Friday, August 12, 2011

आजा नच लें (भाग 2)

दूसरा दिन। मां वक्त से पहले ही पहुंच गई है और नोटबुक-कलम निकाल कर तैयार है। मां भी कितनी बेवकूफ है! नाच सीखना है, नाच। नाच नोटबुक में कलम से लिखकर नहीं सीखा जाता है? फिर कैसे सीखा जाता है, मां ने गुरुजी से पूछ लिया है। "पहले ही दिन में सब सीख लेंगी आप?" गुरुजी ने हंसते हुए पूछा है। मां झेंप गई है।

 'कथक किसे कहते हैं?' गुरुजी का पहला सवाल है।

मां हिंदुस्तानी नाच, कथा वाचन, कथ-क और दरबारी नाच जैसे शब्दों से भरकर एक टूटा-फूटा वाक्य कहती है।

'दरबारी है तो इसे शास्त्रीय नृत्य क्यों कहा गया?'

'......,'

मां चुप हो जाती है और विकीपिडिया से आए अपने अधजल गगरीनुमा ज्ञान पर शर्मिंदा है।

'अगर आप सब जानतीं तो मेरे पास क्यों आतीं? सीखने आईं हैं ना, तो कह डालिए कि नहीं आता, नहीं समझती, नहीं  जानती। इससे आपका ही विस्तार होगा, क्योंकि फिर सीखना कारगर होगा। मैं कथक की कोई परिभाषा नहीं लिखा रहा। अगले कुछ महीनों में आप अपनी परिभाषा खुद बनाएंगी। लेकिन फिलहाल, कथक का क, ख, ग सीखिए, ताकि सही परिभाषा गढ़ी जा सके।'

मां का पाठ शुरू हो जाता है - कथक के मूल बोलों 'तत्कार' को ठ, दुगुन, चौगुन और सोलह गुन क्रम लय में ताल देते हुए गुरुजी पहले बोलों को सही लय में - सही बीट के साथ - पढ़ना सीखाते हैं। फिर पहले नाच की बारी आती है। सकुचाती हुई मां गले से फिसलते शिफॉन के दुपट्टे को संभालती खड़ी हो जाती है। खड़े होने पर अचानक awkward शब्द का एकदम सही-सही मायने समझ में आता है। गुरुजी मेरे बगल में भूमि प्रणाम करके दिखाते हैं। मां अचानक सहम जाती है, ये मुझसे नहीं होगा, मेरा शरीर तो इतना लचीला है ही नहीं।

गुरुजी के साथ भूमि प्रणाम सीखने की प्रक्रिया शुरू होती है - दोनों हाथ 'उत्पत्ति' मुद्रा में, हाथों का खुलना, आंखों का हाथों के साथ उसी दिशा में जाना जहां हाथ जा रहे हों, पैरों की लय, झुककर पैरों पर बैठना, पुष्पक, पुष्पक खोलते हुए उठना और वापस उत्पत्ति पर। फॉर्मूला आसान-सा है, लेकिन ग्यारह कोशिशों में एक बार भी मां सही नहीं कर पा रही। गुरुजी बार-बार करवाते हैं, पैर जवाब देने लगे हैं, डिस्क विद्रोह करने को तैयार है। लेकिन गुरुजी हार नहीं मानते। मां का मन भी हार मानने से रोकता है। उसके बाद कई कोशिशों के बाद मुझे गुरुजी अपनी बहू के साथ भीतर भेज देते हैं। वो मुझे एक-एक स्टेप करवाकर समझाती हैं, सीधे खड़ा होना, हाथों का खुलना, पैरों पर बैठना - दो कोशिश में ही मुझमें अचानक सुधार आया है। लेकिन पैरों की हालत खराब है। क्लास खत्म हो गई है और मुझे लगने लगा है कि गुरुजी हाथ खड़े कर देंगे। पत्थरों ने किसी फिल्म में गीत तो गाया है, लेकिन पत्थर को नाच सीखाना आसान है क्या?

2 comments:

Arvind Mishra said...

पत्थर को तराशने के लिए कारीगर तो आ गया है ...प्राण प्रतिष्ठा भी हो जायेगी !

Manoj K said...

ज़रूर, पत्थर जब बोलते हैं तो लय में भी आ ही जायेंगे.
अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा !