Wednesday, December 5, 2012

कहानी से कमीनी ये ज़िन्दगी

ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए पिछले तीन दिनों की खुशनुमा यादों की जुगाली करनी थी, नए ख़्वाबों और इरादों का च्विंग गम बनाना था और दिमाग में कच्चे-पक्के रोडमैप तैयार करने थे। ज़िन्दगी आख़िर इन्हीं इरादों की इमारतों में जाकर डेरा बनाती होगी। इरादों की हवाई इमारतों को धराशायी करने के लिए हवा का एक झोंका, किसी बददिमाग लम्हे की एक फूंक काफ़ी होती है।

वही हुआ।

ट्रेन छूटने के ऐन पहले मेरे बगल की सीट पर बैठने आए शख्स को देखकर मैं मन-ही-मन सोचती हूं, हुई छुट्टी इरादों की। यहां तो अगले सात घंटे खुद को संभालने में लग जाएंगे। कहते हुए शर्मिंदगी भी होती है कि आधी ज़िन्दगी गुज़ार लेने के बाद भी बात-बात पर दिल दफ्फ़तन धोखा दे देता है। तुम्हें दानिश्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम... बेइरादा उठ जानेवाली नज़र को जी भर के कोसते हुए मौका-ए-वारदात पर दिमाग हमेशा की तरह प्लेबैक सिंगिग करने लगा है।

अगले पंद्रह मिनट फेसबुक पर मज़ा लेते हुए कटे हैं। मन ही मन मुस्कुराने और अपने दिमाग से रंग-बिरंगे किस्से उपजाने का अलग ही मज़ा होता है। बातचीत शुरू होने की तो कोई गुंजाईश ही नहीं है। मैं बोलूंगी नहीं, और किसी अजनबी से कुछ बुलवा लूं, ये हुनर है नहीं। हाथ में अपना अख़बार है। मैंने कुछ और अख़बार निकालकर अपनी बगल वाली सीटों के पाउच में घुसा दिया है, इंडियन एक्सप्रेस के ऊपर। कनखियों से देखती हूं कि मिस्टर एक्स ने अख़बार निकाल लिया है और आगे-पीछे पलट रहे हैं। मेरे भीतर किसी ने बड़ी ज़ोर से बत्तीसी दिखाते हुए दांत निपोड़ा है। लेकिन मिस्टर एक्स ने बिना अंदर के पन्ने देखे अख़बार को वापस पाउच में क्या घुसाया है, मेरे अंदर से कुछ फूट पड़ा है, "मुझे लगता है आपको भीतर के पन्ने भी देखने चाहिए।"

मेरे इस अप्रत्याशित हमले से सकपकाए मिस्टर एक्स ने अख़बार वापस हाथ में ले तो लिया है, लेकिन उनकी निर्लिप्तता से मुझे कोफ़्त हो रही है। अजीब आदमी है। हाथ में इतनी इंटरेस्टिंग चीज़ है, लेकिन खोलकर देखना तक नहीं चाहता। आई हैव डिसाईडेड... आई डोन्ट लाईक हिम। पीरियड।

मैंने झल्लाहट में अख़बार की अपनी कॉपी खोल ली है और मन-ही-मन प्रूफिंग की गलतियां मार्क कर रही हूं। हम पूरी तरह एरर-फ्री अख़बार कब निकाल पाएंगे? फिर लाल स्याही वाली अपनी कलम निकाल कर गलतियों को घेरों में बंद करने लगी हूं।

"कैन आई बॉरो योर पेन प्लीज़?"

मिस्टर एक्स फोन पर हैं और नंबर नोट करने के लिए मुझसे कलम मांग रहे हैं।

"यू हैव वन पीपिंग आउट ऑफ योर पॉकेट," उस आदमी को लीड भर स्याही में डूब मरने का ताना सौंप कर मैं वापस अपने काम में लग गई हूं। अब तक फेसबुक पर आनेवाले सारे कमेन्ट्स का जवाब दे दिया है और अब कोई बात नहीं बढ़ाना चाहती।

आई शुडन्ट किल अदर्स फन, जस्ट बिकॉज़ आई वॉज़ लेफ्ट डिस्प्वाईंटेड। आत्मालाप चालू आहे।

"दिस वन डजन्ट वर्क। सिर्फ दिखने के लिए क्रॉस का पेन है। क्वायट यूज़लेस, दिस वन। कैन आई स्टिल बॉरो योर पेन?"

इज़ दिस द न्यू पिक अप लाईन, सोचती तो यही हूं, लेकिन कहती नहीं। पेन चुपचाप आगे बढ़ा दिया है। पर्स में पेन लेकर घूमने का अपना नफ़ा-नुकसान है।

"थैंक यू। आर यू ए टीचर?" पेन लौटाते हुए मिस्टर एक्स कहते हैं और मैं ज़रा भी हैरान नहीं होती। मुझसे ये बात बीसियों अजनबी पच्चिसियों बार पूछ चुके हैं। चेहरे पर गंभीरता और स्यूडो अक्लमंदी चिपकाए फिरने का भी अपना नफ़ा-नुकसान है।

"नहीं। द न्यूज़पेपर दैट यू जस्ट केप्ट अवे... मैं उसके लिए काम करती हूं।"

"ओह! मेरी हिंदी बहुत खराब है और कॉन्सेन्ट्रेशन तो उससे भी खराब। मैं लंबे-लंबे आर्टिकल्स नहीं पढ़ पाता।"

आई डेफिनेटली डू नॉट लाईक दिस मैन, मेरे भीतर से फिर कोई आवाज़ आती है। तो क्या हुआ अगर सॉल्ट एंड पेपर बाल हैं? तो क्या हुआ अगर इसकी आवाज़ बंटी जैसी है? तो क्या हुआ अगर इसकी लंबाई पापा जैसी है? तो क्या हुआ अगर इसका रंग मनीष जैसा है? तो क्या हुआ अगर गिफ्टी की तरह इसकी आंखें बात करती हैं? तो क्या हुआ अगर ये ठीक मेरे लेटेस्ट क्रश आदिल हुसैन जैसा दिखता है? और अगर ये आदिल हुसैन ही हुआ तो? मेरे भीतर की आवाज़ और ऊंची ना हो जाए, इस डर से मैं खिड़की के बाहर देखने लगती हूं। फोन पर हो रही बातचीत से तो लगता है, डॉक्टर है या फिर दवाओं की एजेंसी है इसकी। इतने प्यार से इतनी सारी दवाओं के नाम कोई और क्या लेता होगा?

दवा के नाम पर अपनी दवा याद आई है जो पिछले चार दिनों से मैं खाना भूलती रही हूं। सीट पर बैठे-बैठे मेरी पीठ अकड़ गई है और अब बैठा नहीं जा रहा। बेल्ट लगाना भी तो भूल गई। बेल्ट निकालने के लिए खड़ी हुई हूं और किसी तरह सूटकेस खींचकर उसमें से लम्बर बेल्ट निकाल लिया है। एक सूटकेस से जूझती महिला को देखकर मिस्टर एक्स के भीतर का क्षात्रधर्म जाग गया है और वो उठकर सूटकेस वापस रखने में मेरी मदद करते हैं।

"इफ यू डोन्ट माइंड... कैन आई सी योर बेल्ट?"

हद है यार! ये आदमी तो पीछे ही पड़ गया। जी में आया है, कह दूं, नन ऑफ योर बिज़नेस... लेकिन चुप रह गई हूं। शायद ये उसका 'बिज़नेस' हो... ठीक वैसे ही जैसे अख़बार मेरा था।

"आपको किसी ने ये बेल्ट प्रेस्क्राईब किया था?"

"ज़ाहिर है। वरना आठ सौ रुपए मुझपर भारी थोड़े ना पड़ रहे थे?"  

"किसने प्रेस्क्राईब किया था?"

"मेरे ऑर्थोपिडिक ने।"

"ऐन्ड हू इज़ दैट?"

यार, ये आदमी इतने सवाल क्यों पूछ रहा है?

"डॉ ए एन मिश्रा", मैंने फिर भी जवाब दे दिया है।

"सो यू लिव इन नोएडा?"

"जी, और डॉक्टर मिश्रा का क्लिनिल सेक्टर उन्नीस में है।"

"जानता हूं। इन्सिडेन्टली आई ऐम ऐन ऑर्थोपीडिक सर्जन ऐज़ वेल। आई लिव इन गुड़गांव।"

एल फाई-एस वन डिस्क प्रोलैप्स पर मुफ़्त में मिलने वाली कन्सलटेन्सी से शुरू हुआ किस्सा अगले तीन घंटे चलता रहा है।

"आई हैव नेवर टॉक्ड टू ए स्ट्रेंजर सो मच", ये मिस्टर, या रादर, डॉक्टर एक्स की नई पिक-अप लाईन हो सकती है, लेकिन मैं उन्हें यकीन दिलाती हूं कि ट्रेन में दोस्तियां करने और उन्हें सालों तक सहेज कर रखने में मुझे वो महारत हासिल है जिसपर मैं एक यात्रा-वृत्तांतनुमा संस्मरण लिखना चाहती हूं।

 इस संस्मरण में डॉक्टर एक्स को अहम जगह दी जाएगी क्योंकि मुझे किसी सहयात्री से हुई बातचीत के हिस्सों ने इतना बेचैन नहीं छोड़ा। तीन घंटे की बातचीत में ड़ॉक्टर एक्स अपनी उस बेटी के बारे में बताते रहे हैं जो स्पेशल चाइल्ड है। कड़वे शब्दों में कहें मानसिक रूप से विकलांग। डॉक्टर एक्स की पत्नी एम्स से पढ़ीं डॉक्टर हैं जिन्होंने अपनी बेटी की परवरिश और उसकी देखभाल के लिए अच्छे-ख़ासे करियर को छोड़ दिया। अब देखभाल की ज़रूरत बेटी को कम, मां को ज़्यादा है। डिप्रेशन ने नींद की गोलियों पर उनकी निर्भरता इस क़दर बढ़ा दी है कि कई बार वो रोज़-रोज़ के संघर्षों से आज़िज होकर नींद की गोलियों की शरण में चली जाती हैं। बारह साल हुए... प्रैक्टिस छूटी, दोस्त-यार छूटे, जीने के मायने बदले और मुट्ठी में जो आया, लाइलाज था - घर में कई डॉक्टरों के होते हुए भी।

 टुकड़ों-टुकड़ों में डॉक्टर एक्स की दर्दभरी व्यथा सुनकर इतनी परेशान हो गई हूं कि अब और कुछ सुनना नहीं चाहती। मुंह घुमाकर मैंने कानों में ईयरप्लग्स लगा लिए हैं। इनके पास अपनी ज़िन्दगी से भागने का कोई रास्ता नहीं, मेरे पास तो है। आई डोन्ट ओ एनीथिंग टू एनीवन। नॉट इवेन अ मोमेन्ट ऑफ पेन। फिर मुझे इतनी रुलाई क्यों आ रही है? प्लेलिस्ट में बजते एक गाने ने मुझे अधीर कर दिया है। अब आंसू छुपाने के लिए बाथरूम में जाना होगा।

मैं बहुत देर तक दरवाज़े के पास खड़ी रही हूं - बीबीएम और वॉट्सएप पर बेमतलब के संदेश भेजते हुए वक्त काटने की बेजां कोशिश में। शुक्र है प्लैटफॉर्म पर मुझे मेरी ज़िन्दगी मेरा बोझ थामकर मुझे घर ले जाने के लिए तैयार खड़ी होगी। शुक्र है मेरे पास भाग जाने की कोई ठोस वजह नहीं। अजनबियों की तकलीफ़ का सोचकर क्या दिल जलाऊं और क्या सोचूं कि कोई हल होगा इन परेशानियों का। क्या सोचूं कि बड़े अरमानों के साथ दो डॉक्टर बैचमेट्स ने शादी की होगी, परिवार बसाया होगा और फिर धीरे-धीरे सब बिखरता चला गया होगा। किसके लिए अफ़सोस करूं - उस पति के लिए जिसने अपनी बीवी को प्यार तो किया होगा लेकिन वक़्त और हिम्मत ना दे सकने के गिल्ट को अस्पताल में सोलह घंटों की नौकरी से कम करता होगा... या फिर उस बीवी के लिए, जिसके लिए कोई दुआ काम आएगी, इसका मुझे यकीन नहीं।

मैं सीट पर लौट आई हूं और डॉक्टर एक्स ने फिर से मेरी लाल कलम उधार मांगी है। काग़ज़ के एक टुकड़े पर कोई नंबर लिख रहे हैं। गॉड! आई डोन्ट वॉन्ट दिस!

"सुदेशना का है ये नंबर। आई डोन्ट नो वाई आई फेल्ट यू शुड स्पीक टू हर। यू आर सो सॉर्टेड आउट।"

सॉर्टेड आउट! Sorted out?

हंसूं या रोऊं, समझ में नहीं आता। मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?

ट्रेन दिल्ली प्लेटफॉर्म पर लग गई है। डॉक्टर एक्स ने मेरा सामान उतार दिया है और जाते-जाते कहा है, "डोन्ट डिपेंड ऑन द बेल्ट टू मच। आपके मसल्स को वीक कर देगा। इट वॉज़ अ प्लेज़र मीटिंग यू।"

मेरे हथेलियों में जो बची रह गई है, दिसंबर के पहले हफ़्ते की मीठी-सी ठंडक है और है एक पु्र्जा - सुदेशना के नंबर के साथ।

मनीष को आते देखकर मैंने वो पुर्जा वहीं किनारे ऐसे फेंका है कि जैसे किसी चोरी के पकड़ लिए जाने का डर हो। मनीष को तो मैं आज का वाकया बता ही दूंगी, लेकिन सुदेशना को कैसा लगेगा जानकर कि उसके पति ने किसी अजनबी को उसके स्पेस में घुसपैठ की इजाज़त दे दी? उसकी तकलीफ़ों का कच्चा-चिट्ठा खोल दिया? मैं भी तो इस पाप की भागीदार बनी हूं।

सॉरी, सुदेशना। समझ लेना कि तुम्हारे पति ने कुछ कहा नहीं और मैंने कुछ सुना नहीं... कि तुम भी फट पड़ना सीख ही जाओगी एक दिन, और कोई ना कोई रास्ता तैयार कर ही लोगी। हम सब अपने भीतर यूं भी आतिश-फिशां लिए चलते हैं। कोई क़तरा-क़तरा पिघलता है, कोई एक बार में फटता है। बर्बाद हम हर हाल में हो जाते हैं।

पोस्टस्क्रिप्ट: काश कि ये कोई कहानी ही होती, और याद शहर की कहानियों की तरह इसका रुख तय करना मेरे हाथ में होता। ये स्साली ज़िन्दगी, वाकई, कहानियों से ज़्यादा कमीनी होती है। मेरी प्लेलिस्ट कहां है यार?



   




16 comments:

mukti said...

'...कुछ सुना नहीं कि तुम भी फट पड़ना सीख ही जाओगी एक दिन, और कोई ना कोई रास्ता तैयार कर ही लोगी। हम सब अपने भीतर यूं भी आतिश-फिशां लिए चलते हैं। कोई क़तरा-क़तरा पिघलता है, कोई एक बार में फटता है। बर्बाद हम हर हाल में हो जाते हैं।'
बहुत अच्छा लिखा है.
मैं भी ऐसे ही उदास हो जाती हूँ किसी ज़िंदगी की कहानी से और फिर उसे झटक देती हूँ...सोचती हूँ कि काश ये सिर्फ एक कहानी हो, जबकि दुःख भरी कहानियाँ पढ़ने का शौक नहीं...

अनूप शुक्ल said...

डोन्ट डिपेंड ऑन द बेल्ट टू मच। आपके मसल्स को वीक कर देगा।

monali said...

लीड भर स्याही में डूब मरने का ताना ... jaisi lines k sath hansate hansate ye kissa jaane kahaan laa k chhod gaya... :(

Kishore Choudhary said...

मेरे हथेलियों में जो बची रह गई है, दिसंबर के पहले हफ़्ते की मीठी-सी ठंडक है और है एक पु्र्जा...

आपको पढ़ने में सुख है।

दीपिका रानी said...

ऐसा लग रहा था मानो कोई आंखो देखा हाल सुन रहे हों। मज़ा आया...

Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता said...

Kya kahoon? Kaun sunta hai? Kisee se kaha bhi to purja finkega hi n? :(

Sonal Rastogi said...

जब सारे जाने पहचाने रास्ते अपना लेते है तो बढ़ चलते है अनजान पगडंडियों पर शायद वह मंजिल तक पहुंचा दे ...

Mired Mirage said...

स्पेशल चाइल्ड का दिन भर ध्यान रखने वाले का यही हाल हो सकता है, विशेषकर तब जब अपने लिए बहुत ऊँचे स्टैंडर्ड रखे. त्याग इतना अधिक भी नहीं होना चाहिए कि अपना निज ही न बच पाए. काश कुछ बेह्तर प्रबंध होते.
घुघूतीबासूती

Arvind Mishra said...

तो फेसबुक में इंगित जनाब यही थे :-)
आज भी आप सरीखे व्यक्तियों से यह आश्वस्ति बनी हुयी है कि मनुष्य की संवेदनाएं अभी तिरोहित नहीं हुईं .....
इतनी संवेदनशीलता -दिमाग का भी कोई बेल्ट होता काश ! आपके लिए वह ज्यादा जरुरी होता,आपकी ही खैरियत के लिए :-)

Piyali Piyu said...

पढ़ते पढ़ते खो गई मैं । पलकों से आँसू ढलकने को थे कि तभी पोस्ट पूरा हो गया । सजीव चित्रण लगा है आँखों के सामने ही सब घट रहा हो ।

प्रतिभा सक्सेना said...

डॉक्टर हो कर भी यह स्थति आने दी.सब झेलने को को अकेली छोड़ दिया,सहयोग दिया होता तो ऐसा नहीं होता!

Umesh Yadav said...

Anu, Bahut achcha post laga, aur gaana uska ak atyant sateek vistar laga. Main bhi sochata hoon ki ye bas ek yatra vrittant hi hai.. par aas paas aise hi logon ko dekh apani soch pe kofta hota hai. Aankh pher lene se sachh gayab nahi hota... Jindagi sach me kya kya hoti hai.
Kayee aise couple apane special bachchon ko kahin chhod (apane se alag) kar sukhi hain, kya unke andar bhi aathish-fishaan hai, jo katra katra pighal raha hai?!

PD said...

अच्छा किया अनु जी, जो आपने सुदेशना के हाथों में भी एक बेल्ट नहीं दिया.

Mukesh Kumar Sinha said...

Sudeshna ke sachche hamdard nikle aap:)

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत संवेदनशील पोस्ट .... अच्छा हुआ कि आपने सुदेशना का नंबर फेंक दिया ... सब को अपने रास्ते खुद ही बनाने पड़ते हैं ।

liveaaryaavart.com said...

संवेदनशील पोस्ट