Sunday, June 16, 2013

गर्मी छुट्टी डायरिज़ में हैप्पी फ़ादर्स डे

ठीक-ठीक याद नहीं कि साल कौन सा था। १९९४ शायद। मैं दसवीं में थी, और तब तक दोस्ती, यारी, वादे-शिकवों, ख़्वाब-ख़्वाहिशों के साथ अज़ीज़ रिश्तों की समझ और उन रिश्तों पर अपनी राय रखना भी आ गया था। ये राय आर्चीज़ और हॉलमार्क के ग्रीटिंग कार्ड्स से लेकर फ़ुटपाथ पर मिलने वाले पोस्टरों के ज़रिए कमरों में चिपकाकर ज़ाहिर होती थी। मुझे लगता नहीं कि उस वक्त मदर्स डे या फादर्स डे का बाज़ार आर्चीज़ या हॉलमार्क इतना बड़ा बना पाया होगा और रांची जैसे शहर में भी इतना बड़ा हो पाया होगा कि ठीक उसी मौके के लिए मैंने वो एक पोस्टर खरीदा हो। लेकिन माया एंजेलो की कविताओं वाले कार्ड्स तब रांची में भी ख़ूब बिका करते थे और मैं उन्हें ख़ूब खरीदा करते थी। उसी क्रम में दो पोस्टर्स खरीदे और अपने कमरे में रखे गोदरेज पर चिपका दिया। एक पोस्टर में था कि एक चिड़िया अपने घोंसले में बैठे तीन बच्चों को दाना देनी बैठी है, और तीनों  बच्चे उसकी ओर मुंह खोले ताक रहे हैं। उस पोस्टर पर लिखा था - मदर्स आर दे ग्रेटेस्ट इन द वर्ल्ड - मांएं दुनिया में सबसे महान होती हैं। एक और तस्वीर थी जिसमें तीन रंगीन भालू एक दूसरे को गले लगाए आंखें मींचे प्यार जताए खड़े थे। उन तीनों पर (शायद मैंने ही) हम तीनों भाई-बहनों का नाम रख दिया था। अब याद आता है कि हमारी इस छोटी-सी दुनिया में एक-दूसरे के लिए प्यार का इज़हार करने, एक हज़ार झगड़ों के बाद भी  साथ जीने-मरने की कसमें खाने के बीच जो पांचवां शख्स गायब था, वो थे पापा।

इसलिए क्योंकि पापा अक्सर ग़ायब ही हुआ करते, और हाज़िर होते भी तो इस तरह दूर कि उनसे और ज़्यादा दूरी बनाए रखने में हम भलाई समझते। मम्मी के इर्द-गिर्द हमारी दुनिया घूमती थी। हमें सुलाना-उठाना-खिलाना-पढ़ाना-सज़ा देना-समझाना, सब मम्मी की ज़िम्मेदारी थी। पापा को नतीजों से मतलब था। हर रोज़ हमारे छोटे-छोटे काम किया करती मम्मी और हमारे बढ़े हुए नाख़ून और बिखरे हुए बाल नज़र आते पापा को। हर रोज़ हमें नहलाती मम्मी, और सर्दियों में खुश्क पड़े हमारे हाथ-पांव नज़र आते पापा को। हर रोज़ हमारा होमवर्क कराती मम्मी, और टीचर की आंखों में धूल झोंककर रिपोर्ट कार्ड्स पर किए गए फ़र्ज़ी दस्तख़त नज़र आ जाते पापा को। हर रोज़ हमें प्यार-दुलार करती मम्मी और रोल मॉडल बना दिया जाता पापा को। इसलिए क्योंकि मम्मी हर वक्त अवेलेबल (मुझे इस एक शब्द के लिए हिंदी में कोई बेहतर शब्द नहीं सूझा) होती, इसलिए हम उनको ग्रान्टेड ले सकते थे। पापा दूर थे, कम वक्त के लिए साथ होते इसलिए उन्हें ख़ुश करना, ख़ुश रखना हमारा कर्तव्य होता। उनका कहा पत्थर की लकीर था, उनके तौर-तरीके हमारे लिए आदर्श।

अब समझ में आता है कि तब के पापा लोग ऐसे ही हुआ करते थे। तब अपने बच्चों को गोद में उठाना एक संयुक्त परिवार में शर्म की बात मानी जाती थी। आप अपने भतीजे-भतीजियों, चचेरे-ममेरे-फूफेरे छोटे भाई बहनों को गोद में लेकर उनसे प्यार जता सकते थे, आपके अपने बच्चों पर उस दुलार का अधिकार नहीं था। ये ग़ज़ब की परंपरा थी जो आज तक मुझे समझ में नहीं आई। मेरे परिवार में सबको पापा जैसा प्यार मिला - लेकिन किसी को अपने पापा से नहीं - किसी को बाबा से, किसी को बड़े पापा से तो किसी को चाचा से। सब पापा लोग प्यार करते थे, लेकिन अपने बच्चों को नहीं।

पापा को हमारे पास नज़दीक आते-आते, हमसे खुलते-खुलते कई साल लगे। मुझे अब लगता है कि बिचारे पापा ने इसके लिए ख़ूब मेहनत भी की होगी। आख़िर एक पुश्तैनी परंपरा को तोड़ना आसान तो है नहीं। हमारे लिए पापा सिर्फ चुनौतियां सामने डालने का काम करते, हमें करियर में और अच्छा करने के लिए कभी तल्ख़ी से कभी प्यार से पीछे से धक्के लगाते। पापा इस क़दर अनप्रेडिक्टेबल थे कि ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि कौन-सी छोटी बात गुनाह क़रार दी जाएगी और कौन-सा बड़ा अपराध नज़रअंदाज़ कर दिया जाएगा।

एक वाकया याद है मुझे। पापा हमें अक्सर पन्नों की बर्बादी न करने को कहते और अपने कॉलेज के उन बड़े गणितज्ञों, वैज्ञानिकों की मिसालें देते जो पहले पेंसिल से गणित के समीकरण हल किया करते, और फिर उसी पन्ने पर पाइथागोरस थ्योरम की धज्जियां उड़ाते। (सच कहूं तो ये फ़ितूर मेरी समझ में कभी नहीं आया, वैसे ही जैसे मैथ्स नहीं आया)। ख़ैर, पापा को ख़ुश करने के लिए मैंने बड़ी मेहनत से पुराने पन्नों को इकट्ठा कर एक रफ़ कॉपी बनाई और उनके सामने एक दिन मैथ्स पढ़ने बैठी - अ ला ट्रू मैथेमटिशियन स्टाईल। पापा ने पूछा, ये क्या है? रफ़ कॉपी, मैंने फ़ख्र से कहा, पेंसिल से पहले दो चैप्टर्स कर लिए। अब अगले दो पेन से करेंगे। यूं कि इतना भर कर देने से अगले वशिष्ठ नारायण सिंह हमीं निकलेंगे। पापा ने वो बुरी तरह झिड़का, वो बुरी तरह झिड़का, वो बुरी तरह झिड़का कि हम उसी दिन तीन नई कॉपियां रघुनाथ चाचा की दुकान से लेकर आ गए थे। कहा कि हम पैसे नहीं कमाते कि तुम्हारी कॉपी खरीदने के लिए कोई पैसे नहीं देता जो ये तमाशा कर रही हो? सवाल ही नहीं था कि मैं पापा से बहस भी करती, या ज़ुबान से ये भी फूटता कि आप ही ने तो...

पापा के दिए हुए झिड़कियों के ज़ख़्मों पर बाबा मरहम लगाया करते थे, इसलिए मैं धीरे-धीरे ढीठ हो गई। लेकिन पापा ने सबसे मुश्किल लम्हों में मेरा हाथ थामा है, मेरा साथ दिया है। बारहवीं में मेरे नतीजे अच्छे नहीं आए थे। मैं जैसे स्टूडेंट रही बचपन से, उस लिहाज़ से तो बिल्कुल नहीं। जिस पापा ने कभी सिर पर हाथ तक नहीं रखा था प्यार से उस पापा ने पहली बार मुझे गले से लगाया था। मैं उनके सीने से लगकर सिसकियां लेती रही और पापा ने कहा, ये एक ख़राब रिज़ल्ट तुम्हारी ज़िन्दगी का रूख़ बदल देगा। वही हुआ। आज सोचती हूं कि पापा ने उस दिन गले से लगाकर सिर पर हाथ नहीं फेरा होता तो छोटी ईया की नींद की गोलियों के तीन पत्ते तो मेरे हाथ में आ ही गए थे। बाकी, जॉर्जेट का एक दुपट्टा भी सिरहाने रख लिया था। उस पापा ने मुझे ऐन मौके पर डूबने से बचा लिया, जिन्होंने मुझे कभी तैरना सिखाया ही नहीं।

पापा दूसरी बार पापा जैसे कब लगे, वो वाकया सुनाती हूं। मेरी विदाई के दिन मैं दहाड़ें मार-मारकर रोई थी (जी, विदाई में मेरा रोना एक किंवदंती बन चुका है)। ये ज़िन्दगी में दूसरी बार मैं पापा के गले लगकर रोई थी। बहुत रोई थी। जाने कौन सा गुबार था कि यूं निकला था। इतना ही रोई थी कि पापा और मुझे अलग करने में चार लोगों को लगना पड़ा था। गाड़ी घर के आंगन से निकल गई। भाई ने विदा होती बहन को पानी का आख़िरी घूंट पिला दिया, आख़िरी बार पैर पखार दिए। गाड़ी गली से निकलकर स्टेशन पहुंच गई और मैं ससुराल आने के लिए ट्रेन में बैठ गई। पापा स्टेशन छोड़ने नहीं आए थे। दोनों भाई साथ पूर्णियां आ रहे थे, इसलिए ट्रेन के निकलते-निकलते तक मैं सहज हो गई थी और शाम तक पूरी तरह सामान्य। अगली सुबह पापा का फोन आया था। हम अभी ट्रेन में ही थे, भागलपुर पहुंचे नहीं थे। नेटवर्क ठीक था नहीं इसलिए दो-एक बार की कोशिश में मुझे पापा की आवाज़ सुनाई पड़ी। पापा - मेरे पापा - मेरे स्ट्रॉन्ग और एक हद तक दुनिया से विरक्त होने का दावा करने वाले पापा बड़ी मुश्किल से इतना पूछ पाए थे कि तुम ठीक तो हो। उसके बाद फोन के दूसरी तरफ़ पापा की न थमने वाली सिसकियां थीं, और इधर मैं फ़ोन पकड़े  ट्रेन की सीट पर बैठी हैरान-परेशान। बाद में मम्मी ने फ़ोन करके बताया कि पापा मेरी विदाई के बाद लगातार रोते रहे - पूरा दिन, पूरी शाम, पूरी रात। खाना तक नहीं खाया।

तब से मेरी और पापा की दोस्ती हो गई है लेकिन पापा के साथ एक सार्थक बातचीत, एक सार्थक डायलॉग अभी भी कम ही होता है। हमारी बातचीत अक्सर एकालाप होती है - या तो मैं बोल रही होती हूं या पापा अपने मन की भड़ास निकाल रहे होते हैं। लेकिन मेरे बाल में तेल लगाना, सिरदर्द होने पर मेरी हथेली की नसों को दबाकर मेरा इलाज करना, मेरे कमरे में आकर एक कोना पकड़कर ख़ामोशी से अख़बार पढ़ना और मम्मी से हुई लड़ाई के बावजूद मुझे फ़ोन करके हमारी परवरिश में मम्मी के सारे त्याग-पुण्य गिनाना - हमने बाप-बेटी के अपने रिश्ते में ये मुक़ाम तो हासिल कर ही लिया है। अपने पति में मुझे पापा की पचहत्तर कमियां, उनासी गुण नज़र आने लगे हैं। मेरे हिसाब से पापा के लिए मेरे प्यार की ये इंतहा है। बाकी हैप्पी फ़ादर्स डे तो आता-जाता रहेगा कि अब तो आर्चीज़ और हॉलमार्क के कार्ड्स की तरह माया एंजेलो की कविताओं से भी मन उचटने लगा है।
मेरे पापा के साथ मेरी बेटी, और एक वो लम्हा जिससे रश्क होता है :)



     

7 comments:

अनूप शुक्ल said...

बहुत प्यारा आत्मीय सस्मरण!

प्रवीण पाण्डेय said...

कोमल और भाव भरा..

abhi said...

Loved it!!

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की फदर्स डे स्पेशल बुलेटिन कहीं पापा को कहना न पड़े,"मैं हार गया" - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Mukesh Kumar Sinha said...

ahsaaso bhara komal sa sansmaran :)

Pallavi saxena said...

बहुत ही कमाल का लिखा है।

jyoti khare said...


सच पिता जी ऐसे ही होते हैं
मन के भीतर पनपती सुंदर और सच्ची अनुभूति
पिता को नमन
सादर

आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों
पापा ---------