Monday, July 11, 2011

यूज़ एंड थ्रो का ओसीडी

रविवार को सफाई का दिन था। सफाई से मेरा मतलब कोने-कोने में घुसकर कतरा-कतरा कचरा निकालना है। मेरी इस आदत से तंग आकर पतिदेव मुझे "मेनियाक" कहते हैं, कहते हैं कि मुझे ओसीडी है - ऑबसेसिव कमपल्सिव डिसॉर्डर। मैं इस आरोप को सिरे से खारिज करती हूं। दो बच्चों वाला घर मेरे स्टैंडर्ड के लिहाज़ से कभी साफ-सुथरा रह सकता है क्या? बहरहाल, मैं ये बताने नहीं बैठी कि मैं कितनी सफाई करने की कुव्वत रख सकती हूं, बल्कि यहां मैं एक दूसरी आत्म-स्वीकृति के लिए आई हूं।

कल मैं बालकनी की सफाई करा रही थी। कोने में पड़ा इन्वर्टर, उसके बगल में दो कार्टन में जाने कबके रखे कागज़-पत्तर, खाली बोतलें, शीशियां, दूसरे कोने में कपड़े का एक शेल्फ जिसमें पहले बच्चों के कपड़े रखे जाते थे, अब पुराने जूते रखती हूं, गैस की खाली सिलेंडरें वगैरह-वगैरह। मैं अपनी कामवाली के साथ सफाई में लगी थी, उससे कहा था कि जिन चीज़ों की मुझे ज़रूरत नहीं, वो लेते जाना। अब कबाड़ीवाले से बहस करने की मेहनत कौन करे? कामवाली चाहेगी तो सामान रखे, चाहे तो बेचे, मेरी बला से। मेरी बालकनी, या यूं कहें कि मेरे सिर का बोझ तो हल्का हो जाएगा।

सो, सफाई शुरू हो गई। कुल चौदह जोड़े चप्पल-जूते-सैंडल ऐसे थे जिनका हमने पिछले एक साल में इस्तेमाल नहीं किया था। टूटे नहीं थे, बस पुराने पड़ गए थे। तभी एक पुराने कैलेंडर को उठाकर कामवाली ने पूछा, “इसका क्या करूं भाभी?” “कचरे में डाल दो, ये कहते-कहते मेरा मन भारी हो गया। अचानक बचपन की कई सारी बातें याद आ गईं। ऐसे ही कैलेंडर को उलटकर मम्मी हमारी किताबों में ज़िल्द लगाती थीं, ताकि सालभर तक कवर की हुई किताबें फटें नहीं। जो कैलेंडर बच जाया करते वो अलमारियों, दराज़ों में बिछते। और जूते? याद ही नहीं कि इतने जूते किसी के पास हुआ करते थे - जो कमाता था, उसके पास भी नहीं, और हम जैसे बच्चों की ख़ैर कौन पूछे। बहुत बड़े होने तक मैं स्कूल के सफेद जूते पहनकर खेलने भी जाया करती थी, और शाम को कुंए के पास बैठकर उसे धोना-सुखाना, अगले दिन के लिए तैयार करना भी एक काम हुआ करता था हमारा। अचानक याद आया कि सालों से मैं मोची के पास नहीं गई। चप्पल का एक सिरा टूटा नहीं कि वो कबाड़ी में चला जाता है और अगले दिन एक के बदले तीन चप्पलें आ जाया करतीं हैं। मॉल में सेल लगी हो तब तो ख़ैर पूछिए ही मत। नहीं, मैं compulsive shopper नहीं। लेकिन लगता है, सामान फेंक देना और उसके बदले नए ले आना एक तरह का ओसीडी ही तो है।

हमारी पीढ़ी ने abundance जाना है, प्रचुरता देखी है। इसलिए हम बचाना, सहेजना, संभालना नहीं जानते। हमारे पहले की पीढ़ी ने जो सहेजा, हमने उसका सुख भोगा, कृतघ्नता की हद तक। हमसे पहले वाली पीढ़ी ने ज़रूरत से ज्यादा कभी नहीं खरीदा या भोगा। बेमतलब के कपड़े नहीं, सामान नहीं, दूसरों को दिखाने के लिए ताम-झाम नहीं। मुझे अचानक इस बात का अफसोस हो रहा है कि यही उपभोक्तावादी संस्कृति मैं अपने बच्चों को सौंपूंगी। जब सहेजना-समेटना-बचाना मुझे नहीं आया तो इन्हें क्या सिखाऊंगी? मेरे बाबा हमेशा हमें एक किस्सा सुनाया करते थे। जब कॉलेज में दाखिला लेने की बारी आई तो उन्होंने अपने पिता के पास जाकर फुल-पैंट के लिए कपड़े की फरमाइश की। इससे पहले वे हाफ पैंट में स्कूल जाया करते थे। बाबा के पिताजी यानि मेरे परबाबा ने उन्हें एक पुरानी ऊनी चादर पकड़ाई और कहा कि इसी को कटवाकर फुल-पैंट सिलवा लेना। ज़िन्दगी में ऊंचा उठने की प्रेरणा उसी ऊनी चादर से बनी फुल-पैंट से मिली उन्हें। पैंट का ज़िक्र चला है तो मुझे अचानक याद आ रहा है कि मम्मी पुरानी पैंटों को काट-काटकर झोले बनाया करती थीं – सब्ज़ी लाने के लिए काला झोला, राशन लाने के लिए गहरा नीला और पूजा का सामान लाने के लिए क्रीम रंग का झोला। मम्मी आज भी फोन पर पुरानी चादरें और पैंट सहेजकर रखने की हिदायत देती हैं मुझे। मैंने अपनी एक आंटी को शादी के कार्ड सहेजकर रखते देखा है। वे उन कार्ड्स के लिफाफे बनाती हैं, बुकमार्क्स बनाती हैं।

सहेजने के कई किस्से याद आ रहे हैं। ये भी याद आ रहा है कि मेरी मौसी टॉफी के रैपर सहेज-सहेजकर किताबों में रखा करतीं थीं और उन्हीं रैपर्स से उन्होंने फूलों का एक गुलदस्ता बनाया था हमारे लिए। हमारी पीढ़ी यूज़ एंड थ्रो में यकीन करती है। परिवार का एक फाउंटेन पेन शान हुआ करता था सबकी। हमें भी नए क्लास में जाने पर एक कलम मिला करती थी। बॉल पेन का ज़माना आया, और फिर पांच-पांच रुपए की दस कलम खरीदना और फेंक देना जायज़ लगने लगा। अब तो हम सबकुछ फेंक दिया करते हैं। मोबाइल फोन, पुरानी तारें, पुराने कपड़े, मेड इन चाइनाप्लास्टिक के खिलौने, हज़ारों की तादाद में निकले प्रिंटआउट्स जिनकी अब कोई ज़रूरत नहीं और ना जाने क्या-क्या। इसमें से कुछ बायोडिग्रेडेबल होगा, कुछ नॉन बायोडिग्रेडेबल, लेकिन होगा तो वेस्ट (waste)’ या कबाड़ ही।

कबाड़ जमा करने और धरती पर कबाड़ी का बोझ बढ़ाने वाली हमारी यूज़ एंड थ्रो पीढ़ी की फितरत में ज़िन्दगी, रिश्तों और पैसों को लेकर भी यही फेंक देने की प्रवृत्ति शामिल हो गई है। हम कुछ सहेजकर क्यों नहीं रखते? बचाना, कम खर्च करना, ज़रूरत भर सामान खरीदना हमें क्यों नहीं आया?

10 comments:

Prashant Raj said...

चीज़ों को सहेजकर रखने से कहीं ज़रूरी है उनसे जुडी यादों को सहेजकर रखना.....जो काम कम लोग ही तुमसे बेहतर कर सकते हैं | और जहां तक अगली पीढ़ी का सवाल है उन्हें भी यही सिखा दो, "waste - management " अपने आप हो जाएगा| :-)

Anukriti Pandey said...

Anu, first of all, well-written. Succinct and unpretentious. Good job!

Despite identifying with everything that you you mention, I would still say that the kind of emotional waste-management that Prashant also talks of above is more important in our times. It's one thing to look at the past as ideal and compare it to the present socio-cultural scenario. But considering a lot of what was the norm earlier is not even important anymore, it's useless to even expect the generation-next to identify with all that. The better thing to do would be remind ourselves as well as talk to the younger ones about the kind of emotional maturity that is needed to survive happily in the current transitional times:)

Anonymous said...

Vaqt k sath jeene ka tareeqa badal jata hai,bhagambhag bhari zindagi mein insan yadon ko sahej le yahi bahut hai. saaman ityadi sahejne k liye samay kisko kisko. par tumne kaha isliye din mein kam se kam ek cheez sahej kar ek muhim ki shuruwat kar sakte hai. nice thoughts anu!

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

ये जुनून भी सब में नहीं होता है।

सतीश पंचम said...

पहले पुरानी चीजों को मैं इसलिये भी बहुधा सहेजता था कि जाने कब काम पड़ जाय, किसी टूट फूट में जोड़ के तौर पर लग जाय......लेकिन धीरे धीरे देखा कि सब रखे रखे फालतू का जगह घेरे रहते हैं, सो अब जहां तक होता है कबाड़ में देना ही ठीक समझता हूँ।

हां, जहां तक मितव्ययिता के चलते कम सामान में काम चलाने की बात है, वो चलन अब कम होते जा रहा है.....हम बड़े तो अब भी मोची के यहां जूते फटने पर सिला लेते हैं, लेकिन बच्चे अब सकुचाने लगे हैं, बदलाव की बयार बहुत तेज है।

मनोज कुमार said...

बड़ा मज़ा आया यह संस्मरण और आलेख पढकर।

पिछले महीने एक नया जूता लाया था। एक था पहले से, जो दो साल पहले खरीदा था। आपका यह आलेख पढ़कर सहसा ख्याल आया कि इसे (नए वाले को) तो पहना ही नहीं।

नया वाला इसलिए नहीं पहना कि कहीं मैला न हो जाए और पुराना वाला इसलिए नहीं छोड़ा कि अभी पुराना कहां हुआ है। सन्डे को साफ़ किया था तो फिर से चक चक करने लगा है।

कौशलेन्द्र said...

अनू जी ! यहाँ मामला उलटा है, पत्नी कहती है कि मैं घर को कबाड़ खाना बनाए दे रहा हूँ. अब तो लोग रिश्तों को भी यूज एंड थ्रो बनाने लगे हैं. मुझे इन सबसे पीड़ा होती है.

Arvind Mishra said...

ऑबसेसिव कमपल्सिव डिसॉर्डर-अरे यही तो पत्नी को भी है -आज पहचान पाया :)
गृह विरही(नोस्टाल्जिया ) संस्मरणों में तो आप निष्णात हैं ही ...अनुभव प्रचुर यादगारों का जखीरा

Rahul Singh said...

माया महाठगिनी हम जानी.

Nishant said...

बहुत सुन्दर, उपयोगी, और प्रेरक पोस्ट है आपकी.
मैं मिनिमलिज्म का कट्टर समर्थक हूँ इसलिए आपकी बातें बेहतर समझ सकता हूँ. अपने ब्लौग पर मैंने इस विषय पर लिखे गए बेहतरीन अंग्रेजी लेख आदि का अनुवाद भी किया है.