Thursday, August 25, 2011

उम्मीद होगी कोई...

मेट्रो स्टेशन से उतरकर पैदल डांस क्लास के लिए जा रही हूं। सामने से अमरूदों से भरी एक रेहड़ी चली आ रही है। हेड-ऑन कॉलिज़न होने ही वाला है, कि मैं किनारे हट जाती हूं। घबराहट में नज़रें रेहड़ीवाले की तरफ चली जाती हैं, इसलिए नहीं कि टकराने से बच गई। इसलिए क्योंकि ना चाहते हुए भी उसके चेहरे से कुछ ऐसा टपक रहा है जिसको ही 'उम्मीद' कहते होंगे शायद। सुबह-सुबह वो रेहड़ी लेकर निकला ही होगा और किसी ग्राहक की उम्मीद में मेरे सामने से गुज़रा होगा, मुझसे अमरूद खरीदने की उम्मीद की होगी।

सवाल ये नहीं कि मैंने उसकी वो उम्मीद पूरी की या नहीं। सवाल है कि 'उम्मीद' को ज़िन्दगी से काटकर कैसे फेंक दिया जाए?

तीन दिन पहले की बात है। मैं एक करीबी दोस्त के साथ बैठी हूं। कुछ कहा नहीं जा रहा उससे, या कह भी रही होऊंगी तो रूंधे हुए गले से निकलनेवाली मेरी बातों का ओर-छोर ना उसे मिल रहा होगा, ना मुझे मिल रहा है। मैं बार-बार एक ही बात दुहराए जा रही हूं - "मेरी उम्मीदों को ठेस पहुंची है"। फिर मन-ही-मन सोचती हूं, उम्मीदों को भी, और अपेक्षाओं को भी। फादर ऑस ने भी बात-बात में सबसे कहा है, "लोअर योर एक्सपेक्टेशन्स। अपनी अपेक्षाओं को कम कर लो, तकलीफ़ नही होगी - रिश्तों में नहीं, ज़िन्दगी में भी नहीं।"

लेकिन ये मुमकिन तो लगता नहीं। सोचती हूं, उम्मीद और अपेक्षा में कितना फर्क है? आशा और प्रत्याशा में? क्यों उम्मीद को सही मान लिया जाता है और अपेक्षा के साथ एक नकारात्मक ख्याल जोड़ दिया जाता है? अपेक्षा करना भी तो कहीं-ना-कहीं उम्मीद करने का ही एक हिस्सा होता है। क्या हम खुद से, अपनी ज़िन्दगी से अपेक्षाएं नहीं रखते? उस रेहड़ीवाले ने उम्मीद की कि कोई ग्राहक सुबह-सुबह उसके अमरूद खरीदेगा। उसने मुझसे अपेक्षा की होगी कि मैं रुककर कम-से-कम मोल-भाव तो करूंगी।

अपेक्षा उम्मीद का अगला रूप नहीं होता? अपेक्षा उम्मीद का एक्सटेंशन नहीं है? तो फिर रिश्तों में या वैसे ही अपेक्षाएं रखने से क्यों मना किया जाता है बार-बार? आखिर उम्मीद के दम पर ही तो सब कायम है। और मीटर तो लगा नहीं होता भावनाओं में कि आज उम्मीद हो गई, कल पूरा का पूरा पैमाना भर लिया तो अपेक्षा की है मैंने किसी से कुछ की। अन्ना को अपने अनशन से और अन्ना के अनशन से हमें कुछ अपेक्षा है, हर भारत-पाक वार्ता से कुछ अपेक्षा होती है, सुबह घर से निकलो तो अपेक्षा करते हैं दिन के अच्छी तरह गुज़र जाने की, बच्चों से अपेक्षाएं होती हैं, बच्चों को बड़ों से होती है। बड़ों को इज़्जत पाने की अपेक्षा होती है, छोटों को प्यार पाने की। क्लास में कुछ सीखने की अपेक्षा होती है, दफ्तर में हर महीने खटकर महीने के आखिर में एकमुश्त आमदनी घर ले जाने की अपेक्षा होती है। यहां तक कि रास्ते में चलते हुए भी हम अपेक्षा रखते हैं  - किसी एक मुकम्मल जगह पहुंचने की अपेक्षा लिए ही तो घर से निकलते हैं हम। अब ऊपर 'अपेक्षा' की जगह 'उम्मीद' लिखें तो वाक्यों के अर्थ में कितना फर्क पड़ जाएगा? मेरे लिए अपेक्षा करना उम्मीद रखने का ही एक रूप है।

फिर उम्मीदों की गठरी कैसे कंधों से उतार दूं? कैसे उम्मीद ना रखूं उन लोगों से जिन्हें प्यार करती हूं? जब रेहड़ीवाला मुझ अनजान ग्राहक से उम्मीद कर सकता है तो यहां तो उन रिश्तों में उम्मीद रखने-खोने की बात है जो ताज़िन्दगी साथ चला करते हैं।

"रुकते नहीं हैं मेरे कदम, चलना इनकी तो फितरत है
रौशनी हो या कि ना भी हो, चाहे जैसी अपनी किस्मत है
हमने हाथों की लकीरों को अपनी ताकत से बदला है
हमने अपने हालातों को अपनी हिम्मत से बदला है
जो चलते रहने की आदत है ये कहीं से तो आई होगी
हमने घने अंधेरे में भी तो एक शम्मा जलाई होगी

उम्मीद ही होगी कोई जो हमने राहें नई निकाली हैं
उम्मीद ही होगी कोई जिससे किस्मत भी बदल जो डाली है
उम्मीद का दामन पकड़कर हम रिश्ते भी संभाले जाते हैं
उम्मीद ही होगी कोई जिससे रोते-रोते मुस्काते हैं

उम्मीद तो होगी कोई
उम्मीद ही होगी कोई"

(अजब को-इन्सिडेंस है कि ये मेरा सौवां पोस्ट है। उम्मीद ही रही होगी लगातार लिखते जाने की कि इस मुकाम तक पहुंचा है सफ़र।)

11 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आशा और प्रत्याशा की कश्मकश का गहन विश्लेषण ..अच्छी लगा विवेचन .. १०० वीं पोस्ट की बधाई .. और आगे निरंतर लिखने के लिए शुभकामनायें

Priyanka Kaw said...

उम्मीद से बरी है ज़न्दिगी, उपेक्षा करना उसकी फितरत है.
आशा और निराशा तो उतार-चदाव है, जो आते -जाते रहते है.
फिर बी ज़न्दिगी हमें हर मोड़े पे,हमारे दिल में आशा की नयी किरण को जाग्रुत करती रहते है.

दीदी. कितना अच्छा लिखा है..ई लिकड इट.
Priyanka Kaw

वन्दना said...

100 वीं पोस्ट की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।
बहुत सुन्दर ढंग से उम्मीद और अपेक्षा का अन्तर समझाया है।

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

Sarthak chintan....100 vi post ki shubhkamnayen.

Kishore Choudhary said...

बहुत सी पंक्तियाँ हैं जो भीगी हुई है, उनमें नमीं है आँखों की... उनके पास ठहरी हुई ख़ामोशी है. वे कह दिये जाने के बावजूद अपने भीतर की ओर सिमटी हुई हैं. पढ़ते हुए लगता है कि लिखते लिखते आप चुप हो गई हैं और फिर से लिखना शुरू कर दिया है. आप गुनगुना रही हैं तो मौसम की गंध बदल रही है. आपको पढ़ते हुए सोचता हूँ कि उम्मीद क्या होती है और क्यों होती है, अनुभूति की किस शाख़ पर खिलती है, वे शाख़ें किस जल से हरी रहती हैं ?

लगातार लिखने की उम्मीद... सौ बार अपने मन की तस्वीर को शब्दों में उकेरने का हासिल भी उम्मीद. वक़्त के लम्हे, ऊँची दीवार, अबूझ उड़ान, अनदेखी मंजिलें, बिना सोचा हुआ सामने का मंज़र... सब कुछ अनंत, असीम, अजेय और एक अनथक उम्मीद !!

Rahul Singh said...

शतक मुबारक.

Manoj K said...

उम्मीद और अपेक्षा.. ज़रूर आपस में गुथम-गुथा हैं,

सौवीं पोस्ट के लिए शुभकामनायें. यूहीं लिखती रहिये तथा औरों को इंस्पायर करते रहिये !!
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अशोक कुमार शुक्ला said...

तो यहां तो उन रत म उमीद रखने-खोने क बात है जो ताज़दगी साथ चला करते ह।
sahi kaha aapne isi ichacha ko kam karne ke liye hi hame aadyaatm ki sharan me jaana hota hai.
100 post ki badhai.
Ummeed karte hai 1000wi post padhane ko milegi.
Oh phir wahi ummid!...!..!.. Kya kare insaan majboor hai

Sunil Kumar said...

एक अलग सोंच सार्थक पोस्ट सौंवी पोस्ट की बहुत बहुत बधाई

Maheshwari kaneri said...

स्बसे पहले 100 वीं पोस्ट की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें। अनु जी...
आशा और निराशा है उम्मीद की बेटियाँ...उम्मीदो से ही आशा और निराशा की उत्पत्ति होती है...हम हमेशा उम्मीदो पर ही जीते है...सार्थक और विचारणीय पोस्ट....

अनुपमा त्रिपाठी... said...

अनु जी आपको इस सौ वीं पोस्ट के लिए बधाई ...माफ़ करें आपको पहले नहीं सूचित कर पाई आज २७-०८-११ शनिवार को .. आपकी ये पोस्ट नयी-पुरानी हलचल पर ली थी मैंने ..हो सके तो ज़रूर पधारें..