Thursday, November 11, 2010

पुराने पन्नों से

लंबे समय से गायब हूं। बहाने कई होंगे। यहां बहाने या अपने आलस्य की सफाई देने नहीं आई। आई हूं वो बांटने जो दीपपर्व से पहले घर की सफाई के दौरान हाथ लगा। एक पुराना बक्सा, बक्से में बंद एक पीली-सी फटी हुई डायरी और एक फाइल जिसमें अख़बार की कई कतरनें मिलीं... ये डायरी, ये पन्ने 1994 से लेकर 1996 तक के हैं, जब मेरी उम्र 15 से 17 के बीच रही होगी। अब पढ़कर हंसी आ रही है, हैरान भी हूं कि ये सब लिखा कैसे होगा। क्या-क्या नहीं है इनमें? मेरी कविताएं जो छपीं, पुस्तक समीक्षाएं, वे पात्र जिन्होंने प्रभावित किया, quotes, उन किताबों के नाम जो मैंने पढ़ा होगा और पढ़ना चाहती थी, उन गानों की लिस्ट जो मैं हमेशा सुनना चाहती थी... इन पन्नों को उलटते हुए लगा जैसे खुद से एक साक्षात्कार हुआ है। ये ख़ुद पर यकीन पुख़्ता होने जैसा कुछ अनुभव है, जिन्हें यहां के यहां, अभी के अभी लिख लेना चाहती हूं। इसलिए क्योंकि किसी ऐसे क्षण, जब भरोसा डिगने लगे तो मैं वापस यहीं आ सकूं, reinforcement के लिए।

(नीचे आनेवाली कविताएं 'आज' में 'नए हस्ताक्षर' स्तंभ में छपीं, 1 फरवरी 1995 से 16 फरवरी 1995 के बीच)

भारत-वेदना

थककर चलते भारत पर एक गाज-सा गिरा है,
क्षुधित, पिपासु आंखों में आंसू का एक सिरा है।
एक दुख ही सहना हो, तब तो चुप रह जाऊं मैं,
भारत मां को रोते देखा, कैसे ये सह जाऊं मैं?
कहीं गरीबी, कहीं, अशिक्षा, कोई ना पीछा छोड़े,
इन कांटों को घेरों को बोलो तो कैसे तोड़ें?
भरपेट मिले ना भोजन, तन ढंकने को वस्त्र नहीं,
पूछूं आज मैं किससे, ये समाज क्या त्रस्त नहीं?
'कम हों बच्चे, कम हो जनता', कल था जिनका नारा,
आज उन्हीं लोगों को देखो, प्लेग ने है मारा।
पूरब चीख उठा है, पश्चिम भी रो रहा है,
उत्तर, दक्षिण में हाय ये क्या हो रहा है।
खुदा के लिए लड़े, बदनाम करें कभी राम को,
तरस जाते हैं वही लोग खुदाई के नाम को।
भ्रष्ट हो गए मां के बच्चे ले झूठ का सहारा,
कुछ ना बचा तो सज़ा देकर प्रकृति ने ही मारा।
मां भारती! कैसे पूछूं बोलो कब मुस्काओगी?
परतंत्रता के बाद के बंधन कैसे तोड़ पाओगी।
हाय! तुमको मेरी माता, कैसे-कैसे दिन हैं देखने,
इन पल्लवित अधरों को हंसी के बिन हैं देखने।
नहीं देख सकती मैं तुमको मां ऐसे ही रोते,
पर आंसू पोंछने को आगे लोग भी होते!
एकता का गीत गाऊं, साथ कोई दे दे।
कठिन डगर है, हाथों में हाथ कोई दे दे।

(1 फरवरी 1995)


उसे रोको

चंदा की शीतल चांदनी ने
मन में एक आशा-सी जगाई है।
आशा, रजनी के अंधेरे में
एक प्रकाश-पुंज की
जो उस तिमिर रात्रि को चीरता हुआ
मेरे समीप से गुज़रा है।
उसी धुंधली रोशनी में
एक परछाई को जाते देखा है।
मेरी निगाहें उसका पीछा करती हैं,
उसके ठहरते ही मेरी नज़रें ठहर जाती हैं।
मैं उसका परिचय जानने को उत्सुक हूं।
उसने बताया है,
वो सच्चाई है।
समाज के कोप, क्रोध से बचने के लिए
वो जा रही है, दूर कहीं।
वो जा रही है,
उसे रोको,
उसे रोको!

(2 फरवरी 1995)

तृषिता

पानी पर खींची हुई लकीरें
ज्यों खुद हो जाती हूं गुम।
क्या करोगी जब
गीली मिट्टी पर
पूरी लगन से
तुम्हारी उंगलियां
कल्पनाओं की लकीरें बनाएं
और निर्मम जल-धार
उन्हें बहाकर ले जाए।
अश्रुकणों से बोझिल पलकें
देखती रह जाएंगी जल-धार को।
कितना वैषम्य है यहां!
कितनी आशाएं
दम तोड़ देती हैं
फलीभूत होने से पहले।
शायद तुम्हारे कदम
फिर भी उठें,
उसी मृगतृष्णा की ओर।
और तृषिता हो जाओ तुम,
वहीं, जहां
आशा की किरणें फिर भी
नज़र आती हैं
पानी की लकीरों को छूते हुए!

(3 फरवरी 1995)

3 comments:

Manoj K said...

बहुत ही सुन्दर कवितायेँ हैं, पहली कविता में भारत माता के लिए व्यथित होता मन, दूसरी में सच्चाई गायब होती ज़िंदगी से और तीसरे में अपने मन के थाह लेते हुए..

खूबसूरत बन पड़ी हैं तीनों कवितायेँ. उस उम्र में भी आपकी भाषा पर पकड़ काबिल-ए-तारीफ़ है.


मनोज

sada said...

तीनों रचनायें बहुत ही सुन्‍दर बन पड़ी हैं ।

गिरिजेश राव said...

@@शायद तुम्हारे कदम
फिर भी उठें,
उसी मृगतृष्णा की ओर।
और तृषिता हो जाओ तुम,
वहीं, जहां
आशा की किरणें फिर भी
नज़र आती हैं
पानी की लकीरों को छूते हुए!

बिम्बों की मात्रा और विविधता देख कर हैरान हूँ। 17 की आयु में!
आशा है कि आप की डायरी से और भी सुन्दर रचनाएँ पढ़ने को मिलेंगी।