Thursday, November 11, 2010

पुराने पन्नों से - भाग दो

तन्हां

एक तन्हां वृक्ष,
कुछ पत्ते, थोड़े फूल,
लेकिन ना आबोहवा
ना नमी का निशां।
रेगिस्तान के बीच
चिलचिलाती धूप में खड़ा।
रेत पर ढूंढता रहेगा
वो वृक्ष कोई पदचिन्ह।
हज़ार बार बनाई होगी
हवाओं ने
कोई आकृति
सतह पर बिछी हुई मिट्टी पर।
मौन, चुपचाप, शांत
प्रतीक्षा करेगा वो वृक्ष,
अपनी थोड़ी-सी छांव
किसी पथिक से बांटने के लिए।

(10 फरवरी 1995)

प्रतिभा

शांत झील का किनारा,
झील में खिलता एक कमल
शायद बेचैन है
किसी प्रशंसक के लिए।
क्योंकि झील का किनारा
है बिल्कुल निर्जन।
तो क्या उस कमल का
कोई प्रशंसक नहीं आएगा?
क्या एक सुन्दर फूल
कहीं तक पहुंचने से पहले
मुरझा जाएगा?
फिर कोई एक प्रतिभा
खुद को सबके सामने
लाने से पहले
अपनी रोशनी खो चुकी होगी।
कमल कमज़ोर है,
असहाय।
झील के बीच
खिले उस कमल को
कौन पूछे?

(14 फरवरी 1995)
(ये कविता मैंने अपनी मां के लिए लिखी, जिनका नाम प्रतिभा है...)

दस्तूर

वक्त गुज़रता जा रहा है
और मैं तकाज़ा ले रही हूं वक्त का।
भूत, वर्तमान, भविष्य का।
सोचती हूं,
वक्त का पहिया घूमता जाएगा
घूमता जाएगा निरंतर।
क्या होगा भविष्य मेरा?
मेरे अपनों का?
मेरे देश का?
इस संसार का?
ये प्रश्न मेरा नहीं, सबका है।
सब भविष्य के लिए ही तो जीते हैं।
यही उम्मीद लेकर
कि वर्तमान से भविष्य बेहतर होगा।
समझती हूं,
जबतक हम हैं,
वक्त की चिंता है।
भविष्य की चिंता है।
यही तो है
वक्त का,
कुदरत का दस्तूर।

(16 फरवरी 1995)
(कमाल की बात है कि ठीक दस साल बाद इसी दिन मेरी शादी हुई। वक्त का, कुदरत का दस्तूर!)

उस क्षितिज के पार क्या है

तोड़कर दिखला दो मुझको
उस क्षितिज के पार क्या है
ढो रहे जिसको निरर्थक
उस जीवन का सार क्या है
हर तरफ निराश जन के
जीवन का आधार क्या है
रूढ़ियां ही तो बंधन हैं
और कारागार क्या है
जीवन से तो जीत ही गए
अब हमारी हार क्या है
मांग रहे दो पल मौत से
बाकी अब उधार क्या है
दुख-सुख तो सहते रहे
अब वक्त की मार क्या है
जीवन के बहते निर्झर में
अपनी बहती धार क्या है
इतनी लिप्साएं हैं अपनीं
उनका अब उद्गार क्या है
कोई मुझको ये बतला दे
आखिर ये संसार क्या है
उस क्षितिज के पार क्या है?

(18 फरवरी 1995)
(हो सकता है ये कविता महादेवी की कविता से प्रभावित रही हो)

सावन का आना

सावन आया पास तुम्हारे लेकर नई कहानी
देखो, आज पुनः उस अमराई में कोयल बोली।

लगी पपीहा शोर मचाने रूत है भीगी-भीगी सी
लगता मानो उठनेवाली है बिटिया की डोली

गिर गई बूंदें, शर्म से लाल हुए हैं बादल
किसने डाली उनपर कुमकुम और रोली?

छायी हरियाली बाग, खेत, खलिहानों में
खेल रहा है जग सारा हरे रंग की होली।

(15 अगस्त 1995)
(ये कविता मुझे जिस पन्ने पर मिली, उसमें फिजिक्स के सवाल हल करने की कोशिश जैसा भी कुछ नज़र आया मुझे। वो सवाल फिर कभी...)

3 comments:

गिरिजेश राव said...

@ हज़ार बार बनाई होगी
हवाओं ने
कोई आकृति
सतह पर बिछी हुई मिट्टी पर।

जबतक हम हैं,
वक्त की चिंता है।
भविष्य की चिंता है।
यही तो है
वक्त का,
कुदरत का दस्तूर।

गिर गई बूंदें, शर्म से लाल हुए हैं बादल
किसने डाली उनपर कुमकुम और रोली?

पंक्तियाँ प्रभावित करती हैं। पहले और तीसरे खण्ड चित्र सरीखे हैं।

Kishore Choudhary said...

पुराने पन्नों से... अपरिचित हो चुकी समय की पांख को फिर से चीन्हने के कारज कितने सुखद होते हैं. आपकी ये कविताएं जरूर अपने मौसमों की भी याद दिलाती होंगी.

Manoj K said...

उन पन्नों पर आपने तारीख लिखकर उन्हें अमर बना दिया.. मुमकिन है 'दस्तूर' पढते वक्त अगर आप तारीख नहीं देखती तो सिर्फ़ एक सृजन रहता, मगर अब चूँकि तारीख है तो माने बदल गए..

उन दिनों को साझा करने के लिए शुक्रिया..

मनोज