Friday, March 12, 2010

मैं औरत भी हूं, इंसां भी

आंखों में हैं ख्वाब कई, पैरों में लेकिन बंदिश है,
मुझको मेरी मिले ज़मीं, इतनी-सी ही ख्वाहिश है।
कभी खड़ी रही, कभी टूट गई,
मैं औरत भी हूं, इंसां भी।

मैं जीवन का बीज लिए उम्मीदों पर ही जीती हूं,
शिवशंकर-सा विष सारा कंठ सहारे पीती हूं।
फिर भी अमृत ही मैं घोलूं
मैं औरत भी हूं, इंसां भी।

मंरे कंधों पर बोझ कई, कई रिश्तों का भी मतलब मैं,
कभी कहते हो बरकत हूं, कभी बन जाती हूं गफलत मैं।
फिर भी तुमपर मैं करूं यकीं,
मैं औरत भी हूं, इंसां भी।

मुझसे ही घर में खुशियां हैं, मुझसे ही रौशन है दुनिया,
कभी अम्मा हूं, कभी दीदी मैं, फिर बनती हूं मैं ही मुनिया।
मेरी थोड़ी तो कद्र करो,
मैं औरत भी हूं, इंसां भी।

आने दो मुझको घर अपने, फिर आंगन की देखो रौनक,
फूल-फूल में रंग होंगे, कोना-कोना होगा जगमग।
कई रूप-रंग में सजती हूं,मैं औरत भी हूं, इंसां भी।

1 comment:

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर भाव!