Sunday, November 27, 2011

कौना बने रहलू ऐ कोयलर...


ये बीसियों कमरों, बड़े दालानों, चार आंगनों और चार चापाकलों वाला घर है – हमारा पैतृक घर। यहां सालों भर लोग कम, अनाज की बोरियां और बिल्ली के बच्चे ज़्यादा दिखाई देते हैं। छठ-त्यौहार या शादी-ब्याह के मौके पर जब परिवार जुटता है तो महाराज को कोई तय गिनती नहीं बताई जा सकती कि कितने लोग होंगे। चालीस-पचास से लेकर सौ-सवा सौ तक – ये संख्या कुछ भी हो सकती है। लेकिन अन्नपूर्णा मेहरबान हैं कि हांडियों में खाना कभी घटता नहीं और विश्वकर्मा मेहरबान हैं कि सोने के लिए कमरे कम नहीं पड़ते।
हम यहां मेरे छोटे भाई की शादी की कुछ रस्में पूरी करने आए हैं। हमारी जड़ें नदी के किनारे बसे इस गांव में ज़रूर है, लेकिन शाखें बरगद की तरह ऐसे फैली हैं कि जाने कई शहरों में अब नई जड़ें नज़र आने लगी हैं। हम दो भाई-बहनों की शादी यहां से नहीं हुई लेकिन सबसे छोटे बेटे का शुभ विवाह करने के साथ-साथ अपनी सकल ज़िम्मदारियों की पूर्णाहुति के लिए पापा गांव लौटते, ये लाज़िमी था।
एक कमरे में हमारे जहाज़ जैसे सूटकेस चौतीस साल पुराने पलंग के नीचे धकेले जा रहे हैं। पलंग एन्टीक हो गया है मम्मा, बदल डालते हैं, मैंने कहा है। मम्मी भी एन्टीक हो गई है, मां ने हंसते हुए कहा है। इसलिए तो बदली जा रही है। पुरानी बहुओं की जगह नई बहुएं लेंगी अब। पदवी बदली है तो सिर का पल्लू भी सरक के कंधे पर उतरे, मैं मां से कहती हूं। लेकिन आदत से लाचार मां का पल्लू सिर से एक सेंटीमीटर भी नहीं सरकता। ऐसे लाल-पीले पल्लू से सिर ढंके हुए दिनभर चलते-फिरते सारे काम निपटा लेना भी एक कला ही होती होगी। मैंने ये कला सीखने की कोशिश भी नहीं की, ना ऐसी कोई मंशा है। सबकी रुसवाईयां झेलते हुए भाभियों को भी अपने ही पाले में रखा है।
तिलक-फलदान और शादी के साथ जनेऊ भी होना है, इसलिए सभी रस्में दोहराई जाएंगी। शगुन चूमाने के साथ सबसे पहली रस्म मटकोर की होनी है। मम्मी पूरे जतन से अपनी बड़ी बहू को (जो उड़ीसा से है) बिहार की रस्में समझाती जा रही हैं। हम किसान हैं, इसलिए मिट्टी और प्रकृति हमारे लिए सबसे पूजनीय है। पेड़, पौधे, घास-दूब, मिट्टी, हवा-पानी सबकी पूजा की जाएगी बारी-बारी से। नदी के किनारे खेत से शादी की वेदी बांधने के लिए मिट्टी खोदकर लाई जाएगी जिस रस्म को मटकोर कहते हैं।
मटकोर के लिए अंतःपुर से सभी महिलाएं लाल-पीली बनारसी और साउथ सिल्क की साड़ियों में निकलती हैं। अंधेरा घिर आया है, इसलिए किसी के हाथ में टॉर्च तो किसी के हाथ में लालटेन है। मुझे याद है कि पंद्रह साल पहले तक मेरी दादी तक को बिना बनारसी चादर से सिर ढंके दरवाज़े से निकलने की अनुमति नहीं थी। शुक्र है कि ज़रीवाले चादरों को संदूकों में डालकर उनके मुकम्मल जगह पहुंचा दिया गया है।  
कौना बने रहलू ए कोयलर, कौना बने जास/केकरा दुअरिया ए कोयलर कौना बने जास/केकरा दुअरिया ए कोयलर उछहल जासशुभ का संदेश लेकर आनेवाली कोयल को उलाहना देते हुए पहला गीत गाया जाता है, कौन से वन में इतने दिनों तक भटक रही थी ऐ कोयल, कितनी देर से हमारे दुआर पर आई हो अब। खुशी से लबरेज़ तुम्हारी आवाज़ सुनकर हमारे मंगलगीतों में भी खुशियां उतर आई हैं। घर की ड्योढ़ी से निकलते हुए कोयल के बहाने उन पुरखों को याद किया जाता है जो इस दरवाज़े से गुज़रे, जिनकी स्मृतियां शेष हैं और जिनके आशीर्वाद के बिना कोई भी शुभ कार्य संपन्न नहीं हो सकता।
गांव के हर समुदाय के सहयोग के बिना दो डेग बढ़ना मुमकिन ना हो, यहां तो शादी जैसे महायज्ञ का आयोजन है। इसलिए नाई-नाउन के साथ कुम्हार, दलित, अति दलित, हरवाहे और गोड़िन को बुलाया जाता है। पूजा के लिए दौरा अति दलित (गांव में जिसे डोम कहते हैं, और इस शब्द से मुझे चिढ़ है) के घर से आता है। इसी दौरे में पूजन सामग्री सजाकर रखा जाता है। घर से निकलते ही पहली पूजा ढोल की होती है, जिसे चमटोली से मंगवाया गया है। अक्षत, पान, सुपारी से पूजे जाने के बाद महिलाएं गीत गाते हुए निहोरा करती हैं - बजाव भईया चमरा बजाव डागाढोलक। लेकिन बिना अपने मनमुताबिक नेग लिए ढोल बजता नहीं, महिलाओं की टोली आगे बढ़ती नहीं। हंसी-ठठे और मान-मनौवल के बाद ढोलक की थाप पर गीत गाते हुए महिलाओं की टोली मिट्टी पूजन के लिए निकलती है। मिट्टी जे उठेला झकाझक/सोहाग के माटी/कौना बाबा के बेदी हम जाएब/सोहाग के माटी गाते हुए दूबवाली मिट्टी दौरे में डाल दी जाती है, सुहागन महिलाओं के खोयचे में जौ के दानों के साथ ढेर सारा आशीर्वाद डाल दिया जाता है और अब कुम्हार के चाक और कलश की पूजा होती है। किसान की गृहस्थी में इस्तेमाल होनेवाले सभी सामान, जैसे खर-मूसल और हल-जुआठ तक किसी ना किसी रूप में विवाह या शुभकार्य के दौरान पूजे जाते हैं।
अब हल्दी लगाने और आशीर्वाद लेने-देने का वक्त हो चला है। कोयल मोरों के इसी वन में बसी रहना, डाल-डाल पर से मीठी बोलियां बांटती रहना। हम अपने-अपने जंगलों को लौट भी गए तो अपनी जड़ें कहां भूल पाएंगे?
(पुनश्च: हमारे गांव का नाम मोरवन है। बचपन में याद है कि हमारे दरवाज़े पर फुलवारी में मोरों का एक जोड़ा रहता था। उन मोरों के साथ नाचकर हमने बारिश के कई मौसमों का आगाज़ किया है, उनके पंखों को किताबों के पन्नों में दबाया है और पेड़ों पर चढ़-चढ़कर उनके अंडे गिने हैं। मोर रहे नहीं, ना फुलवारी की वो रौनक रही। लेकिन जड़ें तो फिर भी यहीं हैं।)

10 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

गावों का माहौल, सामूहिक आनन्द उठाने की मानसिकता शहरों में खोती जा रही है और सिकुड़ते जा रहे हैं हमारे व्यक्तित्व।

Rahul Singh said...

'बजाव भईया ... बजाव डागाढोलक' शब्‍द बदलने का सुझाव है, इस प्रयोग पर छत्‍तीसगढ़ में अशांति और कानूनी कार्यवाही भी हो सकती है.

Kailash C Sharma said...

शहरीकरण के साथ हमारे पुराने रीति रिवाज़ और संस्क्रति केवल यादों की धरोहर बन् कर रह गयी हैं...बहुत सुंदर आलेख...

http://batenkuchhdilkee.blogspot.com/

देवेन्द्र पाण्डेय said...

परंपराओं को सहेजती..जड़ों की खुशबू बिखेरती सुंदर पोस्ट।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

गाँव की खुशबू बिखेरती अच्छी पोस्ट

Arvind Mishra said...

सांस्कृतिक माहौल में सराबोर हैं आप और मोरवन उस परिवेश का क्या कहना जहां आपकी संवेदना और कल्पनाशीलता ने अंगडाई ली... मैं तो मोरवन को ही सारा क्रेडिट देना चाहता हूँ !क्रेडिट सभी बातों के लिए -यह पोस्ट सामने तक के लिए ...

rashmi ravija said...

बरसों पहले...एक मटकोर में शामिल हुई थी..सारे दृश्य कौंध गए....तब तक तो सलमा-सितारे वाली चादरों के बिना कोई पूजा संपन्न नहीं होती थी...अब शायद वहाँ भी बदल गया हो...

Puja Upadhyay said...

आज आपको पढ़ रही हूँ, लगता है जैसे वापस घर लौट आना हुआ है. सीधा मन को छूता है आपका लिखा हुआ. दृश्य भी वही हैं जो अपनी आँखों से देखे थे, पर देखे हुए को ऐसा सहेजना सबसे नहीं हो पाता. आपके ब्लॉग के रस्ते गाँव की पगडंडियों पर वापस पहुंची हूँ...आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ.

thewayyoumakemefeel said...

Hi Anu, I don't know if you remember me, but were together (well, sort of!) at LSR and then at NDTV. Chanced upon your blog recently, and just can;t stop reading it! I am literally savouring each one of them....tum bahot sundar likhti ho. My younger brother got married just a couple of weeks back, amid a lot of traditional ceremonies...and this particular piece helped me relive those moments! Lots of love...Shruti

thewayyoumakemefeel said...

Sorry...just realised that I posted this comment from a corporate ID, and now I cant figure out how to change/delete that! Will reach out from my personal ID soon. Cheers!