Sunday, July 24, 2011

घर किसको कहते हैं

घर
क्या होता है
घर
किसको कहते हैं
ईंट, गारे, पत्थर,
छत और दीवारें
या ज़मीन भरोसे की,
छत ख़्वाबों का?

घर
रिश्तों की बुनियाद
पर खड़ी एक इमारत
जिसकी दीवारों पर
बच्चों के सपने,
उनकी शरारतें,
खिलखिलाहटें चिपकाईं हैं।

बाबा की खांसी,
दादी की घंटी का स्वर,
नानी की साधना,
नाना के योग के
गूढ़ रहस्यों की
यादें सजाईं हैं।

घर
अपना हो कि ना हो
रोज़-रोज़ की उलझनें,
झगड़े,
प्यार-मोहब्बत,
भागमभाग तो अपनी हो।

घर
बड़ा हो कि ना हो
मेहमानों की कद्र,
आनेवालों का सम्मान
करनेवाला
एक दिल तो बड़ा हो।

घर,
मुझसे मेरा घर,
मेरी पहचान
मेरा वजूद
तो मत मांग लो।
दे ना सकूंगी
इतनी बड़ी कुर्बानी
घुमन्तू हूं
फिर भी घर
लौटकर आती हूं।

3 comments:

Kailash C Sharma said...

बहुत सार्थक और भावपूर्ण रचना..

Arvind Mishra said...
This comment has been removed by the author.
Arvind Mishra said...

घूमंतू का भी केंद्र कोई घर ही होता है -है न ? कितनी भावपूर्ण रचना !