शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

बोर हो जाओ तो सोचो मत, काफ़िया मिलाओ

ये कमबख़्त दिल्ली की सर्दी भी जानलेवा चीज़ है। जो मर ही जाऊं और बहार आ भी जाए तो क्या। पिछले दो दिनों से माइग्रेन से जूझने के हर मुमकिन उपाय कर लिए - स्टीम ले लिया, हॉट वॉटर बैग सिर पर बांधकर सोई, मरी हुई धूप में जान डालने की कोशिश में पार्क गुलज़ार किया, कोई पेनकिलर नहीं छोड़ा। राहत ना मिलनी थी, ना मिली।

सिर दर्द जितना परेशान नहीं कर रहा, कुछ ख़्याल कर रहे हैं। कुछ बेचारे-से आवारा लावारिस रिश्तों के मर जाने से जुड़े हुए ख़्याल। संवाद टूट जाने, आवाज़ के बंद हो जाने और कुछ कह ना पाने के डर से जुड़े हुए ख़्याल। रिश्तों की वजह क्या होती है? निस्बत कब और कैसे पैदा हो जाती होगी? कैसे दो अजनबी ज़िन्दगी के किसी चौराहे पर मिलते होंगे और भ्रम में ही सही, दो कदम उलटी राह पर चल देते होंगे थोड़ी देर साथ होने के लिए? जो अपनी मंज़िल का ख़्याल आ गया तो क्या? जो रास्ते में कुछ हासिल ना होने की समझदारी ने दिल पर काबिज़ कर लिया तो? और फिर हम सब तो सभ्य समाज के ज़िम्मेदार नागरिक भी हैं। ये ज़िम्मेदारियां ही ले डूबेंगी एक दिन।

स्थायी क्या होता है - कुछ नहीं, सिवाय उन लम्हों के जो गुज़र गए, जिन्हें हम जी चुके, जो रिकॉर्ड हो गए कहीं। गुज़रा हुआ ही सच है और मैं गीता नहीं पढ़ती। मैं गुज़रे हुए में जीती हूं क्योंकि सच वही है। बाकी आनेवाला कल तो अंदेशों और उम्मीदों के बीच के दो खंभों के बीच तनी हुई रस्सी पर चलने जैसा है।

हम रिश्तों की मियाद की बात कर रहे थे। ये भी कहां तय होता है? यहां भी सच इतना ही है कि जो जिया, जैसे जिया, वही सच था। जिस वक्त तुम्हें सोचने से डरने लगी, वहां से नया सच शुरू हो गया। इन ख़्यालों का मोल नहीं है। इनसे अच्छी कहानियां गढ़ी जा सकती हैं, पोस्ट लिखे जा सकते हैं, थोड़ी-सी वाहवाहियां हासिल की जा सकती हैं और क्रिएटिव होने के दंभ को बचाए रखा जा सकता है। इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

बाकी, ये भी सच है कि फटते हुए सिर पर कहां कोई हाथ होता है। ये भी सच है कि ठंडी, सर्द रातों को नरमी बच्चों की हथेलियों से ही मिलती है और ये भी सच है कि सुबह गुज़रे हुए कल का सच घूमकर देख लूंगी पल दो पल को और फिर वही तनी हुई रस्सी है, वही झूठ है और फ़रेबी रिश्ते हैं।

हद है। अव्वल दर्ज़े की बोरियत की निशानी है ये मोनोलॉग। बचपन में अकेले खेलनेवाले एक खेल से फिर अंधेरा भर लिया है आज। बोर हो जाओ तो काफ़िया मिलाओ। जो बन गया, बेढ़ब, बेसलीका, बेशऊर ही सही, सच ही होगा कोई। 



मुझे तरतीब की कोई सीख ना दे मेरे रक़ीब
सलीके से कहीं कोई आंधी बुलाई जाती है?

नहीं आती मुझे निस्बत की शर्तें, ठीक है,
मगर शर्त पर कैसे मोहब्बत निभाई जाती है?

बेहिस और बेहरकत जो मरता और जीता है
उस दिल से पूछोगे ज़िन्दगी कैसे पाई जाती है?

नशेमन में नहीं जिसके कहीं कोई झरोखा भी
एक दीद की उम्मीद फिर कैसे बनाई जाती है?

चलो हमने कहा 'अनु' पेशानी यूं ना तानो तुम
आईने को कैसे तस्कीन शक्ल दिखाई जाती है?

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

... and it's a baby boy!

It's a huge hall where I am standing, so huge I feel lost. Why would someone make a hall like this her bedroom? It has two king-size beds and no other furniture. I see my mother sitting on one of the beds. Oh! It is actually Mummy's bedroom. No wonder. After all, she has to accommodate my twins too. But who are the two little girls sitting on the other bed? They are so beautiful! Just like Mummy. And the bright red frock makes them look like matriyoshkas.

"They are my twins", Mummy discloses. 

Twins? How? When? You mean they are my sisters? But my logical mind refuses to believe this. Mum's uterus was taken out when she was 35. Then? Does that make five of us? Sisters younger to my kids? What will the world say? What the heck! Who cares about the world? If this is what Mummy wanted, she deserves it. And I love my sisters.

I wake up with a start. Oh, so that was just a dream? But the twins? What does it mean?

And the mobile beeps. Who could this be? 

"Officially in labour," she sends a text. That's my childhood friend M, the one I write letters to, all the time, in my mind. And the letters never see the light of the day.

6.30 AM. I shouldn't be calling her up. Time to get to business. Wake up the kids... play music for them... tickle them... scream... shout... instruct... force milk down their throats and pack them off to school. Wow! That's one job accomplished. I am on the laptop now.

"There?" She pings. 

But wasn't she in labour? In the hospital?

"Yes. Aren't you in the hospital? How are you feeling?"

(It's the BB generation Anu Singh. So what if you still carry that old-fashioned dying Nokia? I could actually be on Skype to see how she is doing in the labour!)

                        M: Yeah. In between contractions :)
                        A: I don't believe this!
 










M: All plugged in now
 

A: And how have you managed to chat?M: Would take time. By evening is what the doc says. Contractions are painful. 
A: Long wait it will be. And yes, contractions are painful. 
 M: The in between phase is fine
 A: The pain is called labour for no other reason! Where is Saurabh? Dreamt of Mom giving birth to twins :) girls... Wonder what it means :)M: Saurabh is outside with a few friends. Just had another contraction. I have also been having weird dreams.
 A: Like?
                      M: More on the baby but guess it was the anxiety.
 
A: Must be. But don't worry. The girls in my dream wore red frocks and looked happy. :)
 M: Good :) Am hungry now But guess they would not let me eat anything now
 A: Ouch! Why?M: Stomach should be clear.
 A: Oh! Then it's a long day for you.
 M: Yeah
 A: Did they do an ultrasound? Baby's position fine?M: Am just going for one in a while
 A: Ok. You want me to call? Is it BB that you chatting on?

I call. She doesn't take the call.

10 mins later.

                        M: Sorry had another contraction. Just fading.


 


A: You will be fine. I am right here. Buzz whenever you want. You want me to come to G'gaon? 
M: No- its okay. Any which way they would not allow you in for long. My doctor sent my friend back
 

Silence. I call again in 10 mins. Conversation on the phone...

M: Another contraction. It's painful.
A: It is. Just a few hours. You will be fine. Think of mine. I had labour for 8 hours and then I was taken in for a C-sec.
M: Now stop giving me the horror stories. Doesn't make me any better.
A: The twins that I gave birth to are 5 now. Every moment of pain gets over. So will this be. Does that make you feel better?
M: Yes, that's the positive side of it.
A: How are you chatting?
M: All tied up to the bed with monitoring machines all over me. BB is difficult. Saurabh has gone down to get the I-pad. Then it will be easier.
A: Are you serious?
M: Listen, I am hanging up... Another bout of pain...

I don't hear from her for hours. My phone goes unanswered. And then there is a message in the afternoon: "Its a boy. Normal but instrument assisted. She has lost a lot of blood. Is not out yet but all is well."

I hope all is well. All will be, must be. Welcome to the Mommie's club which gives you an unrestricted entry to the house of scary roller-coaster rides. You will do fine though. 

Meanwhile, I have deciphered the dream. The two girls are actually the two Bhabhis we brought in our family this year. May the son and the daughters, the boy and the girls bring immense happiness to the family they belong. Amen!

किस कमबख्त को कविता कहनी है?

मुझे मीटर की पहचान नहीं, तुकबंदी-बेतुक कुछ नहीं समझती। अलंकार, प्रतीक और बिंब सब अबूझ। एक अज़ीज़ दोस्त के मुताबिक तो मुझे कविता लिखनी भी नहीं आती। लेकिन सोचे हुए से मजबूर हूं। कौन कमबख़्त यहां कवयित्री बन जाने के लिए लिखता है? किस कमबख़्त को भरा हुआ ऑडिटोरिम और तालियों की गड़गड़ाहट चाहिए? यहां तो दिमाग में चली आ रही पंक्तियों से निजात पाना है, कविता हुई तो ठीक, ना हुई तो मेरी बला से।

बच्चों, मम्मा का ब्लॉग पढ़ोगे पांच साल बाद तो जीभर के हंस लेना। अभी मेरे कहने की बारी है।

मौजों से लड़ने का दम नहीं
फिर भी
जुबां पर बेवजह उम्मीद की रट है
जो साहिल दूर है तो क्या, 
कुछ ऐसा कर मेरे ख़ुदा
दो-चार दिन की ख़ातिर
मुझे पतवार दे, मुझको 
सफ़र में नाख़ुदा बना

उसका सांस पर हक़ है
कहे तो
रूह में लिपटी बदन की आग भी दे दूं
जो इश्क नाम है इसका
कुछ ऐसा कर मेरे ख़ुदा
वस्ल में हिज्र दे ऐसा 
उसे बांधे रखूं फिर भी
मुझे उससे जुदा बना

मेरी इस बाग़ी आवाज़ में
क्या दम
ये शोर और चीखनेवालों की बस्ती है 
अगर यही यहां होता 
कुछ ऐसा कर मेरे ख़ुदा
मुझे ख़ामोश कर दे
और मेरी चुप्पी को
नर्म ख्यालों की सदा बना

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

हैप्पी बर्थडे मम्मी

सुबह चार बजे उठती थीं मम्मी। हमें पढ़ने के लिए बिठा देतीं और वहीं घरभर के कपड़े आयरन करने में लग जातीं, ताकि नींद उन्हें भी ना आए और हमारी रखवाली भी होती रहे। उस चार बजे उठने का कोई ख़ास फ़ायदा तो मुझे नज़र आता नहीं, सिवाय इसके कि हम तीनों भाई-बहन देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ने लायक बने - लेडी श्रीराम, आईआईटी और आईआईएम को काम भर 'लायक' मान लिया जाए तो। हां, मम्मी को उनके सारे कपड़े हर रोज़ सलीके से इस्त्री करते देखने का बड़ा नुकसान ये हुआ कि मुझे आजतक आयरन करने से सख़्त नफ़रत है।

मम्मी सुबह पांच बजे चौके में लग जातीं। अपने कमरे से झांककर देखतीं कि बाबा मॉर्निंग वॉक के लिए निकले हैं या नहीं। फिर पूरा दिन एक टांग पर खड़े होकर चौके में चूल्हा झोंकने में बीतता। पूरे परिवार के लिए तरह-तरह का खाना-नाश्ता बनता और दोपहर बारह बजे नहाने-धोने-पूजा-पाठ करने के बाद मम्मी की प्लेट में पड़नेवाले खाने में कभी सब्ज़ी गायब होती कभी दाल। पूरे दिन रसोई में जूझने, दाल और सब्ज़ी में नमक-मिर्च की आलोचना सुनने के बाद बचा-खुचा खाने की उनकी इस आदत को देखते-देखते मैंने तय किया खाना बनाना और खिलाना दुनिया का सबसे 'अनप्रोडक्टिव' और 'थैंकलेस' काम होता है। ये बात और है कि सबसे ज़्यादा मां के हाथ का खाना खाने की तलब होती है। बाकी, पेट तो कैसे भी भर ही जाता है।

मम्मी त्याग की प्रतिमूर्ति हैं। उनसे कोई भी चीज़ कभी भी मांगकर देखो, मना नहीं करेंगी। ना भी नहीं बोलतीं। इसका फ़ायदा घर-परिवार तो दूर, अड़ोसी-पड़ोसियों ने भी जमकर उठाया। नतीजतन, उनकी शॉल कई पार्टियों में अलग-अलग लोगों ने ओढ़ी (उन्हें पार्टी में जाने की इजाज़त नहीं थी), साड़ियों पर कभी मिठाई का रस, कभी मटर-पनीर की हल्दी गिरी, कानों के बूंदे उतरे, गले की चेन उतरी। मैं ख़ुदगर्ज़ तो नहीं, लेकिन दरियादिल भी नहीं। ना बोलने में खुद को ट्रेन करने लगी हूं बस।

पैंतीस साल में यूट्रस कैंसर हुआ, मौत से जूझकर निकलीं और फिर एक हज़ार बीमारियों का घर बनाकर चलती हैं खुद को। अब इस उम्र में आदत क्या बदले, लेकिन परफेक्शनिस्ट हैं और सफाई का मेनिया है। इस बात से मैंने इतना सीखा है कि हर दो महीने पर अपने शरीर से पूछो, तबीयत और मिज़ाज दुरुस्त तो है, कहीं ओवरहॉलिंग की ज़रूरत तो नहीं? वरना फैमिली हिस्ट्री देख लें तो कई बीमारियां तो रगों में दौड़ती होंगी। दूसरा, आंख मूंदना सीख लिया है। आप दुनिया को अपने हिसाब से नहीं चला सकते और ख़ून इतना भी सस्ता नहीं कि गंदे तवे और बेलन के लिए जलाया जाए।

मम्मी बेहद धार्मिक हैं और बिना नहाए और पूजा किए एक दाना भी मुंह में नहीं डालती। मैं नास्तिक नहीं लेकिन कर्मकांडों में यकीन नहीं करती। मम्मी साल में कम-से-कम 150 दिन व्रत करती हैं, कोई एकादशी प्रदोष नहीं छोड़तीं। मुझसे दो घंटे भी भूख बर्दाश्त नहीं होती। मम्मी तीर्थ और मंदिर दर्शन को अपने जीवन का इकलौता उद्देश्य मानती हैं, मैं तीर्थस्थानों पर भी पर्यटन स्थल ढूंढती हूं। मम्मी त्याग और बलिदान की भाषा बोलती हैं, मैं हक़ का झगड़ा करती हूं। मम्मी टूट-टूटकर संयुक्त परिवार बचाए रखने में यकीन करती हैं, मैं खुद को बचाए रखने की सलाह देती हूं।

ये भी सच है कि ज़िन्दगी के तकरीबन सभी पाठ उनकी ज़िन्दगी को देखकर ही सीखे, और ये भी सच है कि एक रत्ती भी उनके जैसी बन गई तो उम्दा इंसान कहलाई जाऊंगी। आज आपके जन्मदिन पर उन सभी बहस और झगड़ों के लिए क्षमा याचना करती हूं जो हमारे धुर विरोधी विचारों की वजह से हुए। दुआ है कि आपको सेहत भरी और लंबी उम्र मिले। बाकी, दुनिया में मुट्ठी भर लोग भी आपकी तरह हो जाएं तो जन्नत यहीं नसीब हो जाए। क्या मैं अब आपकी तरह बन सकती हूं?

(मम्मी और मेरी ये तस्वीर गांव में छठ की शाम की है)

रविवार, 11 दिसंबर 2011

तक़दीर और तदबीर बदलनेवाली दिल्ली

दिल्ली आने के लिए हमने मूरी-अमृतसर जैसी महाघटिया ट्रेन ली थी, वो भी बड़काकाना से। 1996 की बात है। मैं दिल्ली कॉलेज में दाख़िला लेने आ रही थी, करीब-करीब बगा़वत करके। मेरी बेतुकी ज़िद में मेरी मां साथ दे रही थी मेरा, और मुझे लेकर वो भी सालों बाद दिल्ली आ रहीं थीं। जब अपने कॉलेज के दिनों में आया करती होंगी तब उनके बाबा सांसद थे, लुट्यन्स दिल्ली के अतुल ग्रोव लेन में रहते थे। अब आ रही थीं तो एक भाई का सहारा था, जो पश्चिम विहार के किसी एलआईजी फ्लैट में रहते थे। मामाजी मेरे पार्टनर इन क्राइम थे। उधर रांची में मैंने बग़ावत का झंडा उठाया था, इधर दिल्ली के चार नामी वूमेन्स कॉलेज में उन्होंने मेरे नाम के एडमिशन फॉर्म्स भर दिए थे। दिल्ली स्टेशन पर हम रात के साढ़े बारह बजे पहुंचे थे। ना कुली मिला कोई, ना टैक्सी ही। दरअसल टैक्सी फ़िज़ूलखर्ची लगती थी मामाजी को। (तब भी लगती थी, अब भी लगती है।) सो, हमने पश्चिम विहार तक के लिए कोई डीटीसी बस ली थी, लेकिन सैय्यद नांगलोई तक का तकरीबन दो किलोमीटर तक का रास्ता पैदल तय किया था। मामाजी सूटकेस उठाए दिल्ली में होने के फ़ायदे गिनाते रहे थे। उन्हें पूरा भरोसा था कि ये शहर मेरी तक़दीर और तदबीर दोनों पूरी तरह बदल देगा।

उस एलआईजी फ्लैट में कटनेवाली ज़िन्दगी के अनुभव बयां करने बैठूं तो एक हफ्ता लग जाएगा। लेकिन ये बता सकती हूं कि छोटे शहर से नाक पर गुरूर और ज़िन्दगी को लेकर हसीन ख़्याल लेकर आई लड़की की कई धारणाएं उस एक जगह ने बदल डालीं। 12-14 कमरों का घर, हसीन गुलाबी पर्दे, ढेर सारा स्पेस, अपना बाथरूम, टीवी और म्युज़िक सिस्टम, शॉफर ड्रिवेन एयरकंडीशन्ड एस्टीम, रांची क्लब की हसीन शामें और लॉन में खिलनेवाले पेट्यूनिया, जिनिया, गुलाब और ग्लैड्युला के फूल पीछे छूट गए थे। यहां रोज़-रोज़ की जद्दोजेहद थी। दो कमरों में समाए पढ़ने के लिए दिल्ली आए कई बच्चे और अनगिनत मेहमान थे, दो घंटों के लिए आनेवाला पानी और मदर डेयरी का बेस्वाद दूध था और ढेर सारी उमस और मच्छरों से भरी शामें थीं। रही-सही कसर रेड, ब्लू और ग्रीन लाइन बसों ने पूरी कर दी थी। ऐसा लगता था जैसे किसी राजकुमारी के पैरों के नीचे से मखमली कालीन और सिर पर से भव्य और सुंदर कंगूरों वाली छत खींचकर उसे जून की धूप में पंजाबी बाग के चौराहे पर आज़ादपुर से आनेवाली बस का इंतज़ार करने के लिया खड़ा कर दिया गया हो।

बस भी मिली, मैं कॉलेज भी जाने लगी। लेडी श्रीराम जैसे फैन्सी कॉलेज में अपना टूटा-फूटा गुरूर बचाने के लिए कई मुखौटे ओढ़े, कई रंग बदले। नए शहर में नए लोगों के बीच जीना आसान ना था तो नामुमकिन भी ना था। ये शहर लाखों लोगों को हर दिन आशियाना देता है, मेरे पंखों को परवाज़ क्यों ना देता? हॉस्टल ना मिला तो पेइंग गेस्ट बनकर साउथ दिल्ली में रहने का अनुभव भी हुआ, फिर पचपन खंभों और लाल दीवारों वाला कॉलेज भी एक दिन घर बन ही गया। धीरे-धीरे इस शहर से नाता भी बदलने लगा। लेकिन ये एक लंबी और थका देनेवाली प्रक्रिया थी। ये शहर मुझे बांहें फैलाए बुलाता, मैं अड़ियल और ज़िद्दी महबूबा की तरह मुंह फेर कर नए मुकाम तलाशती। 

याद है कि पहली छुट्टियों के बाद लौटते हुए ट्रेन में वॉकमैन पर लूप मोड में बैट्री डाउन हो जाने की हद तक 'छोड़ आए हम वो गलियां' सुनती रही थी और बाथरूम में जाकर नाक सुड़कती रही थी। ये भी याद है कि दिल्ली की परिधि में ट्रेन के दाख़िल होते ही कंटीले बबूल और गंदी यमुना को देखकर दिल डूबने लगता था, मन होता था कि यार्ड तक जाकर इसी ट्रेन में बैठी रहूं और वापस घर चली जाऊं। ये भी याद है कि दिल्ली को बेहतर समझने-जानने की कोशिश में मैंने बक़ायदा दिल्ली पर वर्कशॉप किए, खुशवंत सिंह की निगाहों से वेश्यारूपी दिल्ली को समझना चाहा, तमाम वो कोशिशें कीं कि इस शहर से मुझे मोहब्बत ना हो तो नफ़रत भी ना हो। लेकिन हर तीन महीने पर घर लौट जाने की बेचैनी होती, कैरियर के हर पड़ाव पर रांची जा बस जाने के बहाने ढूंढती। लेकिन ऐसी किस्मत कि लौटकर यही आती, कभी पढ़ाई पूरी करने, कभी नौकरी की तलाश में। दिल्ली को ठुकराने की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं और मैं यहीं की होकर रह गई हूं।

पंद्रह सालों में इस शहर ने वो सभी सुख और पहचान दिए, जो एक शहर से आप हासिल कर सकते हैं - क़रीबी दोस्त, नौकरी और नौकरी छोड़ने का भरोसा, फोनबुक में मौजूद सैंकड़ों नंबर, बिना किसी प्लानिंग के कहीं चलते हुए जाने-पहचाने चेहरे मिल जाने का सुख, आज़ादी, अपनी मर्ज़ी का जीवन, ऑटोवालों से उलझने का आत्मविश्वास और हर तरह के मौसम की मार झेलकर भी बचे रह जाने का साहस। इसी शहर ने अनुभवों का टोकरा बगल में ऐसा रखा कि आजतक चुन-चुनकर फूल और कांटे निकाल रही हूं उनसे। सात रुपए में पीवीआर में सामनेवाली रो में बैठकर 'मेन इन ब्लैक' देखी तो पांच सौ रुपये देकर लक्ज़री क्लास में 'द डर्टी पिक्चर' देखने की कुव्वत भी आई। 442 और 724 से सीढ़ियों पर लटकर तीखी धूप में रिंग रोड के पिघलते अलकतरे को देखा तो अपनी गाड़ी रोककर अपने माज़ी को लिफ्ट भी दिया है इसी शहर में रहते हुए। पांच रुपये में रिक्शेवालों के साथ बैठकर छोले-कुलचे का लंच मूलचंद फ्लाईओवर के नीचे किया तो कई वीकेंड्स पर सुबह छह बजे कॉफी पीने के लिए वसंत कॉन्टिनेन्टल और ताज भी गई।    

हम कई सारे कच्चे, नासमझ ख्वाब लेकर आए थे यहां। आज पैरों के नीचे ज़मीन है और एक भरोसा भी कि नामुमकिन कुछ भी नहीं होता।  दावे के साथ नहीं कह सकती कि इस शहर को पूरी तरह जान-समझ लिया है। ये ज़रूर कह सकती हूं कि इस शहर ने हम जैसे चुन-चुनकर निकाले हैं और मेरी मुकम्मल पहचान इसी शहर की देन है। मैं इस शहर में अपना बुढ़ापा नहीं गुज़ारना चाहती, ना बच्चों को यहीं बसते देखने की ख्वाहिश है। लेकिन तमाम ऐसी दूरियों के बावजूद इस शहर से करीबी रिश्ता बन गया है अब। यहां ट्रैफिक बढ़ता नहीं, ना महिलाएं सुरक्षित हैं इस शहर में। यहां सड़कों पर सांस लेना मुश्किल है, सड़क की पटरियों पर बिना टकराए चलना नामुमकिन। यहां ओवरटेकिंग के झगड़े में गोलियां चल जाती हैं, टोल पर छ्ट्टे मांगो तो मौत मिलती है। लेकिन फिर भी ये शहर दरियादिल है, जीना अपने तरीके से सिखाता है और सबको खुद में कुछ इस तरह समाता है कि अपने-पराए का भेद मुश्किल।

दिल्ली कल राज के सौ साल पूरे कर लेगी। मुझे और तो कुछ सूझता नहीं सिवाय इसके कि एक बार के लिए ये मान ही लूं कि ये शहर ना होता तो वो रास्ते भी ना होते जो इतने सालों में तय किए, ना मंज़िलें होतीं ना उन्हें पार कर लेने का हौसला होता। बाकी, हमें जो मिला, उसकी शिकायतें करना तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। उन्हें बेशक तड़प लेने दो जिनके लिए दिल्ली दूर है। दिल्ली की बात चली हो और ग़ालिब को याद ना किया तो क्या किया... 

'सताइशगर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़े-रिज्वां का/वो इक गुलिस्ता है हम बेख़ुदों के ताक़े-निसियां का।'

[ज़ाहिद जन्नत के जिस बाग़ की इस क़दर तारीफ़ करता है वो (दिल्ली) तो हम बेखुदों के ताक़ पर रखा एक गुलदस्ता भर है] 

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

लाइफ़ इज़ अ डर्टी पिक्चर, माई फ्रेंड

हम चांदिवल्ली स्टूडियो में शूट कर रहे थे। वहां दो-चार सीरियलों की भी शूटिंग चल रही थी जिनमें एक बालाजी का सीरियल था। सीरियल के लीडिंग रोल में जो लड़की थी, उसे मैं कम पहचानती थी। मां की भूमिका निभानेवाली इस एक्ट्रेस को ज़रूर देखा था कई फिल्मों और सीरियलों में। प्रोडक्शन में होने का एक फायदा था, लंचब्रेक में हमें खाना आख़िर में ही सही, गर्म रोटियों के साथ मिलता था और कई बार इन रोटियों जैसी ही सींकी हुई, गर्म गॉसिप का पूरा डोज़ भी खाने का ज़ायका चटपटा बना देने के लिए आ जाया करता था।

मां के रोल में करीब-करीब मशहूर एक्ट्रेस के बारे में सबसे ज़्यादा कहानियां सुनने को मिलतीं। मैं हैरान। कैमरे के सामने जाते ही कैसे इनकी शक्लें बदल जाया करती हैं! ऐसे ही लोगों से प्रभावित होकर हमारी मांएं सीरियल देखते हुए न्याय-अन्याय की दुहाई देंगी!

एक दिन स्माइल एक्सचेंज करने का नतीजा हुआ कि अगली सुबह वो मुझसे मेरे हाथ में मौजूद किताब के बारे में पूछने आ गईं। मैं उनकी शक्ल के पीछे का चेहरा देखने की कोशिश करती रही, बेटी महमूदी की 'नॉट विदाउट माई डॉटर' पर दिया गया जवाब बहुत संतोषप्रद नहीं था। शाम को हम फिर ग्रीन रूम के बाहर टकरा गए, और हमने बातचीत शुरू कर दी। बाईस साल से फिल्मों में काम कर रही थीं वो।

'रिग्रेट्स?'

'नन।'

'परिवार?'

'दो बार तलाक के बाद तीसरी बार घर बसाने की कोशिश नहीं की।'

'लोनलिनेस?'

'यू हैव द बिगेस्ट वेपन। ऐज़ लॉन्ग ऐज़ इट वर्क्स, यू विल नेवर बी लोनली।'

मैं कान खुजा रही थी, क्या सही सुना था?

'हाउ ओल्ड आर यू?'

'ट्वेंटी टू।'

'आई विल टेल यू समथिंग अबाउट मेन। दे वॉन्ट टू गो टू एक्ज़ैक्ट्ली वेयर दे कम फ्रॉम। ऑल ऑफ देम।'

'द डर्टी पिक्चर' देखते हुए मुझे ग्रीन रूम के बाहर हुई वो टूटी-फूटी बातचीत याद आती रही, जो मेरे लिए फीमेल सेक्सुएलिटी पर सबसे बड़ा और क्रूड सबक था। रेशमा या सिल्क ही उस 'बिगेस्ट वेपन' का इस्तेमाल करना नहीं जानती, अलग-अलग रूपों और तरीकों से वॉर और पीस के हालातों में सेक्सुएलिटी का इस्तेमाल किया जाता रहा है - कभी अपनी रियासतें, कभी रिश्ते, कभी रंजिशें बचाए रखने के लिए। फिर भी शराफत आमतौर पर जिन लोगों की जागीर है, वे खुलेआम शरीर की बात नहीं करते, भले सबसे ज़्यादा शरीर के बारे में ही सोचते हों।

औरतों को तो शिक्षा ही शरीर को मंदिर बनाए रखने की दी जाती है। लज्जा (modesty) और शुचिता (chastity) जैसे सबक औरतों को ही सिखाए जाते रहे। ये बात और है कि पर्दे के पीछे, घरों की चहारदीवारियों में, बंद कमरों में, इच्छा-अनिच्छा से सबसे ज़्यादा यही शरीर और सबक रौंदे जाते हैं। जो छुपकर हुआ तो सही। जो खुलेआम किया तो अश्लील, चरित्रहीन और निर्लज्ज कहलाई जाओगी। इसके बारे में बात करना तो सबसे बड़ी वर्जना। लिख दिया तो गुनाह कर दिया।

कट टू डिबेट कॉम्पिटिशन, जिसकी जज थी मैं आज। विषय - वूमेन एम्पावरमेंट - ए मिथ। ये भी कोई बहस का विषय है? जाने क्यों वेपन वाली बात फिर याद आई है। बच्चों के सामने कैसे कहूं? एम्पावर्ड और वल्नरेबल, दोनों महसूस करने का ये कैसा तरीका है?

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

ऐसी भी बातें होती हैं

वो एक ऐसी ही सुबह थी - धुंध से भरी, ठंडी और तीखी हवाओं वाली। सुबह-सुबह तुम्हारे फोन ने जगाया था, दस मिनट में गेट पर मिलने की बात मैंने सुन भी ली और उन कीमती दस मिनटों को नींद के हवाले भी कर दिया था। याद नहीं कि तुम दस मिनट में पहुंचे थे या एक घंटे में, लेकिन मुझे फिर फोन की घंटी ने ही उठाया था। 'नीचे आओ, हम घर ढूंढेंगे और चाय पिएंगे।' मैं अभी भी मंगेतर थी, तुम्हारी म्यूज़, इसलिए तुम्हें इंतज़ार करवाती तो भी तुम्हें नाराज़ होने का हक़ नहीं था।

ट्रैक्स और सफेद जॉगिंग शूज़ में मैं नीचे थी, दिसंबर की सर्दी और छुट्टी के दिन रजाई छोड़ देने की मजबूरी को जीभर कर कोसते हुए। हम गली के किसी मोड़ पर चायवाले के सामने रुककर चाय पीते, और मुझे भी मना करने का हक़ ना होता। तब भी जब मैं चाय पीती नहीं थी, खाली पेट तो बिल्कुल नहीं और पैन में काली पत्तियों के साथ खौलती काली चाय को देखकर मुझे आमतौर पर उबकाई ही आती थी। लेकिन चाय के कड़वे स्वाद की कल्पना करते हुए मैंने ग्लास अपने हाथ में ले लिया था, कुछ ठंडी हथेलियों पर रहम करने के लिए, कुछ तुम्हें निराश ना करने के डर से। फिर धूप चढ़ जाने तक हम घर की लोकेशन ढूंढते रहे थे - बहुमंज़िली इमारतों और तंग गलियों से होकर गुज़रते हुए एक घर बनाने की ख्वाहिश में हमने एक और छुट्टी निकाल दी थी। हमारी शादी में अब डेढ़ महीने बाकी थे।

घर अब छह साल पुराना हो गया है, शादी की साढ़े साती भी जल्द ही उतर जाएगी। इस घर की दीवारों पर हमारे बच्चों ने अपनी इतनी निशानियां रख छोड़ी हैं कि दीवारों पर नए रंग करवाने का जी नहीं चाहता। चाय मैं अब भी नहीं पीती, खाली पेट तो बिल्कुल नहीं और तुम अभी भी किसी नई तलाश में हो।

फेसबुक पर आधी रात को अचानक तुम्हारे नाम का मेसेज आता है। 'कैसी हो?' मैं हैरान होकर अपनी स्क्रिन देखती हूं। तुमने तो अपनी तस्वीर भी नहीं लगाई।

'पतिदेव, इज़ दैट रियली यू?'

मेरे सवाल के जवाब में तुमने लिखा है, 'पहली बार और शायद आखिरी बार। फेसबुक चैट पर इस तरह। इतनी रात गए क्या कर रही हो?'

'डिप्रेशन पर पढ़ रही हूं और लिखने जा रही हूं, इस उम्मीद में कि इससे बेहतर महसूस कर सकूंगी।'

'डिप्रेशन स्टेट ऑफ माइंड है। हम सब इससे गुज़रते हैं। And the strong woman that you are, the word will not stay with you for long.'

स्ट्रॉन्ग वूमैन - ये तमगा जाने कब हासिल कर लिया। इस वक्त मैं तुम्हें बताना चाहती हूं कि मैं बिल्कुल स्ट्रॉन्ग नहीं। किसी के कंधे पर रो लेने का एक कमज़ोर लम्हा सबसे बड़ा तोहफा होगा मेरे लिए। मैं बिल्कुल स्ट्रॉन्ग नहीं। रात को अंधेरे में मेरी भी सांसें उखड़ती हैं, अकेले कमरे से बाहर निकलने में डर लगता है और बच्चों के सो जाने के बाद हिचकियां ले-लेकर रो लेने के बाद पानी पीने की इच्छा भी होती है तो किचन तक जाने के लिए आदित को गोद में उठाकर बाहर निकलती हूं।

तुम्हें निराश ना करने का डर अब भी कायम है। तब काली चाय की शिकायत नहीं करती थी, अब अकेले होने की नहीं करती।

लेकिन सच तो ये है अकेले इस तरह बच्चों को बड़ा नहीं करना चाहती। मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन अक्सर धोखे देती नज़र आती है। मैं सोशल गैदरिंग्स में नहीं जाना चाहती क्योंकि तुम साथ नहीं। मैं हमउम्र मांओं और अपने बच्चों के हमउम्र दोस्तों की वो सेटिंग्स खोजती हूं जहां कोई पापा के शाम को ना आने को लेकर हैरानी ना जताता हो। मुझे बैंक जाने से नफरत है, इंटरनेट बैंकिंग तो मुझे बिल्कुल समझ नहीं आती। मैं डॉक्टर के पास अकेले नहीं जाना चाहती, पीटीएम में टीचर ने तुम्हारे बारे में पूछना छोड़ दिया है और दो बच्चों को संभालते हुए मॉल में गाड़ी पार्क करते हुए मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है। मैं तुम्हारी टिकट पर किसी और को सफ़र करते देखते हुए, एयरपोर्ट और स्टेशनों पर अपने सूटकेस और ट्रॉलियां अकेले खींचते हुए भी थक चुकी हूं।

घर तो हम साथ ढूंढने निकले थे ना? फिर इस घर को घर बनाए रखने का दारोमदार मेरे तन्हां कंधों पर कब और कैसे आ गया?

मुझे शिकायत करने का हक़ नहीं। तुममें शिकायत करने लायक कुछ है ही नहीं। तुम सीरियस टाईप हो, सॉलिड। तुम कभी झूठ नहीं बोलते, किसी को खुश करने के लिए भी नहीं। तुम अपने परिवार से बेइंतहा प्यार करते हो और ये तमाम कुर्बानियां उनकी बेहतरी की ख़ातिर ही है। तुम परंपराएं नहीं तोड़ते, झूठे वादे नहीं करते और जो कहते हो, उसपर कायम रहते हो। तुम्हें मुझपर अटूट भरोसा है और तुम्हें निराश करना मेरे लिए अक्षम्य अपराध हो शायद।

लेकिन स्ट्रॉन्ग तो मैं फिर भी नहीं कहलाना चाहती। मेरी कमज़ोरी माफ़ करो और मुझे कमज़ोर ही बने रहने दो क्योंकि तुम्हारी गैरहाज़िरी में तुमसे प्यार करते-करते मैं और कमज़ोर पड़ने लगी हूं।

तुम्हारी पुरानी गाड़ी में 'अनुपमा' का कैसेट बजा करता था। जाने क्यों सुबह से उसी फिल्म का एक गीत लूप में बजा रही हूं।