Thursday, July 14, 2011

रोज़-रोज़ जीती मुंबई

मैं 1999 में पहली बार मुंबई गई थी। TISS का एन्ट्रेन्स था, और मैं चाचाजी के साथ कोलकाता से गई थी।  दादर प्लेटफॉर्म पर गीतांजली एक्सप्रेस रात के ग्यारह बजे पहुंची थी, लेकिन उस वक्त भी लोगों का हुजूम भागता-दौड़ता ट्रेन, टैक्सी, बस, ऑटो पकड़ने की जल्दी में था। दादर से निकलकर टिस के कैंपस तक पहुंचने में टैक्सी की खिड़की से मुंबई का जो नज़ारा देखने को मिला था, वो मेरी कल्पना और पर्दे पर नज़र आनेवाली मुंबई के आस-पास भी नहीं था।  हम दादर और चेंबूर (वो भी आर के स्टूडियो के सामने से) से होते हुए सायॉन-ट्राम्बे रोड पर मौजूद टिस के हरे-भरे कैंपस में पहुंचे थे। अबतक ना लोकल ट्रेनों से वास्ता पड़ा था, ना आसमान छूती अट्टालिकाओं से। बल्कि आधी रात को जागता-जगमाता शहर मन को भा ही गया था। बाकी टिस का कैंपस कुछ ऐसा था कि वहीं बस जाते तो ज़िन्दगी बन जाती। 

ख़ैर, मैं इंटरव्यू तक पहुंची और रिज़ल्ट घर भेज दिया जाना था। उस समय इंटरनेट का इतना प्रचलन नहीं था और फॉर्म, रिजल्ट और बाकी के सारे ज़रूरी काग़ज़ात डाक से ही आया करते थे। मुझे पूरा यकीन था कि मैं मुंबई लौटूंगी ज़रूर, लेकिन शायद चाचा को शक था। उन्होंने एक दिन में पूरा मुंबई दर्शन कराने की ठान ली। हम मरीन लाइन्स भी गए, जुहू भी, बैंड स्टैंड भी गए, सीएसटी स्टेशन भी देखा। हमने अमिताभ बच्चन का घर भी देखा और चांदीवल्ली स्टूडियो भी। कुल मिलाकर मुंबई मुझे जम गई थी। लेकिन किस्मत ऐसी कि टिस में दाखिला ना मिला, आईआईएमसी में मिल गया और मुझे वापस दिल्ली आना पड़ा।

अपने सपने की गठरी संभाले मैं एक बार फिर 2002 में मुंबई जा पहुंची। इस बार इरादा वहीं रह जाने का था। एम.ए. के नतीजे भी नहीं आए थे, लेकिन अरमानों को पंख लगने लगे थे।  लेखक, फिल्मकार और एडिटर बनने की ख्वाहिश थी, और ऐसे किसी सपने को मुकम्मल अंजाम तक पहुंचाने के लिए मुंबई में मेरे जैसे हज़ारों लोग हज़ारों हसरतें थैलियों में बांधे शहर की दहलीज़ पर हर रोज़ कदम रखते हैं। मैं दिल्ली से गई थी, वो भी दूसरी बार, सो तकनीकी तौर पर एकदम देहाती तो नहीं कही जाऊंगी, लेकिन इस बार मुंबई मुझे विशाल लगी थी। प्लेटफॉर्म पर अकेले उतरी थी और वो भी सुबह आठ बजे। लगा जैसे वापस ट्रेन में बैठकर दिल्ली चली जाऊं। पैरों के सुन्न पड़ जाने और पेट में मरोड़ उठने का वो अहसास मुझे आजतक नहीं भूला। दादर से चार बंगला जाना था, अंधेरी, जहां एक दोस्त के साथ पेइंग गेस्ट बनकर रहना था। भीड़ जैसा शब्द लोकल ट्रेनों और स्टेशन की भीड़ को सही तरह बयां नहीं कर पाता, बदहवास भीड़ शायद कर पाए।

किस्मत ऐसी रही कि मुझे मायानगरी में काम या घर ढूंढने के लिए बड़ी कम मेहनत करनी पड़ी। दोस्त भी बड़ी तेज़ी से बने, और मुझे वो शहर रास आ गया। ओशिवारा में स्टूडियो से निकलकर कई बार लोखंडवाला होते हुए मैं चार बंगला पैदल जाया करती थी। मेरा साथ मेरा एक सहयोगी और दोस्त (जो अब एक मशहूर टीवी कलाकार है) हुआ करता था। हमें हर रोज़ लोखंडवाला में कोई ना कोई मिल जाया करता – वहीं मैंने नवीन निश्चल से हंसते ज़ख्म पर लंबी बात की, वहीं मोबाइल की एक दुकान में श्रीदेवी को फोन खरीदते देखा। श्रीदेवी और मैंने एक ही मॉडल पसंद किया था, मैंने अपने लिए और उन्होंने अपने ड्राईवर के लिए। लोखंडवाला में ही मैंने आदि ईरानी (अरूणा ईरानी के भाई) से उनकी बहन के फिल्मों में स्ट्रगल की कहानियां सुनीं थीं और वहीं की कॉफी शॉप में एक बार रामगोपाल वर्मा के असिस्टेंट को अपना सीवी पकड़ाया था। पृथ्वी थिएटर में एक अच्छा नाटक देखने के लिए मैं तब्बू के पीछे कतार में खड़ी हुई, बगल वाली सीट पर मेरी ही तरह आयरिश कॉफी और सैंडविच का मज़ा लेती हिबा शाह से एक स्टार पेरेन्ट-कपल की बेटी होने का अनुभव पूछा।   

मुंबई के साथ ऐसी कई खुशगवार यादें जुड़ी हैं। वो शहर मैंने अकेले, अपने दम पर ढूंढा, जिया। उस शहर में मैं अकेले फिल्म देखकर रात के दो बजे निकली और सही-सलामत घर पहुंची, उस शहर में मैंने अपनी आंखों से निकले कई नमकीन कतरों को समंदर में बहाया, डुबोया। मेरी मकानमालकिन कभी नहीं पूछती थी कि मैं आखिर कौन-सा काम करती हूं कि शूट आधी रात को ही खत्म होता है? दिल्ली में पांच साल रहने के बाद मुंबई में ना के बराबर ईव-टीज़िंग के अपने अनुभव मुझे सुखद रूप से हैरान करते थे। मुंबई में रहकर जो आज़ादी मैंने महसूस की उसके लिए भी मुझे कोई सही शब्द नहीं मिलता। “Liberated” शब्द कुछ हद तक इस अहसास के करीब लगता है। आज भी कहती हूं कि मुंबई से बिंदास कोई शहर नहीं, मुंबई से सुरक्षित कोई शहर नहीं। तब भी जब बम धमाकों की ख़बर के बाद आप सबसे पहले मुंबई में रह रहे अपने भाई-भाभी के सुरक्षित होने की ख़बर पूछते हैं। तब भी जब खाऊ गली में हुए धमाके की ख़बर शालीमार रेस्टूरेंट में खाए खाने की यादों को हिला देती है। तब भी जब आप लगातार ये सोच रहे होते हैं कि दादर या ओपेरा हाउस से आपके फलां-फलां दोस्त का घर या दफ्तर कितनी दूर होगा या कहीं धमाके की चपेट में आपका कोई अपना तो नहीं आ गया।

मैंने सुबह से अख़बार नहीं देखा, धमाके की ख़बर मिलने के बाद भी समाचार चैनलों को खोलकर पल-पल की ख़बर देखने की ज़ेहमत नहीं उठाया। ख़बरों में वही cliché होगा, उसी तरह के एडिटोरियल्स होंगे जो आप साल-दर-साल पढ़ते आ रहे हैं। ख़बरों में प्रधानमंत्री से लेकर आला अफ़सरों तक के वही अफ़सोस-भरी बातें होंगी। फिर क्या फायदा?  

मतलब ये कि हम ऐसे संवेदनहीन हो जाएं कि ऐसी ख़बरों का अपने भाई-बंधुओं की सलामती के अलावा खुद पर कोई असर नहीं पड़े? मुझे लगता है रोना रोने से कुछ होगा नहीं। जो शहर हमारे ख्वाबों को परवाज़ देता है, रोज़ी-रोटी देता है, घर-बार, दोस्त-सलाहकार देता है, उस शहर की सलामती चंद पुलिसवालों के हवाले कर हम निश्चिंत तो हो ही नहीं सकते। हमारी अपनी क्या ज़िम्मेदारी बनती है? थोड़ी-सी। वही सब घिसी-पिटी बातें जो अख़बार-टीवी-रेडियो पर आया करती हैं। अपनी आपाधापी से तो तभी कुछ निकलेगा जब हम सुरक्षित बचेंगे। अपनी आंखें और कान खुले रखना हमारा लिए पर्याप्त होगा। मुझे नहीं मालूम इसका क्या नतीजा निकलेगा, लेकिन सफ़र या काम के दौरान अपने काम के साथ-साथ कुछ भी असाधारण दिखाई दे और हम तुरंत रिएक्ट करें तो हो सकता है कि हमारे-आपके जैसे लोग ही वो काम मुमकिन कर सकें जो अबतक पुलिस या प्रशासन नहीं कर पाई है। वरना वान्टेड लिस्ट लेकर गली-गली घूमने वाली सरकार से क्या उम्मीद करें। 

हम अमेरिका नहीं, वैसे प्रतिशोधी बनना भी नहीं चाहते। लेकिन स्वतंत्र देश का स्वतंत्र नागरिक होने के नाते सुरक्षित होना हमारा मौलिक अधिकार है। इस अधिकार को बचाने रखने का दायित्व हमारे माथे पर आ पड़े, ये शायद हममें से कईयों को उचित ना लगे। लेकिन फिलहाल इस दायित्व से हम मुंह नहीं मोड़ सकते। दिल्ली हो या मुंबई, अहमदाबाद या चेन्नई, कोलकाता हो या गुवाहाटी – खुद को सुरक्षित रखने की थोड़ी-सी ज़िम्मेदारी हमारी तो बनती ही है।

बाकी मुंबई तो मैं जल्द ही लौटकर जाऊंगी। सपनों ने दम तोड़ा नहीं है, धमाकों ने कानों को बहरा किया नहीं है और डर में सोचने-समझने की शक्ति छीनने की ताक़त नहीं है। मुंबई की बदहवास बदसूरती को यही भरोसा परे धकेलता रहता है, मुंबई से जुड़ी माया और माया से जुड़े ख्वाबों को यही भरोसा जिलाए रखता है।        

9 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

हमारी अपनी क्या ज़िम्मेदारी बनती है? थोड़ी-सी। वही सब घिसी-पिटी बातें जो अख़बार-टीवी-रेडियो पर आया करती हैं। अपनी आपाधापी से तो तभी कुछ निकलेगा जब हम सुरक्षित बचेंगे। अपनी आंखें और कान खुले रखना हमारा लिए पर्याप्त होगा

बिल्कुल सही कहा है ..सरकार के भरोसे सब कुछ नहीं हो सकता ... सार्थक लेख

सतीश पंचम said...

जी हां, हम इतना तो कर सकते हैं कि आँख कान खुले रखें। बाकी तो जो होना है जब होना है तब होगा ही। लेकिन मुसीबत यह है कि यह आँख कान खुले रखने की कवायद हम केवल कुछ समय के लिये कर पाते हैं, बाद में फिर अपने रोजमर्रा के ढर्रे पर आ जाते हैं , अखबार पढ़ते हैं, या बेहतर कहूं तो जबरिया पढ़ाये दिखाये जाते हैं - जॉन और बिप्स की खटपट हुई, सैफ और करीना करीब आये, शाहरूख....चिंकी....लल्लू...छब्बू.....।

हादसों को भूल जाना एक तरह से अच्छा भी है और खराब भी। भूलना इसलिये अच्छा है कि नॉर्मल जिंदगी जीने को मिलता है, और न भूलना खराब है कि फिर जीवन उसी में उमड़ा घुमड़ा रहेगा, लोग इसी सब में गुत्थम गुत्था होते रहेंगे।

जरूरत सबक सीखने और सिखाने की है जिसमें सरकारी इच्छाशक्ति की और लोगों के सशक्त समर्थन की दरकार है, सो तो हाल फिलहाल नजर नहीं आ रहा।

Arvind Mishra said...

सपने की गठरी:)
मुम्बई के मेरे भी संस्मरण कुछ ऐसे ही है -दो साल -९१-९३ वहां रहा -मैंने तब श्याद किसी और को शापिंग करते देखा -सात बंगला में रहता था -आये दिन शूटिंग होती थी ....क्या क्या बताऊँ ,क्या छोडूं?
एक बाद जेहन में रह गयी मुम्बई में नरक और स्वर्ग दोनों एक ही दिक्काल में मौजूद हैं ..
इन दिनों आप संस्मरण मूड में हैं -या शायद आपका स्थायी भाव है !स्वागत योग्य !

मनोज कुमार said...

@ मैं दिल्ली से गई थी, वो भी दूसरी बार, सो तकनीकी तौर पर एकदम देहाती तो नहीं कही जाऊंगी,
*** और क्या कोलकाता से पहली बार जाने पर क्या देहाती कहलाते हैं।
यदि हां, तो अच्छा ही हुआ कि आज तक मैं देहाती कहलाने से बच गया।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छा संस्मरण जो आज के हक़ीक़त से जुड़ कर एक विचारोत्तेजक शक्ल अख़्तियार कर लेता है।
भाषा काफ़ी प्रवाहमय और लेखन सशक्त ... बहुत अच्छा लगा आपका लिखा पढ़ना। आपने तो कोई अखबार नहीं देखा, हमने कई पडः़ए, कितनों के सम्पादकीय से बेहतर है आपका लिखा।

Anonymous said...

This is well written. As many have said before feels like a editorial.

Mumbai is a city where many find something and easily forget what they lost here...
Anyways this is what i feel.

Good work. keep writing and good luck

Manish Kumar said...

बेहतरीन दिल को छूता आलेख...

अनूप शुक्ल said...

दो दिन पहले आपके लेख की चर्चा की थी तो आज मन किया कि देखें क्या लिखा है नया! :)

बहुत अच्छा लगा इस लेख को बांचना।

Manoj K said...

अपनी इतनी सारी बातें शेयर करने के लिए धन्यवाद और मुम्बई की जो तस्वीर आपने रखी...हमारे ज़ेहन में भी वही मुम्बई बसती है.

अपनी सुरक्षा अपने हाथ - बहुत ही सटीक बात अपने रखी !