्मत के साथ कैसे जिया जाता है, और ये भी याद रहता है कि उन फ़ैसलों को भी ग्रेसफुली कैसे जीना है जो हमपर थोप दिए जाते हैं।

ज़िन्दगी में मेरा भरोसा बचाए रखना दोस्त, पिछले कई सालों की तरह। ज़ख़्म भर ही जाएंगे, और फिर कुरेदे जाएंगे। हाय ज़िन्दगी, वाई ज़िन्दगी का रोना कभी बंद नहीं होगा। हर बार हर मोड़ पर एक नए इम्तिहान की तरह मिलेगी ज़िन्दगी। उसमें भी तुम्हारी वजह से बच गई नज़र और नुक़्ता-ए-नज़र यूं ही बची रहे तो मैं भी बच जाऊंगी।

और चूंकि तुम्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं कैसा लिखती हूं और एक दिन कैसी फिल्में बनाऊंगी, कैसी किताबें और टीवी प्रोग्राम्स लिखूंगी और कितने पैसे कमाऊंगी, इसलिए मुझे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। चूंकि तुम्हें इससे फर्क पड़ता है कि मैं ज़िन्दगी कैसे जीऊंगी, अपने बच्चों को क्या देकर जाऊंगी और अपने परिवार को कैसे बचाऊंगी, इसलिए मुझे भी बस इसी बात से फर्क पड़ता है।

मुझे तुम्हारे सामने बैठकर हंसने और रोने से, तुम्हारे परिवार के लिए बेसन का हलवा बनाने से और तुम्हारे बिस्तर पर बेफिक्री से सो जाने से फर्क पड़ता है। मुझे तुम्हारे घर के सामने ईंटों से अपना घर बनाते, सूखे फूल-पत्तियां चुनते, क्रेयॉन्स के लिए लड़ते बच्चों की आवाज़ों से फर्क पड़ता है। मुझे तुम्हारे होने से फर्क पड़ता है।

मुझे तुम्हारे गले लगा लेने से फर्क पड़ता है, नताशा।

झाड़ू की सींक
और ऊन की कतरनों
बच्चों की फ्रॉक की फ्रिल से
निकालकर रखे गए
रेशमी धागों
गरारे के गोटों से
हम बनाएंगे
गुड़िया

एक गुड्डा भी
रूमाल की धोती
पहन लेगा

बची-खुची ईटों
और सूखे हुए पत्तों से
दोनों के लिए
बनाएंगे आठ कमरों
वाली मड़ैईया
लगाएंगे चांदनी,
चुनेंगे हरसिंगार
खाएंगे वो अंजीर
जिनके पत्तों पर
कल देखी थी
बैठी हुई एक इल्ली

गुड़िया गुड्डा ले जाएगी
इल्ली तितली बन जाएगी
वक़्त खाली हो जाएगा
घर मिट्टी मिल जाएगा

जो बाकी रह जाएगा
एक फ़ितना-सा दिल मेरा होगा
एक इतना-सा दिल तेरा होगा।

(नताशा का ब्लॉग है http://www.mydaughtersmum.blogspot.in/, और उसे मैं ब्लॉगिंग की वजह से नहीं जानती। मैं तो जानती भी नहीं कि मैं उसे कैसे जानती हूं? की फरक पैंदा है यार!)

11 comments:

PD said...

शुर्किया अनु जी, क्योंकि हमारी दोस्ती अथवा जान पहचान का कोई वाजिब वजह नहीं है और ना ही कोई स्वार्थ.

रश्मि प्रभा... said...

सरल बिंदास अभिव्यक्ति

Mukesh Kumar Sinha said...

dil se nikli hui awaaj:) ek dum perfect .. bindaas:)
kuchh lines copy kar ke maine fb status banaya hai:)

प्रवीण पाण्डेय said...

गहरी बातें की हैं संबंधों के बारे में..सुन्दर आलेख..

Maheshwari kaneri said...

प्यारी सी दोस्ती पर सुन्दर आलेख..

monali said...

Apni apni si.. :)

Ramakant Singh said...

रिश्ते कभी मरते नहीं हम उन्हें जीना जानते कहाँ हैं ?

राजेश सिंह said...

फर्क तो पड़ता ही अनु जी. नहीं तो ये नहीं भी लिखती तो क्या फर्क पड़ता

अनूप शुक्ल said...

बहुत प्यारी पोस्ट!

Natasha said...

इतना रुलाया तुमने, मेरी voice break कर गयी... YOU are such a brave and powerful woman, Anu Singh.

Pooja Sharma Rao said...

this is so beautiful !!