Tuesday, September 20, 2011

जब नींद फ़ाख़्ता बन जाए

मुझे हैरत होती थी जब लोग नींद ना आने के बारे में बात किया करते थे। ऐसा कैसे हो सकता है? मैं तो कहीं भी, चौबीसों घंटे में किसी वक़्त, कई बार खुली आंखों के साथ भी सो सकती थी। योग के बाद शवासन में सो सकती थी, चलती गाड़ी में, ट्रेन में, यहां तक कि प्लेन में भी टेढ़ी पीठ के साथ सो लेना शगल था मेरा। इम्तिहानों के वक़्त पूरा हॉस्टल चाय और कॉफी के फ्लास्क के साथ रातें गुलज़ार करता, पूरे कॉरि़डोर में एक मेरे कमरे की बत्तियां बुझीं होती। लोग भाई-बहनों की शादियों में रात-रात भर नाचा करते, मैं नींद पूरी करने के लिए एक कोना तलाश रही होता। ग्यारह बजे के बाद आंखें खोलना नामुमकिन। रात की एडिट्स हों या देर रात की पार्टियां, मुझे अपनी नींद से कहीं कोई समझौता मंज़ूर नहीं था।

फिर ये क्या हो गया? सबसे पहले टीवी चैनल की नौकरी के सिर दोष मढ़ने का मन करता है। हर शुक्रवार का रॉस्टर हमारे लिए एक नया टाईमटेबल लेकर आया करता। फिर सोने, खाने, घर के बाकी काम निपटाने, यहां तक कि फोन पर बात करने और दोस्तों से मिलने के वक़्त हफ़्ता-दर-हफ़्ता बदल जाया करते। चार शिफ्टों के बीच में नींद और सेहत का ऐसा मटियामेट हुआ कि आज भी उससे उबरना मुश्किल है। लेकिन नींद तब भी आ ही जाया करती थी। कई बार ऑफिस के ड्राईवर को उठाना पड़ता, 'मैम, आपका घर आ गया है। घर जाकर आराम से सोएं।' नींद पूरी करने में तब भी कोई कोताही नहीं बरती जाती।

बच्चों ने नींद का बड़ा हिस्सा अपने हक़ में कर लिया। महीनों-महीनों हमने जुड़वां बच्चों को फीड करते और नैपी बदलते अपने नींद को तिलांजलि दी। मेरे इस रोमांच में कभी मेरी मां शामिल होतीं, कभी सासू मां। कई बार ये भी होता कि एक रोते बच्चे को गोद में और दूसरे को कंधे पर लिए मैं सोचती रहती कि जिसे चैन की नींद मयस्सर है, उसका हक़ मारूं या छोड़ दूं। ये ऊहापोह पांच मिनट की ही होती। मेरा काम रोते-चीखते बच्चे आसान कर दिया करते थे। 

फिर बच्चे बड़े होने लगे और काम का जुनून बढ़ता गया। दिन छोटे हो पड़ते तो रातों का सहारा लिया जाता। रात को ही स्क्रिप्ट्स लिखे जाने लगे, रिसर्च भी देर रात होने लगा। अपनी पसंद की किताब पढ़ना शुरू करने के लिए भी इकलौता मुहूर्त यही होता था। अब कोई उलझन नहीं है। नींद ना आने की कोई वजह भी नहीं। ना दिन छोटा पड़ता है ना रातें भारी होती हैं। लेकिन नींद को जैसे पर लग गए हैं। प्रवासी पक्षी हो गई है। मौसम बदला नहीं कि दूर देश की उड़ान भरने को तैयार। 

अब फ़ाख़्ता बनी नींद की शिकायत या तो गूगल से की जाए और सच्चे-झूठे हलों को सीने से लगाए खुद को बेजां बीमारियों का शिकार बताया जाए या फिर आज सूरज को निकलते देखा जाए। नींद ना आने की हालत में नए फ़साने लिखे जाएं, कुछ गीत रचे जाएं और खुली आंखों से सपने देखे जाएं। ये भी ना हो तो नींद से कहा जाए - 

कोई शिकवा नहीं
जो तू घर नहीं लौटना चाहती आज की रात/
तुझे कभी तो अपनी आंखों की याद सताएगी/
तू कभी तो उड़ते-उड़ते थक जाएगी/
तू कभी तो अपने दर लौटकर आएगी।


3 comments:

Arvind Mishra said...

नीद क्यूं रात भर नहीं आती ?
ग़ालिब के बाद फिर वही सवाल? और यह एक शाश्वत प्रश्न है !
आपने नीद को फाख्ता की उपमा देकर एक बड़ी खूबसूरत बात की है और आख़िरी लाईनें
तो बस कुछ न पूछिए ..बहुत प्यारी हैं ...बहुत पोएटिक हैं ...
सोम ठाकुर ने नींद की तुलना मछली से कर दी ...
मन कस्तूरी हिरन हो गया रेत पडी मछली निदिया....
मनमोहन ने राधा के जबसे नैन बड़ेरे देखे हैं...
तो नींद का कुछ ऐसे ही फ़साना है ...यह एक योगदान आपका भी जुड़ा अब इस नीद -क्लासिकी में :)
मुझे तो अब अपनी फिकर हो चली है !:)

Kishore Choudhary said...

ऐसा क्यों होता है ?
मगर नींद के फाख्ता हो जाने से ही ऐसी सुंदर कविता कही जाती है.

कोई शिकवा नहीं
जो तू घर नहीं लौटना चाहती आज की रात
तुझे कभी तो अपनी आंखों की याद सताएगी
तू कभी तो उड़ते-उड़ते थक जाएगी
तू कभी तो अपने दर लौटकर आएगी।

वन्दना said...

वाह बहुत खूब अन्दाज़्।