Wednesday, November 2, 2011

बड़ा रे कठिन कइलू छठी के बरतिया...

छत पर खड़े होते तो सामने कांके डैम दिखता। दूर खेतों के पार, दो छोटी पहाड़ियों से लगकर खड़ा, शांत और स्थिर। पानी के किनारे भी नज़र आते, किनारों पर पसरे खेत भी। कहीं-कहीं खेतों के बीच से निकलती हुई पगडंडियां दूर घने मोहल्ले में जाकर गुम हो जाया करतीं। मैं अक्सर उन पगडंडियों-सा होने की ख्वाहिश करती - जिसका एक सिरा वीराना हो और दूसरा घनी बस्ती।

हमें उस डैम तक अकेले जाने की इजाज़त ना थी। अकेले तो क्या, दो-चार लोगों के साथ भी नहीं। घर से महज़ दो किलोमीटर नीचे चलते चले जाते तो डैम के किनारे ठंडी हवा और ढेर सारी जगह का आनंद लिया जा सकता था। लेकिन ऐसा ख़्याल भी वर्जित था। सभ्य लोगों के मोहल्ले खत्म होते ही डैम के पहले खेतों के आर-पार आदिवासी बस्ती थी जहां से हंड़िया की तीखी गंध सालों भर आती। उस बस्ती से काम करने के लिए महिलाएं या लड़कियां ही निकलतीं। मर्द या तो दिनभर मुर्गे लड़ाते नज़र आते या बरगद की ज़ड़ों पर बैठकर ताश के पत्ते बांटते। जो दो-चार आदमी काम पर जाते भी,  वे रिक्शा चलाते और दिहाड़ी मजदूरी करते। हां, शाम को हंड़िया पीने के वक्त स्त्री-पुरुष का भेद ना रहता और उस बस्ती की यही बात मुझे सबसे अच्छी लगती थी।

साल में दो दिन ही हमें इस बस्ती से होकर गुज़रने की आज़ादी थी। छठ के उन दो दिनों में घाट की ओर जाते हर  गली, हर पगडंडी में छठी मैया का वास माना जाता और तब रास्तों का भेद भी ख़त्म हो जाया करता। हंड़िया की गंध हालांकि उन दो दिनों में भी खूब आती थी, इतनी ही कि बस्ती से गुज़रते हुए छठव्रती ना चाहते हुए भी नाक पर हाथ रख दिया करते। ये बात और थी कि इस बस्ती की महिलाओं के बगैर किसी के चौके-चूल्हे क्या साफ होते, पूजाघर में झाड़ू-पोंछा कैसे होता और यहां के आदमियों के रिक्शे ना होते तो अर्घ्य के लिए सूप, दौरा, केतारी, नारियल और धूप-अगरबत्ती जैसी पूजन सामग्री दरवाज़े पर कैसे उतरती।

दोपहर होते-होते कांके डैम के चारों ओर पूरा रातू रोड जमा हो जाता। मन दूसरे किनारे पर लगा रहता और किनारों के बीच बहता पानी आग का दरिया लगता। इश्क जाने कैसे-कैसे रंग दिखाता है! इस सारी आपाधापी और कोलाहल में किसी की नज़र आप पर हो ना हो, दुपट्टे का रंग सतरंगी ही होता, कानों में कभी मछलियां, कभी तितलियां लटकतीं और कुर्ते का रंग हमेशा उस कार्डिगन से मैच करता जो पहली सर्दी के लिए निकला था पहली बार। खुद पर अंशभर भी अधिक प्यार आया हो तो माथे पर भी वही रंग चिपक जाता।

छठब्रतियों की नज़र अस्ताचल की ओर रत्ती-रत्ती खिसकते सूरज की हरकत पर होती तो बाकी पटाखे चलाने, एक-दूसरे को छेड़ने और किनारे पर गप्पें हांकने में लगे रहते। घाट पर कई सालों तक बहुओं को आने की इजाज़त ना थी। उनका काम घर में व्रतियों के लिए अगले दिन का भोजन तैयार करना, ठेकुए ठोकना और तलना होता। बाद में ये परंपरा भी बदली और बहुओं को सोलह श्रृंगार से साथ घाट पर लाया जाने लगा, जैसे किसी नुमाईश के लिए निकाला जा रहा हो। छठ के हैंगओवर में कई दिनों तक घाट पर आई बहुओं के रूप-रंग-गुण-अवगुण पर मोहल्ले की महिलाएं नुक्ताचीं के लिए भी बैठा करतीं।

सूरज के डूबने से पहले कादो-मिट्टी के किनारे से होते हुए फिसलते-गिरते पानी में उतर जाने की होड़ लग जाया करती। तब संतुलन बनाए रखने के लिए किसी अनजान का हाथ थामना भी वर्जित ना होता। पानी में अर्घ्य देने के लिए उतरी मां-चाचियों-काकियों-दादियों को छू लेने पर से छठी मैया का आशीर्वाद अपने लिए बुक हो जाया करता। उनके 36 घंटों के कठिन उपवास से हम इतने भी लाभान्वित हो जाएं, क्या कम था!

असल मशक्कत तो सुबह के अर्घ्य के लिए उठने में होती। रजाई छोड़ सुबह तीन बजे उठकर तैयार हो जाने का ख्याल भी उस वक्त से एक सज़ा से कम नहीं लगता। लेकिन यहां किसी उम्र के किसी शख्स को कोई छूट ना मिलनी थी।

......

"हलो पापा?" फोन पर इतना कहकर चुप हो गई हूं। पीछे से आती हुई आवाज़ में गीत के बोलों को पकड़ने की कोशिश में पापा क्या कह रहे हैं, ये सुना नहीं। दो-चार इधर-उधर की बातें करने के बाद फोन भी रख दिया है। जहां हूं, वहां से एक किलोमीटर की दूरी पर सनातन मंदिर में छठव्रती अर्घ्य देने के लिए छोटे-छोटे हौदों में उतरे होंगे, कालिंदी कुंज में यमुना के दोनों किनारों पर भी शायद सज गए होंगे घाट। थोड़ी और कोशिश करूं तो दिल्ली में मौजूद रिश्तेदारों के यहां उनकी छतों पर बैठकर बच्चों को छठ की पूजा भी दिखाई जा सकती है। ये भी ना हो तो टीवी पर अर्घ्य लाइव देखा जा सकता है। लेकिन कई बार स्मृतियां ऐसे घने कोहरे-सी साथ चलती हैं कि आगे कुछ दिखता नहीं, वक्त के साथ दो कदम चलते हुए नई स्मृतियां बनाने की भी इच्छा नहीं होती।

आज तीन बजे से जगी हुई हूं और कांके डैम के किनारे की वो पगडंडियां याद आ रही हैं जिनके एक सिरे पर वीराना होता, दूसरे पर घनी बस्ती। सुना है कि पगडंडियां रही नहीं और खेत घनी बस्तियों में तब्दील हो गए हैं।     दादी ने अभी-अभी कहा है फोन पर, अब हम बूढ़ हो गईल बानी...                                                          

 

4 comments:

वाणी गीत said...

उस समय तो सभी को जल्दी उठना पड़ता था , और सचमुच यह कोई मजबूरी नहीं होती थी , ख़ुशी खुश बड़े चाव से ठन्डे पानी में एक किनारे से दूसरे किनारे सहेलियों के साथ दौड़ भाग , सूर्योदय के अर्ध्य के बाद प्रसान माँगना , अपनी स्मृतियों में हमारी स्मृतियाँ भी जोड़ लीजिये !

Vivek Rastogi said...

स्मृतियाँ बहुत गहरी होती हैं, और कब और कैसे खेत घनी बस्तियों में तब्दील होते जा रहे हैं, पता ही नहीं चलता है।

Arvind Mishra said...

छठ महा अनुष्ठान का शब्द चित्रों में जीवंत वर्णन,कितनी ही बारीकियों को भी समेटे हुए और आपकी "जितना कहा उससे अधिक समझ लेने को अनकहा सा संकेत" देती विशिष्ट शैली यहाँ भी उभार लिए :)

Puja Upadhyay said...

मुझे भी अपने देवघर में छठ की याद आ गयी...भोर की अर्घ्य के लिए उठाना वाकई कठिन काम होता था. लगभग चौथाई बाल्टी में गर्म पानी मिलता था...उसी में ठंढा पानी मिला के किसी तरह नहाते थे सुबह सुबह.

आपको पढ़ के सारी तस्वीर आँखों के सामने खिंच गयी. काफी देर से पढ़ रही हूँ आपको और लगता है की वापस घर पहुँच गयी हूँ.