Saturday, August 27, 2011

चिट्ठी लिखेंगे, जवाब आएगा!

टीवी पर अभी-अभी लोकपाल पर अन्ना की तीन मांगों को पूरा करने में जुटी सरकार की कोशिशों की खबर देखी है। अनशन खत्म होगा, रामलीला मैदान की लीलाएं अब दोनों सदनों में दिखाई देंगी। पीएम की चिट्ठी और अन्ना की जवाब में लिखी चिट्ठी ना सिर्फ ऐतिहासिक हो गई है बल्कि पत्रों के इस आदान-प्रदान ने ई-मेल और एसएमएस के ज़माने में चिट्ठी को एक बार फिर उसकी खोई हुई इज़्जत लौटा दी है। वरना आजकल चिट्ठियां कौन दीवाना लिखता है?
 
फ्लैशबैक में जाने लगी हूं फिर से। क्लास खत्म हुई है अभी-अभी। कॉलेज के कॉरीडोर से चलकर हॉस्टल के कॉरीडोर तक आने में ढाई मिनट लगते हैं। लेडी श्रीराम कॉलेज के खंभों और लाल दीवारों के बीच से होकर गुज़रती हसीन टोलियों में से डे-स्कॉलर्स और हॉस्टलर्स को अलग-अलग पहचानना बहुत आसान है। डे-स्कीज़ नए फैशन के साथ कदमताल करती हैं - बेफिक्री से पेंसिल की मदद से बांधा हुआ जूड़ा, वेजीटेबल डाई वाली शर्ट और नीली जीन्स, गहरी काली आंखें और कानों से लटकर गर्दन से अठखेलियां करती सिलवर ईयररिंग्स, एलएसआर में फैशन इसे ही कहते हैं। हॉस्टलर्स की चप्पलें देखकर आप उन्हें पहचान सकते हैं, स्कर्ट की साइज़ अभी फैशन के मुताबिक दुरुस्त नहीं हुई, फैबइंडिया का चस्का नहीं लगा, जनपथ से फ्लिप-फ्लॉप्स खरीदे नहीं गए।

लेकिन फैशन से बेपरवाह हम हॉस्टलर्स किसी और फिक्र में हैं। डाकिया दुपहर को आया करता है अक्सर। लंचटाईम के आस-पास। हॉस्टल के बाहर पहले उसकी साइकिल देख लेते हैं। फिर पोस्टल कमिटी के किसी मेंबर को ढूंढते हैं (पोस्टल कमिटी का काम सबके कमरों में जाकर चिट्ठियां डाल आना है। हॉस्टल में तीन सौ लड़कियां हैं!) एनीथिंग फॉर मी?’ बड़ी उम्मीद से ये सवाल पूछा जाता है मेस में। पोस्टल कमिटी के सदस्य कई बार चिट्ठियां लिए-लिए ही मेस में खाना खाने आ जाया करते हैं। जवाब हैवन्ट सीन येट होता है अक्सर – हां भी नहीं, ना भी नहीं। 

खाना किसी तरह गले से उतारकर कमरे की तरफ दौड़ पड़ते हैं हम। धड़कते दिल से कमरे का दरवाज़ा खोला जाता है। दरवाज़े के नीचे से लिफाफे झांकते हों तो दुपहर की क्लास गोल करके कभी लॉन में, कभी लाइब्रेरी में, कभी कैफ़े के किसी बेंच पर अगले दो घंटे गुज़र जाया करते हैं – चिट्ठी पढ़ते हुए। लिफाफे ना हों तो हम अक्सर क्लास वापस लौट जाया करते हैं, उनसे रश्क करते हुए जिन्हें चिट्ठियों का सुख मिला है आज।

ये चिट्ठियां घर से आती हैं, ननिहाल से आती हैं, यार-दोस्तों के पास से आती हैं, पेन-फ्रेन्ड्स के पास से आती हैं। इनमें कभी जैसलमेर की रेत होती है, कभी कुपवाड़ा की ठंड होती है, कभी मम्मी के हाथ के खाने का स्वाद होता है कभी पापा की तल्ख़ नसीहतें होती हैं। पंद्रह किलोमीटर दूर नॉर्थ कैंपस में बैठी सहेली के दिल का हाल होता है, पटना के डेंटल कॉलेज में आनेवाले मरीजों की दांतों का दर्द होता है। इनमें प्यार होता है, मनुहार होता है, गीत होते हैं, कविताएं होती हैं, नानी की मन्नतें होती हैं, बाबा का लाड़ होता है।

चिट्ठियां मैं भी खूब लिखती हूं। ज़िन्दगी के कई अहम फैसले चिट्ठियां लिखते हुए किए हैं मैंने। अंग्रेज़ी चिट्ठियों से सीखी है, ग्रामर चिट्ठियों से पुख्ता बनाया है। ब्यूरो की अंग्रेज़ी स्पेलिंग इसलिए गलत नहीं होती क्योंकि मामाजी ने अपनी चिट्ठी में पांच जगह अंडरलाईन करके भेजा था। पीरू की राजधानी लीमा है, चिट्ठी से जाना था। पूरे पूरे tense की पढ़ाई मैंने चिट्ठियों में की है।

चिट्ठियों से ऐसा प्यार है कि जब चित्रहार में पहली बार शक्ति फिल्म का गाना देखा था तो सोचती रही थी कि कैसा लगा होगा उस महबूबा को जब डाकिए ने उसका लिखा ख़त वापस लौटा दिया होगा और कहा होगा, इस डाकखाने में नहीं/सारे ज़माने में नहीं/कोई सनम इस नाम का/कोई गली इस नाम की/कोई शहर इस नाम का। ये गीत मुझे अब भी परेशान करता है। और उतनी ही खुशी गुलज़ार-किशोर-राजेश खन्ना के डाकिया बन जाने पर होती है। पलकों की छांव में के डाकिए रवि पर मोहिनी को देखकर क्या गुज़रती होगी, अब भी सोचती हूं। और मन परेशान हो जाता है जब आशा की भींगी हुई आवाज़ आज भी गाड़ी के स्टीरियो में गूंजती है। ख़त लिखकर सामान लौटा देने की बात करते हुए, ख़तों के साथ उनमें लिपटी रातें वापस मांगते हुए किस माया का दिल ना रोया होगा! और पन्ना की आंखें देखी हैं हू तू तू में जब वो आदित्य को अपनी लिखी हुई ख्वाहिशों की चिट्ठियां पढ़ने के लिए चश्मे लगाने की ताक़ीद देती है? ख़त इतनी आसानी से थोड़े ना पढ़ लिए जाते हैं?

कई और चिट्ठियां याद आ रही हैं जो टुकड़ों-टुकड़ों में पढ़ी – नेहरू की इंदु को, अमृता की साहिर को, धर्मवीर भारती की पुष्पा को, बापू की टैगोर को, मेरी वर्ड्सवर्थ की विलियम वर्ड्सवर्थ को... कई याद रहीं, कई भूल गईं। लेकिन जो याद है, उन सब लोगों की हैंडराइटिंग है जो मुझे चिट्ठियां लिखा करते थे। किसको पायलट पेन से लिखना पसंद था, कौन सिर्फ लाल कलम से चिट्ठियां लिखा करता था, किसके लेटरहेड पर आती थीं चिट्ठियां, कौन अंतर्देशीय भेजता था, अब भी नहीं भूली।

अब चिट्ठियां नहीं लिखती, चिट्ठे लिखती हूं। और इस चिट्ठे के साथ स्मिता पाटिल की सांवली मुस्कुराहट, आरडी बर्मन का संगीत और लता मंगेशकर की आवाज़ में आनंद बख्शी की लिखी ग़ज़ल बांटने से खुद को रोक नहीं पाई हूं।    

http://www.youtube.com/watch?v=vUaLOTcyL3U&feature=related

7 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

रोचक वर्णन चिट्ठियों का ... आज कल चिट्ठों का ही ज़माना रह गया है ..

rajiv said...

Kya khoob..Mujhe to apne hostel ke din yaad agaye. Tarah-tarah ke letters lekin ek hasrat poori nahi hui-love letters ki :-)...na kisi ne mujhe likha na mai likhne ki himmat ker saka..e-mail aur SMS ka jamana hota to shayad ker pata..hahaha.

सतीश पंचम said...

मुझे तो याद भी नहीं कि पिछली बार कब किसी को चिट्ठी लिखी थी। मैं ही क्यों, बहुतों को संभवत: अब याद न हो कि उन्होंने कब और किसे लिखी थी।

चिट्ठीयों को लेकर बढ़िया संस्मरण।

Kishore Choudhary said...

अब तक पढ़ी गई सबसे अच्छी पोस्ट्स में से एक... इसमें खुशबू है, प्रतीक्षा है, सुख है, उम्मीद है... ज़िन्दगी के सारे रंग है. कैसे प्रशंसा करूं ?
बस एक ख़याल आता है कि दिल न हो बात कहने का तो चिट्ठी लिखना दुष्कर होता है. बस प्रेम के सेतु ही पार करती करती है चिट्ठी... फिर से बहुत सी बधाई !

Rahul Singh said...

चिट्ठी सा चिट्ठा.

Arvind Mishra said...

हम आपकी ये चिट्ठेनुमा चिट्ठियाँ ही ध्यान से पढ़ते जा रहे हैं -और हाँ ब्यूरो की स्पेलिंग मैंने भी जिह्वाग्र कर रखी है ..बतायें क्या?

Manish Kumar said...

अच्छा लगा चिट्ठियों के बारे में आपके संस्मरण को पढ़ना। बहुत सी बातें याद आ गयीं गुजरे ज़माने की।