Friday, December 14, 2012

तुम काबिल हो, काबिल-ए-तारीफ़ हो

बेहद बेतकल्लुफ़ी वाली शाम थी वो... एक हल्की-सी सर्दी वाली शाम कि जब माहौल का तक़ाज़ा होता है उम्र और अनुभव के अंतर को भुलाकर उस बेतक़ल्लुफ़ी, उस अनौपचारिकता की रौ में बहते हुए वो कहना और सुनना, जो कभी कहा नहीं... या जिसपर हम कभी चर्चा करते नहीं। उस बेहद उम्दा लेखक और कवि ने ये बताते हुए कि मुझसे पाला कैसे पड़ा, मेरे ब्लॉग की चर्चा की और कहा, "ब्लॉग पढ़ा तो लगा, लड़की तो काबिल है!"

मुझे खुश होना चाहिए था, इसे कॉम्प्लिमेंट की तरह लेना चाहिए था, और देर तक मन-ही-मन इस बात पर इतराना चाहिए था... लेकिन जाने क्यों मैं बहुत भीतर तक उदास हो गई थी। अगले कई घंटों तक मैं इस बारे में सोचती रही थी, कि मैं इस बात को लेकर इतनी परेशान क्यों हूं, और इतनी उदास क्यों। किसी को काबिल कहना गाली थोड़े ना होती है?

पिछले कुछ दिनों में अपने बीमार बेटे के सिरहाने बैठे हुए मुझे उस उदासी का सबब समझ में आया है। ये समझ आया है कि काबिलियत अभिशाप क्यों बन जाती है कभी-कभी।

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सुबह मैं फिर भी अपने लिए थोड़ा-सा वक्त निकालकर पीठ की मरम्मती के लिए अपनी फिज़ियोथेरेपिस्ट और योगा इंस्ट्रक्टर के पास चली आई हूं। वो ट्रैक्शन मुझे दे रही हैं, लेकिन बात बगल वाले बिस्तर पर लेटी शालिनी से कर रही हैं।

शालिनी ग़ज़ब की ख़ूबसूरत है। मुझे हाल ही में पता चला कि वो फै़शन डिज़ाईनर और कोरियोग्राफर रही है। थी, अब नहीं है। अब सिर्फ़ एक बीवी, एक मां है। पति को दफ़्तर भेजने, बाई के आने और बच्चों को स्कूल से लाने के बीच का समय अपने सुनहरे दिनों का मातम मनाते हुए काटती है।

हमारी 67 साल की इंस्ट्रक्टर मेरी पीठ की मालिश करते हुए उसके कुचले हुए आत्मविश्वास पर मरहम लगा रही हैं।

"हम औरतें ग़ज़ब की एडैप्टेबल होती हैं, हर हालत में अपने लिए रास्ता बना लेती हैं। तुम चाहोगी तो अपने लिए रास्ता निकाल ही लोगी कुछ ना कुछ। और फिर शिकायत किससे है? ये सब तुमपर थोपा तो नहीं गया था? या तो समझौते करना सीखो, खुश होकर हर हाल में ज़िन्दगी जियो; या फिर तुम्हारे वजूद पर आ पड़ी है तब अपने हालात बदलो। इन दोनों स्थितियों में शिकायतें फिर भी ऐक्सेपटेबल नहीं है।"

फिर रुककर मिसेज सिंह कहती हैं, "कभी पूछना ख़ुद से ईमानदारी से... तुम एम्बिशस तो नहीं हो रही?"

हो सकता है दर्द स्लिप्ड डिस्क का ही रहा हो, लेकिन उसके चेहरे पर मैं कुछ और पसरते हुए देखती हूं।

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बालकनी में उल्टियां किए हुई बेडशीट्स को धोकर, निचोड़कर, झाड़कर पसारते हुए सामने वाले अपार्टमेंट की शिखा से नज़रें मिलती हैं। हम एक-दूसरे को देखकर हाथ हिला देते हैं। वो भी ऐसी ठंड में चादर ही धोकर पसार रही है।

शिखा ने मैथ्स में एम.एससी. किया है, और एम.एड. भी। हो सकता है मुझे गलत याद हो, लेकिन शायद उसने यही बताया था कि जीबी पंत यूनिवर्सिटी में टॉप किया था उसने। उसका बेटा मेरे बच्चों से ठीक एक दिन बड़ा है। एक लकवाग्रस्त सास और एक बेहद बूढ़ी ननिया सास की देखभाल करने के बाद जो वक्त मिलता है, शिखा उस वक्त में खाना बनाती है, पांच दिन पति को अलग-अलग किस्म का लंच पैक करके देती है, बच्चे को स्कूल छोड़ने और लाने जाती है, उसे कराटे सिखाने ले जाती है और बीच में सब्ज़ियां, दूध और राशन भी ले आती है। बाकी समय कपड़े धोने और वहीं बालकनी में बैठकर बेटे को होमवर्क कराने में निकलता है।

मैं आठ सालों में कुल तीन बार उसके घर गई हूं, दसियों बार बुलाने के बाद। उसके घर का भारीपन मुझे बेचैन कर देता है।

रात-रातभर जागकर जब उसने इम्तिहानों की तैयारी की होगी तो ऐसी ही किसी ज़िन्दगी का ख़्वाब देखा होगा? वो किसे दोष दे? उसकी काबिलियत का क्या मोल है?

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रुचि आर्टिस्ट है। थी। है नहीं। उसकी जागरूकता, वाक्पटुता और प्रेज़ेन्स ऑफ माइंड मुझे हैरान करता है। हर मुद्दे पर वो स्पष्ट राय रखती है और किसी बहस में उसकी तर्कशक्ति कई बार हैरान करती है। हर बार सोचती हूं, अपनी बेटियों को पढ़ाते हुए ये औरत खुद कितना पढ़ती होगी!

लेकिन रुचि फिर भी वो आर्टिस्ट थी जो अब नहीं है। उसकी कलात्मकता घर के बजट का टाईटरोप वॉक है। उसने अपनी बेचैनी को बड़ी सलीके से बांध रखा है। उसमें ग़ज़ब का ठहराव है। लेकिन उस ठहरी हुई झील के ऊपर अक्सर कोई-ना-कोई कंकड़ फेंक जाता है, इतनी काबिल हो तो कुछ क्रिएटिव क्यों नहीं करती? जो काबिलियत इस्तेमाल में ना आए, उसका क्या मोल?


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उर्मिला को मैं सोलह सालों से जानती हूं - कॉलेज में थी तब से। अपने रहन-सहन की बेतरतीबी को वो अपनी सलीकेदार पढाई-लिखाई और काम से ढंकती रही है। गृहस्थी ने उसे आखिरकार घर भी सलीके से रखना सिखा ही दिया। जिस उर्मिला से हमें अव्वल दर्ज़े की पब्लिशर बनने की उम्मीद थी, वो धीरे से मुझसे कहती है, "इट्स अ टफ़ बैटल दैट वी आर फाइटिंग।" है ही। दो नावों पर सवार होना, एक ख़्वाब देखना और एक हकीक़त जीना... दोनों फ़ैसले तेरे ही तो थे। फिर भी, तू काबिल है उर्मिला। कोई ना कोई रास्ता बना ही लेगी। ज़िन्दगी की जंग में रोज़-रोज़ के एम्बुश को कोई याद नहीं रखता, तू भी भूल जाएगी।

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बच्चों को वक्त पर दवा देते हुए... बिस्तर पर बैठे हुए उनका होमवर्क कराते हुए... मटर-पनीर बनाते हुए... अपना हाथ जलाते हुए... वॉशिंग मशीन चलाते हुए... आलू छीलते-छीलते लफ्ज़ों की तरतबी समझने की कोशिश करते हुए... डस्टिंग करते-करते कई काबिल लड़कियों और औरतों को याद करते हुए मैं सोचती हूं कि काबिलियत भी शायद हालात का शिकार होती है। काबिलियत पर हमारा नेकदिल होना, हमारा दूसरों के बारे में सोचते जाना, घर-संसार सलीके से बचाए रखने के लिए खुद को तोड़ते जाना भारी पड़ जाता है।

इसलिए सोचती हूं, मैं काबिल होऊं या ना होऊं, काबिल-ए-तारीफ़ ज़रूर हूं। मैं काबिल इसलिए नहीं कि चार आड़े-तिरछे शब्दों को सलीके से रखने का हुनर आता है। मैं और रुचि, शिखा और उर्मिला, शालिनी और मिसेज सिंह... सब काबिल इसलिए हैं क्योंकि हमने घर और बाहर का, ख्वाब और हकीक़त का, रंग और खुशबू का, सब्र और हिम्मत का संतुलन साधना सीख लिया है। हम घर भी बचाए हुए हैं, अपने ख्वाबों को भी मरने नहीं दिया है अभी। मुझे अपनी दोस्त वर्षा मिर्ज़ा का कहा याद किया है, "उम्मीद अभी ज़िंदा है क्योंकि संवेदनाओं से भरा ये मन ज़िंदा है अभी।"

ये लिखते हुए कहीं भीतर तक धंसी हुई तवील उदासी छंट गई है और इस भीड़ में देर से ही सही, अपने लौट आने की उम्मीद रौशन हुई है कहीं।   


 पोस्टस्क्रिप्ट: ये पोस्ट लिखते-लिखते मेरे इन्बॉक्स में एक अटैचमेंट आया - दो महीने पुरानी एक तस्वीर, जिसमें मेरी जैसी कुछ और काबिल औरतें हैं और एक वर्कशॉप में हिस्सा लेने आई थीं... बाएं से अनु जैन, जो दो बच्चों की मां है और जब कहानियां सुनाती हैं तो हम तालियां बजा-बजाकर उसका मज़ा लेते हैं; जिमली बोरा जो प्रोफेशनल फोटोग्राफर है और जब बच्चों से फुर्सत में होती है तो रेकी हीलिंग देती हैं, अंग्रेज़ी की बेहद उम्दा कवयित्री हैं; योर्स ट्रूली; अलका शर्मा, जिसकी आवाज़ आपके बच्चे छोटा भीम और डोरेमॉन समेत कई कार्टून कार्यक्रमों में सुनते होंगे; मिसेज़ अनूपा लाल जिन्होंने तकरीबन पच्चीस किताबों का अनुवाद किया है और मशहूर चिल्ड्रेन्स राईटर हैं; और गुल, जो प्रोफेशनल स्टोरीटेलर हैं, कहीं भी पांच-सात बच्चों को बिठाकर कहानियां सुनाना शुरू करना इनका प्रिय शगल है और इनके हाथ का खाना खाकर वाकई उंगलियां चबाने का मन करता है। काबिल औरतें, जिनकी काबिलियत एक-ना-एक दिन अपना मुकाम पाएगी। ढेर सारा मुस्कुराते हुए ये तस्वीर मैं यहां लगा रही हूं। 

17 comments:

Sonal Rastogi said...

इस कड़ी में कितने अनजाने चेहरे जुड़ेंगे अनु ..एक सी कहानी वाली ढेर सी औरते

PD said...

अलका शर्मा जी किस कैरेक्टर को अपनी आवाज दी हैं? कुछ और जानकारी मिल सकती है क्या?

Anju (Anu) Chaudhary said...

हम भी आप जैसी ही है :)

Piyu said...

जाने कई और महिलाओं की भी ऐसी ही कहानी मिलेगी। एक साथ कई मोर्चों पर मुस्तैदी से डटे हुए। हम सब की कहानी एक जैसी ही है। मेरे पोस्ट पर भी आपके कमेंट की प्रतिक्षा रहेगी।

Neeta Mehrotra said...

हम औरतें ग़ज़ब की एडैप्टेबल होती हैं , हर हालत में अपने लिए रास्ता बना लेती हैं ........ फिर शिकायत किससे है   ........ जिन्दगी का ख़वाब देखना और एक हकीकत जीना .........
अनु जी....सच कहूँ तो दर्द याद दिला गया ...... हमेशा से यही सोचती रही कि क्या औरतों के भी घर होते हैं ..... घर तो पिता का , पति का या भाई का होता है ..... उसी को औरत अपना मानने के भ्रम में ताउम्र जीती रहती है ......
बहुत सुन्दर चित्रण किया है आपने ...... बातें छोटी जरूर दिखती हैं पर हैं बहुत गहरी .....
सादर.... आभार .

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

उम्मीद अभी ज़िंदा है क्योंकि संवेदनाओं से भरा ये मन ज़िंदा है अभी।"

बहुत सी स्त्रियॉं की कहानी कहता सार्थक लेख

Anupama Tripathi said...

। ढेर सारा मुस्कुराते हुए ये तस्वीर मैं यहां लगा रही हूं।

ये मुस्कान बनी रहे ....खिली रहे ....!!
सार्थक आलेख ...शुभकामनायें ....

सदा said...

एक-ना-एक दिन अपना मुकाम पाएगी।
बिल्‍कुल ...

vandana gupta said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (15-12-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

प्रवीण पाण्डेय said...

एक बढ़े पग, एक छूटता।

Arvind Mishra said...

काबिल-ए-तारीफ़!ये जज्बा ये जिजीविषा कायम रहे -सभी का ,शुभकामनाएं!
यथार्थ और फंतासी का एक मिलन बिंदु भी तो होता है न !

Shilpa Agrawal said...

बहुत दिनों पहले लिखी अपनी ही पंक्तियाँ याद आ गयीं ---
ख्वाहिशों की बात मत पूछिए ,
ये तो एक सौगात हैं ,
पूरी हो ना हो चाहे कभी ,
बंदिशों से तो आज़ाद हैं ।

आपकी पोस्ट पढ़कर , कुछ दिन के लिए सकारात्मक ऊर्जा मिली है , कुछ ना कर पाने का डिप्रैशन हम जैसे लोगों के आस- पास हवा में फ्लू के वायरस की तरह छुपा रहता है, ज़रा सा susceptible होते ही तुरंत जकड़ लेता है । जो कर रहे हैं उसमे क्रिएटिविटी ढूँढ ले अगर तो वो immuno -booster का काम करता है ।
इतनी सकारात्मक पोस्ट के लिए आपको बधाई देना तो बनता है ।

अनूप शुक्ल said...

काबिल और काबिलेतारीफ़ लोगों को शुभकामनायें।

Nidhi Tandon said...

बढ़िया लेख.

expression said...

बहुत अच्छा लगा ये पोस्ट पढ़ कर.....
ऊर्जा का संचार हुआ मन में....
सभी को बधाई!!!!
शुक्रिया अनु

अनु

Sadhana Vaid said...

बेहतरीन आलेख है अनु जी ! आपने जिनकी कहानियाँ लिखी सचमुच वे काबिले तारीफ़ हैं लेकिन कई कहानियाँ अनकही भी रह जाती हैं जिनका मोल कोई नहीं आँका पाता और उनकी उनके सपनों के लिए कोई आसमान भी उन्हें नहीं मिल पाता लेकिन 'काबिल' वो भी हैं ! आपका आलेख पढ़ कर कई ऐसी महिलाओं को बहुत तसल्ली मिलेगी ! आभार आपका !

स्पाईसीकार्टून said...

लेख बहुत बढ़िया है परंतु तस्वीर उससे भी बहिया लेकिंग तस्वीर मैं खड़ी महिलाओं से जो प्रेरणा मिलती है वो सर्वोत्तम है।