Monday, June 17, 2013

गर्मी छुट्टी डायरिज़: जापानी कहानी और टूटा हुआ चांद

दिन भर हम क्या करते रहते हैं, एक यही सवाल बस न पूछो। दिन फिर भी कैसी-कैसी बेचैनियों में निकल जाता है। जेठ  की दोपहर में एक ज़रूरी काम धूप की चाल के साथ-साथ अपने बैठने-सोने की जगह बदलना भी है। रात जिस कमरे में पुरवैया का इंतज़ार करते बीतती है, वो कमरा पौ फटते ही छूट जाता है। सुबह उमसभरी हैं इन दिनों और हवाएं सुबह-सुबह आती हैं हल्की-हल्की। इतनी ही हल्की, कि पूअर्स मैन दार्जिलिंग पूर्णियां में होने का भ्रम न टूटे। इसलिए बेचैनी में कभी आंगन में, कभी छत पर बाद-ए-सबा की पूंछ पकड़ने की कोशिश में सुबह के कोई एक घंटे को निकल ही जाते हैं।

बाकी के एकाध घंटे खिड़की पर लटके हुए आमों को गिनने में जाते हैं - कल दोपहर चौंतीस थे दाईं डाली पर। आज उनतीस हैं। उसमें भी एक को तोते ने जूठा कर दिया। फिर मां के पीछे-पीछे छत पर। मां कबूतरों को दाने डालती हैं और मैं देर तक देखती रहती हूं कि कौन-सा जोड़ा उड़कर किस ओर जा रहा है। अगली सुबह उनको पहचानने का खेल। सफ़ेद गर्दन वाले मटमैले कबूतर को तो यादव जी के घर की मुंडेर पर जाते देखा था, फिर आज मिथिलेश अंकल के घर की तरफ़? गहरी धारियों वाला सफ़ेद कबूतर रंगभूमि मैदान की तरह, बाएं पैर से उचक कर चलने वाला पीले वाले मकान की तरफ़... सबके अपने पते। सबके अपने घोंसले। सबका अपना काम।

बच्चों के उठने के बाद थोड़ी-सी हलचल नहीं। ब्रश करो, नहाओ, दूध पियो, आम खाओ की धाराप्रवाह हिदायतें। उसके बाद फिर लंबी ख़ामोशी। बच्चों को ख़ुद से ही फ़ुर्सत नहीं। उनके पास मसरूफ़ रहने के इतने तरीके हैं कि उनसे रश्क़ होता है। और नहीं तो रामजी के किसी तोते को पालतू बनाने लगेंगे। किसी बिरनी के पीछे आधे घंटे दौड़ लगाएंगे। कबूतरों को पानी देंगे। उन्हें रोटी के टुकड़े खिलाएंगे। काग़ज़ के हवाई जहाज़ बनाएंगे और उन्हें अपनी फ़ूकों से उड़ाएंगे। आम की टोलियां बनाएंगे और उनके बीच बिठाएंगे आमदेव महाराज। हर लम्हा एक नया फ़साना, हर घंटे एक नई कहानी। उनकी नज़रों से देखती रहती हूं तभी तक सबकुछ ठीक लगता है। उनकी कसौटी पर कसते हुए ख़ुद को सही-ग़लत का पाठ पढ़ाती रहती हूं। मैं उन्हें अनुशासित नहीं करती, वो मुझे करते हैं। मैं उन्हें बड़ा नहीं कर रही, वो मुझे कर रहे हैँ। सारी कोशिशें उन्हीं की ख़ातिर है। ज़िन्दगी के किताब का उनवान भी वही, अंजाम भी वही।

दोपहर होते-होते एक और खेल शुरू हो गया है। पुराने बक्सों से बच्चों के कपड़े निकल आए हैं। दोनों एक-एक करके उन कपड़ों को ला-लाकर डायनिंग टेबल पर रखते जाते हैं, जहां मैं बैठकर एक रिपोर्ट लिखने की नाकाम कोशिश कर रही हूं। मोज़े उंगलियों में आ जाते हैं, टोपियां सिर में बांध ली जाती हैं, पायजामे गले का हार बन गए हैं, एक पुराने दुपट्टे की आद्या ने साड़ी लपेट ली है, आदित ने शॉल की धोती बना ली है। खेल कई घंटे चलता है, और मैं काम छोड़कर उनके एक-एक कपड़े की याद ताज़ा करने में लग गई हूं। ये जंपसूट कोलकाता से लिया था, ये लाल टोपी चाची ने बनाई थी, ये नीली फ्रॉक लिंकिंग रोड से आई थी... फिर संभालती हूं खुद को। बच्चों को देखो - यादों को भी खेलने का सामान बना लिया। कितने मशगूल फिर कैसे उदासीन! और एक हम हैं कि जहां होते हैं, वहां होते नहीं और जहां होना नहीं चाहिए, अक्सर वहीं होते हैं।

खेल समेट लिया गया है और अब पूरी संजीदगी के साथ नया खेल शुरू हो गया है। एक बाबा के सिर की बनफूल से चंपी कर रहा है, दूसरा पीठ पर पाउडर मल रहा है। बाबा बच्चे हो गए हैं, बच्चे बाबा। हम दोनों पार्टियों के लिए चीयर कर रहे हैं। अचानक बच्चों को टीवी की याद आई है। डोरेमॉन, नोबिता, शुज़ुका, जियान और सुनियो के बग़ैर इतने दिन कट गए, यही कम है? फिर ढेर-सारा टीवी है और ममा की ढेरी-सारी कोफ़्त है। इतनी ही कि मैं उन्हें सज़ा सुना देती हूं - जो टीवी पर देखो वो मुझे कहानी लिखकर दिखाओ, पांच लाईन में। दोनों बच्चों ने हामी भर दी है।

अब शाम है, छत है और झूला है। आद्या मुझे आसमान पर टंगे टूटे हुए चांद की कहानी सुना रही है। चांद तारों के साथ आसमान में लुका-छिपी  खेल रहा होता है, इसलिए कभी पूरा दिखता है कभी टूटा हुआ। राकासुर चांद को निगल जाना चाहता है ताकि उसकी दुल्हन को ले जा सके, लेकिन चांद की दुल्हन हर बार कूदकर ज़मीन पर आ जाती है और भाग जाती है। जिस रात राकासुर के आने का डर नहीं होता उस रात चांद अपनी पूरी शक्ल दिखा कर दुल्हन को वापस आसमान आने को कहता है...

कहानी के बीच में मुझे कुछ याद आता है...  

"ममा ने जो काम दिया वो किया?"

"किया ममा। पांच लाईन्स क्या, एक पेज लिख दिया। लेकिन आपको जापानी पढ़नी थोड़े आती है!"

मैं हंस देती हूं और सोचती हूं कि ऐसे दिन बहुत अच्छे होते हैं कि जिस दिन आप अपने बच्चों से टूटे हुए चांद की मनगढंत कहानियां सुनते हैं। उस दिन ख़ुद के किए कई बड़े फ़ैसलों पर यकीन पुख़्ता हो जाता है।   


6 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बच्चे तूफानी,
पढ़ते जापानी।

ब्लॉग बुलेटिन said...

आज की ब्लॉग बुलेटिन जेब कट गई.... ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Vivek Rastogi said...

यकीन पुख्ता करने के लिये बच्चों का आत्मविश्वास ही काफ़ी है ।

Ramakant Singh said...

लाजवाब यादें बचपन बच्चे और शरारत वाह

Ashok Pande said...

बहुत बढ़िया!

Sunita Shanoo said...

आज पहली बार पढ़ा यह ब्लॉग मैने बहुत अच्छा लगा... ऎसा लगा खुद लिख रहे हैं... सारी सच्ची बातें...