Friday, September 9, 2011

माया एंजेलो और तन्हाई

प्यास से होंठ सूख रहे हैं और मैं पसीने से तर-ब-तर उठी हूं। बच्चों के बीच में सोना वैसे भी महीनों से नींद पूरी ना हो पाने का सबब है। फिक्र ये रहती है कि कहीं दोनों में से कोई बिस्तर से नीचे ना जा गिरे! सो मैं पूरी रात कभी इसे, कभी उसे अपनी तरफ खींचने के लिए कई-कई बार नींद में भी जागी रहती हूं।

लेकिन आज जाने क्या हो गया है? आद्या किनारे चली गई है एकदम, और उसके घुंघराले बाल साइड डेबल पर बिखरे हुए हैं। एक पांव बिस्तर से नीचे, और वो बेसुध सो रही है। हे भगवान! अभी प्यास ना लगती तो नीचे गिरा होता ये बच्चा। फिर दिनभर के लिए गिल्ट पाल लेने की एक और वजह। मैंने आद्या को अपनी ओर खींचा है और मोबाईल फोन ढूंढती हूं। समय देखने के लिए। कौन मुरादोंवाला मुझे इतनी सुबह याद करेगा? 4.50। मेरे फोन की घड़ी से बच्चों ने छेड़छाड़ की है शायद। वरना इतनी सुबह ऐसी रौशनी कहां हरे पर्दों से छनकर कमरे में आती है? मैं किसी तरह गुलाबी चादर से बाहर निकली हूं। याद आया कि तेज़ बुखार के साथ सोयी थी। शायद बुखार उतरा है - पसीना और प्यास इसी की निशानी है।

कमरे से बाहर निकल आयी हूं। बाहर बालकनी का दरवाज़ा खुला है। बच्चों के कमरे में सोनी फर्श पर ही सो रही है। निहायत आलसी है ये औरत, अपना बिस्तर डाले बिना ही सोती रही है रातभर, मुझे झल्लाहट हुई है। बाहर दीवार घड़ी पर भी 4.52। ओफ्फोह, अब इसकी भी बैट्री बदलनी पड़ेगी। सोनी को उठाऊं कि पानी पीऊं पहले, इस ऊहापोह में मैं किचन तक जा पहुंची हूं। दिमाग सुबह की सारी तैयारी करने लगा है - बच्चों के स्कूल ड्रेस, जूते, आई-कार्ड बाहर निकालने हैं, फ्रिज से दूध बाहर करना है, गीज़र ऑन करना है, और छाता कहां है? कितनी बारिश हुई है कल!

पानी पीने के बाद होश आया है, शाम हुई है अभी तो। हम तो आधे घंटे पहले ही सोए थे। बच्चे स्कूल से ही साढ़े तीन बजे आए हैं आज! थर्मामीटर कहां है? तेज़ बुखार की ख़ुमारी अक्सर ऐसी हालत कर देती है मेरी। दिमाग तुरंत शाम की तैयारी के मोड में आ जाता है - पार्क नहीं जा सकते बारिश में, तो क्या-क्या हो सकता है घर में जिससे उनका समय भी कटे और मेरा भी। मैंने किताबों की अलमारी से सारी ड्राईंग बुक्स बाहर कर दी हैं, वाटर कलर्स बाहर हो गए हैं, क्रेयॉन्स भी, रंग-बिरंगी पेंसिलें भी। सोनी को उठाया है और वापस अपने कमरे में आ गई हूं।

शाम बहुत उदासी लेकर आती है कई बार। मेहंदी का उतरता रंग, गहरा होता दिन, पहाड़ों से उतरती धूप, खत्म होती नज़्म, खाली होता कॉफी का प्याला, तेज़ी से कम होती छुट्टियां, मंज़िल की तरफ पहुंचती रेल और सोते हुए बच्चों के घर की दीवारों-दरवाज़ों पर पसरा सन्नाटा मुझे बुरी तरह परेशान कर देता है। इस परेशानी में सुकून के लिए मैं माया एंजेलो की शरण में जाती हूं। कोई एक पन्ना खुला है और उछल आई है ये कविता -

Now if you listen closely
I'll tell you what I know
Storm clouds are gathering
The wind is gonna blow
The race of man is suffering
And I can hear the moan,
'Cause nobody,
But nobody
Can make it out here alone.

Alone, all alone
Nobody, but nobody
Can make it out here alone.


अगर ध्यान से सुनो तो
बताती हूं जो मैं जानती हूं
आंधियों से भरे बादल जमा होने लगे हैं
तेज़ हवा आने को है
इंसान कष्ट में है
और मैं उसकी कराह सुन सकती हूं
क्योंकि कोई नहीं,
कोई भी नहीं
तन्हां वक्त गुज़ार सकता है यहां।


तन्हां बिल्कुल तन्हां
कोई नहीं, कोई भी नहीं
तन्हां वक्त गुज़ार सकता है यहां।

5 comments:

Arvind Mishra said...

कविता अकलेपन के अहसास की कविता है

Kishore Choudhary said...

गहरा होता दिन, पहाड़ों से उतरती धूप, खत्म होती नज़्म, खाली होता कॉफी का प्याला... तन्हां, बिल्कुल तन्हां कोई नहीं, कोई भी नहीं आ सकता इस अकेलेपन से बाहर. बहुत सुंदर पोस्ट है. एक बेहतरीन वेबलोग !

Kailash C Sharma said...

अकेलेपन के दर्द को उकेरती बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति...

सतीश पंचम said...

मस्त लिखा है।

Gyandutt Pandey said...

ऐसा ही कुछ अनुभव कर उठा हूं मैं! सो जाना पहचाना भाव लगता है।