Thursday, August 30, 2012

ख़्यालों, ख्वाबों, ख़्वाहिशों के ख़त

एक मम्मा थी। कभी बहुत बोलती थी, कभी ख़ामोश रहती थी। मम्मा का पूरा दिन अपने मन के आंगन से ख़ामख़्याली के पंछियों को उड़ाने में जाता था। मम्मा अच्छी चिड़ीमार नहीं थी, इसलिए ख़्यालों के पंछियों को फुर्र-फुर्र करके उड़ा दिया करती थी, उन्हें शब्दों के पिंजरों में बंद करने का हुनर उसे कभी आया ही नहीं।

ख़्यालों को उड़ाते-उड़ाते जब उलझ जाया करती तो ख़्वाब बुनने लगती - उस हसीन दुनिया के ख़्वाब जहां अमन-चैन हो, जहां बताशों के बदले प्रसाद में मीठी बोलियां बांटी जाती हों, जहां दुख-तकलीफ़ों के बीच हौसले के पुल बनाने को प्रोत्साहन मिलता हो।

फिर कुछ ऊंटपटांग-सी ख़्वाहिशें भी थीं मम्मा की। फर्श पर छितरा गए दूध से सफ़ेद लकीरों वाले रेखाचित्र बनाने की ख़्वाहिश, खुरदुरी और सख़्त हथेलियों की कटी-पीटी लकीरों को बच्चों के इरेज़र से मिटा देने की ख़्वाहिश, अपनी सोच की धार को उनके शार्पनर से और नुकीला कर देने की ख़्वाहिश, पार्क में अकेले बैठे सफेद मूंछोंवाले राजगढ़िया अंकल को खीर खिलाने की ख़्वाहिश, आस-पास तैरती बेनामी कहानियों को डिब्बों में बंद कर देने की ख़्वाहिश...

इन ख़्यालों, ख़्वाबों और ख़्वाहिशों के ख़त मम्मा चलते-फिरते, सोते-जगते, रुकते-थमते, हंसते-बोलते जाने किसको-किसको लिखा करती थी। वक़्त कम पड़ता गया, वो ख़त पूरा नहीं हुआ और एक जो क़ासिद हुआ करता था, वो भी थककर चला गया।  इस डाकखाने में नहीं, सारे ज़माने में नहीं... मम्मा गुनगुनाती रही और फिर भी अपने दिमाग में लिखती रही एक के बाद एक चिट्ठियां...

1.

लाल बत्ती के हरियाते ही
गाड़ियों के बीच से
निकल जाएगी
उस मम्मा की गाड़ी

बगल की सीट पर
ख़ामोश बैठे रहेंगे
सुबह पांच बजे
उठकर तैयार किए गए
टपरवेयर के डिब्बे
और पीछे की सीट पर
दो बच्चे

एक को डेकेयर छोड़ने के बाद
दूसरे को 'स्कूल फॉर स्पेशल चिल्ड्रेन'
पर छोड़ आएगी वो
और फ़ीस के लिए
ज़लालत को निगलकर
दिनभर करेगी जद्दोज़ेहद

शाम तो फिर भी होगी,
है ना मम्मा?

2.

खीर में पीसकर डालो इलायची
तो खुशबू
बढ़ा देती है स्वाद
मां की रेसिपी डायरी में
क्यों नहीं मिलता
ज़िन्दगी का अचार डाल सकनेवाला
कोई नुस्ख़ा।

3.

सुरमई रात
बरसती रही
बहाती रही काजल
हम उम्मीद की आंखें मूंदे
तकिए में सिर घुसाए
काटते रहे रात।

4.

चलो छोड़ो
करो ना वक़्त ज़ाया
नहीं पढ़ता इन दिनों कोई चिट्ठियां
हमारे लेटर बॉक्स में भी सिर्फ
टेलीफोन और बिजली के बिल मिलते हैं

फिर भी मैं कैसे फाड़ दूं
तुम्हारे पते वाला लिफ़ाफ़ा?


9 comments:

Dr.Nidhi Tandon said...

चलो छोड़ो
करो ना वक़्त ज़ाया
नहीं पढ़ता इन दिनों कोई चिट्ठियां
हमारे लेटर बॉक्स में भी सिर्फ
टेलीफोन और बिजली के बिल मिलते हैं

फिर भी मैं कैसे फाड़ दूं
तुम्हारे पते वाला लिफ़ाफ़ा?
सुन्दर...भावभीना

Pallavi saxena said...

नहीं पढ़ता इन दिनों कोई चिट्ठियां
हमारे लेटर बॉक्स में भी सिर्फ
टेलीफोन और बिजली के बिल मिलते हैं

फिर भी मैं कैसे फाड़ दूं
तुम्हारे पते वाला लिफ़ाफ़ा? बहुत ही सुंदर एवं गहन भावभिव्यक्ति...

Ramakant Singh said...

सुरमई रात
बरसती रही
बहाती रही काजल
हम उम्मीद की आंखें मूंदे
तकिए में सिर घुसाए
काटते रहे रात।

beautiful lines

Rahul Singh said...

खुशबूदार और चटख.

राजेश सिंह said...

ख़त उनका और पता तुम्हारा,मगर हर बार की तरह मैं ही जाऊंगा फाड़ा

देवांशु निगम said...

ऐसे बहुत से खाब होते हैं जो पलकों की खिड़कियों में बस फंसे रह जाते हैं | उनको मानी नहीं मिलते | लास्ट वाली लाइन्स मुझे बहुत अच्छी लगीं :
चलो छोड़ो
करो ना वक़्त ज़ाया
नहीं पढ़ता इन दिनों कोई चिट्ठियां
हमारे लेटर बॉक्स में भी सिर्फ
टेलीफोन और बिजली के बिल मिलते हैं

फिर भी मैं कैसे फाड़ दूं
तुम्हारे पते वाला लिफ़ाफ़ा?

प्रतिभा सक्सेना said...

ज़िन्दगी का अचार डालना कौन सीख पाया आज तक !

Mired Mirage said...

जिंदगी का आचार ! वाह! रेसिपी मिले तो बताइयेगा.
घुघूतीबासूती

My Soulsoup said...

बहुत ही बढ़िया । अब लेटरबाक्स में पाती मिलती नहीं पर ढूँढती रहती हूँ ...... यह सोचते हुए कि कभी तो प्रियतम् ख़त लिखेंगे ।