Friday, May 4, 2012

जब से हुई है शादी

जी में आता है शादी नाम की मुसीबत के लिए टोकरी भर-भर के गालियां निकालूं। जाने वो कौन-सी सभ्यता रही होगी जिसने दुनिया भर के जाहिल-गंवार-नाकारा-असभ्य-गैरज़िम्मेदार लोगों को इस एक बंधन में डालकर सभ्य और ज़िम्मेदार बना डालने का बेहद बेहूदा काम किया होगा?

और बंधन कैसे इंसानों को इंसान बनाए रखते हैं, शादी क्यों जरूरी होती है और परिवार की भूमिका क्या होती है समाज में, इसके तर्क तो मेरे सामने ना ही पेश किए जाएं। मैंने भी शादी की है भाई। दो बच्चों को बड़ा कर रही हूं। ठीक-ठाक खुशहाल परिवार चला रही हूं, और भली-भांति विवाह के समस्त नियमों को निभा भी रही हूं। सात फेरों के सातों वचन भी याद हैं और पतिदेव की यादाश्त पर भी पूरा भरोसा है। फिर भी दोस्तों, शादी क्यों करते हैं लोग?

कल रात से ढूंढने की कोशिश कर रही हूं, एक वो दंपत्ति जो मिसाल हो कि जनाब, शादी हो तो ऐसी वरना सब कुंआरे ही अच्छे। ना किसी ने ऐसी मिसाल पेश की है अबतक ना शादी के खिलाफ आवाज़ उठाता है कोई। बल्कि गैर शादीशुदा लोगों से तो परिवार-समाज को इस कदर परेशानी होती है कि राह चलते-चलते भी मैचमेकिंग से बाज़ नहीं आते लोग।

बैंड बाजा बारात देखती हूं तो एक ही ख़्याल आता है, चलो भईया, दो और के शहीद हो जाने का जश्न मनाते हैं मिलकर। पनीर मटर, मुर्ग मुसल्लम और खोए के साथ गाजर का हलवा खाते हैं कि आज के बाद तो इधर का ज़ायका यूं भी बिगड़ ही जाना है बुरी तरह।

शादी की सालगिरह भी अपनी उसी गलती की घनघोर याद दिलाने के लिए आया करती है।

फोन करती हूं पापा को और शादी के पैंतीस साल पूरे होने की बधाई देती हूं। पापा चुप हैं थोड़ी देर, फिर से धीरे से अपने ख़ास अंदाज़ में कहते हैं - ठीक बा... (माने, दर्द-ए-दिल का हाल मत ही पूछो तो अच्छा)। हम इधर-उधर की बातें करते हैं पूरे अठतालीस सेकेंड, जिसके बाद मैं मम्मी के बारे में पूछती हूं।

उनका फोन नहीं लगा? ये सवाल है या जवाब, सूझा नहीं। अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि दोमंज़िला मकान में रहनेवाले दो लोग अलग-अलग मंज़िलों पर होंगे सुबह के इस वक्त। पापा ने टेरेस पर चापाकल चलाकर गमलों में पानी दिया होगा, सूखी हुई पत्तियां चुनी होंगी, ये भी मुमकिन है कि छत पर झाडू भी लगा दिया हो सुबह-सुबह।

मम्मी भी उठते ही सफाई अभियान में लग गई होंगी। मच्छरदानियां खोलकर, बिस्तर बनाए होंगे, डस्टिंग की होगी और चार बार फ्रिज की कटोरियां अंदर-बाहर की होंगी। दूध खौलाया होगा, चाय बनाई होगी और पापा के लिए बिना चीनी की चाय ऊपर भिजवा दी होगी ड्राईवर से।

एक घर में होते हुए दोनों बड़े कमाल के तारतम्य के साथ उतनी ही तन्मयता से अपने अपने कामों में लगे होंगे। मम्मी को मंदिर जाना होगा, पापा को साईट। ये भी मुमकिन है कि साथ ही निकले होंगे दोनों। हो सकता है, पापा के लिए अपनी पसंद की शर्ट मम्मी ने निकालकर रख दी हो बिस्तर पर, और खुद बांध ली हो उनके पसंद की कोई साड़ी। बिंदी और चूड़ी का रंग भी शायद मैच करता हो साड़ी से। शादी की सालगिरह साल में एक बार ही तो आती है। ये भी मुमकिन है कि शुगर-फ्री डालकर शाम को पापा के लिए खीर भी बना दें।

शादी इसलिए करते हैं लोग, अब समझ में आया है। साथ होते हुए साथ ना होना, साथ ना होते हुए होना... इसलिए करते हैं शादी। तमाम बंधनों को स्वीकारने के साथ जीवनसाथी को कोसते रहने का सुख शादी में दिलचस्पी बचाए रखता है। गंदे तौलियों और बिखरी चप्पलों के साथ किसी की उपस्थिति का जो सुकून होता है उसे कोई और रिश्ता नहीं दे सकता, यहां तक कि मातृत्व भी नहीं। शादी दरअसल ज़िन्दगी में आस्था बनाए रखने का एक और रूप है। वरना बिन घरनी घर भूत का डेरा और बिन शौहर के कैसा बसेरा।

रही बात मां-पापा की, तो मुझे यू टू का गाया गाना याद आ गया है दफ्फ़तन - कान्ट लिव विद और विदाउट यू! वेल, इन्डीड!


सही पहचाना। मैं इतने ही हैंडसम पेरेन्ट्स की उतनी ही हैंडसम बेटी हूं। :p


10 comments:

Ramakant Singh said...

शादी पर सबके अलग अलग सार्थक और व्यक्तिगत विचार
अंधों की कहानी जैसी जिसने जैसा पाया वैसा ही बखाना .
शादी चिंतनीय किन्तु अनुकरणीय रोग .

Ramakant Singh said...

शादी पर सबके अलग अलग सार्थक और व्यक्तिगत विचार
अंधों की कहानी जैसी जिसने जैसा पाया वैसा ही बखाना .
शादी चिंतनीय किन्तु अनुकरणीय रोग .

rashmi ravija said...

बिन घरनी घर भूत का डेरा और बिन शौहर के कैसा बसेरा।..क्या बात :)

साथ होते हुए साथ ना होना, साथ ना होते हुए होना... इसलिए करते हैं शादी ।...शादी को कित्ती अच्छी तरह परिभाषित किया है..

आपके मम्मी-पापा को शादी की सालगिरह की अशेष शुभकामनाएं

अजय कुमार झा said...

अपना अपना जीवन , और अपने अपने अनुभव

Bhagat Singh Panthi said...

शादी इसलिए करते हैं लोग, अब समझ में आया है। साथ होते हुए साथ ना होना i feel it

प्रवीण पाण्डेय said...

हमारी ओर से बधाई दें..

Arvind Mishra said...

अकसर कहा जाता है न कि यह वह गुड़ है जो खाए वह भी पछताये और जो न खाये वह और पछताये ... :) तो फिर खाकर ही पछताना बेहतर है ..
आपके मम्मी पापा को मेरी और से भी बहुत शुभकामनाएं ....
अदिति अब ठीक हो गए होंगें!

Rahul Singh said...

इसी तरह हमेशा नई परिभाषाएं गढ़ी जाती रहें, व्‍याख्‍याएं होती रहें.

दीपक बाबा said...

शादी का गोल गोल लड्डू --
दुनिया गोल है की भांति,

दस बरस बाद यहीं यक्ष प्रश्न खड़ा होता है,
शादी क्यों की.

ainadevil said...

Anu Di, mujhe is blog ke baare mein Nandita ne bataya tha.. aur main bahut dins e soch rahi thi ki padhoongi.. aajjab maine padha toh apni muskurahat rok nahi saki aur ek-aada aansoon bhi... life ki chhoti chhoti baaton ko apne kitni aasani se keh diya.. main jaanti hoon mere parents bhi aise hi karte hai!kuch bolenge nahi par bina bole itna kuch keh jaate hai...!!! inke pyaar ko salaam!! :)